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सुशांत सिंह राजपूत की लाइफ के किस्से: जब लड़कियों के कॉलेज के आगे मूंगफली बेची

14 जून 2020. सिनेप्रेमी बेवक़्त दो अनमोल कलाकारों को खोने के ग़म से अभी ठीक से उभरे भी नहीं थे कि एक और कलाकार की मौत की ख़बर ने ज़ख्मों को फ़िर कुरेद दिया. सुशांत सिंह राजपूत के न रहने की खबर आई थी. सब सकते में थे. ऐसा लग रहा था मानो काल किसी चलचित्र के लिए बेहतरीन कलाकार एक के बाद एक चुन रहा था. 14 जून दोपहर तक ‘सुशांत सिंह राजपूत ‘नाम देश का सबसे बड़ा टीआरपी/व्यूज़ मैग्नेट बन गया था. आज हम सुशांत की 34 सालों की ज़िंदगी के पन्नों को फ़िर पलटेंगे और दोहराएंगे सुशांत के जीवन के कुछ यादगार पल.

#पटना का गुलशन

21 जनवरी 1986 को पटना में जन्मे सुशांत चार बहनों के इकलौते भाई थे. सुशांत नाम कागज़ों पर था, घर पर वो सबके लाडले गुलशन थे. लाड़-प्यार से पल रहे गुलशन का अपनी बहनों की तरह ही पढ़ाई में खूब मन लगता था. इतना कि 7th क्लास में ही 10th तक का कोर्स कंप्लीट कर लिया था. दिन भर गुलशन पढ़ते तो खूब थे लेकिन एक आंख घड़ी की सुइयों पर टिकी रहती थी. इंतज़ार रहता था शाम के साढ़े चार बजने का. क्योंकि साढ़े चार से साढ़े पांच खेलने की मोहलत मिलती थी. पूरे दिन में असली आनंद उन्हें इसी एक घंटे में मिलता था. सुशांत कहते थे कि एक्टिंग कर के उन्हें वैसा ही आनंद आता है, जैसा बचपन में  साढ़े चार से साढ़े पांच के बीच आता था.

बाल सुशांत सिंह राजपूत.
बाल सुशांत सिंह राजपूत.

#शाहरुख़ ने दूर किया कंफ्यूजन

लेकिन ऐसा नहीं है कि पढ़ाकू गुलशन को सिर्फ किताबें ही रिझाती थीं. सुशांत शाहरुख़ खान के भी एकदम जबरा फ़ैन थे. 6th में पहली बार ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ देखी. तो पिक्चर का कूल एंड कल्चरल राज उनका फेवरेट बन गया. सुशांत ने एक इंटरव्यू में बताया था,

“90s का दौर था. हम पहली बार कोक कैन्स देख रहे थे. बड़े बड़े ब्रांड भारत आ रहे थे. मैं बहुत आकर्षण में था, साथ ही कंफ्यूज़ भी हो रहा था. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वेस्टर्न कल्चर को अपना लूं या अपने भारतीय कल्चर के प्रति वफ़ादार रहूं. इस टाइम पे ‘DDLJ’ आई. और राज ने दिखलाया कि बियर पीना कूल है. लेकिन साथ ही उसने सिमरन के बाबूजी की मर्ज़ी के बिना सिमरन को ले जाने से मना कर दिया. वहां एक अच्छा बैलंस था. मुझे कैसा बनना है शाहरुख खान ने ये कंफ्यूजन दूर कर दिया था.”

शाहरुख़ खान को काफ़ी पसंद करते थे सुशांत सिंह राजपूत.
शाहरुख़ खान को काफ़ी पसंद करते थे सुशांत सिंह राजपूत.

