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अंग्रेजों ने हिन्दी, मराठी अखबार बंद करवाने के लिए क्या-क्या किया?

साल 1876. लॉर्ड लिटन (Lord Lytton) वायसराय बने थे. देश में भयंकर अकाल और भुखमरी छाई थी. फसलें बर्बाद हो गईं थी. लाखों लोग मर रहे थे. लेकिन लिटन का पूरा फोकस दिल्ली दरबार पर था. जहां 1 जनवरी 1977 के रोज क्वीन विक्टोरिया को भारत की महारानी घोषित किया जाना था. आम भारतीय के लिए जीना यूं भी मुश्किल था, रही-सही कसर पूरी कर दी साल 1878 में शुरू हुए दूसरे एंग्लो-अफ़गान युद्ध ने. ब्रिटिश इंडियन इकॉनमी तबाह हो चुकी थी. और यूरोपीय अख़बार अपनी पूरी ताकत से सरकार की नाकामी छिपाने की कोशिश में थे. लेकिन कुछ भारतीय अख़बार और पत्रिकाएं इस दुर्दशा को छाप रहे थे. सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे थे. ऐसे में सरकार के खिलाफ़ नाराजगी को दबाने के लिए वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लाया गया. यानी देशी प्रेस अधिनियम. हालांकि ऐसा कुछ भी लिखना जो सरकार की कमियां उजागर करता हो, पहले भी राजद्रोह माना जाता था. साल 1870 में ही ऐसे किसी भी कम के खिलाफ़ IPC की धारा 124-A जैसा क़ानून आ चुका था. लेकिन नए वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट के प्रावधान और कहीं ज्यादा सख्त थे इतने कि इसे मुंह बंद करने वाला क़ानून कहा जाने लगा.

आज 13 मई है और आज की तारीख़ का संबंध है भारतीय पत्रकारिता के उस काले क़ानून की आमद से जिसने भारतीय पत्रकारों की आवाज दबा दी थी.

वर्नाक्युलर, असल में लैटिन वर्ड वर्नाक्युलस (Vernaculus) से बना है. जिसके मायने हैं देशी या देशज. अंग्रेजी में कहें तो Native या Indigenous. और वर्नाक्युलर लैंग्वेज से मतलब होता है, किसी ख़ास इलाके की एक ऐसी बोली या भाषा जिसमें वहां के लोग आपस में बात करते हैं. हिंदी, मराठी या दूसरी भारतीय बोली-भाषाओं के अखबारों में ब्रिटिश सरकार की आलोचना छपती थी. जिसे भाषाई दिक्कत के चलते अंग्रेज समझ नहीं पाते थे. इसलिए वे अलग-अलग वक़्त पर ऐसे अखबारों पर प्रतिबंध लगाने के लिए तमाम क़ानून लाते रहे.

पत्रकारिता पर अंग्रेजों का पहला प्रतिबंध-

शुरुआत से समझें तो भारत का पहला समाचार पत्र था- द बंगाल गजट या कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर. साल 1780 में जेम्स आगस्टस हिक्की ने इसे प्रकाशित किया था. इस अखबार ने जब सरकार की आलोचना की तो इसका छापाखाना जब्त कर लिया गया. उस दौर में ऐसे ही कुछ और अखबार भी थे, जैसे- द बंगाल जर्नलकलकत्ता क्रॉनिकलमद्रास कुरियर, बॉम्बे हेराल्ड वगैरह. सबकी गत एक सी हुई. वजह अंग्रेज अधिकारियों का डर कि ये अखबार लंदन पहुंचे तो उनके काले कारनामों का भंडाफोड़ हो जायेगा. इसीलिए दमन की नीति अपनाई गई. वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट से पहले प्रेस के लिए कौन से क़ानून लाए गए, संक्षिप्त में जानते चलते हैं.

प्रेस के लिए लाए गए कानून-

पहला था, साल 1799 का The censorship of press actफ्रांसीसी आक्रमण के डर से लॉर्ड वेलेज़ली ने इसे लागू किया था. इस एक्ट के चलते सभी अख़बारों के लिए अखबार के मालिक,एडिटर और पब्लिशर का नाम छापना जरूरी हो गया था. साथ ही अख़बार के प्रकाशन से पहले उसे सरकारी सेक्रेटरी के पास प्रीसेंसरशिप के लिए भेजना होता था. माने वैसा ही जैसा किसी मूवी की रिलीज के पहले उसे सेंसरबोर्ड का अप्रूवल लेना होता है. हालांकि लॉर्ड हेस्टिंग्स ने इन नियमों में थोड़ी ढील दे दी और साल 1818 में प्रीसेंसरशिप बंद कर दी गई.    

