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कैसे हुआ था सत्यम घोटाला?

दुनिया के अधिकतर लोग कम से कम एक बार अपना जन्मदिन मना पाते हैं. यानी सूरज का एक पूरा चक्कर. इससे कुछ कम लेकिन फिर भी लगभग सारे ही लोग कम से कम एक दशक के बदलने के साक्षी बनते हैं. चुनिंदा लोग शताब्दी बदलते हुए देखते हैं. और विरले वो जो कह सकते है कि वो दो सहस्राब्दियों यानी मिलेनियम्स में जिए हैं. साल 2000 में जिन लोगों ने ये बदलाव देखा उनमें से अधिकतर 80’s और 90’s की पैदाइश थे. इसके साथ-साथ इन लोगों ने देखा ऐसा ख़ौफ़ जो किसी प्राकृतिक आपदा से भी बड़ी तबाही ला सकता था.

बात कर रहे हैं Y2K बग की. जब कम्प्यूटर सिस्टम में डेटस की गड़बड़ी के चलते ऐसा लगा था कि दुनिया के सारे सिस्टम ठप हो जाएंगे. इक्का दुक्का उदाहरण हुए भी. जैसे इशिकाव जापान में एक न्यूक्लियर प्लांट में रेडिएशन उपकरण फेल हो गए. लेकिन बैकअप के चलते कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई. अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने Y2K बग के समाधान पर लाखों डॉलर खर्च किए. दिसम्बर 1999 में ऑस्ट्रेलिया ने रूस से अपने राजनयिकों को वापस बुला लिया था. रूस Y2K समस्या के लिए कुछ नहीं कर रहा था. और ऑस्ट्रेलिया को लगा कि साल 2000 की शुरुआत होते ही वहां बड़ी दिक्कतें पैदा होंगी.

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चूंकि मेमोरी महंगी थी, कम्प्यूटर में साल के लिए सिर्फ़ दो संख्याओं का उपयोग किया जाता था. इस चक्कर में परेशानी खड़ी हुई कि प्रोग्राम साल 2000 और 1900 में अंतर नहीं कर पाएगा. यही Y2K बग था (तस्वीर: टाइम मैगज़ीन)

ख़ैर साल 2000 आया और चला गया. कोई बड़ी तबाही नहीं हुई. और Y2K बग, दुनिया के अंत की भविष्यवाणी करने वाले कई होक्स की फ़ेहरिस्त में जमा हो गया. Y2K से निपटने के लिए दुनिया के समृद्ध मुल्कों का बड़ा खर्चा हुआ या थोड़ी बहुत मुसीबत हुई. लेकिन एक देश था जिसके लिए Y2K बग वरदान साबित हुआ. वो देश था भारत.

आईटी बूम

90’s के दशक में Y2K बग की समस्या को सुलझाने के लिए प्रोग्रामिंग में सैकड़ों बदलाव किए गए. और ज़रूरत पड़ी हज़ारों प्रोग्रामर्स की. ये सब मुहैया कराए भारत ने.
Y2K बग के चलते अमेरिका ने H1 वीज़ा की लिमिट में इज़ाफ़ा किया. सिर्फ़ 3 साल भारत में काम करने के बाद हर दूसरा कम्प्यूटर प्रोग्रामर अमेरिका जाने लगा. 90 के दशक और उसके बाद के कुछ सालों तक भारत से हर महीने तक़रीबन 10 हज़ार लोग अमेरिका पहुंचे.

जो बग दुनिया के लिए डिज़ास्टर लाने वाला था, वो भारत के IT सेक्टर में एक बड़ा बूम लाया. इस बूम का सबसे बड़ा फ़ायदा मिला हैदराबाद को. मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू तब हैदराबाद को नई सिलिकॉन वैली बनाना चाहते थे. बिल गेटस ने तक वहां आकर माइक्रोसॉफ़्ट का एक सेंटर खोला. साल 2000 में जब बिल गेट्स हैदराबाद पहुंचे तो स्टेज में उनके साथ भारतीय IT कम्पनियों के मालिक, मसलन इंफोसिस, विप्रो, टीसीएस के चेयरमैन मौजूद थे. इनमें से एक था सत्यम कम्प्यूटर्स का मालिक रामलिंग राजू. Y2K बूम से सबसे ज़्यादा फ़ायदा कमाने वाला शख़्स. Y2K बूम ने सत्यम को इंफोसिस, विप्रो, टीसीएस के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया था. कंपनी ने इतनी तरक्की की कि 1999 में राजू को वर्ष के सर्वश्रेष्ठ कारोबारी का सम्मान से नवाज़ा गया था.

