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इंदिरा ने शेख़ अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया तो आतंकियों ने प्लेन हाइजैक कर लिया

आज 10 सितम्बर है और आज की तारीख़ का संबंध है एक प्लेन हाइजैकिंग से.

आज ही के दिन यानी 10 सितम्बर 1976 को 5 लोगों ने एक बोइंग प्लेन हाइजैक कर लिया था. हाइजैकर्स ने ये मांग रखी कि वॉशिंग्टन पोस्ट और न्यू यॉर्क टाइम्स में उनकी अपील छापी जाए. अपील क्या थी?

ये कि उनकी ज़मीन की आज़ादी के लिए अमेरिका के लोग समर्थन करें. यानी मोटामाटी समझें तो वो मुद्दे को अंतराष्ट्रीय मीडिया में उछालना चाहते थे. ताकि सबका ध्यान इस तरफ़ जाए. उन्होंने धमकी दी कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गई तो प्लेन को बम धमाके से उड़ा दिया जाएगा.

कौन थे ये हाइजैकर्स? और वो किस ज़मीन की आज़ादी की मांग कर रहे थे?

दिल्ली टू बॉम्बे बट लाहौर

ये सब जानने से पहले हमें दिल्ली के पालम हवाई अड्डे चलना होगा. 10 सितम्बर की सुबह एक बोइंग 737 प्लेन मुम्बई जाने के लिए तैयार हो रहा था. प्लेन के पायलट कैप्टन बी. एन. रेड्डी और को-पायलट आर.एस. यादव सब कुछ चेक करने के बाद टेक ऑफ़ करते हैं. कुछ ही देर में प्लेन 8000 फ़ीट की ऊंचाई पर पहुंच जाता है. पायलट रेड्डी नो स्मोकिंग का साइन ऑन करते हुए अनाउंस करते हैं कि सभी यात्री अपनी सीट बेल्ट खोल लें.

इसके बाद को-पायलट यादव प्लेन को ऑटो-पायलट मोड में सेट करते हैं. तभी कॉकपिट का दरवाज़ा खुलता है और दो लोग ज़बरदस्ती अंदर घुस जाते हैं. इससे पहले कि दोनों पायलट कुछ समझ पाते, उनमें से एक आदमी को-पायलट यादव की कनपट्टी पर एक 12 बोर की पिस्टल धर देता है. बिलकुल क्लीशे अन्दाज़ में पायलट और को-पायलट को हिदायत दी जाती है,

‘हाथ ऊपर, हिलना मत. वरना हम तुम्हें मार देंगे. हमने प्लेन हाइजैक कर लिया है. प्लेन को लीबिया ले चलो.’

अब यहां पर हाइजैकर्स की तीक्ष्ण बुद्धि का परिचय मिलता है. जो प्लेन पालम से बॉम्बे तक का फ़्यूल लेके चला है. उसे ये लोग लीबिया ले जाने की फ़िराक में हैं. पालम से मुम्बई की दूरी है – लगभग 1400 किलोमीटर. और दिल्ली से लीबिया —5800 किलोमीटर. प्लेन किसलिए हाईजैक किया गया था? ये जानने के लिए हमें तब के कश्मीर के हालात को समझना होगा.

सेब के बाग और रफ़ीक अहमद

कश्मीर का शोपियां टाउन. सेब के बागों के लिए मशहूर इस शहर से आए दिन आतंकी मुठभेड़ों की खबरें आती रहती हैं. सितम्बर 1976 के रोज़ यहां के एक बाशिंदे ने दिल्ली सरकार को हिला डालने की ठानी. इस आदमी का नाम था रफ़ीक अहमद मुफ़्ती. उसने अपने साथ चार और लोगों को जोड़ा. अब्दुल हमीद दिवानी, ग़ुलाम नबी, ग़ुलाम रसूल और अब्दुल राशिद मलिक.

