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यूरोप ने आज के अपने स्वैग के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, खून से अपनी बर्फ बार-बार रंगी है

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shrish pathakश्रीश पाठक. ये उन सज्जन का नाम है, जिनकी तस्वीर आप बाईं तरफ देख रहे हैं. असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. गलगोटिया यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में पढ़ाते हैं. श्रीश ने लल्लनटॉप के रीडर्स के लिए यूरोप का हाल लिख भेजा है. इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में इंट्रेस्ट है, तो ये आपके लिए किसी ट्रीट से कम नहीं है. बांचिए.

वैश्विक राजनीति पर यह दरअसल उनके लेख की दूसरी कड़ी है. पहला भाग (एशिया पर) हम आपको पहले ही पढ़वा चुके हैं.


चौबीस घंटे की एक क्लॉक से अगर अपनी पृथ्वी की अभी तक की जिंदगानी को दिखाने की कोशिश हो तो हम इंसानों की औकात महज इतनी है कि 00:00 से शुरू हुई घड़ी में हम तकरीबन 11:58 पर अवतरित हुए. पर लगता यों है कि हिस्ट्री हमीं से है, इस जहान की. उसमें भी पिछले दो-तीन सौ साल से यूरोप का चैप्टर चल रहा और लगता यही है कि जैसे दुनिया का सारा ‘फर्स्ट’ यहीं से बिलॉन्ग करता है. सत्ता जिसकी होती है, उसी का रहन-सहन होता है, उसी का भौकाल होता है, उसी की भाषा होती है और उसी की परिभाषा होती है.

सुबूत ये है हुज़ूर कि इवेन इस आर्टिकल में भी अगर अंग्रेजी के वर्ड्स निकाल प्योर हिंदी के डाल दें, तो इसे बोझिल लगना चाहिए. इतिहास का पिता हेरोडोटस को मानना होता है, जो यूरोप के एक देश ग्रीस का निवासी था. हम पढ़ते हैं कि अमेरिका की खोज कन्फ्यूज़्ड क्रिस्टोफर कोलम्बस ने की, जो इंडिया ढूंढते-ढूंढते कैरिबियाई द्वीपों से जा टकराया.

कोलम्बस ने अफ्रीका के सिरे से भारत को देखा, तो उसे केप ऑफ गुड होप कहा. (फोटोः विकिमीडिया कॉमन्स)
कोलम्बस ने अफ्रीका के सिरे से भारत को देखा, तो उसे केप ऑफ गुड होप कहा. (फोटोः विकिमीडिया कॉमन्स)

अमेरिका पहले भी वहीं था, पर यूरोप के देश इटली के नाविक को पहली बार मिला तो अमेरिका की खोज हुई. यों ही आखिरकार भारत की भी खोज हुई, क्यूंकि पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा को ये देश पहली बार मिला. इंडिया का भौकाल समझिए, कि 20 मई, 1498 को केरल के कप्पडु क्षेत्र में उतरने के करीब 8000 किमी पहले ही अफ्रीका के जिस द्वीप से कोलम्बस इंडिया को पहली बार देख पाया, खुशी में उस द्वीप का नाम ही केप ऑफ़ गुड होप रख दिया. सिक्का यूरोप का होगा तो टकसाल भी यूरोपियन होगी और करेंसी (चलन) में वही होगा जो यूरोप का होगा.

कनाडा से महज दो प्रतिशत बड़ा है, पर महाद्वीप तगड़ा है यूरोप. दुनिया का दूसरा सबसे छोटा महाद्वीप यूरोप है पर इसमें दुनिया का सबसे बड़ा देश रूस है और दुनिया का सबसे छोटा देश वेटिकन सिटी भी है. ऑस्ट्रेलिया से थोड़े ही बड़े इस महाद्वीप में पचास देश हैं, बोली जाने वाली ढाई सौ से अधिक भाषाएं हैं और एक सौ साठ से अधिक कल्चरल आइडेंटिटीज़ हैं. दुनिया में सबसे धनी है यूरोप और आज के ख्वाबों भरी ज़िंदगी की हकीकत है यूरोप.

