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किसने लिखा था 'मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहां हमारा’?

हम ही हम हैं तो क्या हम हैं 

“मैं पंजाब, नार्थ वेस्ट फ्रंटियर, सिंध और बलूचिस्तान को एक संयुक्त राज्य के रूम में देखना चाहता हूं. ब्रिटिश राज के तहत या फिर उससे बिना भी एक खुद-मुख्तार नार्थ-वेस्ट भारतीय मुस्लिम राज्य ही मुसलमानों का आखिरी मुस्तकबिल है.”

1930 में अल्लामा इक़बाल ने मुस्लिम लीग के 25 वें अधिवेशन में ये बयान दिया था. उर्दू के शब्दों का व्हाटसएपीकरण करें तो इक़बाल मुसलमानों के लिए अलग मुल्क की बात कर रहे थे. तब सोशल मीडिया नहीं था. वर्ना कोई ना कोई ट्विटरबाज उन्हें 1904 का स्क्रीनशॉट ज़रूर चेप देता. जब वो कह रहे थे,

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा

इससे पहले कि इक़बाल कैन्सिल कल्चर की भेंट चढ़े. नोट किया जाना ज़रूरी है कि इंसान के ख़यालातों में बदलाव आना स्वाभाविक है. लेकिन इस बदलाव की कहानी में कुछ बिंदु हैं. जिन्हें समझकर जाना जा सकता है कि भारत का धर्म निरपेक्ष राष्ट्र होना कितनी बड़ी बात है. सरशार सैलानी साहब का एक शेर है,

चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है,
हम ही हम हैं तो क्या हम हैं तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो

(इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू – रंग और ख़ुशबू का आपस में मिलना)

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मुहम्मद इक़बाल (तस्वीर: commons)

शेर लिखते वक्त सरशार सैलानी साहब ने बताया नहीं कि किस हिज्जे में इसका इस्तेमाल किया जाए. हमवतन अगर हिंदुस्तान को चमन कहें तो सवाल उठेगा कि कौन ‘हम’ और कौन ‘तुम’. इक़बाल जब लिखते हैं, हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा, तो यहां ‘हम’ से उनका मतलब ‘हम सब’ से है. एक भी छूटा तो ‘हम’, ‘हम’ नहीं रह जाता. लेकिन सिर्फ़ 4 साल के फ़ासले में इक़बाल का ‘हम’, हम और तुम में तब्दील हो गया. कैसे?

शुरू से शुरुआत

इक़बाल का जन्म आज ही के दिन यानी नवंबर 9, 1877 को सियालकोट में हुआ था. उनके पुरखे मूलतः कश्मीर के रहने वाले थे. जिन्होंने उनके जन्म से तीन सदी पहले इस्लाम स्वीकार कर लिया था. आगे चलकर उन्होंने लाहौर से ग्रेजुएशन किया और फिर वहीं पढ़ाने लगे. आज़ादी का संघर्ष तब धीमी आंच पर पक रहा था. अंग्रेजों से विरोध में कलम और कविता भी अपना कर्तव्य पूरा कर रही थी. और इक़बाल भी इसमें साझा भूमिका निभा रहे थे. 1903 में इत्तेहद नाम की पत्रिका में उनकी कविता छपी. ‘सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा’. इसके एक साल बाद मंच से उन्होंने ये कविता दोहराई. इक़बाल तब गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में लेक्चरर हुआ करते थे. 1904 में वहां छात्रों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम रखा गया. वक्ता के तौर पर इक़बाल भी शामिल हुए. बोलने की उनकी बारी आई तो वो उन्होंने गाया,

ग़ुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहां हमारा

सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्तां हमारा

बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर ये गीत चढ़ा और स्वतंत्रता संग्राम का सिम्बल बन गया.

लंदन से चीन-ओ-अरब

इसके अगले साल यानी 1905 में इक़बाल लंदन रवाना हुए. वहां कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज से आगे की पढ़ाई की. 1907 में म्यूनिख जाने का मौक़ा मिला और वहां लुडविंग मेक्समिलियन विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री ली. यहीं पर नहीं रुके. आगे चलकर क़ानून की पढ़ाई भी की. बैरिस्टर बने. इस दौरान उनका राब्ता रूमी से हुआ. उन्होंने गोथे और नीत्शे का दर्शन पढ़ा. स्वामी रामतीर्थ को मसनवी सिखाई और उनसे संस्कृत सीखी.

