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तारीख़: लगातार युद्ध जीत रहे मराठे, पानीपत में अब्दाली से क्यों हार गए?

‘हमने लाहौर,मुल्तान,कश्मीर,और दूसरे सूबों को हमारे साम्राज्य में मिला लिया है. जो नहीं आ पाए हैं,वो जल्द ही हमारी मातहती में होंगे. अहमद खान अब्दाली का बेटा तैमूर सुलतान और जहां खान हमारी सेनाओं द्वारा खदेड़े और लूटे जा चुके हैं. दोनों ही कुछ टूटे-फूटे दल-बल के साथ पेशावर पहुंचे हैं. हमने कांधार पर अपना राज घोषित करने का निर्णय ले लिया है’

राघोबा की ये चिट्ठी पढ़कर पेशवा बालाजी राव ख़ुशी से फूले न समाए. पूना के अपने महल में बैठे उन्होंने पूरे भारत पर मराठा साम्राज्य स्थापित करने के सपने देखे थे. मुगलों का शासन दरक चुका था. दक्षिण में निज़ाम ही था जिसमें अभी मराठों को चुनौती देने की कूवत जिंदा थी. पेशवा ने राघोबा को दक्षिण बुला लिया. निज़ाम को सबक सिखाने के लिए. उत्तर में पंजाब तक अपनी सीमा बढ़ाने के बाद मराठों का सामना अफ़गानों से होने वाला था. इधर निज़ाम से लड़ने मराठा सेना दक्षिण की तरफ़ निकल पड़ी थी. पंजाब में सिर्फ 15,000 मराठा सैनिक रह गए थे. एक साथ उत्तर और दक्षिण दोनों पर कब्ज़ा करने के चक्कर में पेशवा बालाजी बाजीराव युद्ध के सबसे बड़े नियमों में से एक भूल गए.

‘दो छोरों पर लड़ा जाने वाला युद्ध जीतना बहुत मुश्किल होता है.’

आज 14 जनवरी है. और आज की तारीख़ का संबंध है भारत के इतिहास के उस भीषण युद्ध से जिसमें लगातार सभी लड़ाइयां जीतते आ रहे मराठे अहमद शाह अब्दाली से हार गए थे.  शुरुआत से शुरू करते हैं, पानीपत की तीसरी लड़ाई की वजह समझते हैं.

पानीपत के युद्ध की वजह?

अफ़ग़ानिस्तान में अहमद शाह अब्दाली को ‘बाबा-ए-क़ौम’ यानी ‘फ़ादर ऑफ़ द नेशन’ कहा जाता है. साल 1747 में 25 साल के कबायली सरदार अहमद खान अब्दाली को अफगानिस्तान का शाह यानी राजा चुना गया था. और ख़िताब दिया गया था- ‘दुर-ए-दुर्रान’ यानी मोतियों का मोती. इसके बाद अब्दाली के नाम के आगे दुर्रानी भी जुड़ गया. उसके कबीले को भी दुर्रानी कबीला कहा जाने लगा. जिसमें अफ़गान, पश्तून और अब्दाली लोग आते थे.

अब्दाली ने अपने दौर में उम्मीद से ज्यादा हासिल किया. पश्चिम में ईरान से लेकर पूर्व में हिंदुस्तान तक अब्दाली ने साम्राज्य कायम कर लिया था. साल 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई अब्दाली के लिए सबसे अहम थी. इससे पहले की लड़ाइयों में अब्दाली ने हिन्दुस्तान से जो कुछ हासिल किया था वो उसका दंभ बढाने वाला था. इधर लगातार जंग जीत रहे मराठे भी अब्दाली का ये दंभ तोड़ने को आतुर थे. अहमद शाह अब्दाली अपनी सल्तनत के लिए ख़तरा महसूस कर रहा था. न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि उसके जीते हुए अफगानी प्रान्तों पर भी मराठों का भगवा झंडा काबिज होने वाला था. ऐसे में 38 साल के अब्दाली के लिए मराठों से सीधी जंग लड़ना ज़रूरी हो गया था. आगे बढ़ने से पहले,एक नज़र इस महायुद्ध से जुड़े मराठी किरदारों पर.

