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ब्रिटेन में सप्लाई चेन का ऐसा संकट कि सरकार, सेना उतारने पर विचार कर रही है!

ट्रक ड्राइवर्स एक ऐसी क़ौम हैं, जो हमारी-आपकी ज़िंदगी आसान बनाते हैं. वे हमें दिखते हैं, मगर हम इग्नोर कर अपने रास्ते पर आगे बढ़ जाते हैं. कभी फ़ुर्सत मिले तो गौर करिएगा, अगर वे न होते तो क्या हमारा जीवन आगे बढ़ पाता? छोटी से छोटी ज़रूरत की चीज़ अगर हमारे दरवाज़े तक पहुंच रही है, तो वो उनकी ही बदौलत. अगर हमारी थाली में खाना, बदन पर कपड़ा और सिर पर छत कायम है तो इसकी एक वजह वे भी हैं.

सोचिए, अचानक से सड़कों पर ट्रक्स चलना बंद हो जाए. ट्रक ड्राइवर्स की कमी हो जाए या उन्हें एक दिन काम करने का मन न करे. ऐसी परिस्थिति में क्या-क्या हो सकता है? सोच नहीं पा रहे? कोई बात नहीं. इतिहास के पिटारे से एक कहानी सुन लीजिए. सच्ची वाली. फिर सब आसानी से समझ आ जाएगा.

साल 1972. ये घटना दक्षिण अमेरिका के देश चिली की है. वहां कम्युनिस्ट नेता सल्वादोर अलांदे का शासन चल रहा था. वो दौर कोल्ड वॉर का था. अलांदे सोवियत संघ के करीब थे. अमेरिका पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट शासन को नेस्तनाबूद करने में जुटा था. इसी प्लान के तहत वो चिली में भी गया. अलांदे सरकार को अस्थिर करने का ज़िम्मा खुफिया एजेंसी सीआईए को सौंपा गया. सीआईए ने पहला दांव ट्रक ड्राइवर्स पर लगाया. अक्टूबर 1972 में ट्रक ड्राइवर्स के संगठन ने हड़ताल का ऐलान कर दिया.

24 दिन की हड़ताल

ये हड़ताल 24 दिनों तक चली. इस दौरान लोग खाने तक के लिए तरस गए. दुकानों में राशन की कमी हो गई. अस्पतालों में दवा नहीं मिल रही थी. गाड़ियों के लिए ईंधन खत्म हो चुका था. बुनियादी ज़रूरत की चीजों की सप्लाई अचानक से ठप पड़ गई थी. इस हड़ताल ने चिली की अर्थव्यवस्था को बीमार करके रख दिया. अलांदे इस घटना से हुए हड़ताल से कभी उबर नहीं पाए. उनके ख़िलाफ़ लोगों का आक्रोश बढ़ता गया. इसका फायदा सेना के एक गुट ने उठाया. सितंबर 1973 में सेना ने विद्रोह कर दिया. सल्वादोर अलांदे ने प्रेसिडेंशियल पैलेस के भीतर आत्महत्या कर ली. इसके बाद चिली पर जनरल अगस्तो पिनोशे की तानाशाह सरकार ने क़ब्ज़ा कर लिया.

उस बरस ट्रक ड्राइवर्स की हड़ताल ने चिली में सरकार गिरा दी थी. आज इस चर्चा की वजह क्या है? दरअसल, ट्रक ड्राइवर्स के चलते दुनिया के सबसे विकसित देशों में से एक ब्रिटेन की हालत दिनोंदिन बिगड़ रही है. ब्रिटेन ट्रक ड्राइवर्स की भारी कमी से जूझ रहा है. इसके कारण पेट्रोल पंपों में सूखा पड़ गया है. पेट्रोल स्टेशनों पर गाड़ियों की लंबी कतारें लगी हैं. दहशत में जी रहे लोग स्टॉक ज़मा करने की फ़िराक़ में जुटे हैं. हालात यहां तक बिगड़ गए हैं कि सरकार सेना उतारने पर विचार कर रही है.

ब्रिटेन के ईंधन संकट की असली कहानी क्या है? इस संकट में ब्रेग्ज़िट की क्या भूमिका है? क्या सेना उतारने से स्थिति में सुधार हो पाएगा? और, ब्रिटेन के सामने आगे क्या ख़तरे हैं? सब विस्तार से बताते हैं.