#अवसाद में परीक्षा छोड़ी

पटना में सुशांत का बचपन खुशहाल बीत रहा था. लेकिन 2001 में सुशांत की माता जी का अचानक देहांत हो जाता है. अपनी मां की अचानक हुई मौत का बहुत गहरा सदमा सुशांत को लगा. इतना गहरा कि एक महीने के लिए अवसाद में चले गए. स्कूल के प्री बोर्ड्स के इम्तिहान छोड़ दिए. गहरे अवसाद के बीच सुशांत को अपनी मां की बात याद आई. जो कहा करती थीं कि जीवन में इतना कर लो कि कोई तुम्हें असफ़ल ना बोल पाए. मां की बात याद करते हुए सुशांत ने फ़िर अपना रुख पढ़ाई की तरफ़ किया और इतनी मेहनत की कि ऑल इंडिया इंजीनियरिंग एग्जाम में 7th रैंक पर आ गए. कुछ वक़्त बाद नेशनल फिजिक्स ओलम्पियाड भी जीत लिया.

अपनी मां की गोद में नन्हे सुशांत.
अपनी मां की गोद में नन्हे सुशांत.

पत्नी के देहांत के बाद सुशांत के पिता दिल्ली आ कर बस गए. आगे की पढ़ाई सुशांत ने फ़िर यहीं पूरी की. सुशांत को एस्ट्रोफिजिक्स पढ़ने का बहुत शौक था. एस्ट्रोनॉट बनने की इच्छा रखते थे. और बाय चांस एस्ट्रोनॉट ना भी बन पाएं तो कम से कम पायलट तो हर हाल में बनना चाहते थे. लेकिन सुशांत के पिता ने उन्हें इस लाइन में भेजने से साफ़ इनकार कर दिया. वो इस बात को लेकर एकदम अडिग थे कि वो सुशांत को इंजीनियर ही बनाएंगे. पापा के इस फ़ैसले से सुशांत इतना झुंझलाए कि अपने कमरे में लगा ‘टॉप गन’ का पोस्टर फाड़ दिया. सुशांत कहते हैं उस दिन उन्होंने इतना तमाशा किया था कि उनके घर वालों को उसी दिन समझ जाना चाहिए था कि उनके अंदर एक एक्टर है.

#जाने क्या ढूंढता है ये मेरा दिल

ख़ैर सुशांत आधे मन से ही सही लेकिन दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पहुंच गए.’ कुछ कुछ होता है’ की तरह इस कॉलेज का कैंपस तो काफ़ी बड़ा था लेकिन टीना और अंजलि का नामोनिशान नहीं था. मतलब कॉलेज में लड़कियां ही नहीं थी. इस बंजर मंज़र के बारे में सुशांत कहते थे,

“हमारा कॉलेज बॉलीवुड फ़िल्मों की तरह ही था. मैं भी एकदम हीरो जैसा दिखने वाला लड़का था. सब कुछ सेट था. लेकिन कॉलेज में गए तो देखा लड़कियां ही नहीं हैं. यहां मैं सोच रहा था कॉलेज में लड़कियां मिलेंगी. लेकिन यहां तो सिर्फ लड़के ही थे. उस वक़्त लड़कियां इंजीनियरिंग नहीं चुनती थीं.”

#मूंगफली वाली आशिकी

अब तक किताबों से इश्क़ फ़रमाते रहे सुशांत कॉलेज में गए थे कि लड़कियों से थोड़ी गुफ़्तुगू करेंगे. लेकिन यहां भी उनके अरमानों पर पानी फ़िर चुका था. अब जैसा कि दस्तूर है जिनके कॉलेज में लड़कियां नहीं होती हैं वो दूसरे कॉलेज में लड़कियां देखने जाते हैं. सुशांत भी अपने दोस्तों संग बन ठन के लड़कियां देखने पहुंच जाया करते थे लेडी श्री राम कॉलेज. और यहां मूंगफली वाले से पूरी मूंगफ़ली की रेहड़ी खरीद कर खुद लड़कियों को मूंगफली बेच इम्प्रेस करने की कोशिश में लगे रहते थे.