अहमद शाह अब्दाली की ताजपोशी (प्रतीकात्मक चित्र- wikimedia)
अहमद शाह अब्दाली की ताजपोशी (प्रतीकात्मक चित्र- wikimedia)

पेशवा बाजीराव-

पेशवा बाजीराव.  पूरा नाम, पंतप्रधान श्रीमंत पेशवा बाजीराव बल्लाल बालाजी भट. शाहू जी के पेशवा. यानी मुख्यमंत्री. इतिहास में पेशवा बाजीराव के नाम के साथ दर्ज है उनका कुशल नेतृत्व. और मस्तानी के साथ प्रेम की कहानी भी. इनके चार बेटे हुए. बालाजी बाजी राव, रघुनाथ राव (राघोबा), जनार्दन राव, और शमशेर बहादुर. बाजी राव की मृत्यु के बाद छत्रपति शाहू ने बालाजी बाजीराव को पेशवा पद पर नियुक्त किया. इनको लोग नाना साहेब भी कहते थे. इनके शासन के दौरान होल्कर, सिंधिया, भोसले जैसे गुटनायकों का असर बढ़ा. इतिहासकारों का मानना है कि पेशवा बालाजी बाजीराव के पास सैन्य चतुराई की कमी थी. जिसके चलते मराठों ने तगड़ी हार झेली. अब्दाली के हाथों.

पानीपत की तीसरी लड़ाई-

अब चलते हैं वापस. युद्ध के उस साल में,जिस साल एक लाख मराठा कुछ ही घंटों में रणभूमि पर खेत रहे थे. जैसे ही मराठा सेना दक्षिण की तरफ निकली, अफ़गान सेना को मौका मिल गया पंजाब की तरफ से हमला करने का.अब्दाली को सांस लेने के लिए हवा मिल गई थी, वो इसे छोड़ना नहीं चाहता था. उसने पंजाबी के रास्ते आक्रमण किया. अपने साथ रोहिलखंड के नजीबउद्दौला को मिला लिया. दोनों ही पश्तून थे. यही नहीं, अवध का नवाब शुजाउद्दौला भी अब्दाली के साथ मिल गया. जबकि सूरजमल जो कि मराठों के कट्टर समर्थक थे, उनकी इच्छा को दरकिनार कर मराठों ने शुजाउद्दौला को दिल्ली का गवर्नर बनाया था. वजह थी कि शुजाउद्दौला एक तो शिया मुस्लिम थे, मुगलों के खिलाफ़ थे, और इनके पास 50,000 घुड़सवारों की सेना भी थी. लेकिन जब मराठों को शुजाउद्दौला की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ी तो अब्दाली ने उसे इस्लामी भाईचारे की दुहाई देकर साथ मिला लिया.

तकरीबन 80,000 सैनिकों के साथ अहमदशाह अब्दाली ने कूच किया. ये खबर सुनते ही पेशवा ने सदाशिवराव भाऊ को पूना से कूच करने का आदेश दिया. ये उनके रिश्ते के भाई थे. राघोबा ने उत्तर भारत में भले ही तैमूर और जहान की सेनाओं को हरा दिया था, लेकिन इसमें उम्मीद से कहीं ज्यादा खर्च हुआ था. कौशिक रॉय अपनी किताब India’s Historic Battles: From Alexander  the Great to Kargil में बताते हैं कि उत्तर में राघोबा के आक्रमण और जीत के बावजूद मराठा साम्राज्य को 88 लाख रुपए का घाटा हुआ था. लेकिन इसके बाद 1760  में उदगिर की लड़ाई में सदाशिवराव निजाम की सेना को हराकर तकरीबन 60 लाख रुपए का फायदा अपने साथ लाए थे. इसलिए पेशवा उन्हें अब्दाली के सामने चुनौती खड़ी करने के काबिल समझ रहे थे.