इसके बाद साल 1823 का Licensing Regulation आया. गवर्नर-जनरल जॉन एडम्स ने नियम बनाया कि बिना लाइसेंस लिए प्रेस लगाने या उसका इस्तेमाल करने पर सजा होगी. इस नियम के बहाने भारतीय भाषाओं के अखबार, या वो अखबार जिनके मालिक भारतीय हों, उन्हें निशाना बनाया गया. इसी के चलते राजा राममोहन राय की पत्रिका मिरात-उल-अखबार बंद हो गई. हालांकि साल 1835 में प्रेस एक्ट आया या मेटकॉफ एक्ट आया. गवर्नर-जनरल चार्ल्स मेटकॉफ ने थोड़ा नरम रवैया अपनाया और इस एक्ट के रास्ते रेगुलेशन वाला सख्त नियम खत्म कर दिया. अब सिर्फ प्रेस का स्थान बताने की अनिवार्यता रह गई थी. अखबार निकालना कुछ आसान हो गया था. इस दौर में कई नए अखबार भी निकले. इसीलिए मेटकॉफ़ को भारतीय अखबारों के मुक्तिदाता की संज्ञा दी जाती है. 

लेकिन भारतीय मीडिया के लिए आसान दिन बहुत लंबे नहीं चले. साल 1857 के विद्रोह के बाद नया लाइसेंसिंग एक्ट लाया गया, और रेगुलेशन वाली व्यवस्था पहले से भी ज्यादा सख्ती से लागू कर दी गई. सरकार को अब अधिकार मिल गया था कि वो जिसे चाहें लाइसेंस दे या रद्द कर दे. और ये नियम अब सिर्फ अखबार नहीं बल्कि किताब, पत्रिका, जर्नल या किसी भी तरह की छापी जा सकने वाली सामग्री के लिए थे. हालांकि ये व्यवस्था आपातकालीन थी. लेकिन जनसंचार के सभी तरह के साधन इसकी जद में रहे.

इसके बाद साल 1867 में आया Registration Actमेटकॉफ़ ने जो छूट दी थीं. इस एक्ट के आने से वो खत्म हो गई.  कहा गया कि उद्देश्य प्रतिबंध लगाना नहीं है बल्कि रेगुलेट करना है. इसलिए पहले की ही तरह अब अखबार पर छापेखाने का पता और सम्पादक वगैरह का नाम देना पडेगा. साथ ही किसी पुस्तक के प्रकाशन के एक महीने के अंदर उसकी एक फ़्री कॉपी स्थानीय सरकार को देनी होगी.

देशी भाषा समाचार-पत्र अधिनियम-

एक शब्द आज भी प्रासंगिक है. और 19वीं सदी की शुरुआत में भी चर्चा में था. फ्रीडम ऑफ़ स्पीच. यानी बोलने और लिखने की आजादी. आम नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा का मुद्दा और प्रेस की आजादी दोनों समांतर बातें हुआ करती थीं. राष्ट्रवादियों और क्रांतिकारियों के घोषणा-पत्र में इन्हें मजबूती से उठाया जा रहा था. साल 1824 में जब राममोहन राय ने प्रेस पर प्रतिबंध लगाने वाले एक्ट की आलोचना की तो बदले में उनकी पत्रिका मिरात-उल-अकबर पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

1870 के बाद जो भारतीय पत्रिकाएं निकलना शुरू हुईं, उनमें दो तीन मुख्य मुद्दे होते थे. मसलन भारतीयों को उनके राजनीतिक मूल्यों की जानकारी देना, राष्ट्रवादी भावना का प्रचार करना और उपनिवेशी शासन के खिलाफ़ लोगों में जागरूकता लाना. इन मुद्दों पर निकल रहे भारतीय अखबार क्रान्तिकारियों के लिए हथियार साबित हो रहे थे. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस शुरुआती दिनों से ही प्रेस की आजादी को महत्व दे रही थी. साथ ही बैठकों में पारित होने वाले प्रस्तावों को जनता तक पहुंचाने के लिए भारतीय प्रेस का बखूबीं इस्तेमाल भी कर रही थी.

