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पीएम केयर्स के बेकार वेंटिलेटर्स की पूरी कहानी

बात वैक्सीन की क़िल्लत की. देश के अधिकांश राज्यों ने वैक्सीन की क़िल्लत को फ़्लैग किया है. कहा है कि उनके पास वैक्सीन नहीं है. कोविशील्ड बनाने वाले सीरम इंस्टिट्यूट और कोवैक्सीन बनाने वाले भारत बायोटेक के पास राज्यों के ऑर्डर पड़े हुए हैं, लेकिन ऑर्डर की सप्लाई का फ़्लो नहीं बन सका है.

पहले कुछ उदाहरण देखिए

पहला राज्य दिल्ली
आम आदमी पार्टी की विधायक आतिशी मार्लीना ने 11 मई को मीडिया को जानकारी दी कि दिल्ली में 18 से 44 साल एक वर्ग के लिए 2-3 दिनों के लिए कोविशील्ड ही बची है, कोवैक्सीन तो ख़त्म हो गयी है.

दूसरा राज्य महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने बताया कि महाराष्ट्र ने 18 से 44 साल के वर्ग का टीकाकरण बंद कर दिया है. और इस आयुवर्ग के लिए जो वैक्सीन प्रोक्योर की गयी थी, उसे 45 साल से ऊपर वाले वैक्सीन ग्रुप के लिए रख दिया गया है. ऐसा इसलिए क्योंकि 45 साल के ऊपर के जिन लोगों को वैक्सीन की पहली डोज़ दी गयी थी, उनके दूसरे डोज़ की बारी आ गयी थी. और वैक्सीन महाराष्ट्र के पास थी नहीं.

तीसरा राज्य आंध्र प्रदेश
यहां के भी CM वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने साफ़ कर दिया कि अब वैक्सीन उन्हें ही लगायी जाएगी, जिनको वैक्सीन का पहला डोज़ दिया जा चुका है. यानी 18-44 वालों को यहाँ भी वैक्सीन अब कुछ दिनों तक नहीं लगेगी

ये तो बस तीन राज्य हैं, जिन्होंने वैक्सीन न लगा पाने का मुखर ऐलान कर दिया है. अधिकतर राज्यों ने वैक्सीन निर्माताओं को ऑर्डर के मुताबिक़ सप्लाई न कर पाने के आरोप लगाए हैं. लिहाज़ा आपूर्ति उस हिसाब से नहीं हो पा रही है तो देश के कुछ बड़े राज्यों ने वैक्सीन की क़िल्लत को दूर करने के लिए केंद्र सरकार और देश में वैक्सीन का निर्माण कर रही कम्पनियों का भरोसा छोड़ दिया है. राज्यों ने ख़ुद का ग्लोबल टेंडर निकाला है. ग्लोबल टेंडर यानी राज्य दुनिया भर के वैक्सीन निर्माताओं से सीधे वैक्सीन ख़रीदने का ठेका. क़िल्लत झेल रहे राज्य दरअसल वैक्सीन प्रोक्योर करने का एक चैनल विकसित करना चाह रहे हैं, जिससे वो देशी वैक्सीन निर्माताओं पर अपनी निर्भरता कम कर सकें. इन राज्यों में सबसे पहले नाम महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश का लिया जाना चाहिए क्योंकि इन दो राज्यों ने सबसे पहले ग्लोबल टेंडर निकाला था. उनके अलावा दिल्ली, कर्नाटक, तेलंगाना, ओडिशा और आंध्र प्रदेश ने भी वैक्सीन की ख़रीद के लिए ग्लोबल टेंडर निकालने का ऐलान किया है.

पूरी समस्या को समझने के लिए वैक्सीन के गणित को समझना होगा

स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़ 11 मई तक देश में वैक्सीन के 17 करोड़ से ज़्यादा डोज़ दिए जा चुके हैं. लेकिन 17 करोड़ डोज़ देने और 17 करोड़ लोगों का कम्प्लीट वैक्सीनेशन करने में बहुत अंतर है. तो ये आंकड़ा ये भी बताता है कि देश में अब तक महज़ 3 करोड़ 86 लाख लोगों को वैक्सीन का दूसरा डोज़ दिया गया है. जनवरी से लगायत मई आ गयी, 5 महीने का समयांतराल बीत गया और हमने कम्प्लीट वैक्सीन किया 4 करोड़ से भी कम लोगों का.

