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तालिबान महिलाओं के साथ कैसा बर्ताव करता है, ये जानना हो तो ये दो फ़िल्में देखिए

“औरतें बिना बुर्का पहने घर से बाहर नहीं निकल सकतीं.”

“उन्हें ऊंची एडी वाले जूते पहनने की इजाज़त नहीं, क्योंकि ऐसा न हो कि कोई मर्द उनके पैरों की आहट सुनकर उत्तेजित हो जाए.”

“औरतों को पब्लिक में तेज़ बोलना मना है क्योंकि ऐसा करने पर कोई अजनबी उनकी आवाज सुन सकता है.”

कहते हैं कि किसी भी समाज का बुनियादी सच जानना है तो ये देखिए कि वो अपनी महिलाओं के साथ कैसे पेश आता है. अगर आप ‘Women under Taliban Rule’ गूगल करेंगे तो ऊपर बताई दकियानूसी बातों की लिस्ट सामने आएगी. साथ ही सामने आएंगे वो घिनौने वाकये जब तालिबान ने अफगानी औरतों पर ज़ुल्म किये. सड़क पर अकेले निकलने वाली औरत को कोड़े मारे. वो औरत जिसके पिता जंग में मारे गए. कोई भाई, पति या बेटा नहीं. ऐसी औरत घर से बाहर नहीं निकलेगी तो खाएगी क्या? तालिबान के अंतर्गत अफगानी महिलाओं की ऐसी हालत देख दिल पसीज जाता है. खासतौर पर वो अफ़ग़ानिस्तान जिसने 1919 में पहली बार अपनी महिलाओं को वोट करने का अधिकार दिया था. हैरानी की बात है कि स्वघोषित शांतिदूत अमेरिका ने अपने देश की औरतों को वोटिंग का अधिकार 1920 में दिया था.

अफ़ग़ानिस्तान की मॉडर्न हिस्ट्री सोवियत रुस और तालिबान के अत्याचारों की साक्षी है. लेकिन तालिबान की एक और हिस्ट्री है. इस खूनखराबे से पहले वाली हिस्ट्री. वो हिस्ट्री, जिसकी गर्त से एक तस्वीर हमारे सामने बार-बार आती रहती है. 1972 के काबुल की तस्वीर. जहां तीन लड़कियां मिनी स्कर्ट पहने काबुल यूनिवर्सिटी जा रही हैं. पढ़ने के लिए. मिनी स्कर्ट की आजादी से बुर्के की बंदिश का सफर अफगानी महिलाओं के लिए पीड़ादायक था. इतिहास फिर से कट्टरवादी तालिबान को बंदूक के दम पर अपनी कहानी लिखने का अवसर दे रहा है. एक समय महिलाओं को अपने घर की बाल्कनी में खड़े होने पर सरेआम सज़ा देने वाला तालिबान अब उनके साथ कैसा बर्ताव करेगा, ये सोचने की हिम्मत नहीं होती. जी घबराता है. साथ ही ऐसे सवाल पर ‘so called world leaders’ की चुप्पी भी डराती है. जो सिर्फ अपनी सहूलियत के हिसाब से बोलते हैं.

इतिहास का बही खाता रखने में इंसान मक्कारी कर सकते हैं. लेकिन कला नहीं. बर्बरता की तमाम कहानियों को उनके पूरे नंगेपन और घिनौनेपन के साथ प्रत्यक्ष रुप से सामने लाने की हिम्मत रखती है कला. कला का ही बड़ा कॉमन सा माध्यम है सिनेमा. समाज को आईना दिखाने वाला सिनेमा. कट्टरपंथी तालिबान के राज में महिलायें कैसे घुट घुट कर जीती हैं, उनकी क्या व्यथा होती है, ऐसे ही हालात पर कुछ फिल्में भी बनी हैं. आज तालिबान राज में महिलाओं की दुर्दशा का सच दिखाती, दो फिल्मों से आपको परिचित कराएंगे.

#1. एस्केप फ्रॉम तालिबान (2003)
डायरेक्टर: उज्ज्वल चैटर्जी

“अफगानी लोग बड़े ही आज़ाद ख्याल लोग हैं. जान देकर भी अपनी आजादी की हिफाज़त करने वाले लोग. लेकिन इस लोगों ने औरतों की आजादी के मसले को बार-बार पैरों तले कुचला है. कभी रिवाजों के नाम पर. तो कभी मज़हब के नाम पर. इस बर्बरता का सबसे घृणित रूप है तालिबान.”