युद्ध के मैदान में सदाशिव राव भाऊ (फोटो सोर्स- wikimedia)
युद्ध के मैदान में सदाशिव राव भाऊ (फोटो सोर्स- wikimedia)

मराठा सेना की तैयारी-

सदाशिवराव ने कूच तो कर दी, लेकिन अपने साथ बहुत सारा गैर ज़रूरी  सामान, परिवार और साथी-संघाती भी साथ लेकर चल निकले. ये वो लोग थे जो युद्ध लड़ने के लायक नहीं थे. केवल साथ जा रहे थे. जाट राजा सूरजमल ने उन्हें इसकी बाबत चेतावनी भी दी. कहा कि इतना तामझाम लेकर मत चलो. चम्बल के इस तरफ ही ये सब कुछ छोड़ दो. हल्के सामान के साथ अटैक करो. उससे तुम्हें ही मदद मिलेगी. लेकिन सदाशिव ने अनसुना कर दिया. साथ में उनके आ मिला इब्राहिम खान गर्दी. पहले निजाम की सेवा में था. फिर मराठा साम्राज्य के साथ आ गया. गर्दी के पास दो चीज़ें थीं. फ़्रांस में निर्मित रायफलें, तोपें और फ़्रासीसी सेना के द्वारा ट्रेन किए गए 8000 लड़ाके. सदाशिवराव को भरोसा था कि वो इनके भरोसे अफ़गानों से निपट लेंगे. आगे के सफ़र में मराठों के साथ महेंदले, शमशेरबहुर, पवार बड़ोदा के गायकवाड़ और मानकेश्वर जैसे कई सहयोगी जुड़ते गए और सेना बड़ी होती गई. मई-जून तक जब मराठा आगरा पहुंचे तब मल्हारराव होलकर तथा जुनकोजी सिंधिया भी अपनी सेनाओं के साथ मराठा सेना में शामिल हो गए. लेकिन दिल्ली में मराठों के बहुत कम शुभचिंतक थे. असल में ये लोग मराठों के बढ़ते वर्चस्व से खुश नहीं थे. इसीलिए नजीब खान जैसे शाहों ने अब्दाली को मराठों पर चोट करने के लिए बुलावा भेजा था. 1739 में भी मुग़ल नेताओं ने अफगानी बादशाह नादिर शाह को बुलाया था, लेकिन नादिर शाह ने लूट मचाते वक़्त हिन्दू-मुस्लिम में कोइ भेद नहीं किया. और अब्दाली का मंसूबा तो लूट से भी बढ़कर था. वो दिल्ली के सिंहासन पर कब्जा चाहता था. और मराठे उसकी राह में रोड़ा बन रहे थे.

मराठों की शुरुआती जीत-

दिल्ली से होते हुए सदाशिवराव अपनी सेना के साथ अफ़गानों के सामने पहुंचे. अब्दाली की सेना यमुना के उस पार थी. सदाशिव की इस पार. यहीं से वो लोग उत्तर की तरफ बढ़े. और कुंजपुरा में अब्दाली के किले को ध्वस्त कर दिया. इस किले की हिफाज़त का जिम्मा क़ुतुब शाह के ऊपर था. उसके साथ वहां मौजूद तकरीबन 10,000 अफगानों को भी मराठों ने मौत के घाट उतार दिया. क़ुतुब शाह का कटा हुआ सिर लेकर मराठों ने जीत का जश्न मनाया.