अब एक थोड़ा गणित समझिए. देश की आबादी मोटामोटी 135 करोड़. और सिद्धांतत: हर इम्यूनिटी पाने के लिए कुल 95 करोड़ लोगों का दोनों डोज़ के साथ वैक्सीनेशन होना चाहिए. और इसके लिए चाहिए लगभग 190 करोड़ डोज़. अब इसी स्पीड से वैक्सीनेशन चला, तो भारत को हर्ड इम्यूनिटी पाने में लगभग साढ़े तीन साल का समय लग सकता है. इंडिया टुडे समूह द्वारा बनाया गया ये ग्राफ़िक्स देखिए

अब इस ज़रूरत के हिसाब से आपूर्ति के समीकरण को भी समझना होगा. सीरम इंस्टिट्यूट इस वक़्त हर महीने 6 करोड़ कोविशील्ड के डोज़ और भारत बायोटेक हर महीने 1 करोड़ कोवैक्सीन के डोज़ का निर्माण कर रहे हैं. इस 7 करोड़ में से आधा ले गयी केंद्र सरकार. और बचे हुए 3.5 करोड़ में से राज्य और प्राइवेट अस्पतालों दोनों को प्रोक्योर करना है. और इसके अलावा सीरम इंस्टिट्यूट के अन्तर्राष्ट्रीय कमिटमेंट की भी बात है, जहां पर उन्होंने विदेशों में भी अपनी वैक्सीन भेजने का वादा किया हुआ है. कोविशील्ड को डिवेलप करने वाली एस्ट्राजेनेका पर बीते दिनों यूके में वैक्सीन की निर्धारित मात्रा न देने के लिए केस भी हो चुका है. ऐसे में वैक्सीन की उपलधता और भी जटिल होती जाती है

साथ ही ये भी बात है कि दोनों ही वैक्सीन की राशनिंग भी ठीक से होनी है, ताकि जिसे वैक्सीन की पहली डोज़ लगी है, उसे उसी वैक्सीन की दूसरी डोज़ दी जा सके. और वो भी सही समय पर.

देश को हर्ड इम्यूनिटी पाने में कितना वक्त लगेगा?

अब वैक्सीन का पूरा सिस्टम जिस असंतुलन से भरा हुआ है, उसे देखते हुए साफ़ तौर पर कहा नहीं जा सकता है कि देश को हर्ड इम्यूनिटी पाने के लिए समय साढ़े 3 साल से कम लगेगा या ज़्यादा.

इस डिमांड और सप्लाई के सिस्टम में बस यही विसंगति नहीं है कि मांग के बराबर प्रोडक्शन ही नहीं हो रहा है, लेकिन केंद्र सरकार पर ये भी आरोप लग रहे हैं कि अपना 50 परसेंट का हिस्सा ख़रीदने के बाद वो राज्यों को मिलने वाले कोटे पर भी रेगुलेशन लगा रही है. 12 मई को ही छपी खबरों के मुताबिक़, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई पर कहा है कि वैक्सीन के 2 करोड़ डोज़ में से सभी राज्य अपनी मई महीने की ख़रीददारी कर लें.

इसी कड़ी में भारत बायोटेक के प्रमुख कृष्णा एल्ला का एक पत्र भी देखा जाना चाहिए, जो उन्होंने दिल्ली सरकार ने कोवैक्सीन के ऑर्डर पर लिखा है. उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी इस लेटर का ज़िक्र किया. इस कथित लेटर में कृष्णा एल्ला ने ऑर्डर को पूरा न कर पाने की असमर्थता जताते हुए कहा था कि वो सरकार के निर्देशों के अनुसार ही वैक्सीन डिस्पैच कर रहे हैं.

क्या वैक्सीन का प्रोडक्शन बढ़ा?

लेकिन बात ये भी नहीं है कि वैक्सीन के उत्पादन का पूरा हिसाबकिताब इतने तक ही सीमित रहेगा. कुछ महीनों पहले ही सीरम इंस्टिट्यूट और भारत बायोटेक दोनों ने केंद्र सरकार से वित्तीय मदद मांगी थी. ये मदद वैक्सीन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए थी. भारत सरकार ने सीरम इंस्टिट्यूट को दिए 3 हज़ार करोड़ और भारत बायोटेक को दिए लगभग 1500 करोड़ रुपए. ये अप्रैल 2021 की बात है. हम मई के मध्य में खड़े हैं. क्या हुआ टैक्सपेयर द्वारा दिए गए इन पैसों का? क्या वैक्सीन का प्रोडक्शन बढ़ा? अगर नहीं तो क्या कारण हैं और कब तक प्रोडक्शन बढ़ेगा? और राज्यों को वैक्सीन बेचने के लिए केंद्र सरकार और वैक्सीन निर्माताओं के बीच किस तरह के समझौते हुए हैं?