सुशांत को लड़कियों की संगत पाने के लिए इतना डेडिकेटिड देख एक दिन उनके दोस्त ने कहा कि भाई मूंगफली बेच के कुछ नहीं होगा लड़कियों से मिलना है तो कोई डांस क्लास जॉइन कर ले. आजकल दिल्ली की सारी कूल लड़कियां डांस कर रही हैं. चूंकि सुशांत आगे का सिलेबस पहले ही कंप्लीट कर चुके होते थे तो वो बिना अपनी पढ़ाई का नुकसान किए डांस क्लासेस ले भी सकते थे. फ़िर क्या था अगले ही दिन पहुंच गए डांस अकादमी.

#फ्रंट रो डांसर

सुशांत ने शामक डावर डांस अकादमी जॉइन कर ली. लड़कियों की तलाश में डांस अकादमी गए सुशांत को नहीं पता था यहां से उनका जीवन बदलने वाला था. सुशांत डांस अकादमी में आए तो थे लड़कियों के पीछे लेकिन धीरे-धीरे वो डांस के प्रति सीरियस हो रहे थे. बीतते वक़्त के साथ उन्हें डांस करने में मज़ा आने लगा था. कुछ टाइम बाद वो शामक स्पेशल पोटेंशियल बैच में आ गए थे. एक दिन शामक ने सुशांत से कहा,

“सुशांत तुम मेरे कोई बेस्ट डांसर नहीं हो, लेकिन तुम्हारे एक्सप्रेशंस में कुछ बात है इसलिए मैं तुम्हें फ्रंट रो के लिए चुनता हूं. तुम थिएटर क्यों नहीं करते ?”

#टर्निंग पॉइंट

शामक डावर की सलाह पर सुशांत ने बैरी जॉन के तीन महीने के एक्टिंग डिप्लोमा कोर्स में दाखिला ले लिया. कोर्स खत्म होने पर उनके साथ के बाकी सभी लड़को को सी ग्रेड मिला और उन्हें बी ग्रेड. बैरी जॉन के द्वारा दिए बाकियों से ज़्यादा बी ग्रेड ने उन्हें काफ़ी मोटिवेट किया. इसी वक़्त उन्होंने एक्टिंग को करियर बनाने का नक्की कर लिया. सुशांत भयंकर पढ़ाकू तो थे ही. तो एक्टिंग से जुड़ी लगभग हर किताब पढ़ डाली. धीरे-धीरे उन्हें यकीन होने लगा था कि वो एक्टर बन सकते हैं और साथ ही उन्हें स्टेज पर रहना भी बहुत अच्छा लगता था.

#शाय, इंट्रोवर्ट, एक्टर

सुशांत बचपन से बहुत ही शर्मीले और इंट्रोवर्ट किस्म के थे. दोस्त भी उनके सिर्फ दो-तीन थे. इस लेवल के शर्मीले थे कि स्कूल में कई बार उन्हें हेड बॉय बनने का मौका मिलता था, तो वो हर बार सिर्फ इस वजह से ऑफर ठुकरा देते थे कि हेड बॉय बनने के बाद उन्हें स्टेज पर बोलना पड़ेगा. शर्मीले तो थे लेकिन अंदर एक्टिंग का कीड़ा भी लगा हुआ था. अपने एग्जाम की तैयारी के दौरान कई बार माइंड फ्रेश करने के लिए शीशे के सामने शाहरुख खान स्टाइल में ‘सूरज हुआ मद्धम’ प्रॉपर लिप् सिंक के साथ गुनगुनाया करते थे. लेकिन उनके मन में एक्टर बनने का विचार दूर-दूर तक नहीं था. उनकी एक्टिंग अकेले में सिर्फ़ शीशे तक ही सीमित थी. सुशांत कहते हैं कि वो इतने इंट्रोवर्ट थे कि अगर उन्हें उस वक़्त एक्टिंग का ऑफऱ भी आता तो वो मना कर देते.