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लंदन में गोलमेज सम्मेलन में मोहम्मद अली जिन्ना के साथ बैठे अल्लामा इकबाल (बीच में; अपनी विशिष्ट टोपी में) (फोटो: अल्लामा इकबाल संग्रह)

1908 में भारत लौटे. और जो पहली ग़ज़ल लिखी, उसी से ख़यालात में बदलाव की झलक दिखने लगी थी. उन्होंने लिखा,

चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्तां हमारा
मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहां हमारा

इकबाल के यहां भी ‘हम’ कहा. लेकिन ये ‘हम’ वो हम नहीं है जिसकी बात वो 1904 में कर रहे थे. ये ‘हम’ सिर्फ़ एक धर्म सम्प्रदाय के लिए था. बाकी लोग इस ‘हम’ में शामिल नहीं थे. भारत लौटकर उन्होंने दो साल लेक्चरर की नौकरी की. 1910 में उसे छोड़कर वकालत संभाल ली. 9 साल वकालत की. 1919 में वो भी छोड़ दी और अंजुमन-ए-हिमायत-ए इस्लाम संस्था के जनरल सेक्रेटरी चुने गए.

कफ़स में नाइटहुड 

1904 से पहले तक इक़बाल ग़ुलामी के दर्द को काग़ज़ पर उतार रहे थे. उन्होंने परिंदे की फ़रियाद नाम से एक कविता लिखी थी. जिसके एक लाइन कुछ यूं थी,

इस क़ैद का इलाही दुखड़ा किसे सुनाऊं
डर है यहीं क़फ़स में मैं ग़म से मर न जाऊं

कफ़स- कैद

1922 आते आते कफ़स का ग़म शायद कुछ मद्धम पड़ गया था. 1922 में अंग्रेज सरकार ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि दी तो उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी उसे स्वीकार कर लिया. इसके 3 साल बाद 1925 में जब जिन्ना को ये पेशकश की गई तो उन्होंने ये कहकर नाइटहुड की उपाधि ठुकरा दी कि “मैं सिर्फ़ मिस्टर जिन्ना कहलाना पसंद करूंगा”.

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1932 में नेशनल लीग, लंदन द्वारा दिए गए एक स्वागत समारोह में मुहम्मद इकबाल (तस्वीर: Commons)

1927 में इक़बाल ने चुनाव लड़ा. वो पंजाब लेजिसलेटिव असेंबली के सदस्य के तौर पर चुने गए. अगले कुछ सालों में उन्होंने अलीगढ़, हैदराबाद और मद्रास विश्वविद्यालयों में छह लेक्चर दिए. बाद में इन्हें एक किताब की शक्ल में छापा गया. किताब का नाम था, ‘रीकंस्ट्रक्शन ऑफ़ रिलिजियस थॉट इन इस्लाम’.

1904 से पहले इक़बाल अखंड भारत की बात किया करते थे, जहां हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रह सकेंगे. लेकिन ‘रीकंस्ट्रक्शन ऑफ़ रिलिजियस थॉट इन इस्लाम’ में वो एकेश्वरवाद और अलग मुस्लिम इकाई की बात करने लगे थे. उनका कहना था कि हिंदू बहुल संख्या वाले देश में मुसलमान हमेशा दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रहेंगे. हालांकि उनका विचार सिर्फ़ राष्ट्र तक सीमित नहीं था. वो वैश्विक मुस्लिम समुदाय में एकजुटता की बात कर रहे थे.

लोकतंत्र यानी लोगों की क़तारें

लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को लेकर भी उनके विचार बदल चुके थे. उनका तर्क था कि लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ़ लोगों की क़तारें हैं. इसमें सिर्फ़ लोगों को गिनती का मोल है. उनके व्यक्तित्व का कोई मोल नहीं. इसके अलावा उन्होंने तर्क दिया कि लोकतंत्र में धर्म की अनुपस्थिति के चलते सही-ग़लत सिर्फ़ एक क़ानूनी मसला बन जाता है. धर्म में सही ग़लत मूल रूप से परिभाषित हैं. जबकि लोकतंत्र में क़ानून बदलता है तो सही-ग़लत भी बदल जाता है.