इस दौर में कई निडर पत्रकार नए अखबार छापने लगे थे. मसलन जी. सुब्रह्मण्यम अय्यर के संरक्षण में हिन्दू एवं स्वदेश मित्र , सुरेंद्रनाथ बनर्जी का द बंगाली, दादा भाई नौरोजी के संरक्षण में वॉयस आफ इंडिया , शिशिर कुमार घोष और मोतीलाला घोष की अमृत बाजार पत्रिकाएन.एन. सेन का इंडियन मिरर . बाल गंगाधर तिलक की पत्रिका केसरी और मराठा वगैरह उस वक़्त के क्रांतिकारी अख़बार थे. इनके अलावा ट्रिब्यूनइंदु प्रकाश ध्यान, बंगनिवासी, साधारणी वगैरह क्रांतिकारियों की आवाज बने हुए थे.

हमने शुरुआत में आपको बताया कि जब लॉर्ड लिटन का दौर आया, उस वक़्त राष्ट्रीय आंदोलन मुखर हो चला था. प्रेस की स्वतंत्रता का पक्ष लिया जा रहा था. और भारतीय मीडिया अकाल के दौरान लिटन के रवैये की घोर आलोचना कर रहा था. इस पर लिटन का कहना था कि भारतीयों में असंतोष की वजह मैकाले एवं मैटकॉफ की गलत नीतियां थीं. और ब्रिटिश सरकार साल 1878 में 13 मई को आज ही के दिन देशी भाषा समाचार-पत्र अधिनियम यानी Vernacular Press Act लेकर आई.

इस एक्ट का सीधा उद्देश्यभारतीय भाषाओं के अखबारों पर सरकारी नियंत्रण कायम करना था, ताकि राजद्रोही लेख दबाए जा सकें. कड़े प्रावधान थे और उनका उल्लंघन करने पर कड़ी सजा थी. जिला मजिस्ट्रेट को अधिकार मिल गया था कि वो किसी भारतीय समाचार पत्र के प्रकाशक को बुलाकर उनसे एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर करवा सकता था. इस बॉन्ड में स्पष्ट शर्त थी कि प्रकाशक कुछ भी ऐसा नहीं छाप सकते जिससे सरकार के खिलाफ़ असंतोष भड़के. इस एक्ट के प्रावधान संक्षिप्त में समझ लीजिए. कहा गया कि,

#मजिस्ट्रेट का निर्णय अंतिम होगा तथा उसके खिलाफ़ किसी भी तरह की अपील करने की अनुमति नहीं होगी. 

#देशी भाषा का कोई अखबार अगर इस अधिनियम की कार्रवाई से बचना चाहे तो उसे पहले से अपने अख़बार की एक प्रूफ कॉपी प्रीसेंसरशिप के लिए बजाय ज्यूडिशियरी के पुलिस को देनी होगी. 

#पब्लिशर को सिक्योरिटी की रकम अदा करनी होगी, जो कि क़ानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर जब्त कर ली जाएगी. 

#अगर एक्ट के खिलाफ़ जाकर कोई काम एक से ज्यादा बार किया गया तो प्रेस का सारा सामान जब्त कर लिया जाएगा.

और इस अधिनियम का सबसे घृणित पक्ष ये कि इसमें यूरोपीय और भारतीय अखबारों के बीच नियमों को लेकर भेदभाव था. आगे की कार्रवाइयों में सरकार का असली मकसद भी साफ़ हो गया. 

एक्ट आने के बाद अमृत बाजार पत्रिका को रातों-रात अपनी भाषा बदलकर अंग्रेजी करनी पड़ी. ईश्वरचंद्र विद्यासागर के अखबार सोमप्रकाश का प्रकाशन अस्थायी तौर पर बंद करना कर दिया गया. जबकि ढाका प्रकाश, हलिसहर पत्रिका, सुलभ समाचार, भारत मिहिर, बंगाली पत्रिका साधारणी, भारत संस्कारक वगैरह पर सरकार के खिलाफ़ राजद्रोह का अभियान चलाने के आरोप लगे. इनसे जमकर हर्जाना वसूला गया और इनके एडिटर्स को जेल भेज दिया गिया. 

