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ब्रिटेन ने मॉरीशस का ये आईलैंड क्यों चुराया?

सबसे पहले एक कहानी सुनिए.

एक भरा-पूरा खुशहाल गांव था. वहां के लोग चैन से जी रहे थे. बाहरी दुनिया से उनका कोई मतलब नहीं था. फिर एक दिन डाकुओं का एक दल गांव में घुसा. डाकुओं को वो जगह अच्छी लगी. उन्होंने वहीं पर बसने का फ़ैसला किया. उन्होंने गांव पर क़ब्ज़ा कर लिया. कुछ दिनों तक तो गांव वाले सब सहते रहे. लेकिन एक दिन उनका मन भर गया. उन्होंने विरोध करना शुरू किया. तब डाकुओं ने सोचा कि अब यहां टिके रहना ठीक नहीं. उन्होंने गांव को छोड़कर जाने का फ़ैसला किया.

ये तो हुई ट्रेडिशनल कहानी. मतलब हैप्पी एंडिंग वाली. अगर इसमें एक लोचा लगा दिया जाए तो…

डाकुओं ने भी यही सोचा. उन्होंने जाने से पहले गांव का सबसे बढ़िया वाला खेत किसी दूसरे बाहुबली को बेच दिया. गांव वालों को डाकुओं से आज़ादी तो मिल गई. लेकिन आधी-अधूरी हालत में. उनके एक टुकड़े को काटकर अलग कर दिया गया था. जो लोग वहां बसे थे, उनको निकाल दिया गया. अब जब भी गांव वाले डाकुओं से अपना खेत मांगने जाते, वो कहता, हमने गांव को आज़ाद कर दिया, वो क्या कम है. जो खेत हमने बेचा, वो उस समय की बात है, जब पूरा गांव हमारे क़ब्ज़े में था. तुमको जो करना हो कर लो. ये वाली बहस आज तक चल रही है.

इस अंतहीन कहानी को अगर हुबहू धरातल पर उतार दिया जाए तो क्या होगा? ये बनेगा ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच का दशकों से चल रहा विवाद.

इस विवाद की पूरी कहानी क्या है? इस कहानी का अफ़ग़ानिस्तान कनेक्शन क्या है? और, आज के दिन हम इसकी चर्चा क्यों कर रहे हैं? सब विस्तार से बताएंगे.

मॉरीशस का इतिहास

मॉरीशस हिन्द महासागर में बसा है. ये अफ़्रीकी महाद्वीप का हिस्सा है.

ऐज ऑफ़ डिस्कवरी के दौरान यूरोप के ताक़तवर देश नई ज़मीनें तलाश रहे थे. 1510 ईस्वी में पुर्तगाली नाविक पेद्रो मैस्केनहास ने यहां कदम रखा था. लेकिन उसे ये जगह दिलचस्प नहीं लगी. इसलिए, पुर्तगाल ने वहां कॉलोनी नहीं बसाई. उनके जाने के बाद डच आए. साल 1598 में. उन्होंने अपने राजकुमार मॉरिस के नाम पर इस जगह का नाम रखा, मॉरीशस. डचों ने मॉरीशस को अपना उपनिवेश बना लिया. क़ब्ज़े के लिए मार-काट से परेशान डच 1710 में वापस लौट गए.

उनके बाद आया फ़्रांस. फ़्रांस ने लगभग 100 बरस तक मॉरीशस में रहा. 18वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेज़ों की आमद हुई. ज़मीन एक थी, दावेदार दो. फिर लड़ाई हुई. इस लड़ाई में फ़्रांस हार गया. 1814 में पेरिस की संधि के तहत मॉरीशस, ब्रिटेन के हाथ में पहुंच गया.

ब्रिटेन का शासन साल 1968 तक चला. इस साल उसने मॉरीशस को आज़ादी दे दी. लेकिन जाने से पहले उसने एक लोचा लगा दिया. मॉरीशस को आज़ाद करने से ठीक दो साल पहले उसने चागोस आईलैंड्स को खरीद लिया. लगभग 20 करोड़ रुपये की कीमत में. उसके बाद ब्रिटेन ने चागोस को ‘ब्रिटिश इंडियन एशियन टेरिटरी’ घोषित कर दिया. मॉरीशस का आरोप है कि ब्रिटेन ने आज़ादी के बदले ज़बरदस्ती चागोस का सौदा करने के लिए मजबूर किया. 1966 में ब्रिटेन ने चागोस को अमेरिका के हवाले कर दिया. 50 साल की लीज पर. अमेरिका ने इसके बदले ब्रिटेन को न्युक्लियर सबमरीन सिस्टम की खरीद में डिस्काउंट दिया था. ये डील लंबे समय तक दुनिया से छिपी रही.