अलग मुस्लिम इकाई को लेकर उनका तर्क था कि ईसाई धर्म के विपरीत इस्लाम में क़ानून और धर्म अलग अलग नहीं हो सकते. इसलिए इस्लामी धार्मिक क़ानून के पालन के लिए अलग राष्ट्र का होना ज़रूरी है.

1930 के दौर में मुस्लिम लीग नेताओं की आपसी खींचतान की शिकार थी. जिससे तंग आकर जिन्ना लंदन चले गए थे. इक़बाल का मानना था कि सिर्फ़ जिन्ना ही वो एकमात्र व्यक्ति थे, जो भारत में मुस्लिमों के रहनुमा बन सकते थे. इसलिए उन्होंने जिन्ना को वापस भारत लौटने को कहा. इक़बाल के बुलावे पर 1934 में जिन्ना भारत लौटे. और उन्होंने इक़बाल के ‘इस्लामी आध्यात्मिक समाजवाद’ का रास्ता अपनाया.

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मुहम्मद अली जिन्ना और अल्लामा इक़बाल (तस्वीर: commons)

जिन्ना तब भी ‘टू नेशन थियोरी’ की बात कर रहे थे, लेकिन दबी ज़बान में. 21 जून 1937 को उनको इक़बाल का आख़िरी ख़त मिला, जिसके बाद वो खुलकर अलग पाकिस्तान की मांग करने लगे. इस लेटर के ऊपर लिफ़ाफ़े में कॉनफिडेंशियल लिखा हुआ था. अंदर दर्ज़ था,

“मुस्लिम प्रांतों का एक अलग संघ, एकमात्र रास्ता है जिससे हम मुसलमानों को गैर-मुसलमानों के वर्चस्व से बचा सकते हैं. साथ ही इसके द्वारा हम भारत को शांतिपूर्ण बनाए रख सकते हैं.”

आगे लिखते हैं,

“भारत और भारत के बाहर अन्य राष्ट्रों को आत्मनिर्णय का अधिकार है. तो उत्तर-पश्चिम भारत और बंगाल के मुसलमानों को ये अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए.

अपने आख़िरी दिनों में इक़बाल दुनिया भर में घूम-घूम कर मुस्लिम लीग के लिए समर्थन जुटाते रहे. स्वाधिकार और स्वतंत्रता की बात जब भी उठी तो उन्होंने इसका विरोध किया. उनका कहना था कि जब तक मुसलमानों के लिए अलग इकाई का निर्णय नहीं लिया जाता, स्वतंत्रता की बात बेमानी है.

ज़िंदगी के अंत तक इक़बाल मुसलमानों के लिए अलग राज्य की लड़ाई लड़ते रहे, लेकिन वो इस दर्दनाक बंटवारे के गवाह नहीं बन सके. 21 अप्रैल 1938 को उन्होंने पठानकोट में आखिरी सांस ली.

एपिलॉग 

इक़बाल में कहे में सिर्फ़ मुस्लिम शब्द को रिप्लेस कर दिया जाए. तो आपको दूसरी तरफ़ का तर्क दिखाई देने लगेगा. और इसीलिए भारत में सरकार का धर्म निरपेक्ष होना विशेष है. क्योंकि एक राष्ट्र के दौर पर भारत पाकिस्तान का उल्टा नहीं है. भारत का गठन जिस विचार पर हुआ था, वो पाकिस्तान देश के विचार से डाइमेंशनली अलग है.

सरकार अगर धर्म का पक्ष लेती है. तो ये निश्चित है कि उसे आगे और पक्ष लेने होंगे. क्योंकि धर्म से आगे और अलग-अलग बंटवारे भी हैं. ये ऐसी फिसलन है कि अगर स्टेट ने एक बार किसी भी आधार पर पक्षपात किया तो वो कहां जाकर रुकेगा, कह नहीं सकते. इसके अलावा धर्म निरपेक्षता की बात सिर्फ़ धर्म तक सीमित नहीं है.

इसके मूल में ये विचार है कि सरकार या कोई सरकारी इंस्टिट्यूशन किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती. चाहे वो लिंग हो, रंग हो, धर्म हो या और कोई भी आधार हो. ये बात सबके हित के लिए है. हो सकता है किसी को लगे कि आज सरकार पक्ष में है तो फ़ायदा है, लेकिन सोचिए इसकी कितनी सम्भावना है कि एक दिन सरकार जिसका पक्ष ले, उसमें आपका पाला शामिल ना हो.


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