सप्लाई चेन का मसला

पिछले कई हफ़्तों से ब्रिटेन एक बड़े संकट से जूझ रहा है. ये संकट सिर्फ़ ईंधन तक ही सीमित नहीं है. असल मामला सप्लाई चेन से जुड़ा है. अभी तक रेस्तरां और सुपरमार्केट्स में कच्चे माल की सप्लाई धीमी पड़ रही थी. तब तक सरकार निश्चिंत बैठी थी. अब इस संकट का दायरा बढ़ गया है. इसका असर उन चीज़ों पर पड़ रहा है, जिसके बिना रोज़ाना की ज़िंदगी आगे बढ़ाना मुश्किल ही नामुमकिन है. ये मसला ईंधन तक पहुंच गया है. ब्रिटेन के 90 फीसदी से अधिक पेट्रोल पंपों में सूखा पड़ा है. कई पेट्रोल स्टेशनों पर ताला भी लगाना पड़ा है. जहां अभी तक स्टॉक बचा है, वहां कई किलोमीटर्स तक गाड़ियों की कतारें है. लोग ज़रूरत से ज़्यादा ज़माखोरी पर ध्यान दे रहे हैं. लोगों में आक्रोश भी बढ़ रहा है. कई जगहों पर पुलिस और आम लोगों के बीच झड़प की ख़बरें भी हैं.

तो क्या ब्रिटेन में पेट्रोल और डीजल का स्टॉक खत्म हो गया है? ऐसा नहीं है. सभी बड़ी तेल कंपनियां और सरकार बार-बार कह रहीं है कि ब्रिटेन में ईंधन की कोई कमी नहीं है. उसका पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है. फिर लोगों को ये मिल क्यों नहीं रहा?

एक उदाहरण से समझिए. मान लीजिए, आपको एक ब्रेड का पैकेट खरीदना है. आप क्या करेंगे? या तो आप घर के पास वाली दुकान से ख़ुद जाकर खरीद लाएंगे या फिर ऐसी जगह से ऑनलाइन ऑर्डर प्लेस करेंगे, जो कम-से-कम समय में आप तक ब्रेड भेज दे. आमतौर पर आपके आस-पास की दुकान में ब्रेड बन नहीं रहा होगा. वो असर में एक सेलिंग पॉइंट है. ब्रेड का फ़ैक्ट्री में निर्माण होता है और वहां से चरणबद्ध तरीके से नीचे के सप्लायर्स तक पहुंचाया जाता है. आम उपभोक्ता सीधे फ़ैक्ट्री से जाकर सामान नहीं खरीद सकता. ऐसा करना संभव ही नहीं है. अंतिम व्यक्ति तक सामान पहुंचाने के लिए पूरी चेन काम करती है. इस सप्लाई चेन का चलायमान होना बेहद ज़रूरी है. वरना सब अस्त-व्यस्त हो जाएगा.

लोगों की समस्या

ब्रिटेन की दिक़्क़त इसी सप्लाई चेन से जुड़ी है. वहां ईंधन भरपूर है. बस वो सेलिंग पॉइंट तक पहुंच नहीं रहा है. कोई आदमी तेल भरवाने बड़ी कंपनियों के गोदाम तक तो जाएगा नहीं. उसे चलते-फिरते रास्ते में ईंधन चाहिए. सड़क पर गाड़ी चलाते हुए ये भरोसा होता है कि आगे पेट्रोल स्टेशन मिल जाएगा. वहां ईंधन मिलने का विश्वास भी होता है. इसी भरोसे पर सब कुछ चल रहा होता है. बिना ईंधन के गाड़ियां आगे बढ़ेंगी नहीं. और, गाड़ियां नहीं बढ़ेंगी तो जाने कितनी छोटे-बड़े कामों पर पॉज लग जाएगा.

ब्रिटेन में ऐसा ही हो रहा है. इसकी वजह क्या है? इसकी वजह है ट्रक ड्राइवर्स की भारी कमी. ट्रक ड्राइवर्स सप्लाई चेन की सबसे अहम कड़ी हैं. ज़रूरत की चीज़ों को सेलिंग पॉइंट्स तक पहुंचाने के लिए बड़े-बड़े ट्रकों का इस्तेमाल होता है. ये ट्रक्स हज़ारों किलोमीटर का सफ़र कर सप्लाई चेन को जारी रखते हैं. इन ट्रकों को चलाने के लिए प्रशिक्षित और अनुभवी ड्राइवर्स की ज़रूरत होती है. ब्रिटेन में इस समय एक लाख से अधिक प्रशिक्षित ट्रक ड्राइवर्स की कमी है. ड्राइवर्स के बिना ट्रक्स बंद पड़े हैं, और सप्लाई चेन अस्त-व्यस्त हो गया है.

ड्राइवर्स की कमी का कारण क्या है?

पहला बड़ा कारण ब्रेग्ज़िट है. एक फ़रवरी 2020 को ब्रिटेन ने यूरोपियन यूनियन (EU) से नाता तोड़ लिया था. EU के देशों के बीच खुला व्यापार होता है. सदस्य देशों की सीमाएं एक-दूसरे के लिए खुली रहतीं है. लोगों के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाकर अवसर तलाशना आसान होता है. ब्रेग्ज़िट के बाद ब्रिटेन ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए. EU के नागरिकों को  ब्रिटेन में एंट्री के लिए वीजा और तमाम काग़ज़ी कार्रवाई की दरकार होने लगी. ब्रेग्ज़िट से पहले EU के सदस्य देशों के 25 हज़ार से अधिक ट्रक ड्राइवर्स ब्रिटेन में काम करते थे. ब्रेग्ज़िट के बाद उन्होंने ब्रिटेन छोड़ दिया.