ब्रिटेन-मॉरीशस का समझौता

जब मॉरीशस आज़ाद हो गया, उसने ब्रिटेन के साथ एक समझौता करने की कोशिश की. उसने कहा कि वो चागोस में किसी तरह का दखल नहीं देगा. बशर्ते अमेरिका में चीनी के निर्यात का उसका क़ोटा बढ़ा दिया जाए. ब्रिटेन ने इससे मना कर दिया. उसने कहा कि अमेरिका, मॉरीशस के साथ संधि में हिस्सेदार नहीं बन सकता.

अमेरिका और ब्रिटेन का चागोस में मिलिटरी बेस बनाने का प्लान था. उस समय चागोस में लगभग दो हज़ार लोग रहते थे. उनकी पीढ़ियां लंबे समय से वहां रहती आई थी. एक झटके में उन्हें उनके पुश्तैनी घरों से बेदखल करने की साज़िश रची गई.

जो लोग खरीदारी करने या रिश्तेदारों से मिलने चागोस से बाहर गए थे. उन्हें कभी वापस नहीं लौटने दिया गया. जो बच गए थे, उन्हें जहाजों में भरकर सेशेल्स और मॉरीशस के मेन द्वीप पर भेज दिया गया. पुनर्निवास के नाम पर उन्हें जो जगह दी गईं थी, वहां बिजली और पानी की व्यवस्था तक नहीं थी. चागोस के लोग मछली-पालन के सहारे अपना गुजारा करते थे. लेकिन नई जगह पर उनके लिए किसी तरह के रोजगार की व्यवस्था नहीं थी. कई लोग तो ग़रीबी और भूखमरी के चलते मर गए. महज सात बरस में अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर चागोस को पूरी तरह खाली करा लिया था. पीड़ित लोगों को आज तक ढंग से मुआवजा नहीं मिल पाया है.

चागोस द्वीपसमूह का एक द्वीप है, डिएगो गार्सिया. वहीं पर अमेरिका ने अपना मिलिटरी बेस बनाया. वहां अभी लगभग दो हज़ार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. इसके अलावा एयरस्ट्रीप, वॉरशिप, न्युक्लियर सबमरीन और सेटेलाइट स्पाई स्टेशन भी यहां बना है. इसी बेस से अमेरिका ने गल्फ़ वॉर, अफ़ग़ानिस्तान वॉर और ऑपरेशन इराक़ी फ़्रीडम के दौरान एयरस्ट्राइक लॉन्च किए थे. 9/11 के हमले के बाद इस जगह पर सीआईए का भी बसेरा बना. गिरफ़्तार किए गए संदिग्धों को यहां लाकर सीआईए पूछताछ और टॉर्चर करती थी.

ब्रिटेन लंबे समय तक ये दावा करता रहा कि जिन लोगों को चागोस से हटाया गया था, वे वहां मजदूरी करने आए थे. उसने ‘मूल निवासी’ का टैग मिटाने की साज़िश रची. लेकिन ये साज़िश उसके काम नहीं आई.

चागोस के लोगों पर फैसला

साल 2000 में लंदन हाईकोर्ट ने कहा कि चागोस के लोगों का हटाने का फ़ैसला गैर-कानूनी था. उस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे टोनी ब्लेयर. उन्होंन विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर कोर्ट के डिसिजन को गौण कर दिया. आठ साल बाद फिर से हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि चागोस से हटाए गए लोग वापस अपने घर लौट सकते हैं. ब्रिटिश सरकार इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट चली गई. सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी अपील मान ली और हाईकोर्ट का फ़ैसला पलट दिया. उस समय कोर्ट में मौजूद लोगों ने बताया कि ये फ़ैसला सुनाते समय न्यायाधीशों का चेहरा शर्म से झुक गया था. जाहिर सी बात है, कोर्ट ने ये फ़ैसला सरकार के दबाव में सुनाया था. 2016 में ब्रिटेन ने यूएस की लीज को 20 बरस के लिए बढ़ा दिया.

इस बीच में मॉरीशस सरकार ने क्या किया? उसने चागोस पर अपना दावा कब ठोंका?