हमने वैक्सीन बनाने वाली कम्पनियों भारत बायोटेक और सीरम इंस्टिट्यूट को ये सवाल भेजे. बुलेटिन के लिखे जाने तक जवाब तो नहीं आया. आएगा तो वो भी लल्लनटॉप आपको ज़रूर बताएगा. लेकिन मिनिस्ट्री ऑफ़ साइंस एंड टेक्नॉलजी ने आज ही बयान जारी करके कहा है कि मई-जून 2021 तक कम्पनी का वैक्सीन प्रोडक्शन दोगुना हो जाएगा, जुलाई-अगस्त तक 6 से 7 गुना और कम्पनी सितम्बर 2021 आते-आते हर महीने 10 करोड़ डोज़ का उत्पादन करने लगेगी.

सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के CEO अदार पूनावाला ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से बातचीत की है और 1.5 करोड़ वैक्सीन के डोज़ देने का वादा किया है. आशा जतायी जा रही है कि जल्द ही वैक्सीनेशन शुरू हो सकेगा.

इसके अलावा ख़बर ये भी है कि उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के गांव चोला स्थित बिबकॉल यानी भारत इम्यूनलॉजिकल एंड बायोलॉजिकल कारपोरेशन लिमिटेड में भी जल्द ही कोवैक्सीन का निर्माण हो सकता है. भारत सरकार ने इसके लिए 30 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत कर दी है, कंपनी के अधिकारी बताते हैं कि इसके लिए काफी समय से प्रयास चल रहा था और अब टेक्नोलॉजी इक्विपमेंट्स व अन्य चीजों को शेयर कर जल्दी ही निर्माण का कार्य शुरू कर दिया जायेगा.

कोविन पर क्या दिक्कतें आ रही हैं?

इस सबके साथ कोविन का नाम लेना भी ज़रूरी है. ऐसा ऐप जिस पर वैक्सीन लगवाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराना होता है. ऐसा ऐप जिस पर नम्बर डालने के बाद OTP नहीं आता है, आता है तो OTP काम नहीं करता है और नया OTP मंगवाना पड़ता है. सबकुछ हो जाता है कि स्लॉट हमेशा भरे हुए दिखते हैं. और सबकुछ इतना जटिल हो जाता है कि वैक्सीन के लिए स्थान और समय को बुक करना रेलवे के तत्काल टिकट बुकिंग से भी इसके आगे फ़ेल है, ऐसा भी लोग सोशल मीडिया पर लिखने लगे है.

वैक्सीन के बाद अब बात जीवन रक्षक उपकरण वेंटिलेटर की. वेंटिलेटर गंभीर रूप से बीमार मरीजों को सांस लेने में मदद करती है. संक्रमित मरीजों के फेफड़ों तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करती है. बीते साल कोरोना महामारी की वजह से देश में लॉकडाउन लगा तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2020 में पीएम केयर्स फंड बनाने की घोषणा की. प्रधानमंत्री ने लोगों से इस पीएम केयर्स फंड में दान देने की अपील की. फिर सरकार ने मई 2020 में कहा कि कोरोना से लड़ाई में 3100 करोड़ रुपए पीएम केयर्स फंड के जरिए खर्च होंगे. सरकार ने बताया कि 50 हजार वेंटिलेटर खरीदने के लिए इसमें से करीब 2 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे. ये सभी वेंटिलेटर मेक इन इंडिया अभियान का हिस्सा होंगे और कोरोना के इलाज में मदद के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दिए जाएंगे.

फिर 2021 में आते हैं. 2 फ़रवरी को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने राज्यसभा में बताया कि 18 सौ 50 करोड़ की लागत वाले 38 हजार 867 वेंटिलेटर राज्यों को आवंटित किए गए हैं. इनमें से 34 हजार 333 वेंटिलेटर इंस्टॉल हो चुके हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री ने बताया कि सबसे ज्यादा 4960 वेंटिलेटर आंध्र प्रदेश को दिए गए. 4 हजार 434 वेंटिलेटर महाराष्ट्र को, 4 हजार 016 उत्तर प्रदेश को और 3400 वेंटिलेटर गुजरात को दिए गए. हालांकि अश्विनी चौबे ने ये नहीं बताया कि ये वेंटिलेटर पीएम केयर्स फंड के अंतर्गत खरीदे गए हैं या नहीं?