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सत्यम इन्फो-सिटी कार्यालय भवन हैदराबाद में. टेक महिंद्रा ने 13 अप्रैल को सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज का अधिग्रहण कर लिया (तस्वीर: Getty)

फिर आया 2009. जनवरी में रामलिंग राजू ने कम्पनी और हिस्सेदारों के नाम एक पत्र लिखते हुए बताया की कैसे उसने कम्पनी के आंकड़ों में हेरफेर की थी. और मुनाफ़े को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया था. इसके बाद भानुमति का ऐसा पिटारा खुला कि सब देखते रह गए. कुल 14 हज़ार करोड़ का घोटाला सामने आया था.
कमाल की बात ये है कि अमेरिका से शुरू हुई एक घटना ने सत्यम की सफलता की कहानी लिखी और वहीं से शुरू हुई एक दूसरी घटना ने उसे डुबा दिया. अमेरिका से शुरू होने वाली वो घटना थी, 2008 की मंदी. कैसे इस मंदी ने रामलिंग का पर्दाफ़ाश किया? और कैसे भारतीय इतिहास के सबसे बड़े घोटालों में से एक को अंजाम दिया गया था. चलिए जानते हैं.

सत्यम कम्प्यूटर्स की शुरुआत

पहले चलते हैं सत्यम कम्प्यूटर्स की शुरुआत पर. यूज़वल टेम्पलेट है. किसान के घर पैदा हुआ रामलिंगल राजू पढ़ाई में अच्छा था. बड़ा होकर विदेश गया और वहां से MBA की डिग्री हासिल की. भारत लौटकर अपना बिज़नेस शुरू किया. होटेल बिज़नेस में कदम रखा. एक कपास कम्पनी शुरू की. और साथ ही एक रियल स्टेट कम्पनी भी शुरू की. नाम था मैटास. ये नाम याद रखिएगा. आगे इसका बड़ा रोल है.

1987 में अपने साले साहब DVS राजू की सलाह पर रामलिंग ने IT के क्षेत्र में कदम रखा. सिकंदराबाद इलाक़े में 20 कर्मचारियों के साथ एक कम्पनी खोली. नाम रखा सत्यम कम्प्यूटर्स. साल 1991 में कम्पनी को अपना पहला बड़ा क्लाइंट मिला. और उसके बाद राजू ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 1991 में कम्पनी ने बॉम्बे स्टॉक एक्स्चेंज में अपना IPO लॉंच किया. मांग ऐसी थी कि IPO 17 गुना ओवरसबस्क्राइब हुआ था. वक्त के साथ कम्पनी ने दिन दुगनी रात चौगुनी तरक़्क़ी की.

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घोटाले के खुलासे के बाद सत्यम के शेयर प्राइस (तस्वीर: रायटर्स)

1995 में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने चंद्र बाबू नायडू. IT को लेकर उन्होंने खूब इनिशीएटिव लिए. सत्यम को इसका बड़ा फ़ायदा हुआ. और 2000 तक आते-आते इंफोसिस, विप्रो, टीसीएस के बाद सत्यम भारत की चौथी सबसे बड़ी IT कम्पनी बन गई. रामलिंग राजू को सिकंदराबाद का बिल गेटस बुलाया जाने लगा. 2006 में रामलिंग राजू कम्पनी का चेयरमैन बना. और 2007 में उसे सबसे युवा एवं सफल उद्यमी का ख़िताब दिया गया. कम्पनी का टर्नओवर 1 बिलियन डॉलर के ऊपर पहुंच गया. और 2008 तक ये 2 बिलियन डॉलर हो गया. 60 से ज़्यादा देशों में कम्पनी ने अपना बिजनेस फैला लिया था.