02 दिसम्बर, 1994 की तारीख. अफ़ग़ानिस्तान के काबुल शहर से करीब 18 किलोमीटर दूर स्थित गांव. रात का सुनसान अंधियारा. एक औरत लालटेन के सहारे अपनी कहानी लिख रही है. आंखों की नमी कहीं कागज पर लिखी उसकी गाढ़ी कहानी को धुंधला न कर दे, इसलिए एक हाथ कलम पर है और दूसरे से अपने आंसुओं की दिशा मोड़ रही है. इस औरत का नाम है सुष्मिता. भारत के कलकत्ता शहर की रहने वाली. 1988 में जांबाज़ से मुलाकात हुई. प्यार हुआ. इतना गहरा कि अपना घर, परिवार और दुनिया छोड़ उसके साथ अफ़ग़ानिस्तान आ गई. एक नई दुनिया की तलाश में. सपनों की दुनिया जहां सारे रंग वो खुद भरना चाहती थीं. दुर्भाग्यवश ये सपना कभी मुकम्मल नहीं हो पाया.

सुष्मिता बैनर्जी एक भारतीय लेखिका थीं. एक अफगानी आदमी से प्यार हुआ. उसके वतन जाकर अपनी ज़िंदगी की नई दास्तां लिखना चाहती थीं. जहां प्यार के सिवा कोई रंग न हो. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. और उसकी सबसे प्रमुख वजह था तालिबान. जो महिलाओं के मुखर होने का पक्षधर नहीं. उनके शिक्षित होने से, उन्मुक्त होने से खीज खाता तालिबान. उनके स्वतंत्र विचारों से डरता तालिबान. अपनी ज़िंदगी को हसीन बनाने का अरमान लिए अफ़ग़ानिस्तान आई सुष्मिता जल्द ही हकीकत से रूबरू हो जाती हैं. खुद को दकियानूसी ख्यालात की बंदिश में पाती है. लेकिन वो अपनी किस्मत को दोष देकर सारी ज़िंदगी दूसरों के बनाए परदे में रहना मंज़ूर नहीं करती. खुलकर अपनी बात कहती है. जिसका खमियाज़ा भी भुगतती है.

Escape From Taliban
फिल्म में सुष्मिता अपनी फार्मेसी चलाती है. जिसपर नाराज होकर आतंकी उन्हें मारते-पीटते हैं.

हालात बदलने की पुरजोर कोशिशें करती है. लेकिन जब कुछ नहीं बदलता, तो खुद ऐसी दुनिया को पीछे छोड़ वहां से भागने में जुट जाती है. सुष्मिता ने अफ़ग़ानिस्तान में हुए अपने ऐसे ही अनुभवों को समेटकर तालिबान पर चोट की. ताकि तालिबान के राज में महिलाओं के उत्पीड़न पर मौन बैठी दुनिया को सच दिखाई दे सके. अपने अनुभव और अफ़ग़ानिस्तान से भागने के सफर को ‘काबुलीवालार बंगाली बहू’ का नाम दिया. उनकी लिखी ये किताब ही ‘एस्केप फ्रॉम तालिबान’ की नींव बनी. तालिबान किस हद तक क्रूर और सनकी हो सकता था. इसका एग्ज़ाम्पल फिल्म के एक शुरुआती सीन में मिलता है. गांव के एक घर में चिमनी से धुआं उठ रहा है. तभी वहां कुछ बंदूकधारी पहुंच जाते हैं. जिन्हें देख पुरुषों की आंखें फटी की फटी रह जाती हैं. महिलाएं अपना मुंह ढक लेती हैं. ये बंदूकधारी उस घर की ओर बढ़ते हैं. रसोई में पहुंचते ही उसे बुझा देते हैं. आंच के सामने बैठी सुष्मिता को धमकाते हैं. कि जानती नहीं कि रमज़ान का महीना चल रहा है. इन दिनों रोज़ा रखना होता है. जानती नही? उससे अल्लाह का नाम लेने को कहते हैं. बिना पलक झपकाए सुष्मिता कहती है कि वो मुस्लिम नहीं. आवाज में नफरत भरकर वो बंदूकधारी आतंकी उससे अल्लाह का नाम लेने को कहता है. उसका हुक्म मानने का आदेश देता है. सुष्मिता नहीं मानती. किसी औरत से ऐसे जवाब की उम्मीद सीधा उसके अहंकार पर चोट करती है. सुष्मिता पर बरस पड़ता है. थप्पड़ मारता है. बालों से खींचता हुआ बाहर ले आता है. ताकि उसका तमाशा बना सके. एग्ज़ाम्पल सेट कर सके. कि जो हमारी बात नहीं मानेगा, उसका यही हश्र होगा.

