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वह 'खास' आरक्षण जिसे मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक बताया गया

तारीख 4 अप्रैल 2018, उत्तर प्रदेश का फिरोजाबाद जिला. चौराहे पर पोस्टर-बैनरों के साथ कुछ युवा और अधेड़ जमा हैं. ये सवर्ण महासभा के लोग हैं. सबने जमीन पर बैठकर सिर मुंडाना शुरू कर दिया है. यह इनका विरोध प्रदर्शन का तरीका है. इनका कहना है कि वह दलितों के आरक्षण के खिलाफ नहीं लेकिन गरीब सवर्णों को भी आरक्षण दिया जाए. शाम होते-होते भीड़ खुद-ब-खुद तितर-बितर हो गई.

ये घटना देखने में छोटी है लेकिन इसके पीछे की भावना बहुत पुरानी है. इसकी गूंज संविधान निर्माण के लिए बैठी सबसे बड़ी पंचायत ‘संविधान सभा’ में भी सुनाई दी थी. आजादी के बाद भी जब संविधान सभा में दबे-कुचलों के लिए आरक्षण का छाता तैयार हो रहा था, तो उसके नीचे आने की कसमसाहट आर्थिक रूप से कमजोर लोगों में भी थी. जैसा कि महात्मा गांधी कहते थे कि ‘मेरे सपनो का स्वराज गरीबों का स्वराज है.’ संविधान सभा में इस पर चर्चा भी हुई. लेकिन संविधान सभा ने सिर्फ आर्थिक आधार पर पिछड़ेपन को कभी भी आरक्षण की कसौटी नहीं माना. ‘पिछड़ेपन’ को परिभाषित करने के लिए एक प्रक्रिया बनाई गई. संविधान को अपनाने के बाद, सरकार ने आयोग बनाए और उन्होंने ही आरक्षण की प्रकृति पर विचार किया. साल 2019 में मोदी सरकार ने आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग को मानकर एक नए तरह के आरक्षण की शुरुआत की. आइए जानते हैं आर्थिक आधार पर लाए गए इस नए आरक्षण की पटकथा.

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अब एक नहीं दो तरह के रिजर्वेशन

साल 2019 में संविधान के 103वें संशोधन के बाद भारत में अब दो तरह के आरक्षण हैं. पहला आरक्षण वह है, जिसकी व्यवस्था मूल संविधान में है. उस आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन, ऐतिहासिक रूप से छुआछूत का शिकार होना और आदिवासी होना है. इस संविधान संशोधन के बाद दूसरा आरक्षण वह जो आर्थिक आधार पर पिछड़े लोगों को दिया जाएगा. ये आरक्षण उन लोगों को मिलेगा जो आरक्षण के अब तक लागू प्रावधानों के दायरे में नहीं आते और जो सरकार के तय मानकों के हिसाब से गरीब या इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन (EWS) हैं. इस आरक्षण के लिए ऐतिहासिक भेदभाव या पिछड़ेपन की कोई शर्त नहीं है.

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गरीबों के रिजर्वेशन की कहानी

गरीबों के लिए या आर्थिक आधार पर रिजर्वेशन देने का क्रेडिट भले ही मोदी सरकार ले रही हो, लेकिन इसकी कहानी पुरानी है. इसे तब सवर्ण रिजर्वेशन की तरह देखा गया था. इस मुहिम को शुरुआत नरसिम्हा राव सरकार ने 1991 में कर दी थी. सरकार ने एक ऐसे रिजर्वेशन का मसौदा तैयार किया, जिसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को नौकरियों और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण दिया जा सके. सरकार ने आदेश भी जारी कर दिया, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ यह आधार दिया गया कि किसी को भी रिजर्वेशन सिर्फ इस आधार पर नहीं दिया जा सकता वह आर्थिक रूप से कमजोर है. सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्वेशन को रद्द कर दिया. प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव तब एक मिलीजुली सरकार चला रहे थे. उन्होंने इसके लिए संविधान संशोधन जैसा रास्ता नहीं चुना इसका दो बड़े कारण थे. एक तो सरकार में शामिल कई दल इसके खिलाफ थे, दूसरे इस फैसले को डिफेंड करने के लिए उनके पास कोई मजबूत स्टडी या रिपोर्ट भी नहीं थी.

Narsimha Rao S 650 062815105545
पीवी नरसिंह राव की सरकार साल 1991 में पहली बार आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान लेकर आई. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया.