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शेख़ अब्दुल्ला और इंदिरा गांधी (फ़ाइल फोटो)

ये पांचों 1975 में हुए इंदिरा-शेख़ अकॉर्ड से ख़फ़ा थे. अकॉर्ड के मुताबिक़ शेख़ अब्दुल्ला ने कश्मीर में प्लेबिसाइट यानी जनमत संग्रह की मांग छोड़ दी थी. इसके बदले में कांग्रेस ने उन्हें सपोर्ट दिया और वह जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बन गए. रफ़ीक अहमद को लगा कि इंदिरा गांधी और शेख़ अब्दुल्ला ने मिलकर कश्मीर के साथ नाइंसाफ़ी की है. नतीजतन उसने अपने चार साथियों के साथ प्लेन हाइजैक करने का प्लान बनाया. और यही पांचों 10 सितंबर की सुबह मुम्बई जाने वाले प्लेन में घुसे और उसे हाइजैक कर लिया.

वापस क़िस्से पर

टेक ऑफ़ करते ही सबसे पहले इन्होंने कॉकपिट को अपने कब्जे में लिया.

इसके बाद हड़बड़ी में को-पायलट यादव प्लेन का ऑटो-पायलट मोड ऑन करते हैं. पालम तक कोई स्ट्रेस सिग्नल पहुंचा दें, इस फिराक में उनकी उंगलियां डैशबोर्ड पर हरकत करने लगती हैं. ये देखकर लीड हाइजैकर रफ़ीक, दोनों को दुबारा जान से मारने की धमकी देता है.

पायलट रेड्डी उसे समझाते हैं कि प्लेन में इतना फ़्यूल नहीं कि उसे लीबिया ले जाया जा सके. रफ़ीक उनसे नियरेस्ट हवाई अड्डा का पता पूछता है. रेड्डी कहते हैं कि प्लेन को जयपुर या वापस पालम ले ज़ाया जा सकता है. कुछ देर सोचने के बाद लम्बी दाड़ी वाला एक दूसरा हाइजैकर, हमीद उनसे कहता है कि प्लेन को कराची ले चलो. रेड्डी उसे दुबारा समझाते हैं कि ये डोमेस्टिक फ़्लाइट है और कराची तक का फ़्यूल नहीं है. इसके बाद रेड्डी ऑप्शन देते हैं कि अगर भारत में प्लेन नहीं उतारा जा सकता तो उसे लाहौर ले जा सकते हैं.

कॉकपिट में जब ये सब कुछ चल रहा है. बाकी तीन आतंकी पीछे केबिन में मौजूद हैं. उनकी कमर में ऐम्युनिशन बेल्ट और हाथ में बंदूक़ है. तीनों को कॉकपिट में हो रही बातचीत का कोई अंदाज़ा नहीं था. तभी कॉकपिट का दरवाज़ा एक और बार खुलता है. रफ़ीक ने पायलट रेड्डी को कॉलर से पकड़ रखा है. वो उन्हें घसीटता हुआ ले जाता है और प्लेन के एंड वाले टॉयलेट में बंद कर देता है.

डेस्टिनेशन चेंज्ड टू लाहौर

प्लेन को अब सिर्फ़ को-पायलट यादव चला रहे हैं. अब प्लेन का डेस्टिनेशन है, लाहौर.

पूरे सफ़र में रफ़ीक बार-बार को-पायलट यादव से पूछता है कि लाहौर पहुंचने में कितनी देर है. यादव उसे चेताते हैं कि अगर स्पीड ज़्यादा तेज हुई, तो इंजन गरम हो सकता है और उसमें आग भी लग सकती है. लेकिन रफ़ीक उनसे प्लेन की स्पीड बढ़ाने को कहता है. कुछ घंटों बाद प्लेन लाहौर पहुंचता है. को-पायलट यादव कंट्रोल टावर से सम्पर्क करते हैं. और लैंडिंग की इजाज़त मांगते हैं. रफ़ीक यादव से माइक्रोफ़ोन छीन लेता है. इसके बाद वो कंट्रोल टावर को बताता है कि ये एक हाइजैक्ड प्लेन है. वो बार-बार कंट्रोल टावर से कंफ़र्म करने के लिए पूछता है,

ये लाहौर हवाई अड्डा ही है ना?