करीब दो घंटे लंबी इस फिल्म ने तालिबान की हर मुमकिन बर्बरता को कैप्चर करने का काम किया है. इंसानियत के साथ किए उसके खिलवाड़ को कैप्चर किया है. ओरिजिनली इंग्लिश में बनी ‘एस्केप फ्रॉम तालिबान’ को आगे चलकर हिंदी में भी डब किया गया. जिसे आप यूट्यूब पर भी देख सकते हैं. ऊपर सुष्मिता बैनर्जी के लिए लिखा गया कि वो भारतीय लेखिका थीं. तालिबान की कैद से भागने के बावजूद उनके नाम के आगे ‘थीं’ लगाना पड़ रहा है. जिसकी वजह भी तालिबान ही है. 2013 में सुष्मिता फिर अफ़ग़ानिस्तान लौटी थीं. तब तक हर ओर ‘एस्केप फ्रॉम तालिबान’ और उसकी मैसेजिंग से लोग अवगत हो चुके थे. खुद तालिबान को भी खबर लग चुकी थी. अफ़गान पुलिस के मुताबिक 04 सितंबर, 2013 की रात कुछ तालिबानी आतंकी उनके घर में घुस आए. उनके पति को बंधक बनाकर सुष्मिता को अपने साथ ले गए. अगली सुबह पुलिस को सुष्मिता की लाश मिली. उन्हें 15 से 20 गोलियां मारी गई थीं.


#2. खुदा के लिए (2008)

डायरेक्टर: शोएब मंसूर

1965 की जंग के बाद इंडिया और पाकिस्तान ने अपनी फिल्में एक-दूसरे के देश में रिलीज़ करने पर रोक लगा दी. उसके बाद अगले 43 साल तक इंडिया में कोई भी पाकिस्तानी फिल्म रिलीज़ नहीं हुई. इस खासे लंबे गैप की कमी पूरी करने के लिए एक मजबूत फिल्म की जरुरत थी. जो ‘खुदा के लिए’ ने पूरी की. फिल्म ने ‘एस्केप फ्रॉम तालिबान’ से अलग रुख अपनाया. सतही तौर पर सच्चाई दिखाकर अपना फर्ज पूरा करने की जगह गहराई में उतरी. एक ही धर्म को माननेवाले दो लोगों की विचारधारा में कितना फर्क हो सकता है, ये समझाया. एक इस्लाम के नाम पर प्यार और शांति में यकीन करता है. तो दूसरा इस्लाम को अपनी परिभाषा देने में लगा है. बंदूक के दम पर खौफ दिखाकर अपने धर्म की जय करने में लगा है.

सय्यद फ़िरदौस अशरफ ने रेडिफ़ के लिए ‘खुदा के लिए’ के रिव्यू की शुरुआत मोमिन के एक शेर से की.

“उम्र तो सारी कटी इश्क-ए-बुतां में मोमिन, आखिरी वक्त में क्या खाक मुसलमां होंगे.”

मोमिन के इस शेर के ज़रिए पूरी फिल्म को बांधकर देखा जा सकता है. एक सच्चा मुसलमान होने की क्या परिभाषा है? क्या उसकी लंबी दाढ़ी होनी चाहिए? या उसे संगीत से परहेज होना चाहिए? फिल्म अपनी ऑडियंस से ऐसे ही सवाल करती है. लेकिन उससे भी बड़ा सवाल पूछती है कि क्या मुस्लिम महिलाओं को अपनी ज़िंदगी अपनी मर्जी से जीने की आजादी है?

Fawad Khan In Khuda Kay Liye
फिल्म में फवाद खान ने सरमद का किरदार निभाया.

इस्लाम को लेकर लोगों में बने दो पक्षों को फिल्म ने अपने किरदारों में उतारा है. दो भाई. सरमद और मंसूर. संगीत से वास्ता रखते हैं. मंसूर लिबरल है. खुले विचारों का. अमेरिका चला जाता है. वहीं सरमद इस्लाम के कट्टरपंथी रुप की ओर मुड़ जाता है. म्यूज़िक को हराम मानकर उसका त्याग कर देता है. सरमद की शादी हो जाती है. मरियम से. आगे चलकर धर्म के नाम पर मरियम के साथ जो बर्ताव होता है, उसे देखकर रूह कांप जाती है. घिन आती है.

फिल्म का इम्पैक्ट क्या रहा. उसे आप रिलीज़ के बाद आई दो तरह की न्यूज़ हेडलाइंस से समझ सकते हैं. पहली में लिखा था कि फिल्म को देखने वो पाकिस्तानी लोग आए जिन्होंने इससे पहले अपनी आखिरी फिल्म 20-30 साल पहले देखी थी. इतना पसंद किया गया फिल्म को. दूसरी थी कि रिलीज़ के बाद कट्टरपंथी संघठनों ने फिल्म के खिलाफ फतवा जारी कर दिया था.

अगर असली इस्लाम की असली सीख और उसके मायने समझना चाहते हैं तो फिल्म को यूट्यूब पर देख सकते हैं.


वीडियो: अफगान फिल्म ऑर्गनाइजेशन की पहली महिला चेयरपर्सन का कौन सा पोस्ट वायरल है?

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