इस हार ने अब्दाली का खून खौला दिया. अपनी सेना के साथ उसने यमुना पार की, और खुद को मराठों और दिल्ली के बीच टिका लिया. भाऊ आगे बढ़कर सिखों से मदद मांगने की सोच रहे थे, लेकिन जब अब्दाली के यमुना पार करने की खबर उन तक पहुंची, तो वहीं थम गए. जब वापस लौटने की कोशिश की, तो हर तरफ से खुद को घिरा हुआ पाया. न दिल्ली पहुंच सकते थे. न पीछे हट सकते थे. पानीपत में फंस कर रह गए. खेमे में रसद घटनी शुरू हो गई. मराठों ने गोविन्दपन्त बुंदेले को जिम्मा दिया, कि अब्दाली के खेमों तक पहुंचने वाली रसद की सप्लाई काट दो. कुछ समय तक उन्होंने ये मोर्चा संभाला, लेकिन 17 दिसंबर 1760 को उन्हें मार डाला गया. इसके बाद मराठों की सेना और भी कमज़ोर पड़ती गई. वहीं अब्दाली को रसद पहुंचाने के लिए रोहिलखंड मौजूद था, जिसका राजा नजीबउद्दौला अब्दाली से मिला हुआ था.

सितंबर में ही सदाशिव ने चिट्ठी लिखी थी पेशवा को. कहा था कि उनका खेमा संकट में है. उन्होंने लिखा-

सबसे बड़ी दिक्कत राशन की है. दुश्मन की मौजूदगी और बाहर बिगड़े हुए हालात की वजह से हम ऋण भी ले पाने की स्थिति में नहीं हैं. सभी लेन-देन के मामले ठंडे पड़े हुए हैं. हमारे खेमे में रसद बेहद कम है. बाहर से राहत असंभव है. अब्दाली बेहतर स्थिति में है.

पेशवा ने जवाब भेजा, हम तुम्हारे लिए कुमक पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं. डटे रहो. लेकिन वो वादा झूठा निकला. कुमक न आनी थी, न आई. खेमे के घोड़े भूख से मरने लगे. फाके करने की नौबत आ गई. ऐसी हालत में सैनिकों ने सदाशिव भाऊ के पास जाकर विनती की. अब नहीं सहा जाता. अब तो आर या पार. कर ही डालिए. वो तारीख थी 13 जनवरी, 1761. तय हो गया कि अब आर-पार की लड़ाई लड़ेंगे.

14 जनवरी 1761 यानी आज ही के दिन मकर संक्रांति थी. हिंदू धर्मानुसार ये एक पवित्र दिन माना जाता है. सूर्य उत्तरायण में होता है. इसी दिन सदाशिव की सेना ने निर्णायक युद्ध के लिए कूच कर दिया.

अफ़गानों की सेना खेमे डालकर बैठी हुई थी. आगे सैनिकों की पंक्तियों के करीब ढाई मील पीछे एक लाल रंग का टेंट था. इस टेंट के भीतर बैठा रोबदार अब्दाली हुक्का फूंक रहा था. तभी उसके पास शुजाउद्दौला दौड़ा-दौड़ा आया. हांफते हुए बोला,

खबर मिली है. मराठों की सेना जंग के लिए कूच कर चुकी है.

अब्दाली अब भी बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था. सुन कर हुक्के को परे रखा, और कहा, सही खबर मिली है आपको. इसके बाद अपनी सेना का निरीक्षण कर उसे कूच करने का आदेश दे दिया.

अफगान सेना के टेंट (प्रतीकात्मक तस्वीर getty)
अफगान सेना के टेंट (प्रतीकात्मक तस्वीर getty)

अर्धचन्द्र के आकार में उसकी सेना ने कूच किया, और वहीं सामने से सदाशिव की सेना तीन हिस्सों में बंटी हुई धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी. मैदान के एक तरफ से पुकार उठ रही थी-

हर हर महादेव !!!

दूसरी तरफ से जवाब आता

दीन दीन !!!

