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एयरसेल-मैक्सिस डील में चिदंबरम ने क्या खेल किया जिससे अब उनका नाम चार्जशीट में आया है

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एयरसेल-मैक्सिस डील में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, कार्ति और 16 लोगों पर सीबीआई ने चार्जशीट दायर की है. इनमें 10 अधिकारी हैं और 6 लोग कार्ति की कंपनी के कर्मचारी हैं. चिदंबरम पर पद के दुरुपयोग के आरोप हैं. आरोप साबित होने पर पी चिदंबरम को 7 साल तक की जेल की सजा हो सकती है. पी चिदंबरम कांग्रेस के ताकतवर नेताओं में से एक हैं. बीजेपी कांग्रेस को जमानती नेताओं की पार्टी कहकर तंज करती है. ऐसे में एक बड़े नेता का नाम चार्जशीट में आना कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला है. लेकिन यह केस आज का नहीं हैय 2006 में हुई एक डील का है जिसकी कहानी 1999 से शुरू होती है.

धोनी एयरसेल के ब्रांड एंबेस्डर थे लेकिन अब ब्रांड ही डूब गया.
कभी धोनी एयरसेल के ब्रांड एंबेस्डर थे लेकिन अब ब्रांड ही डूब गया.

1999 में भारत में मोबाइल की शुरुआत हो चुकी थी. तमिलनाडु में चिन्नाकनन शिवशंकरन ने एयरसेल कंपनी बनाई. एयरसेल ने तमिलनाडु सर्किल में मोबाइल की सर्विस देनी शुरू की. जल्दी ही एयरसेल तमिलनाडु की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी बन गई.  2004-05 मलेशिया की एक कंपनी मैक्सिस कम्युनिकेशन ने 2005 में एयरसेल के 74 फीसदी शेयर खरीद लिए. इसके बाद मैक्सिस ने एयरसेल में करीब 45, 000 करोड़ रुपये इनवेस्ट किए, जिसके बाद ये कंपनी पूरे देश में फैल गई. बचे हुए 26 फीसदी शेयर शिवशंकरन ने 2012 में सिन्द्या सिक्युरिटीज एंड इन्वेस्टमेंट कंपनी को बेच दिए. अब ये एयरसेल कंपनी बंद हो चुकी है. दिवालिया घोषित होने के कारण. जियो लॉन्च होने के बाद छोटी कंपनियों को जो नुकसान हुआ उसमें एयरसेल नप गई.

चिदंबरम कहां फंस रहे हैं वो समझने के लिए पहले ये जानिए

भारतीय कंपनियों में बाहरी कंपनियों/व्यक्तियों का निवेश होता है वो FDI (Foreign Direct Investment) कहलाता है. एयरसेल एक भारतीय कंपनी है मैक्सिस विदेशी. ऐसे में मैक्सिस ने जो भी इन्वेस्टमेंट किया वो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानि FDI है. FDI के थ्रू पैसा भारत की किसी कंपनी में इन्वेस्ट के दो रास्ते हैं.

एक सेक्टर जहां इन्वेस्ट करने के लिए किसी भी अप्रूवल की जरूरत नहीं है. इस तरह के इन्वेस्टमेंट को ‘ऑटोमेटिक रूट इन्वेस्टमेंट’ कहते हैं. दूसरा सेक्टर भारत सरकार के अप्रूवल की जरूरत होती है इसे ‘अप्रूवल रूट’ या गवर्नमेंट रूट भी कहते हैं.

चार्जशीट के मुताबिक एयरसेल-मैक्सिस की डील में चिदंबरम को फायदा मिला.
चार्जशीट के मुताबिक एयरसेल-मैक्सिस की डील में चिदंबरम को फायदा मिला.

24 मई 2017 तक, 5000 करोड़ तक के ‘गवर्नमेंट रूट’ से आयए विदेशी इन्वेस्टमेंट को FIPB (Foreign Investment Promotion Board – विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड) द्वारा ही अप्रूव किया जाता था. हां अगर इससे ज़्यादा का इन्वेस्टमेंट आए तो फिर अप्रूवल CCEA – कैबिनेट कमिटी ऑफ़ इकॉनोमिक अफेयर्स से लेना पड़ता था. चूंकि 5000 करोड़ से अधिक के निवेश होते ही नहीं थे तो हर ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI)’ को FIPB ही अप्रूव करता था. लेकिन ऐसा 24 मई 2017 तक था. क्यूंकि उसके बाद वित्त मंत्रालय की ये इकाई बंद कर दी गई. अब सरकार के अलग-अलग विभागों को DIPP (Department of Industrial Policy & Promotion-औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग) से परामर्श करके FDI प्रस्तावों को क्लियर करने का अधिकार दिया गया है.