वह सिन्हो कमीशन जिसके आधार पर मोदी सरकार रिजर्वेशन लाई

इस तरह आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू तो नहीं हो पाया, लेकिन इसकी आग सुलगती रही. इसे लेकर 2004 में आई यूपीए 1 की सरकार फिर एक्टिव हुई. देश की बागडोर अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हाथों में थी. साल 2006 में रिटायर्ड मेजर जनरल एसआर. सिन्हो की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया. इसका उद्देश्य था कि इस बात का पता लगाना कि क्या आर्थिक पिछड़ों को आरक्षण देने का कोई आधार है कि नहीं. इधर आर्थिक आधार पर आरक्षण को लेकर जमीन तलाशने का काम शुरू हुआ तो जैसे बोतल से नया जिन्न निकल आया. कई राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर आर्थिक आधार पर रिजर्वेशन देने की कोशिशें शुरू कर दीं. साल 2008 में केरल के मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन की सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों के लिये सरकारी कॉलेजों में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन में 10% सीटें और यूनिवर्सिटी में 7.5% सीटें रिजर्व करने फैसला लिया. इस पर सुप्रीम कोर्ट में अपील लंबित है. 2008 में ही राजस्थान विधानसभा ने अगड़ी जातियों के आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को 14% आरक्षण प्रदान करने के लिये विधेयक पारित किया. ऐसा ही विधेयक राजस्थान विधानसभा ने 2015 में भी पारित किया. साल 2011 में यूपी की तत्कालीन सीएम मायावती ने केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखकर ऊंची जाति के गरीबों के लिये आरक्षण की मांग कर डाली. इतना ही नहीं आर्थिक रूप से आरक्षण की मांग को लेकर साल 2019 तक 21 बार प्राइवेट मेंबर बिल पेश करके भी इसकी मांग उठी. वैसे प्रदेशों के आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के फैसल भी न्यायपालिका के डंडे के चलते परवान नहीं चढ़ पाए.

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इस सबके बीच साल 2010 में सिन्हो कमीशन ने आर्थिक आधार पर आरक्षण देने को लेकर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. रिपोर्ट में आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की गई थी. उस वक्त की मनमोहन सिंह सरकार ने उस पर कोई एक्शन नहीं लिया. उस रिपोर्ट को आज तक सदन के पटल पर नहीं रखा गया है. हालांकि एस.आर सिन्हो ने साल 2019 में इकॉनमिक टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू  में इस रिपोर्ट को तैयार करने और लागू करने के सवाल पर जवाब दिए थे. उन्होंने कहा था,

हमने 4 साल गहन अध्ययन के बाद यह रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी. इसके लिए हमने 28 राज्यों का दौरा किया. गवर्नरों, मुख्य सचिवों, मंत्रियों और गैर सरकारी संगठनों के साथ-साथ जानकारी देने वाले सभी लोगों से मिले. साल 2010 में इस रिपोर्ट पर कैबिनेट में चर्चा भी हुई थी, लेकिन उसके बाद सरकार आगे नहीं बढ़ी. मेरी रिपोर्ट इस मूल सवाल पर बात करती है कि गरीब कौन है और आखिर वो गरीब क्यों है. गरीबी जाति या धर्म से जुड़ी हुई समस्या नहीं है. यह एक सामाजिक और आर्थिक समस्या है. हमने अपनी रिपोर्ट में ऐसे 13 पैमानों की पहचान की जिनके आधार पर लाभार्थियों की पहचान की जाए और शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी जैसी सुविधाएं प्रदान कराई जाएं. हमने अपनी रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की है कि आर्थिक रूप से जो लोग इनकम टैक्स नहीं भर रहे हैं, उनके लिए प्राथमिकता के आधार पर नीतियां बनाई जाएं. उन्हें आईएएस एग्जाम के लिए फ्री कोचिंग, उच्च शिक्षा के लिए कम ब्याज पर लोन और सस्ती स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई जाएं.

Sinho
साल 2006 में पीएम मनमोहन सिंह ने मेजर जनरल एसआर सिन्हो की अध्यक्षता में एक कमीशन को आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण पर स्टडी के लिए गठित किया. उसने साल 2010 में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी. लेकिन तब यूपीए सरकार ने इस पर कोई एक्शन नहीं लिया.