इब्राहिम गर्दी के सैनिकों ने फ्रांसीसी बंदूकों से फायर करना शुरू किया. शुरुआत में अफगानों के पांव उखड़े लेकिन मराठों की सेना अपना अटैक बनाए नहीं रख सकी. और अब्दाली ने पीछे से हजारों सैनिक और भेज दिए. पहले पेशवा के बेटे विश्वास राव खेत हुए. उनके बाद सदाशिव भी जंग में उतरे, और मारे गए. सदाशिव राव की भावुकता और विश्वासराव के लिए उनका प्रेम भी युद्ध का एक टर्निंग पॉइंट रहा. जब विश्वासराव को गोली लगी तो सदाशिव राव अपना हाथी छोडकर घोड़े पर सवार हुए और विश्वासराव के पास पहुंच गए. मराठा सेना ने हाथी पर भाऊ को नहीं देखा तो घबरा गई जिसके बाद अफ़गानी सेना हावी हो गई. शाम के चार बजते-बजते पूरा युद्ध समाप्त हो गया था. रात होने तक अफ़गान सेना मराठों को चुन-चुन कर मारती रही. मराठों का भारत विजय अभियान भयंकर ठंड, गद्दारी और सदाशिवराव की एक भूल के चलते थम गया था.

लूट मचाकर और मराठों की सेना को हराकर अब्दाली वापस अफगानिस्तान की तरफ लौटा. लेकिन बीच में सिखों ने रोक कर उसकी सेना को नाकों चने चबवा दिए.

इस लड़ाई के पहले भी अब्दाली ने कई बार हिंदुस्तान चढ़ाई की थी. पहली बार वो 1748 की जनवरी में आया था. लेकिन वहां अहमद शाह और मीर मन्नू की सेना ने मानपुर की लड़ाई में उसे हरा दिया था. 1750 में फिर आया अब्दाली, और इस बार पंजाब पर अधिकार कर लौट गया. अगले साल दिसंबर में अब्दाली फिर लौटा, और इस बार सरहिंद और कश्मीर पर कब्जा जमा कर लौटा. चौथी बार 1757 में वो दिल्ली तक पहुंचा और कब्जा कर लिया. एक महीने तक दिल्ली को इतनी बुरी तरह लूटा कि पंजाबी की एक कहावत मशहूर हो गई थी. ‘खादा पीत्ता लाहे दा, रहंदा अहमद शाहे दा’ यानी जो खा लिया पी लिया और तन को लग गया वो ही अपना है, बाकी तो अहमद शाह लूट कर ले जाएगा. इसके बाद अब्दाली अपने बेटे तैमूर को लाहौर में छोड़ गया, जहान खान के साथ.

कई इतिहासकारों का मानना है कि दक्षिण और उत्तर में एक साथ लड़ाई लड़ने की कीमत मराठों को चुकानी पड़ी. पानीपत की तीसरी लड़ाई में अगर अब्दाली की हार हो जाती तो हिन्दुस्तान पर दोबारा किसी विदेशी ताकत का कब्ज़ा न हो पाता. लेकिन ये लड़ाई मराठों के भविष्य के लिए बेहद अहम साबित हुई. भले ही इस युद्ध में वो जीत न सके, लेकिन उनकी वीरता की तारीफ़ खुद अब्दाली ने भी की. मराठा साम्राज्य दुबारा अपने पांवों पर खड़ा होने में सफल हुआ. इस युद्ध में घुड़सवारों और हाथी-सवारों के बजाय पैदल सैनिकों और हल्के, बेहतर हथियारों ने अपनी महत्ता दिखाई. कौशिक रॉय अपनी किताब में इसका ज़िक्र करते हुए लिखते हैं:

पानीपत की तीसरी लड़ाई ने दक्षिण एशिया में आधुनिक युद्ध का पहला उदाहरण पेश किया.

युद्ध के बाद पेशवा बालाजी बाजी राव की मृत्यु हुई. मराठा साम्राज्य खुद को संभालने की कोशिश में जुट गया. उनके मुखिया बने पेशवा माधव राव. इन्हीं के नेतृत्व में तकरीबन दस साल तक मराठों ने अपने खोया हुआ रुतबा वापस हासिल किया. इनके साथ नाना फडनवीस और महादजी शिंदे (सिंधिया) की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही.


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