 

केंद्र से अब राज्यों की ओर चलते हैं

अप्रैल-मई में कोरोना की दूसरी लहर आती है. अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन और वेंटिलेटर के लिए मारामारी मचती है. ऐसे समय में जब केंद्र सरकार की ओर से आए वेंटिलेटर्स से लोगों की जान बचाई जानी थी, कई राज्यों से खबर आती है कि ये वेंटिलेटर काम ही नहीं कर रहे हैं.

उदाहरण देखिए.

पंजाब के गुरू गोबिंद सिंह मेडिकल कॉलेज, फरीदकोट चलते हैं. यहां AgVa हेल्थकेयर कंपनी के 80 वेंटिलेटर पिछले साल पीएम केयर फंड के जरिए आए थे. मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स ने कहा है कि 80 में से 71 वेंटिलेटर खराब हैं. एक-दो घंटे में ही बंद हो जा रहे हैं. इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.

इसी तरह की खबरें मध्यप्रदेश से भी आईं. भोपाल के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल हमीदिया हॉस्पिटल में पिछले हफ्ते वेंटिलेटर अचानक बंद हो जाने से एक मरीज की मौत भी हो गई. एनडीटीवी में छपी खबर के मुताबिक डॉक्टरों ने सुपरिटेंडेंट को चिट्ठी लिख कर कहा कि पीएम केयर्स फंड के अंतर्गत खरीदे गए वेंटिलेटर कायदे से काम नहीं कर रहे हैं. डॉक्टरों का कहना है कि मशीन जरूरत के मुताबिक प्रेशर जनरेट नहीं करती है और कई बार अचानक ही बंद हो जाती है. ये मरीजों के लिए बहुत ही खतरनाक है.

हालांकि राज्य सरकार और अस्पताल प्रशासन दोनों ने इस पर सफाई देते हुए कहा है कि मशीनों में कोई गड़बड़ी नहीं है.

एक और राज्य छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने दावा ने भी किया कि केंद्र की ओर से मिले वेंटिलेटर्स में से 70 काम नहीं कर रहे थे. इनमें से 66 को पहले रिपेयरिंग के लिए भेजा गया फिर इनका इस्तेमाल शुरू हो सका.

ये तो हो गया उन अस्पतालों का हाल जहां से खबरें आईं कि वेंटिलेटर्स में दिक्कत है. अब उन जगहों का भी हाल देख लेते हैं जहां पर वेंटिलेटर्स आ तो गए लेकिन अब तक ऐसे ही पड़े हुए हैं उन्हें खोला ही नहीं गया है.

उत्तर प्रदेश के खेल और युवा मामलों के राज्य मंत्री उपेंद्र तिवारी सीएमओ और सिटी मजिस्ट्रेट से पूछा कि अस्पताल में ग्यारह-ग्यारह वेंटिलेटर होने के बाद भी क्यों नहीं चल रहे हैं? इस पर जवाब मिलता है कि वेंटिलेटर चलाने वाला स्टाफ नहीं है.

जहां एक तरफ वेंटिलेटर बेड के इंतजार में लोगों की जान चली जा रही है. वहीं दूसरी तरफ इस तरह के भी दृश्य सामने आ रहे हैं जहां वेंटिलेटर धूल फांक रहे हैं. उत्तर प्रदेश के कानपुर, फिरोजाबाद और इटावा के अस्पतालों में भी इसी तरह से वेंटिलेटर पड़े हुए मिले.

बिहार में आए वेंटिलेटर्स की स्थिति उत्तर प्रदेश से कुछ अलग नहीं है. जहां पिछले साल सैकड़ों की तादाद में वेंटिलेटर आए, जो अब तक ऐसे ही हुए हैं क्योंकि उन्हें चलाने वाला ही कोई नहीं है.

