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माधव राव सिंधिया के प्लेन क्रैश की गुत्थी क्यों नही सुलझ पाई?

आज 30 सितंबर है और आज की तारीख़ का संबंध है एक प्लेन हादसे से.

बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में ‘ग़ालिब’ की आबरू क्या है

ग़ालिब ने ये शेर बहादुर शाह ज़फ़र की खुशामद में लिखा था. अधिकतर देशों में लोकतंत्र या तानाशाही क़ाबिज़ होने के बाद राजा-महाराजा पुराने दौर की बात लगते हैं. लेकिन परम्परा से इंसानी जुड़ाव के कारण इन बातों का चार्म आज भी है.

28 सितंबर के एपिसोड में हमने आपको बहादुर शाह ज़फ़र और 1857 की क्रांति के बारे में बताया था. 1857 की क्रांति से शुरू हुआ इंक़लाब 90 साल बाद अपने मुक़ाम पर पहुंचा. 1947 में अंग्रेज रुख़सत हुए और चंद सालों में भारत की रियासतें लोकतंत्र का हिस्सा हो गईं. लेकिन 1971 में इंदिरा गांधी द्वारा प्रिवी पर्स के ख़ात्मे तक राजा महाराजा की उपाधि सलामत थी.

यहां पढ़िए- शेर-ओ-शायरी के चक्कर में मुग़लों ने दिल्ली गंवा दी.

उधर ब्रिटेन में 1952 में किंग जॉर्ज-6 की मृत्यु के बाद उनकी बड़ी बेटी लिलिबेट, क्वीन एलिज़ाबेथ बन गई. जिनकी उम्र का राज आज भी मीम्स का हिस्सा हैं. हालांकि क़िस्मत के पासे कुछ और करवट लिए होते तो एलिज़ाबेथ के बजाय कुर्सी पर आज कोई और होता.

राजा-रानी की कहानी

कहानी यूं है कि 1936 में ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज पंचम की मृत्यु हुई और उनके सबसे बड़े बेटे, प्रिन्स ऑफ़ वेल्स, एडवर्ड का राजतिलक हुआ. वो ब्रिटेन और उसके उपनिवेशों के राजा बन गए. तब तक एडवर्ड की शादी नहीं हुई थी. जिससे उनकी शादी होती, वो ब्रिटेन की रानी बनती. लेकिन 90’s के फ़ेमस पॉप बैंड यूरोफ़िया का गाना याद है आपको,

जग बहता पानी
सब आनी-जानी
कितनी पुरानी
राजा-रानी की कहानी

इसी राजा-रानी की कहानी ने किस्से में एक अलग तड़का लगा दिया. हुआ यूं कि राजा एडवर्ड जिसे रानी बनाना चाहता था, उसका नाम था वॉलिस सिंपसन. एक अमेरिकन महिला, जो दो शादियां कर दोनों को डिवॉर्स दे चुकी थी. एडवर्ड का वॉलिस पर दिल आया तो मदर-क्वीन मेरी की भौहें चढ़ गईं.

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राजा जॉर्ज-6 और एलिज़ाबेथ (तस्वीर: AFP)

राज परिवार ने शादी से इनकार कर दिया. इसके अलावा एक दिक़्क़त चर्च के साथ भी थी. दरअसल ब्रिटेन का राजा चर्च का भी सुप्रीम गवर्नर होता है. और तब के धार्मिक माहौल में राजा दो-दो शादी कर चुकी महिला से शादी करे, ये चर्च को क़तई गवारा नहीं था. वो भी तब, जब वॉलिस के दोनों पूर्व पति ज़िंदा थे. यहां तक कि ब्रिटेन की संसद, PM सब इस शादी के सख़्त ख़िलाफ़ थे.

राजा एडवर्ड ज़िद पर डटा था कि शादी करुंगा तो सिर्फ़ वॉलिस से. शादी करना ज़रूरी भी था क्योंकि राजा शादी नहीं करेगा तो राज गद्दी को वारिस कैसे मिलेगा. दोनों तरफ़ से कोई भी एक इंच देने को तैयार नहीं था. सो एडवर्ड ने फ़ैसला किया कि सोने की दीवारों से बढ़कर ख़ुशी अपनी प्रेमिका के साथ रहने में है. उन्होंने राज परिवार से कहा कि वो राजमुकुट वापस ले लें.