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2018 में लाहौर में रफ़ीक मुफ़्ती की मृत्यु हो गई (तस्वीर: kashmirlife.net)

कंट्रोल टावर से जवाब आता है, हां! लेकिन अब्दुल को तब भी यक़ीन नहीं आता. घबराहट में वो सोच रहा है कि पायलट ने कहीं कोई चालाकी ना कर दी हो. बहरहाल लैंडिंग की इजाज़त मिलती है और प्लेन लाहौर हवाई अड्डे पर लैंड भी हो जाता है. प्लेन के रनवे पर पूरी तरह रुकने से पहले ही रफ़ीक ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर बाहर मौजूद लोगों से पूछने लगता है,

“क्या ये लाहौर ही है?”

को-पायलट यादव उसे समझाते हैं कि इंजन की आवाज़ के कारण कोई उसकी बात नहीं समझ पाएगा. प्लेन रुकने के बाद जब हाइजैकर्स को तसल्ली हो जाती है कि वो लाहौर में ही हैं, तो रफ़ीक को-पायलट यादव को बाहर भेजता है. यादव जाकर पाकिस्तानी अधिकारियों से बात करते हैं. अधिकारियों को बताते हैं कि हाइजैकर जल्द से जल्द लीबिया के लिए उड़ान भरना चाहते हैं. और इसके लिए फ़्यूल, इंटरनैशनल रूट मैप, नैविगेटर आदि की ज़रूरत होगी.

लीबिया पहुंचकर बताएंगे

पाकिस्तानी अधिकारी सूझबूझ दिखाते हुए हाइजैकर्स के पास जवाब भिजवाते हैं कि लाहौर भी एक डोमेस्टिक हवाई अड्डा है. इंटरनेशनल उड़ान के लिए ज़रूरी चीजें कराची से मंगानी होंगी. शाम तक किसी तरह हाइजैकर्स को समझाने की कोशिश की जाती है. लेकिन रफ़ीक अपनी ज़िद पर अड़ा रहता है. पाकिस्तानी अधिकारी लगातार रफ़ीक से उनकी मांग पूछते हैं. लेकिन रफ़ीक जवाब देता है कि ये सब वो लीबिया पहुंचकर ही बताएंगे.

उसे बताया जाता है कि रात को बिना मैप के उड़ान भरने से किसी दूसरे प्लेन से टकराने का ख़तरा है, तब जाकर वो अगली सुबह तक इंतज़ार करने के लिए तैयार हो जाता है. पाकिस्तानी अधिकारी रफ़ीक से कहते हैं कि सभी यात्रियों की सलामती इंश्योर करने के लिए उन्हें लाउंज में ले जाया जाए. रफ़ीक इसके लिए तैयार हो जाता है. लेकिन साथ ही एक शर्त भी रखता है. वो ये कि पायलट सहित 4 हाइजैकर्ज़ प्लेन में ही रहेंगे और वो खुद यात्रियों के साथ लाउंज में रुकेगा.

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दिल्ली और लीबिया के बीच 5800 किलोमीटर की दूरी है (तस्वीर: गूगल मैप्स)

यहां पर कैप्टन रेड्डी और को-पायलट यादव एक और सूझबूझ दिखाते हैं. वो रफ़ीक से कहते हैं कि अगर उन्हें पर्याप्त आराम नहीं मिला तो वो सुबह प्लेन नहीं उड़ा पाएंगे. ये सुनकर रफ़ीक उन्हें भी लाउंज तक भेजने के लिए तैयार हो जाता है. इसके बाद रात 2.30 बजे एक बस बुलाई जाती है और सारे यात्रियों और क्रू को लाउंज में ले जाती है. प्लेन पूरा खाली हो चुका होता है. उसमें सिर्फ़ 4 हाइजैकर बच जाते हैं. आगे जो हुआ वो आप गेस कर सकते हैं.