अररिया के सदर अस्पताल के आईसीयू वार्ड में 6 वेंटिलेटर पड़े हुए हैं. आईसीयू वार्ड में ताला लटका हुआ है. ताला खुलवाकर जब देखा गया तो वहां 5 वेंटीलेटर, बेड सहित धूल फांकते मिले. एक वेंटिलेटर आईसीयू के अंदर बने शौचालय के बाहर पड़ा हुआ था. ये सभी 6 वेंटिलेटर 8 महीने पहले पीएम केयर्स फंड के अंतर्गत आए थे. अस्पताल प्रशासन की ओर से बताया गया कि वेंटिलेटर को चलाने के लिए जितने डॉक्टर, नर्स और कर्मचारी की जरूरत होती है वह उनके पास मौजूद नहीं है.

राजस्थान के धौलपुर से भी अस्पताल में धूल फांकते वेंटिलेटर्स की तस्वीरें आईं. यहां बाड़ी उप जिला अस्पताल में कुल 11 वेंटिलेटर हैं लेकिन काम एक भी नहीं करते हैं. क्योंकि इन्हें चलाने वाला कोई स्टाफ नहीं है.

ये केवल राजस्थान, उत्तर प्रदेश या बिहार की स्थिति नहीं है. देश के अधिकतर राज्यों की यही हालत है. वो मशीन जिसकी इस समय बहुत ज्यादा जरूरत है, जिसे पाने के लिए बड़े शहरों में लोग अपना घर तक बेचकर प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने को तैयार हैं. वही जीवन रक्षक मशीन महीनों से सरकारी अस्पतालों में धूल खा रही हैं. शोपीस बनी हुई हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इतने महीनों में केंद्र और राज्य सरकारों को क्या एक बार भी सुध नहीं आई कि इन वेंटिलेटर्स को चलाने के लिए ऑपरेटर्स की भी जरूरत होती है? बिना स्किल्ड स्टाफ़ के वेंटिलेटर बस मंगवाने के लिए मँगवा लिए गए? क्या इतने महीनों में वेंटिलेटर चलाने के लिए स्टाफ को ट्रेनिंग नहीं दी जा सकती थी? या नए स्टाफ की भर्ती नहीं की जा सकती थी?

और ये चीज़ें सामने कब आती हैं? जब हम आपदा के बीचोंबीच खड़े होते हैं. सबकुछ भयावह होते हुए देखते हैं, तब. इन चीज़ों पर सरकारों का क्या कहना है? अब तक तो कोई बयान या कोई सफ़ाई आयी नहीं. ये चीज़ें यूँ ही मीडिया स्क्रूटनी या आरोपों की शक्ल में सामने आती हैं और बहुत दिनों तक अनुत्तरित रह जाती हैं. हमें इन सभी स्टेकहोल्डरों की जवाबदेही तय करनी होगी. जवाब जानना होगा.

विपक्षी दलों ने पीएम मोदी को लिखी चिट्ठी

अब वैक्सीन की क़िल्लत को दूर करने के लिए विपक्षी दलों ने PM नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी है. इस चिट्ठी में विपक्षी दलों ने कहा है कि उन्होंने कोविड मैनेजमेंट के लिए बहुत सारे सुझाव दिए, लेकिन केंद्र सरकार ने किसी पर भी अमल नहीं किया. इसके साथ ही विपक्षी दलों ने PM मोदी ने कुछ मांगे की हैं. उन्होंने कहा है कि

– चाहे घरेलू स्तर पर हो या अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर, वैक्सीन का प्रोक्योरमेंट केंद्र सरकार करे
– केंद्र सरकार तुरंत एक मुफ़्त और विशाल देशव्यापी टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करे
– देश में वैक्सीन बनायी जा सके, इसके लिए सरकार ज़रूरी लाइसेंस प्राप्त करे
– वैक्सीन के लिए जो 35 हज़ार करोड़ का बजट एलोकेट किया गया था, उसका इस्तेमाल किया जाए
– सेंट्रल विस्टा का काम रोक दिया जाए, उस पैसे को वैक्सीन और ऑक्सिजन में लगा दिया जाए
– PMCares नाम का जो प्राइवेट और अनअकाउंटेड फ़ंड है, उसका सारा पैसा वैक्सीन, ऑक्सिजन और दूसरी ज़रूरी चीज़ें ख़रीदने में लगा दिया जाए
– सभी बेरोज़गारों को हर महीने 6 हज़ार रुपए दिए जाएं
– जरूरतमंदों को भोजन दिया जाए
– कृषि क़ानूनों को वापिस लिया जाए ताकि अन्नदाता, जो हमारे लिए अनाज उगाते हैं वो इस देश के लोगों के लिए सतत काम करते रहें


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