राजमहल ने राजा की आज्ञा मानते हुए मुकुट वापस ले लिया और एडवर्ड की ब्रिटेन के राजमहल से विदाई हो गई. इसके बाद एडवर्ड के छोटे भाई जॉर्ज-6 को राजा बना दिया गया. बाद में जब वॉलिस और एडवर्ड की हिट्लर के साथ कुछ फ़ोटोज़ लीक हुई तो उनकी और भी बदनामी हुई. एडवर्ड के राजशाही त्यागने को लेकर उनका परिवार हमेशा उनसे नाराज़ रहा और बाकी ज़िंदगी उन्हें फ़्रांस में लगभग गुमनामी में गुज़ारनी पड़ी.

एडवर्ड का एक और छोटा भाई था, प्रिन्स जॉर्ज, ड्यूक ऑफ़ केंट. 1942 में एक प्लेन हादसे में उनकी मौत हो गई. इस प्लेन हादसे के इकलौते सर्वाइवर से ‘ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट’ पर साइन करवाया गया. जिसके अनुसार ऐक्सिडेंट कैसे हुआ और उसकी बाकी डिटेल्स किसी को नहीं बताई जा सकती थीं.

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एडवर्ड और वॉलिस सिंपसन (तस्वीर: Getty)

इसके चलते कई और कॉन्स्पिरेसी थ्योरी चली कि प्रिन्स जॉर्ज की मृत्यु में MI-5 का हाथ था क्योंकि वो नाज़ियों को सीक्रेट इंफ़ो दे रहे थे. इसके बाद 1947 में भारत की राजशाही तो ख़ात्मे की ओर बढ़ गई लेकिन. ‘घंटी बिग बेन दी’ बजती रही और बकिंघम पैलेस से ब्रिटेन की 1000 साल पुरानी राजशाही चलती रही. आज भी चल रही है.

कुल मिलाकर बात ये है कि शाही परिवारों की गिनती शुरू करें तो निश्चित ही ब्रिटेन के राजपरिवार का नाम सबसे ऊपर आएगा. कारण की 21वीं सदी में दुनिया के लगभग सभी बड़े देशों में राजशाही समाप्त हो चुकी है. ब्रिटेन का नेशनल एंथम आज भी ‘गॉड सेव द क्वीन’ है. कमाल की बात ये भी है कि ब्रिटेन इसके बावजूद एक डेमोक्रेसी है. और लोगों का राज परिवार के प्रति कोई ख़ास विद्रोह भी नहीं है.

ग्वालियर का बकिंघम पैलेस

ब्रिटेन के राज परिवार का ये किस्सा इसलिए सुनाया कि आज हम जिस भारतीय ऐतिहासिक घटना की बात कर रहे हैं. उसमें ये सभी शामिल है, बकिंघम पैलेस जैसा एक राजमहल. एक राज परिवार, राजमाता, एक बहू जिसके जिसके लिए माना जाता रहा कि उसी के कारण परिवार में अलगाव पैदा हुआ और एक प्लेन हादसा.

भारत में ग्वालियर राजघराने का ठिकाना है, जयविलास महल. जिसकी भव्यता बकिंघम पैलेस से कुछ कम नहीं है. 80 एकड़ में फैला हुआ ये महल कभी रजवाड़ों की राजनीति का गढ़ हुआ करता था. ब्रिटिश राज के दौरान केवल 5 राजघराने ऐसे थे जिन्हें 21 बन्दूकों की सलामी दी जाती थी. इनमें से एक ग्वालियर राजघराना भी था. आज़ादी के बाद ग्वालियर और आस-पास की रियासतों को जोड़कर एक रियासत ‘मध्य भारत’ बनाई गई. मध्य भारत के पहले राजप्रमुख बने जीवाजीराव सिंधिया. 31 अक्टूबर 1956 को इन शाही रियासतों को मिलाकर मध्य प्रदेश राज्य का निर्माण हुआ.