दशकों तक मॉरीशस सरकार चुप बैठी रही. 2015 में उसने ब्रिटेन के दावे को चुनौती देने का मन बनाया. मॉरीशस परमानेंट कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन पहुंचा. कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि ब्रिटेन, मॉरीशस को उसका हक़ देने में नाकाम रहा है. इसके अलावा, ब्रिटेन ने जान-बूझकर चागोस के इर्द-गिर्द के इलाके को ‘मरीन प्रोटेक्टेड एरिया’ घोषित किया. ताकि चागोस के मूल निवासियों को वापस लौटने से रोका जा सके. कोर्ट ने ये भी कहा कि ब्रिटेन और अमेरिका के निजी हितों को मॉरिशस के अधिकारों के ऊपर तरजीह दी गई.

ICJ पहुंचा मामला

फ़रवरी 2019 में मामला इंटरनैशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस (ICJ) में पहुंचा. ICJ ने अपने फ़ैसले में कहा कि ब्रिटेन को जल्द-से-जल्द चागोस को मॉरीशस के हवाले कर देना चाहिए. ICJ ने इसके लिए छह महीने का समय दिया.

फ़ैसले के बाद ब्रिटेन ने कहा कि ICJ का फ़ैसला बस एक सलाह है. इसे मानने की कोई बाध्यता नहीं है. ब्रिटेन ने जोर देकर कहा कि चागोस का मिलिटरी बेस ब्रिटेन और पूरी दुनिया के लोगों को आतंकवाद और दूसरी समस्याओं से बचाने के लिए ज़रूरी है. और, जब तक इसकी ज़रूरत बनी रहेगी, वो चागोस को मॉरीशस के हवाले नहीं करेगा. डेडलाइन गुज़र गई, ब्रिटेन का दावा बरकरार रहा.

जिस तरह से नाटो सेनाओं को हारकर अफ़ग़ानिस्तान से बाहर जाना पड़ा है, उस हालत में चागोस उनके लिए बेहद अहम हो जाता है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ये कहते रहे हैं कि अगर अमेरिका पर आतंकी हमला हुआ तो वो अफ़ग़ानिस्तान में फिर से एयरस्ट्राइक करेगा.

इसके अलावा, हिन्द महासागर में चीन की घेराबंदी भी बढ़ रही है. 2017 में उसने जिबूती में विदेशी धरती पर पहला मिलिटरी बेस चालू किया था. इसके अलावा, श्रीलंका और मालदीव में भी चीन की पैठ मजबूत हो रही है. चीन इस समय अमेरिका के सबसे बड़े प्रतिद्वंदियों में से एक है. चीन को टक्कर देने के लिए भी चागोस बेस का उसके पास बचे रहना ज़रूरी है.

आज चागोस आईलैंड्स की चर्चा क्यों?

चागोस आईलैंड्स पर मॉरीशस का दावा और मज़बूत हुआ है. यूनाइटेड नेशंस की एक एजेंसी है, यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (UPU). UPU के सदस्य देशों की संख्या 192 है. ये एजेंसी अपने सदस्य देशों की पोस्टल पॉलिसीज़ को निर्धारित करती है. यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन ने कहा है कि चागोस के पोस्ट पर सिर्फ़ मॉरीशस के स्टाम्प ही लगेंगे. इससे पहले वहां पर ब्रिटेन का पोस्ट स्टाम्प लगता था.

UPU के फ़ैसले से ये एक बार फिर स्पष्ट हुआ है कि चागोस आईलैंड्स पर ब्रिटेन का क़ब्ज़ा अवैध है. ब्रिटेन ये कहता रहा है कि चागोस उसके 1814 से उसकी कॉलोनी रहा है और वो कभी भी मॉरीशस के क़ब्ज़े में नहीं गया. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस दावे को ग़लत बताती रही है.

UPU तीसरी बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जिसने इस चागोस पर ब्रिटेन के क़ब्ज़े को अवैध बताया है. हालांकि, ब्रिटेन ये कहता रहा है कि जब तक इस इलाके में सुरक्षा की ज़रूरत महसूस होती रहेगी, वो इसे मॉरीशस को नहीं सौंपेगा.

ब्रिटेन चागोस पर अपने दावे को लेकर अलग-थलग होता जा रहा है. लेकिन, फिलहाल वो इस तरफ शायद ही ध्यान देगा. उसने मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की किताब को किसी तहखाने में बंद कर दिया है.

इतना तो तय है कि यहां के मूल निवासियों के न्याय का इंतज़ार और लंबा होने वाला है.


जब बंटवारे के बाद के हालात को देखकर रेडक्लिफ़ तुरंत वापस ब्रिटेन लौट गए

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