दूसरा बड़ा कारण कोरोना महामारी है. कोरोना के दौरान कई ट्रक ड्राइवर्स ने दूसरी नौकरियां तलाश लीं. यूरोप के देशों के कई ड्राइवर्स अपने घर लौट गए. इनमें से अधिकतर वापस काम पर नहीं लौटे. इसके अलावा, महामारी के कारण ट्रक टेस्ट और उनकी ट्रेनिंग का काम धीमा पड़ गया. टेस्ट सेंटर्स में लंबा बैकलॉग जमा है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 40 हज़ार से अधिक एप्लिकेशन पेंडिंग पड़े हैं.

तीसरी वजह ट्रक ड्राइवर्स के लिए उपलब्ध सुविधाओं से जुड़ी है. ब्रिटेन में ट्रक ड्राइवर्स के रिटायरमेंट की औसत उम्र 55 साल है. जैसे-जैसे समय बीत रहा है, रिटायर होने वाले ड्राइवर्स की संख्या बढ़ रही है. नए लोग इस पेशे में आने से कतरा रहे हैं. क्यों? क्योंकि उन्हें इस पेशे में कमाई और भविष्य को लेकर आशंका है.

साथ ही साथ, ब्रिटेन में ड्राइवर्स की सुविधाओं का ध्यान तक नहीं रखा जाता. उन्हें एक रात की पार्किंग के लिए तीन हज़ार रुपये तक का चार्ज़ देना पड़ता है. ब्रिटिश अख़बार द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, फ़्रांस अपने यहां के ट्रक ड्राइवर्स को फ़्री पार्किंग और शॉवर की सुविधा देता है. ब्रिटेन को छोड़कर यूरोप के बाकी देश ट्रक ड्राइवर्स से पार्किंग और दूसरी छोटी-मोटी सुविधाओं के लिए पैसा नहीं लेते. इस वजह से भी लोग ब्रिटेन की बजाय बाकी यूरोप में ट्रक चलाना पसंद करते हैं.

ब्रिटेन की सरकार क्या कर रही है?

27 सितंबर को सरकार ने बताया कि सेना को अलर्ट पर रखा गया है. ज़रूरत पड़ने पर उन्हें उतारा जा सकता है. सेना के ट्रक ड्राइवर्स को ट्रेनिंग दी जा रही है. ताकि जिस जगह पर ईंधन की ज़्यादा कमी हो, वहां जल्द से जल्द आपूर्ति की जा सके. तेल कंपनियों के लिए बने कम्पटीशन लॉ को भी अस्थायी तौर पर निलंबित कर दिया है. इससे कंपनियां एक-दूसरे के साथ आसानी से सूचनाएं साझा कर सकेंगी. जहां ज़रूरत ज़्यादा हो, वहां फौरन सप्लाई पहुंचाना आसान हो जाएगा. सरकार ने साढ़े दस हज़ार विदेशी लॉरी ड्राइवर्स और पॉल्ट्री वर्कर्स को अस्थायी वीजा देने का फ़ैसला किया है. चार हज़ार नए ट्रक ड्राइवर्स को प्रशिक्षण देने का भी ऐलान हुआ है. इन्हें सरकारी खर्च पर ट्रेन किया जाएगा. इसके अलावा, जिन लोगों के पास ट्रक चलाने का लाइसेंस है और वे दूसरा काम कर रहे हैं, उन्हें सरकार की तरफ़ से चिट्ठी भेजी गई है. उनसे ट्रक ड्राइविंग के पेशे में लौटने की दरख़्वास्त की गई है.

क्या सरकार के इन कदमों से सब ठीक हो जाएगा? ये पूरे दावे से नहीं कहा जा सकता. अगर सब सरकार की योजना के अनुसार चला तो कुछ समय के लिए स्थिति सामान्य हो सकती है. लेकिन आगे का समय आशंकाओं से भरा दिखता है. सरकार की अधिकतर योजनाएं टेम्पररी हैं. ब्रेग्ज़िट बरकरार ही रहने वाला है. मतलब ये कि यूरोप के बाकी हिस्सों से ट्रक ड्राइवर्स का आना मुश्किल बना रहेगा.

ड्राइवर्स की बुनियादी सुविधाओं और उनके बेहतर भविष्य की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं है. अभी कमी के कारण इस समय उनके चार्जेज़ बढ़ाए गए हैं. लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि सब ठीक हो जाने के बाद भी ये आमदनी बनी रहेगी? फिलहाल, सरकार का ध्यान तात्कालिक समाधान की तरफ़ है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर उन्होंने दूरगामी नतीज़ों को ध्यान में नहीं रखा तो आने वाले समय में ये संकट काबू से बाहर हो सकता है.


जब बंटवारे के बाद के हालात को देखकर रेडक्लिफ़ तुरंत वापस ब्रिटेन लौट गए

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