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जयविलास महल (फ़ाइल फोटो)

1957 में देश में चुनाव हुए तो कांग्रेस ने जीवाजीराव सिंधिया से उनके टिकट पर चुनाव लड़ने का आग्रह किया. जीवाजीराव नहीं माने तो उनकी पत्नी राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने चुनाव लड़ने का फैसला किया. 1960 के दशक में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा से तनातनी के चलते विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेस से किनारा कर लिया. 1967 में उन्होंने जन संघ जॉइन किया और जीतकर विधानसभा पहुंचीं. 1971 में दुबारा लोकसभा का इलेक्शन लड़ा और इंदिरा गांधी की लहर में भी चुनाव जीतने में सफल रहीं. इसी साल उनके बेटे माधव राव सिंधिया ने भी राजनीति में एंट्री ली. और गुना से चुनाव जीत कर लोकसभा पहुंचे.

मां-बेटे के बीच दरार

1975 में इमरजेंसी के दौरान मां बेटे के रिश्ते में पहली दरार आई. जिसका कारण था कि इमरजेंसी के दौरान विजयाराजे सिंधिया को जहां जेल जाना पड़ा, वहीं माधव राव सिंधिया जेल से बचने के लिए ब्रिटेन चले गए. उनका कहना था,

“मैं जिस कॉज में विश्वास ही नहीं करता, उसके लिए जेल क्यों जाऊं

इसके बाद अपनी मां की राह की ठीक ‘मिरर इमेज’ बनाते हुए 1977 में उन्होंने जनसंघ से स्तीफ़ा दे दिया. विजयाराजे सिंधिया की ही तरह उन्होंने भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और जीते भी. 1979 में जनता पार्टी में कलह के कारण सरकार गिर गई. 1980 में चुनाव होने थे. सत्ता की लहर इंदिरा की तरफ़ देख माधव राव सिंधिया ने कांग्रेस का दामन थाम लिया. मां विजयाराजे के लिए ये स्ट्राइक 2 थी.

बेटे और मां के रिश्तों में तनातनी का एक बड़ा कारण था सिंधिया परिवार की अथाह जायदाद. जनता पार्टी को चंदा देने के चक्कर में विजयाराजे सिंधिया ने जय विलास महल से बहुत सा धन और ज़ेवर बेच डाला था. साथ ही मुंबई और बाकी जगहों पर कई प्रॉपर्टीज़ को औने पौने दामों पर बेच दिया गया था.

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सिंधिया परिवार (तस्वीर: Getty)

लेकिन प्रॉपर्टी और राजनीति इस कलह में सिर्फ़ ‘टिप ऑफ़ द आइसबर्ग’ की तरह थे. विजयाराजे और माधव राव के बीच कलह की एक बड़ी वजह थी सिंधिया राजघराने की बहू, माधवी. तब की इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, विजयाराजे माधवी से ख़ासी नाराज़ थीं. उनके अनुसार उनके और बेटे के बीच ख़लल डालने का काम माधवी ने ही किया था. रिपोर्ट के अनुसार माधवी के लिए उन्होंने जिन शब्दों का प्रयोग किया था, इस प्रकार हैं,

“मेरे सोने से भी खरे बेटे को इस लालची और घमंडी औरत ने बिगाड़ दिया.”

1980 के चुनाव में जनता पार्टी की करारी हार हुई. उसी साल भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ. राजमाता विजयाराजे सिंधिया को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया. दूसरी तरफ़ माधव राव सिंधिया धीरे-धीरे कांग्रेस का बड़ा चेहरा बन गए. और  राजीव गांधी के साथ उनकी दोस्ती भी गहरी होती चली गई.

वाजपेयी को हराया

1984 के लोकसभा चुनाव में माधव राव गुना से पर्चा भरने वाले थे लेकिन लास्ट मिनट में उन्होंने ग्वालियर से पर्चा भर दिया. इस सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार थे अटल बिहारी वाजपेयी. चुनाव में माधव राव सिंधिया से दो लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीते. विजयाराजे सिंधिया के लिए ये आन और शान का मसला था. और इस घटना से मां-बेटे के रिश्ते लगभग हमेशा के लिए टूट गए.