बाघ की सवारी

फिर आई आज की तारीख़. यानी 23 दिसम्बर 2008. उस दिन वर्ल्ड बैंक ने सत्यम पर 8 साल का बैन लगा दिया. कारण दिया कम्पनी के कॉर्पोरेट गवर्नेंस स्टैंडर्ड ख़राब है. ये बात चौंकाने वाली थी. क्योंकि चंद महीने पहले ही वर्ल्ड काउन्सिल फ़ॉर कॉर्पोरेट गवर्नेंस ने सत्यम को गोल्डन पीकॉक अवार्ड फ़ॉर कॉर्पोरेट गवर्नेंस से नवाजा था. मतलब जो संस्था गवर्नेंस के मामले में मिसाल मानी जाती थी उस पर वर्ल्ड बैंक ने बैन लगा दिया.

इसके कुछ ही दिन बाद 7 जनवरी 2009 को अचानक कंपनी के चेयरमैन राजू ने अपना पद छोड़ दिया. साथ में लिखा एक लेटर जिसने स्टॉक मार्केट में भूचाल ला दिया. सेबी को भेजे अपने पत्र में राजू ने लिखा कि सालों से कंपनी की माली हालत खराब चल रही थी. बाजार में हैसियत बनाए रखने के लिए कंपनी को लाभ में दिखाया गया. और इसके लिए कंपनी के खातों में हेर-फेर की गई.

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सेबी के मुताबिक, फर्जीवाड़े के जरिये 6 करोड़ निवेशकों को सत्यम के कर्ता-धर्ताओं ने करीब 7800 करोड़ रुपये को चूना लगाया था (तस्वीर: Getty)

राजू ने खुद को विक्टिम दिखाते हुए कहा कि उसने कम्पनी कोइ बचाने की खूब कोशिश की. लेकिन बात हाथ से निकल गई. राजू ने कहा,

“यह बाघ की सवारी करने जैसा है. आप सवारी तो कर सकते हैं. लेकिन उतार नहीं सकते क्योंकि उतरते ही बाघ आपको ख़ा जाएगा.”

बाद की तहक़ीक़ात में जो सच सामने आया वो आंखें चौंधियाने वाला था. खेल की शुरुआत 16 दिसम्बर से शुरू हुई. उस दिन अब्राहम नाम की एक मेल आईडी से कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को एक मेल गया. मेल में इशारा था कि कम्पनी की बैलेंसशीट में हेरफेर हुई है. तब सत्यम में एक दूसरी कम्पनी के अधिग्रहण की बात चल रही थी. ईमेल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के पास पहुंची तो अधिग्रहण को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. बात बाज़ार में पहुंची तो उसी दिन से कम्पनी के शेयर गिरने लगे. सवाल था कि एक रियल इस्टेट कपनी को सॉफ़्टवेयर कम्पनी में क्यों विलय किया जा रहा था?

सत्यम में घपला कैसे हुआ था?

हुआ ये था कि सत्यम में जितना प्रॉफ़िट मार्जिन दिखाया जा रहा था. उतना था नहीं. प्रॉफ़िट मार्जिन सिर्फ़ 3% था और बताया ज़ा रहा था 26%. ये सब किया जा रहा था फ़र्ज़ी बिल बनाकर. कम्पनी के बिलों को दो तरीक़ों से बनाया जाता था. एक टाइप के बिल पर H मार्क रहता था. H यानी हाइड, मतलब जो बिल छुपाने के लिए होते थे. और दूसरे टाइप के बिल पर मार्क रहता था S. यानी See. यानी ऐसे बिल जो दिखाए ज़ा सकते थे. H मार्क वाले ऐसे बिलों की संख्या क़रीब 7000 थी. और क़ीमत क़रीब 5100 करोड़ रुपए.