यूरोप का नक्शा. (फोटोः nationsonline.org)
यूरोप का नक्शा. (फोटोः nationsonline.org)

दुनिया के सर्वाधिक विकसित देश यहीं हैं और मान लीजिए कि यहां के गरीबों का कूड़ा अगर दुनिया के कुछ देशों में पहुंचा दिया जाए तो वे अपने देश के अमीरों में होंगे. दुनिया का हर बारहवां भाग्यशाली आदमी यूरोप में रहता है. क्रिस्टोफर मार्लोवी के शब्दों में –

‘कि जैसे, इनफाइनाइट दौलत एक रूम में बंद हो.’

पैरिस यहीं, लन्दन यहीं, बर्लिन यहीं, रोम यहीं, यश चोपड़ा के शिफॉन साड़ियों वाला स्विट्जरलैंड यहीं, डिज्नीलैंड यहीं. अनुष्का और विराट ने भी यूरोप का ही एक देश चुना अपनी शादी और हनीमून के लिए – इटली. यहां से यूरोप के दूसरे सबसे पुराने एम्पायर – रोमन एम्पायर की शुरुआत हुई. धरती के महज दो प्रतिशत धरातल वाले यूरोप में दुनिया में सारे देशों के न्याय सुनाने वाला इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस, हेग भी है.

बैल पर बैठी यूरोपा के नाम पर यूरोप का नाम पड़ा है. (फोटोः विकिपीडिया कॉमन्स)
बैल पर बैठी यूरोपा के नाम पर यूरोप का नाम पड़ा है. (फोटोः विकिपीडिया कॉमन्स)

अगवा हुई राजकुमारी का नाम मिला है यूरोप को

दुनिया को साइंस का मॉडर्न लेसन देने वाले यूरोप के नाम की कहानी तक वेरी कन्फ्यूजिंग है. इसे ग्रीक मिथोलॉजी में ‘यूरोपा’ नाम की राजकुमारी और ज्यूस की एक रानी के नाम से लिया गया. ग्रीक शब्द से चलें तो इसका मतलब वाइड या ब्रॉड माने विस्तृत होगा. पर सीरियन शब्द ‘एरेब’ से इसकी उत्पत्ति मानें तो इसका मतलब सनसेट होगा. माने सूर्यास्त.

शुरू में जब यह शब्द किसी प्लेस के लिए इस्तेमाल में आया, तो यूरोप का मतलब उत्तरी अफ्रीका से था. फिर धीरे-धीरे यूरोप का आधुनिक अर्थ बना. अगर दुनिया भगवान ने बनाई तो यकीन करना मुश्किल है कि कभी यूरोप को इतना बुलंद करने की सोची हो उसने. क्योंकि सोचिये न, चारों तरफ से दुनिया के बाकी हिस्सों से कटा हुआ है यूरोप. बर्फीला आर्कटिक इसे सर्द बनाए रखता है. विशाल अटलांटिक इसे पश्चिम के प्राकृतिक स्रोतों भरपूर अमेरिका महाद्वीप से वंचित रखता है. फिर मेडीटेरेनियन सी से यह मिनरल्स वाले अफ्रीका से कट जाता है. यूराल पहाड़ इसे पूरब के एशिया से अलग करके रखता है.

पूरी दुनिया पर राज करने की ताकत यूरोप में पानी के जहाज़ों से आई.
पूरी दुनिया पर राज करने की ताकत यूरोप में पानी के जहाज़ों से आई.

जब यह ही न पता हो कि पृथ्वी गोल है या चपटी, और सूरज घूमता है कि पृथ्वी चक्कर काटती है सूरज के, तो फिर ये सोचना कि एक दिन यूरोप के देश ऐसे शिप बनाएंगे कि वे पृथ्वी के एक-तिहाई लैंड से निकलकर दो-तिहाई वाटर को तैरते हुए पृथ्वी के चक्कर पे चक्कर लगाएंगे! यह किसी किसी ऊंघती दुपहरी में देखे जाने वाले अटपटे बेतरतीब सपने से कहीं अधिक न था. पर, जनाब ! ये हुआ और इसलिए ही आज यूरोप ड्रीमलैंड है. सब बस अच्छा ही है यूरोप में, ऐसा नहीं है. पर बाकी दुनिया के महाद्वीपों के मुकाबले यूरोप की स्थिति यकीनन बेहतर है.

यूरोप ने आज के अपने स्वैग के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाई है. खून से अपनी बर्फ बार-बार रंगी है. एक ज़माने से ही यूरोप में रहने वाली जातियों को बारबेरिक माना जाता रहा और आज भी यूरोप ने वह बारबेरिज़म (बर्बरता) खोया नहीं है. बस मॉडर्न सिविलाईजेशन के अधखुले कपड़े से इसे ढंक रखा है.