लेकिन जब इस वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट के खिलाफ़ देशभर से तीखा विरोध दर्ज कराया गया तो साल 1882 में गवर्नर-जनरल लॉर्ड रिपन ने इसे रद्द कर दिया.

हलांक दबाव से क़ानून रद्द हो जाते हैं. दमन की नीतियां और कुटिलता नहीं जाती. साल 1883 में सुरेंद्र नाथ बनर्जी को जेल भेज दिया गया. उन्होंने अपने अखबार में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज के एक निर्णय के खिलाफ़ लिख दिया था. कहा था कि निर्णय बंगाली समुदाय की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ़ है. 

बाल गंगाधर तिलक को लोकमान्य की उपाधि मिलने की कहानी भी इसी दमन से जुड़ी है. साल 1893 में तिलक ने गणपति उत्सव और 1896 में शिवाजी उत्सव नाम के दो अख़बार शुरू किए थे. शिवाजी उत्सव में उन्होंने शिवाजी की महिमा का गुणगान कर दिया था. उनकी पत्रिकाएं मराठा और केसरी में भी देशप्रेम के लेख हुआ करते थे. आजादी के आन्दोलन में तेजी लाने के लिए तिलक की पत्रकाओं में जरूरी मुद्दों पर बात होती थी. विदेशी कपड़ों के बहिष्कार, गैर जरूरी टैक्स न देने की अपील की जाती थी. इसलिए ठीक मौक़ा देखकर ब्रिटिश सरकार ने तिलक पर कई आरोप लगाए गए और उन्हें 18 महीने के कारावास की सजा दे दी गई. 1898 में IPC की धारा 124-A के साथ 153-A भी जोड़ दी गई. इसमें प्रावधान किया गया कि सरकार के खिलाफ़ कोई काम करने के लिए उकसाया गया तो सजा होगी. बाकी पत्रकारों के लिए ये एक सन्देश था. लेकिन इस दौर में तिलक की छवि सर्वमान्य क्रन्तिकारी नेता की बन गई. उन्हें लोकमान्य की उपाधि मिली.

भारतीय समाचार पत्र अधिनियम, 1910-  

इसके बाद साल 1910 में इंडियन प्रेस एक्ट लाया गया. वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट 1878 में अस्तित्व में आया था और साल 1882 में ख़त्म किया गया था. लेकिन इंडियन प्रेस एक्ट में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट के सभी प्रावधानों को वापस प्रभावी बना दिया गया. रजिस्ट्रेशन सिक्योरिटी के नाम पर 500 रूपए से 5000 रूपए तक की रकम जमा करने का प्रावधान तय किया गया. दोबारा रजिस्ट्रेशन कराने पर यही रकम 1000 से 10,000 रूपए तक कर दी गई. और बाकी नियम पुराने क़ानून की तरह ही दोबारा लागू कर दिए गए. बाल गंगाधर तिलक की छवि अबतक एक उग्र क्रांतिकारी नेता की बन गई थी, इसलिए उन्हें देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार करके 6 साल के लिए रंगून के मांडले जेल भेज दिया गया. 

साल 1921 में पहले विश्व युद्ध के दौरान तेज बहादुर सप्रू की अगुवाई में प्रेस समिति ने इन प्रावधानों का विरोध किया. अधिनियम को रद्द करने की मांग की, जिसे मान भी लिया गया. लेकिन 1931 में सविनय अवज्ञा आंदोलन को दबाने के लिए फिर एक क़ानून लाया गया. क्रिमिनल अमेंडमेंट एक्ट. इस दौरान कोई भी ऐसा साहित्य प्रकाशित करना जो सरकार को चुनौती देता हो, उसे आपराधिक श्रेणी में रखा जाने लगा.

पत्रकारों की आवाज दबाने वाले इन अधिनियमों से आखिरकार मुक्ति तब मिली जब देश आजाद हो गया. प्रावधान बदले गए. प्रेस परिषद् बनाया गया. पत्रकारों को अपने खिलाफ़ किसी मामले में कोर्ट से अपील करने का अधिकार दिया गया. और देश की पत्रकारिता को रेगुलेट करने के लिए तमाम नए कानूनी संशोधन किए गए.

बहाना हुआ, यानी तारीख हुई तो आजादी के बाद भारतीय पत्रकारों की फ्रीडम ऑफ़ स्पीच का सफ़र कैसा रहा, इसका भी जवाब देने की कोशिश करेंगे.


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