बिल भी रोज़ नहीं बनाए जाते थे. बल्कि तीसरे, छठे, नवें या बारहवें महीने की एक ख़ास तारीख को. CBI ने जब कम्पनी के कर्मचारियों के स्वाइप कॉर्ड की डिटेल खंगाली तो पता चला क़रीब एक दर्जन ऐसे लोग थे. जो काम खतम हो जाने के बाद ये हेराफेरी किया करते थे. जब भी कम्पनी के तिमाही, छमाही या वार्षिक रिज़ल्ट आने वाले होते, उससे कुछ दिन पहले फ़र्ज़ी यानी H मार्क वाले बिलों को बैलेंस सीट में जोड़ दिया जाता. ताकि कम्पनी का प्रॉफ़िट ज़्यादा दिखे. ये काम बहुत पहले से चल रहा था. यहां पर एक और सवाल आता है.

रामलिंग ऐसा कर क्यों रहा था?

तनख़्वाह तो उसको सीमित ही मिलनी थी. फिर? दरअसल खेल स्टॉक मार्केट का था. कम्पनी का रेवेन्यू बढ़ता तो लोग और इन्वेस्ट करते. और सत्यम के शेयर में खूब उछाल आता. शुरुआत में रामलिंग राजू कम्पनी में 16 % का भागीदार था. शेयर की क़ीमत बढ़ी तो वो अपने हिस्से के शेयर धीरे-धीरे बेचता रहता. जनता समझ रही थी कि फ़ायदे का सौदा है. अंदर की बात सिर्फ़ राजू और उसके क़रीबियों को मालूम थी. राजू के परिवार के लोग कम्पनी के प्रमोटर थे. वो भी अपने शेयर बेचकर खूब मुनाफ़ा कमाते. अंतिम दिनों तक रामलिंग की हिस्सेदारी सिर्फ़ 3% रह गई थी. बाकी सारे शेयर उसने बेच डाले थे.

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रामलिंग राजू (बाएं) को 9 अप्रैल, 2009 को हैदराबाद की चेंचलगुडा जेल से अदालत में पेश होने के लिए ले जाते हुए (तस्वीर: Getty)

इन पैसों को उसने अपनी रियल इस्टेट कम्पनी में इन्वेस्ट किया. 2000 के बाद के सालों में रियल एस्टेट सेक्टर में बूम आया था. लेकिन आंध प्रदेश में नियम था कि एक कम्पनी को 58 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन नहीं बेची जा सकती. इसलिए उसने अपने परिवार वालों के नाम पर 300 से ज़्यादा कम्पनी खोल कर हैदराबाद में क़रीब 6 हज़ार एकड़ ज़मीन ख़रीद ली थी. इसमें भी घालमेल था. दरसल उसे साल 2000 में ही खबर लगी गई थी कि मेट्रो प्रोजेक्ट शुरू होने वाला है. इसलिए उसने आसपास की काफ़ी सारी ज़मीन ख़रीद डाली.

इतना ही नहीं उसने कर्मचारियों की तनख़्वाह में भी घालमेल किया. सत्यम में कुल 40 हज़ार लोग काम करते थे. लेकिन दस्तावेज में ये संख्या 53 हज़ार दिखाई जाती थी. इस तरह हर महीने 13 हज़ार लोगों की तनख़्वाह रामलिंग खुद हड़प कर जाता था. लगभग 20 करोड़ रुपए हर महीने.

रामलिंग का जीनियस प्लान

2008 तक ये खेल खूब चला. लेकिन फिर मंदी ने दस्तक दी. अमेरिका में मंदी का सबसे बड़ा असर रियल एस्टेट सेक्टर में दिखा था. वही भारत में भी हुआ. रियल स्टेट का कारोबार पूरी तरह बैठ गया. तब सत्यम ने एक तरकीब खोजी. शुरुआत में हमने आपको एक कम्पनी के बारे में बताया था. मेटास रियल इस्टेट कम्पनी, जिसे रामलिंग राजू ने ही बनाया था और बाद में अपने बेटों को इसका मालिक बना दिया था.

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सत्यम घोटाले में रामलिंग राजू को अदालत से 7 साल की सजा सुनाई गई लेकिन एक ही महीने में ज़मानत मिल गई (तस्वीर: Getty)

2008 तक फ़र्ज़ी खातों के सहारे सत्यम में क़रीब 7000 करोड़ रुपए का हेरफेर हो चुका था. रामलिंग ने प्लान बनाया कि मेटास का विलय सत्यम में कर दिया जाए. इससे होता ये कि घाटे में जा रही रियल एस्टेट कम्पनी से वो छुटकारा पा लेता. और मेटास की क़ीमत 7000 करोड़ बताकर उस रक़म को दुबारा बेलेंस शीट में डाल देता. अगर रामलिंग की ये तरकीब काम कर जाती तो किसी को पता ही नहीं चलता कि 7000 करोड़ का हेरफेर हुआ है.