उस कहानी को आइए फिर दोहराते हैं. ये महत्वपूर्ण है क्योंकि इकोनॉमिक-कल्चरल सिक्का अभी भी यूरोप का ही करेंसी में है. जीसस के करीब 1200 साल पहले फेमस ट्रॉय-स्पार्टा वार हुआ. जीसस के जनम के साढ़े आठ सौ साल पहले होमर हुआ जिसने आधुनिक दुनिया का पहला महाकाव्य इलियड और ओडिसी लिखा. फिर 776 बीसी में ओलम्पिक खेल शुरू हुए और समझिए कि यूरोप की काशी रोम बसी ईसा से तकरीबन 750 साल पहले. ग्रीक एम्पायर पर पर्शिया ने आक्रमण किया ईसा के धरती पर आने के भी ठीक 500 साल पहले और यह लड़ाई अगले दो सौ और साल चलने वाली थी.

पहला बाल्कन युद्ध. यूरोप ने तब से लेकर अब तक लड़ाइयां ही लड़ाइयां लड़ी हैं.
पहला बाल्कन युद्ध. यूरोप ने तब से लेकर अब तक लड़ाइयां ही लड़ाइयां लड़ी हैं.

बहरहाल, यूरोप महाद्वीप ने महान ग्रीक एम्पायर देखा और फिर महान रोमन एम्पायर देखा. जीसस के इस दुनिया से विदा होने के बाद उनके कहे शांति संदेशों पर चर्च कुंडली मारकर बैठ गया और पॉलिटिक्स की कमान रिलीजन के पास जाते ही यूरोप इतिहास के अपने मध्ययुग में आ पहुंचा. आज की पॉलिटिक्स अभी जितना क्रूर होने के लिए सोचेगी, रीलीजन ने वो हदें शताब्दियों पहले से ही तोड़नी शुरू कर दी थीं. ईसा मसीह की मृत्यु के 632 साल बाद एक नए रिलीजन इस्लाम के मसीहा मुहम्मद साहब की मृत्यु हुई. और इस्लाम आज यूरोप का ही दूसरा प्रमुख रिलीजन नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया का दूसरा बड़ा रिलीजन है.

मध्य युग के यूरोप की कमान चर्च के पास थी. यूरोप से निकलकर चर्च ने रिलीजन के नाम पर क्रूसेड (युद्ध) करने शुरू किए, जिसमें बेरहमी से काफिरों को मिटाया गया. तब तक मध्य एशिया से सिल्क रुट बनाता हुआ मंगोल शासक चंगेज खान बारबेरिज़म का दूसरा स्टैंडर्ड सेट करता हुआ आ पहुंचा और उसके बाद के शासकों ने सर्द यूरोप को और भी सर्द अपने हाथों से छू लिया. मध्य युग का यूरोप अंधयुग माने ब्लाइंड एज कहलाता है. ब्लाइंड इसलिए क्यूंकि चर्च का आदमी स्वर्ग की टिकटें बेचता और लोग टूट पड़ते खरीदने को. आज भी लोग चांद और मंगल पर जमीन खरीद ही रहे हैं इंटरनेट पर.

उस ब्लाइंड एज में सारी कसौटियां चर्च सेट करता और ‘राइट’ वही माना जाता जो पोप को ‘राइट’ लगता. ठीक ऐसे ही जैसे आज मुस्लिम फंडामेंटलिस्ट को किसी सिरफिरे मौलवी की बात ‘राइट’ लगती है, किसी क्रिस्चियन फंडामेंटलिस्ट को दहशती प्रीस्ट की बात ‘राइट’ लगती है और किसी भटके हिन्दू नौजवान को किसी ढोंगी गुरु की ही बात ‘राइट’ लगती है. यों तो इस ब्लाइंड ऐज के बाद फिर रेनेसॉ और एनलाइटेन्मेंट एरा (पुनर्जागरण) भी आया 17वीं शती तक, जिसमें एक बार फिर अंधश्रद्धा के स्थान पर रीजन और लॉजिक को महत्त्व दिया गया पर रिलीजन अभी भी इतना प्रभावशाली था कि उसने समूचे यूरोप को 1618 से 1648 तक के तीस साल के युद्धों में झोंक दिया.

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