मोदी सरकार ने लिया बड़ा फैसला

जैसा कि अक्सर होता है, सरकारें अपने बड़े फैसले इलेक्शन वाले साल के लिए बचा कर रखती हैं. इस बड़े फैसले के साथ भी वैसा ही हुआ. 2019 में आम चुनाव होने थे और मोदी सरकार 8 जनवरी 2019 को आर्थिक आधार पर आरक्षण के लिए 103 वां संविधान संशोधन विधेयक लेकर आई. इसके तहत संविधान के 2 आर्टिकल्स (15 & 16) में नए क्लॉज जोड़े गए. मोदी सरकार ने इस बड़े कदम के पीछे जिस रिपोर्ट का हवाला दिया वह वही रिपोर्ट थी, जिसे मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते वक्त 2010 में सिन्हो कमेटी ने दिया था. लगभग 5 घंटे की चर्चा के बाद रात को विधेयक पर मतदान हुआ. समर्थन में 323 मत पड़े जबकि विरोध में सिर्फ 3 मत.

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विधेयक के पारित होते ही नरेंद्र मोदी ने तीन ट्वीट किए. उन्होंने इसे ऐतिहासिक कदम बताया. उन्होंने लिखा,

“संविधान (103वां संशोधन) विधेयक, 2019 लोकसभा में पास होना हमारे देश के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण है. यह समाज के सभी तबकों को न्याय दिलाने के लिए एक प्रभावी उपाय को प्राप्त करने में मदद करेगा.”

इसके बाद किए गए ट्वीट में उन्होंने सभी सांसदों का शुक्रिया अदा किया. वहीं तीसरे ट्वीट में लिखा कि उनकी सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ के सिद्धांत को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है.

आरक्षण के इतिहास में एक नया चैप्टर जुड़ चुका था. इस संविधान संशोधन के द्वारा आर्थिक रूप से पिछड़ों को लेकर इस तरह के प्रावधान किए गए.

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आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा.

अब सबसे बड़ा सवाल यह था कि आर्थिक रूप से पिछड़ा किसे माना जाए. इसके लिए भी सरकार ने एक फर्मा तैयार किया है. जिसके भी

#परिवार की सालाना इनकम 8 लाख रुपए या उससे कम हो.
# पास में 5 एकड़ या उससे कम खेती करने लायक जमीन हो.
# 1000 वर्ग फीट या उससे कम एरिया का मकान हो
#नोटिफाइड शहरी एरिया में 109 गज का प्लॉट है या नोटिफाइड कस्बे में 209 गज या उससे कम का प्लाट है.
#किसी दूसरे तरह का रिजर्वेशन नहीं मिल रहा.

उन्हें आर्थिक रूप से पिछड़ा माना जाएगा और वह इस नई कैटेगरी के आरक्षण के पात्र होंगे. इसके साथ ही आर्थिक आधार पर दिए गए आरक्षण पर इन बातों को जानना भी बहुत जरूरी है. जैसे

# इस नए रिजर्वेशन का कोटा वर्तमान कोटे से अलग होगा. अभी देश में कुल 49.5 फ़ीसदी रिजर्वेशन है. अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फ़ीसदी, अनुसूचित जातियों (SC) को 15 फ़ीसदी और – अनुसूचित जनजाति (ST) को 7.5 फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था है.

# संविधान के आर्टिकल 15 और आर्टिकल 16 में नए क्लॉज जोड़े गए हैं.

बता दें कि आर्टिकल 15 जो शिक्षा से संबंधित है, उसमें 15 (6) बनाकर शैक्षणिक संस्थानों में EWS के लिए 10 फीसदी सीटें आरक्षित की गईं. जबकि आर्टिकल 16, जो रोजगार से संबंधित है, उसमें 16 (6) बनाकर सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी सीटें (Economically Weaker Section) EWS के लिए आरक्षित की गई.

इस आरक्षण के लागू होने के बाद मोदी सरकार ने राहत की सांस ली और लोगों ने इसे मास्टर स्ट्रोक करार दिया. मोदी सरकार फिर से 2019 में सत्ता में आई. लोगों को लग सकता है कि आरक्षण पर एक चैप्टर अब बंद हो चुका है. लेकिन जब-जब ऐसा लगता है, एक नया चैप्टर खुलता है. इस रिजर्वेशन के आधार को लेकर भी मामला सुप्रीम कोर्ट में है. अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या फैसला सुनाता है.


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