लेकिन चूंकि रियल एस्टेट डूब रहा था तो सवाल उठा कि ठंडे पड़े सेक्टर में सत्यम को क्यों जोड़ा जा रहा है. साथ ही लीक हुई ईमेल ने उसकी सारी पोल खोल दी. फरवरी में सरकार ने जांच CBI को सौंपी और सारी कहानी सामने आ गई. जिस दिन रामलिंग ने सेबी के नाम लेटर लिखा, शेयर मार्केट में भूचाल आ गया. 2008 में सत्यम का जो शेयर 544 रुपए पर लिस्टेड था वो 10 जनवरी को 10.50 रुपए प्रति शेयर तक पहुंच गया. निवेशकों को लगभग 10 हज़ार करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ. अब एक और सवाल.

ऑडिट में घोटाला सामने क्यों नहीं आया?

ये पूरा खेल आठ साल से चल रहा था. लाज़मी था कि इंटर्नल ऑडिटर मिले हुए थे. लेकिन एक्स्टर्नल ऑडिटर से बचने के लिए उसने एक खास तरीक़ा आज़माया था. अकाउंटिंग के लिए तब ERP सिस्टम का उपयोग होता था. स्टैंडर्ड सिस्टम यूज़ करने के बजाय, रामलिंग ने अपना ERP सॉफ़्टवेयर बनायागया. और उसमें कई सारे बैकडोर फ़ीचर डाले गए. ताकि ज़रूरत के हिसाब से हेराफेरी की जा सके.

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आउटसोर्सिंग की दिग्गज कंपनी सत्यम के भारतीय पूर्व अध्यक्ष, बी. रामलिंग राजू (टॉप-सेंटर), और उनके भाई बी. सूर्यनारायण राजू (टॉप से तीसरा) उनके और आठ अन्य के खिलाफ धोखाधड़ी के मामले के अंतिम फैसले के बाद मेट्रोपॉलिटन क्रिमिनल कोर्ट से निकलते हुए (तस्वीर: Getty)

इंटरनेशल ऑडिटिंग कम्पनी प्राइसवॉटरकूपर्स भी इस घपले को नहीं पकड़ पाई. क्यों नहीं पकड़ पाई पूछेंगे तो जवाब वही है. दिल्ली के मुख्यमंत्री वाला. ‘सब मिले हुए हैं जी’.
घोटाले के बाद बाद में सत्यम को टेक महिंद्रा ने ख़रीद लिया. और 2015 में रामलिंग राजू को 7 साल की सजा हुई. मज़े की बात ये कि सिर्फ़ एक महीने में बेल भी मिल गई और राजू दुबारा जेंटलमेन बन गया. तब से लेकर अब तक राजू साहब हैदराबाद में अपने बंगले में ऐश फ़रमा रहे हैं. शेयर मार्केट में जिनका पैसा डूबा. वो भी अब तक इसे भूल चुके होंगे. एक फ़ाइनल ट्रिविया ये बता दें कि इसी साल यानी 2021 में नेटफ़्लिक्स पर एक सीरीज़ आई थी,Bad Boy Billionaires: India.

इसमें सहारा के मालिक सुब्रत रॉय, नीरव मोदी और विजय माल्या की कहानी दिखाई गई थी. इसी सीरीज़ में एक और कहानी रामलिंग राजू की भी थी. लेकिन राजू महाशय कोर्ट पहुंचे और एपिसोड की रीलीज पर रोक लगा दी गई. शायद जल्द ही आपको देखने को मिले. न्याय तो नहीं मिला, चलो. एंटरटेंमेंट ही सही.


 वीडियो देखें- कहानी उस शख़्स की जिसकी गिरफ़्तारी के बाद जलियांवाला बाग में सभा बुलाई गई थी

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