हाइजैकर हाइजैक्ड

सुबह 5.30 बजे लाउंज में दोनों पायलट को नींद से जगाया जाता है. एक पाकिस्तानी ऑफ़िसर उन्हें बताता है कि रात में ही पांचों हाईजैकर्स कब्जे में ले लिया गया है. इसके किसी ख़ास ऑपरेशन की ज़रूरत भी नही पड़ी. रात को चार हाइजैकर्स को प्लेन में खाना पहुंचाया गया. और उसमें बेहोशी की दवा मिला दी गई. खाना खाकर चारों बेहोश हो गए. और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.

रफ़ीक जो लाउंज में यात्रियों के साथ था, उसे भी आसानी से कब्जे में कर लिया गया. प्लेन में मौजूद 77 यात्री और 6 क्रू मेम्बर्स को कोई नुक़सान नहीं हुआ. उन्हें सही सलामत भारत पहुंचा दिया गया.

पांचों हाइजैकर्स पर पाकिस्तान की अदालत में मुक़दमा चला. उन्हें जेल हुई लेकिन कुछ ही महीने में उन्हें रिहा कर दिया गया. काफ़ी कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान ने उन्हें भारत को नहीं सौंपा. और तब से लेकर अब तक वो पाकिस्तान में ही हैं. 2018 में खबर आई थी कि लीड हाइजैकर रफ़ीक की लाहौर में बीमारी से मौत हो गई थी. बाकी चार की कोई खबर नहीं कि वो कहां हैं और ज़िंदा भी हैं या नहीं.

क़िस्से के शुरुआत में हमने आपको बताया था कि हाइजैकर्स ने वॉशिंग्टन पोस्ट और न्यू यॉर्क टाइम्स में अपनी बात छपवाने की मांग रखी थी. और ये भी कि वो अपनी ज़मीन की आज़ादी की मांग कर रहे थे. क़िस्से से तो यही लगता है कि कश्मीर की आज़ादी की बात हो रही है. लेकिन भारत से ये मांग वॉशिंग्टन पोस्ट में कैसे छपती. ये बात कुछ अचरज की है.

न्यू यॉर्क टू पेरिस

हुआ ये कि 10 सितम्बर 1976 को एक और फ़्लाइट हाइजैक हुई थी. इत्तिफ़ाक़ ये कि उसे भी 5 ही लोगों ने हाइजैक किया था. लेकिन अंतर ये था कि वो फ़्लाइट पालम से नहीं बल्कि न्यू यॉर्क के La Guardia एयरपोर्ट से उड़ी थी. इसको हाइजैक करने वाले क्रोएशियन नेशनल थे.

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पेरिस में आत्मसमर्पण के बाद हाइजैकर्स को ले जाती हुई पुलिस (फ़ाइल फोटो)

उन दिनों क्रोएशिया एक आज़ाद मुल्क ना होकर यूगोस्लाविया का हिस्सा हुआ करता था. हाइजैकर्स ने मांग रखी कि क्रोएशिया की आज़ादी का मुद्दा अमेरिका के सभी बड़े अख़बारों में छपे ताकि उन्हें अमेरिकी लोगों का समर्थन मिल सके.

इन लोगों ने प्लेन को बम से उड़ाने की धमकी दी थी. बाद में पता चला कि वो सिर्फ़ प्रेशर कूकर थे. ये लोग फ़्लाइट को न्यू यॉर्क से पेरिस ले गए. जहां पहुंचकर इन पांचों ने आत्मसमर्पण कर दिया. बाद में अमेरिका में इन्हें उम्रक़ैद की सजा मिली. इस हाइजैकिंग को अंजाम देने वाली एक मेम्बर ज्यूलियन ब्यूसिक ने इस हाइजैकिंग पर एक किताब भी लिखी है, ‘लवर्स एंड मैडमेन’. जिसमें उन्होंने अपने और लीड हाइजैकर ज्वोंको ब्यूसिक के प्रेम प्रसंग का ज़िक्र भी किया है. इस घटना के बारे में मौक़ा मिला तो कभी विस्तार से बताएंगे.


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