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'फांसी लगाने वाले बर्दाश्त करने में आलस कर जाते हैं'

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डीपीडी की  संडे वाली चिट्ठी आ गई है. इस बार ये चिट्ठी कुछ जायज सवाल उठा रही है. आप और हम सब पर. सवाल कि जिंदगी कितनी जरूरी है. जब सबको एक रोज मरना है तो लाइफ को इतनी सीरियसली क्यों ही लिया जाए? dpd-pic_140216-040741-600x400दिव्य प्रकाश दुबे ने इस बार की चिट्ठी IIT की तैयारी कर रहे सैकड़ों लड़कों और लड़कियों के नाम लिखी है. लेकिन ये चिट्ठी उन लोगों को भी पढ़नी चाहिए, जिन्हें जिंदगी से आसान मौत लगती है. जिन्हें जिंदगी के दर्द के मुकाबले फांसी के फंदे से होने वाले दर्द को बर्दाश्त करना आसान लगता है. पढ़िए इस बार की संडे वाली चिट्ठी


 
यार सुनो,

माना तुम लोग अपने मां बाप की नज़र में दुनिया का सबसे बड़ा काम कर रहे हो. माना तुम लोग जब रोज़ कोचिंग के लिए जाते हो तो दूर बैठे तुम्हारे मां बाप को लगता है जंग पे जा रहे हो. माना IIT से पास होने के बाद जिंदगियां बदल जाती हैं. माना कि ये इम्तिहान पास करने लायक है.

तुम्हारे कुछ दोस्तों ने पिछले कुछ सालों में जिंदगी से ऊपर फांसी को चुना. मैं उनको ये तो नहीं कहूंगा कि वो बेवकूफ थे. असल में जब कोई आस पास वाला दोस्त फांसी लगा लेता हैं तो तुम अपने आप को मन ही मन समझा लेते हो कि बेवकूफ था साला, struggle नहीं झेल पाया. हम बड़े तीस मार खां है जिंदगी को झेल जा रहे हैं. तुम्हारे पैरेंट्स, टीचर वो भी तुम्हें यही समझते होंगे शायद कि जो मर गए वो इसी लायक थे.

मुझे ये लगता है कि जो फांसी लगा लेते हैं वो लोग बड़े हिम्मती होते हैं. वो सब कुछ बर्दाश्त कर लेते हैं लेकिन आलस में करना नहीं चाहते. वो बर्दाश्त कर लेते हैं कि मरने के बाद उनकी मां उसी दिन रोकर मर जाएगी, उनके मरने से ‘घर’ जो कि IIT के इम्तिहान के रिज़ल्ट पर टिका था वो घर टूट जाएगा. मुहल्ले की एक लड़की उन्हे तब तक ढूंढेगी जब तक ढूंढते ढूंढते वो एक दिन नाम भूल जाएगी. फांसी लगाने वाले ये सब कुछ अपने दिमाग में बर्दाश्त कर चुके होते हैं तब फांसी का फंदा पंखें में लपेटते हैं.
एक्स माशूका को लव लेटर, जो हर लड़का लिखना चाहता है, पर लिख नहीं पाता

असल में हिंदुस्तान में हम शुरू से ही फांसी को गले लगा लेने वालों की बड़ी इज्ज़त करते हैं. कभी कभी मैं सोचता हूं कि भगत सिंह को अगर फांसी न हुई होती तो भी क्या हम उनकी उतनी ही इज्ज़त करते, इस बात का जवाब सोचकर डर लगता है. मेरी एक बात मानोगे, अगर तुम्हें फांसी लगानी हो न तो इम्तिहान देने से पहले फांसी लगा लेना यार. लिख देना एक सेंटी सी चिट्ठी जिसको पढ़कर तुम्हारे मां बाप चलती फिरती लाश हो जाएं.

जब अपनी आखिरी चिट्ठी लिखना तो दुनिया की थोड़ी बुराई कर देना कि दुनिया थी नहीं इस लायक. जब मर जाओगे तो अगले दिन अखबार में तुम्हारा रोल नंबर नहीं नाम भी आएगा. एक दो दिन हम लोग कोसेंगे तुम्हारे घर वालों को फिर एक दिन तुम्हारा नाम भूल जाएंगे. तुम्हारा पड़ोसी जो एक दो दिन सो नहीं पाएगा तुम्हारे मरने के बाद, वो तुम्हें सबसे पहले भुला देगा. जिस टपरी पे तुम चाय पीते होगे, वो टपरी वाला भी एक दो दिन तुम्हारी बड़ी तारीफ करेगा कि ‘बड़ा हंसमुख लड़का या लड़की थी.’

तुम्हें पता है न तुम इस दुनिया के लिए इंपोर्टेंट नहीं हो. तुम क्या कोई भी इतना इंपोर्टेंट नहीं है कि किसी के लिए दुनिया रुक जाए. और यही इकलौती वजह है जिसकी वजह से तुम्हें दुनिया झेलनी चाहिए. यही वो वजह है कि तुम्हें ज़िन्दा रहकर इस बात को गलत साबित करने कि कोशिश करनी चाहिए. जब हमें पहले से ही पता है कि ज़िन्दगी नाम के खेल से कोई ज़िन्दा बचकर नहीं निकलेगा तो खेल का मज़ा लेकर जाओ न, ऐसी भी क्या जल्दी है यार.
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एक बात याद रखना लाइफ के किसी भी इम्तिहान की ‘औकात’ लाइफ से ज़्यादा थोड़े होती है. जब साला यहां पे कोई नहीं बचेगा तो लाइफ को ही सीरियसली क्यूं लेना. IIT तो फिर भी केवल एक इम्तिहान है. बाकी जो मन में आए वो करना, मौज से रहना. तुम्हारे हर एक दोस्त जिसने फांसी लगा ली थी उसके हिस्से की जिन्दगी जीना भी तुम्हारी ज़िम्मेदारी है. क्या पता मरने के बाद भी कोई दुनिया होती हो और वहां कभी वो दोस्त मिले तो उसको बताना, ‘यार, ये दुनिया इतनी भी बुरी नहीं थी कि उसको फांसी लगाकर महसूस किया जाए’

उधर से अपना हाल चाल भेजना और बताओ तैयारी कैसी चल रही है?

दिव्य प्रकाश दुबे

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