#बस इतना सा ख्वाब है

थिएटर करते हुए सुशांत को ये अहसास हुआ कि जो उनके अंदर बोलने की चाह है. लोगों से कम्यूनिकेट करने की इच्छा है वो एक्टिंग द्वारा पूरी हो सकती है. सुशांत ने कहा था,

“स्टेज ने मुझे हौसला दिया. अब मैं किरदार को ओढ़कर कुछ भी कह और कर सकता था. मैं महसूस कर पाता था कि मुझसे लोग इन्फ्लुएंस हो रहे हैं. ज़िंदगी के पहले 20 साल लोगों को मैं क्या हूं समझा पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल होता था. लेकिन अब मैं आसानी से लोगों से कनेक्ट कर पा रहा था. इसी बात की मुझे सबसे ज़्यादा खुशी थी.”

#ड्रॉप आउट

साल 2006. सुशांत ने इंजीनियरिंग फाइनल ईयर में कोर्स कंप्लीट होने के सिर्फ 2 महीने पहले कॉलेज ड्रॉप कर दिया. और कॉलेज ड्रॉप करने की इस विस्फ़ोटक खबर को जब अपने घर मेड्रॉप करने जा रहे थे तो उन्हें पता था कि धमाका होना तय है. सुशांत ने जब अपने पिता को इंजीनियरिंग छोड़ एक्टर बनने के लिए मुंबई जाने के बारे में बताया तो सब शॉक्ड रह गए. सुशांत ठान तो चुके ही थे तो घर वालों की चुप्पी को ही अप्रूवल डिक्लेयर कर मुंबई रवाना हो लिए. उस वक़्त उनके पिता बहुत नाराज़ हुए. लेकिन बाद में उनके पिता से जब उनके अड़ोसी-पड़ोसी सुशांत की तारीफ़ करते थे तब उन्हें गर्व होता था. लेकिन सालों बाद भी जब भी वो सुशांत से मिलते तो  उनसे कहते ‘डिग्री ले लेता यार’.

सुशांत सिंह राजपूत अपने पिता के साथ.
सुशांत सिंह राजपूत अपने पिता के साथ.

#हर ग़म में खुशी है

इंजीनियरिंग छोड़ सुशांत मुंबई आ गए. वर्सोवा में वन रूम किचन किराए पर लिया. वो भी अकेले नहीं 6 अन्य एक्टर्स के साथ. लेकिन सुशांत इस वक़्त को अपना स्ट्रगलिंग पीरियड नहीं बतलाते थे. वो कहते थे,

“मै स्ट्रगल नहीं कर रहा था. मैं उसी वक़्त वो कर रहा था जो मुझे बेहद पसंद है. मैं थिएटर करता था. कास्टिंग के लिए जाता था, मार्शल आर्ट ट्रेनिंग के लिए जाता था. एक्टर्स के पीछे बैकग्राउंड में डांस करता था. अपने रूममेट्स के साथ फ़िल्मों के बारे में बात किया करता था. हां इस बीच मुझे खाना बनाना पड़ता था. क्योंकि हमारे पास एक ही प्रेशर-कुकर था. और उसी में दाल, चावल, सब्ज़ी सब बनती थी. साथ में बर्तन धोने के साथ बाकी काम भी खुद करने पड़ते थे. जो बेहद थका देते थे. लेकिन मैं इसे खेल का हिस्सा मानता था.
आज भी जब मेरे पास पैसा, फ़िल्में, शौहरत सब है, तब भी मुझे इस काम के लिए उतनी ही उत्सुकता है जितनी तब होती थी. मुझे एक्टिंग करना पसंद है. फ़िर वो चाहे थिएटर में हो, फ़िल्म में हो, या टीवी पर हो. ट्रेंड डांसर और मार्शल आर्ट परफ़ॉर्मर होने के नाते मेरे लिए कोई एक्शन या डांस फ़िल्म करना बहुत आसान होता. वो फ़िल्में पैसा कमा लेतीं. लेकिन पैसे या फेम के लिए मैं यहां नहीं हूं. मैं यहां हूं क्योंकि मुझे एक्टिंग करना पसंद है.”