शुरू हुआ अदालतों और वकीलों का चक्कर. झगड़ा इतना बढ़ा कि राजमाता ने अपनी वसीयत में से माधव राव को बाहर निकाल दिया. उन्होंने अपनी वसीयत में यहां तक लिख दिया कि माधव राव उनका अंतिम संस्कार नहीं करेंगे. इसके बाद माधव राव सिंधिया राजीव गांधी की सरकार में रेल मंत्री बने. 1990 से 1993 तक BCCI के प्रेसिडेंट रहे. और 1991 से 1992 तक नरसिम्हा राव सरकार में सिविल एविएशन मंत्री रहे. 1992 में एक प्लेन दुर्घटना के कारण उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा भी देना पड़ा. 25 जनवरी 2001 को विजयाराजे सिंधिया का निधन हुआ तो वसीयत के ख़िलाफ़ जाकर माधव राव सिंधिया ने उनका अंतिम संस्कार किया.

प्लेन हादसा

उसी साल आज ही के दिन यानी 30 सितंबर 2001 को माधव राव सिंधिया भी एक प्लेन हादसे का शिकार हो गए. उस दिन माधव राव सिंधिया को उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक चुनावी रैली को सम्बोधित करना था. दिल्ली के सफदरजंग हवाई अड्डे से दोपहर 12:49 एक शेषना एयरकिंग 90 विमान ने उड़ान भरी. इसमें सिंधिया और पत्रकारों को मिलाकर कुल आठ लोग सवार थे.

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क्रैश हुए प्लेन का मलबा (तस्वीर: AFP)

उड़ान भरने के कुछ देर बाद ही खबर आई कि मैनपुरी के भैंसरोली गांव नज़दीक विमान दुर्घटना ग्रस्त हो गया. बचाव दल पहुंचा तो उन्होंने देखा कि विमान ज़मीन में धंस गया था. विमान की दरवाज़ा टूटकर अलग हो गया था. हादसे के कारण विमान में आग लग गई थी और बारिश के बावजूद एक घंटे तक उसमें से धुआं उठ रहा था.

भयानक बारिश के कारण प्लेन कीचड़ में फ़ंस गया था. ऐसे में गांव वालों को बुलाया गया. शव इतनी बुरी तरह जल चुके थे कि पहचानना मुश्किल था. सीट बेल्ट भी ज्यों की त्यों बंधी थी. जिससे पता चलता था कि हादसा इतनी अचानक हुआ कि किसी को कुछ करने का मौक़ा ही नहीं मिला था. गले में एक लॉकेट और जूतों से माधव राव सिंधिया की पहचान हो पाई.

खबर लगते ही तब के मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह भी घटना स्थल पर पहुंचे. इस हादसे में माधव राव सिंधिया के अलावा दो पायलट विवेक गुप्ता और ऋतु मलिक, चार पत्रकार रंजन झा, गोपाल बिष्ट (आजतक), अंजू शर्मा (हिन्दुस्तान टाइम्स), संजीव सिन्हा (इंडियन एक्सप्रेस) और सिंधिया के निजी सचिव रूपिंदर सिंह की दर्दनाक मौत हुई थी.

हादसे की जांच के लिए एक कमिटी बनाई गई. लेकिन प्लेन में ब्लैक बॉक्स की ग़ैरमौजूदगी के चलते दुर्घटना के कारणों का कुछ ख़ास पता नहीं चल पाया. इसी कारण इस प्लेन क्रैश को लेकर भी बहुत सी कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज चलीं.
उनकी मृत्यु पर ब्रिटिश अख़बार द गार्डियन ने कुछ यूं लिखा-

“उनके कुलीन वंश, व्यक्तिगत आकर्षण, कलात्मकता, युवा छवि और लोकतांत्रिक राजनीति की उथल-पुथल से निपटने की उनकी क्षमता ने उन्हें जन लोकप्रिय नेता बनाया. हो सकता है सोनिया गांधी के पास नेतृत्व की क्षमता और गांधी परिवार का नाम हो. लेकिन सिंधिया के पास  वाकपटुता थी और वो कांग्रेस के लिए भीड़ खींचने वाले नेताओं में से एक थे “

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर सिंधिया की अकाल मृत्यु ना हुई होती तो 2004 में वे प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़े उम्मीदवारों में से एक होते.


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