चिदंबरम ने कहां खेल खेला?

चिदंबरम 2004 से 2008 तक मनमोहन सरकार में वित्त मंत्री थे. इसी बीच मार्च 2006 में मैक्सिस ने 3,200 करोड़ रुपए के इन्वेस्टमेंट की परमिशन मांगी. FIPB ने इसके लिए क्लीयरेंस दे दिया जबकि वित्त मंत्रालय को 600 करोड़ तक के इन्वेस्टमेंट को ही क्लीयरेंस देने की अनुमति थी. इससे ज्यादा के FIPB क्लीयरेंस को कैबिनेट कमिटी ऑफ़ इकॉनोमिक अफेयर्स (वित्तीय मामलों की संसदीय समिति) को भेजा जाना चाहिए था. चार्जशीट के मुताबिक चिदंबरम ने एक खेल किया और आंकड़े को ही 3,200 करोड़ की जगह 180 करोड़ का दिखा दिया.

पी चिदंबरम तब वित्त मंत्री हुआ करते थे.
पी चिदंबरम तब वित्त मंत्री हुआ करते थे.

चार्जशीट में लिखा है कि इसके लिए मैक्सिस ने रिकॉर्ड्स में 10 रुपए पर शेयर के हिसाब से एयरसेल के18 करोड़ शेयर मतलब 180 करोड़ की डील शो की. 10 रुपए एक शेयर की ‘फेस वैल्यू’ थी. फेस वैल्यू मतलब शेयर जब पहली बार जारी होता है तो उसकी इनीशियल या शुरुआती वैल्यू जो होती है वो. इस शुरुआती वैल्यू के बाद शेयर बजार के हिसाब से प्रीमियम जुड़कर टोटल वैल्यू बनती है. प्रीमियम मतलब फेस वैल्यू के बाद बढ़ी कीमत. इस हिसाब से एयरसेल के शेयर्स की टोटल वैल्यू 3,200 करोड़ थी.

अगर 3,200 करोड़ की वैल्यू दिखाई जाती तो ये फाइल CCEA के पास अप्रूवल के लिए जाती. क्योंकि इसकी असल वैल्यू तो 3,200 करोड़ लेकिन चिदंबरम ने इस इन्वेस्टमेंट वैल्यू 180 करोड़ बताते हुए इस डील को अपने स्तर पर ही क्लीयरेंस दे दिया. इसके बाद एक और खेल हुआ जो अब चिदंबरम के जी का जंजााल बन गया है. यह क्लीयरेंस 13 मार्च, 2006 को दिया गया. लेकिन असली खेल हुआ 16 दिन बाद मार्च की 29 तारीख को. चिदंबरम के बेटे कार्ति की एक कंसल्टेंसी फर्म थी जो ‘सलाह’ देने का काम करती थी. उसके खाते में 26 लाख रुपए एयरसेल की तरफ से आए. इसका बिल बनाया गया ‘मार्केट सर्वे’ के नाम पर.

कार्ति चिदंबरम
कार्ति चिदंबरम के ऊपर पिता के नाम पर पैसे लेने का आरोप है.

कार्ति की एक और कंपनी थी ‘चेस मैनेजमेंट सर्विसेज’, इसके खाते में 87 लाख रुपए मैक्सिस कंपनी की तरफ से आए. इसका कारण बताया गया चेस कंपनी ने मैक्सिस को ‘सॉफ्टवेयर सर्विस’ प्रोवाइड की. कुल 1.13 करोड़ के ये दो ट्रांजेक्शन ही चिदंबरम के गले की फांस बन गए. चिदंबरम पर अब आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया और नियमों के विरुद्ध जाकर एयरसेल-मैक्सिस डील को क्लीयरेंस दिया. इसके ऐवज में उनके बेटे कार्ति को इन कंपनियों ने पैसा दिया. ऐसे ही आरोप चिदंबरम और उनके बेटे पर INX मीडिया डील में भी लगे हैं. कार्ति को इस मामले में गिरफ्तार भी किया गया था. कार्ति फिलहाल जमानत पर रिहा हैं. चिदंबरम को कोर्ट ने 7 अगस्त तक की अग्रिम जमानत दे दी है.

एयरसेल-मैक्सिस डील के एक मामले में पूर्व टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन और उनके भाई कलानिधि मारन पर भी मुकदमा चला था. आरोप लगा था कि मारन ने एयरसेल के मालिक पर शेयर्स बेचने के लिए दबाव बनाया था. बाद में कोर्ट ने उन्हें निर्दोष करार दे दिया था.


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