#पवित्र रिश्ता

सुशांत ने बतौर बैकग्राउंड डांसर फ़िल्मफ़ेयर, आइफा अवार्ड में शाहरुख, शाहिद के पीछे कई बार डांस किया. 2008 में पृथ्वी थिएटर में बालाजी टेलीफ़िल्म्स के कास्टिंग डिपार्टमेंट के एक शख्स ने सुशांत को ‘किस देश में है मेरा दिल’ नाम के सीरियल के लिए ऑडिशन देने को बोला. सुशांत ने ऑडिशन दिया और सिलेक्ट हो गए. इस सीरियल में सुशांत की परफॉरमेंस देख एकता कपूर ने सुशांत को अपना नेक्स्ट प्रोजेक्ट ‘पवित्र रिश्ता’ ऑफर किया. हालांकि ज़ीटीवी नए चेहरे की जगह एक एस्टैब्लिश चेहरा लेना चाहते थे. लेकिन एकता ने सुशांत को ही फाइनल किया. ये शो ज़बरदस्त पॉपुलर हुआ. सुशांत हिंदुस्तान के एक आदर्श बेटे और पति का प्रतीक बन गए.

तकरीबन ढाई साल सुशांत ने ‘पवित्र रिश्ता’ में मानव का रोल निभाया. 2011 में सुशांत एक ही किरदार करते करते ऊब गए और सीरियल छोड़कर अमेरिका जाकर फ़िल्ममेकिंग सीखने का फ़ैसला लिया. इसी तैयारी में लगे थे कि कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा ने सुशांत को ‘काय पो चे’ ऑफर की. और यहां से सुशांत का फ़िल्मी करियर शुरू हुआ.

#कई बड़ी फ़िल्में छोड़ीं

सुशांत ने अपने करियर में जितनी फ़िल्मेंकी, उससे ज़्यादा छोड़ीं. इन फ़िल्मों में जॉन अब्राहम के साथ बनी ‘रोमियो अकबर वॉल्टर’, संजय लीला भंसाली की ‘राम-लीला’,’पद्मावत’,’बाजीराव मस्तानी, के अलावा ‘फ़ितूर’ और ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ जैसी फ़िल्में शामिल हैं.

# सितारा

सुशांत सिंह राजपूत अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने में बड़ी दिलचस्पी रखते थे. एक महंगा अतिआधुनिक टेलिस्कोप खरीद रखा था. जिससे रात में दूसरे प्लेनेट्स और चांद तारों को देखा करते थे. सुशांत के साथ’सोनचिरैया’ में काम कर चुके मनोज बाजपेयी बताते हैं कि शूटिंग पर भी सुशांत टेलिस्कोप ले गए थे और वहां वो सबको रात में तारे दिखाया करते थे. स्पेस प्रेम सिर्फ यहां तक ही सीमित नहीं था बल्कि सुशांत ने चांद पर थोड़ी सी ज़मीन भी ख़रीद रखी थी. 2016 में उनकी ‘चंदा मामा दूर के’ नाम से एक फ़िल्म भी अनाउंस हुई थी. जिसमें सुशांत एस्ट्रोनॉट का रोल करने वाले थे. रोल की तैयारी के लिए सुशांत NASA जाकर ट्रेनिंग भी कर के आए थे. लेकिन बाद में ये प्रोजेक्ट डंप कर दिया गया. चांद तारों को दूर से देखने वाले सुशांत शायद आज इनके बेहद करीब होंगे.


ये स्टोरी दी लल्लनटॉप में इंटर्नशिप कर रहे शुभम ने लिखी है.


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