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कस्बाई लौंडों का दोस्त 'सारुक': जिसने शिल्पा को ही नहीं, घिसे-पिटे फ़ॉर्मूलों को भी नीचे फेंक दिया था

‘पद्मश्री मि. शाहरुख़ ख़ान’ – जाने-माने बिज़नेसमैन, इन्वेस्टर, पॉवरफुल फ़िल्म प्रोड्यूसर. आज वो 56 साल के हो गए. अनुमान के मुताबिक़ लगभग 5500 करोड़ रुपए की परिसंपत्तियों के साथ पूरी हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में सिर्फ़ यशराज फिल्म्स के मालिक आदित्य चोपड़ा, जिनकी कुल परिसंपत्तियाँ व्यापार सूत्र लगभग 6500 करोड़ रुपए बताते हैं, के बाद दूसरे स्थान पर सबसे अधिक धनी व्यक्ति ‘पद्मश्री मि. शाहरुख़ ख़ान’ ही हैं. दुनिया कहती है कि अब वे बूढ़े होने लगे हैं. उनके चेहरे पर सालों तक दिन-रात पागलों की तरह काम करने के नशे से उपजी थकान, सिगरेट और सोडे की हद से ज़्यादा लत और ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ (2013) के बाद से लगातार मिलती नाकामयाबी से खिंचती झुर्रियाँ गहरी होती जा रही हैं.

लेकिन क्या अजीब बात है, ‘पद्मश्री मि. शाहरुख़ ख़ान’ के लिए इतनी बुरी तरह से चिंतित इतनी बड़ी दुनिया में किसी को कभी उस ‘सारुक’ की याद तक नहीं आती – जिसे अपने लड़कपन ही से अपना जिगरी यार मानते आ रहे उसके क़स्बाई मोहल्लों वाले असंख्य दोस्त कभी नहीं भूल पाते. आज तक याद करते हैं और आज के दिन तो बहुत ही याद करते हैं. लेकिन वो ‘सारुक’ आख़िर था कौन, जानते हैं आप? अभी बताता हूँ.

शाहरुख़ खान अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ.
शाहरुख़ खान अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ.

‘सारुक’ वो था, जिसने 90 के दशक में अबोध बालक से जवान हुए उत्तर भारत के तमाम क़स्बाई लौंडों को पहली बार यह बताया था कि सिनेमा के पर्दे पर सिर्फ़ अमिताभ बच्चन साहब जैसे सुपरस्टार महानायकों या फिर लड़कियों की ज़बरदस्त दीवानगी के तौर पर नए-नए उभरे आमिर ख़ान और सलमान ख़ान जैसे साउथ मुंबई में पले-बढ़े चॉकलेटी, सॉफिस्टिकेटेड मेट्रोपोलिटन स्टार्स, या गुंडों की हड्डियों का सुरमा बनाने में एक्सपर्ट अक्षय कुमार जैसे मार्शल आर्ट वाले सूरमाओं के लिए ही जगह नहीं थी.

क़स्बों के औसत और इकहरे जिस्म वाले मध्यमवर्गीय लड़कों सा ही दिखता और उन्हीं की तरह का मध्यम फैशन सेंस रखने वाला ‘सारुक’ शहरी टीनएजर्स द्वारा छोड़ दिए गए फैशन ट्रेंड्स को अपनाने को मजबूर क़स्बाई किशोरों की ही तरह आमिर समेत कई स्थापित नायकों द्वारा ठुकराई हुई ‘बाज़ीगर’ और ‘डर’ को उस वक़्त में चुपचाप अपना रहा था.

‘सारुक’ लेकिन वो भी था, जिसने ‘बाज़ीगर’ में जैसे अपनी अमीरज़ादी प्रेमिका शिल्पा शेट्टी को बीसवीं मंज़िल से नीचे फेंका, वैसे ही कई फ़ॉर्मूलों और मान्यताओं को भी वहाँ से नीचे फेंक दिया. तेज़ पॉवर का चश्मा पहनने वाले, कमज़ोर नज़रों वाले सीधे-सादे भोले-भाले, मायोपिया से ग्रस्त लड़के बदला लेने की ज़रूरत पड़ने पर आँखों में पॉवर कॉन्टेक्ट लेंस लगा कर दुष्टों के खूँखार हत्यारे भी बन सकते हैं, यह ‘बाज़ीगर’ का एक बहुत बड़ा ‘टेक अवे’ था, उस वक़्त शुरुआती टीनएज से गुज़र रहे क़स्बाई लड़कों के लिए. और यहीं से ‘सारुक’ उनके लिए कोई ‘हीरो’ या ‘स्टार’ नहीं रहा, उनमें से ही एक, जैसे उसी क़स्बे के दूसरे मोहल्ले में रहने वाला, उन जैसा एक जिगरी यार ही बन गया.

'बाज़ीगर' में शाहरुख़ खान और काजोल.
‘बाज़ीगर’ में शाहरुख़ खान और काजोल.

वक़्त आगे बढ़ा और फिर मणि रत्नम जैसे मँजे हुए सिनेमाई जादूगर ने ‘सारुक’ की उँगली पकड़ी और उस क़स्बाई लड़के को सीधे ‘दिल से’ के नितांत रहस्यमयी लेकिन सम्मोहक संसार में उतार दिया. ऊपरी तौर पर ग्रेनाइट पत्थर की सख़्त सड़क जैसे निर्मम राजनैतिक कथोपकथन के बहुत नीचे कहीं अँधेरों में एक अतिउत्साही सरकारी पत्रकार और अपने ही देश के ख़िलाफ़ बम धमाका बन जाने को तैयार एक ख़ूबसूरत लड़की के बीच फूटती अथाह और जानलेवा प्रेम की कोंपलों से लिपट कर रचा-बसा था वह संसार.

गुलज़ार की मख़मली क़लम, ए. आर.रहमान के खरगोश की आँखों जैसे निश्छल और ईमानदार संगीत, तथा संतोष सिवान की हवा में तैरती बारिश की बूँदों में तीव्र प्रेम, मर्मान्तक विरह व राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की निष्ठुरता के समवेत रंग घोलती सिनेमटॉग्रफ़ी ने इस संसार के नक्शों पर रहस्य के मोहक मंत्र पढ़े थे.

'वो पत्ते दिल, दिल, दिल थे'.
‘वो पत्ते दिल, दिल, दिल थे’.

जैसा कि होना था, इस रहस्यलोक में ‘सारुक’ जितना चकित और इसके मोह से जितना अधिक विस्मित था, ठीक वही हाल उसके क़स्बाई टीनएजर यारों का भी हुआ.

कितने लोग जानते हैं कि नए मिलेनियम में क़दम रखते हुए अपना ग्रेजुएशन ख़त्म करने के ठीक बाद सीधे पत्रकारिता (जो उस वक़्त इतनी ग्लैमरस भी नहीं थी जितनी आज है) के कोर्स में दाख़िला लेने वाले छोटे शहरों के लड़कों में कुछ ‘सारुक’ के वही यार थे, जो उत्तरपूर्व की मेघना के साथ भीषण बम धमाके में ग़ायब हो गए अपने दोस्त के निशान ढूँढने, या फिर उसी के दिखाए कदमों पर चलने के लिए ही मीडियाकर्म में उतरने गए थे?

‘सारुक’ का यह सफ़र चलता रहा, और अपने क़स्बाई यारों के साथ बड़ा होता हुआ आख़िरकार वह ‘कल हो ना हो’ तक जा पहुँचा. बहुत से सिने-विद्वानों और समीक्षकों ने इसे ‘आनंद’ और ‘देवदास’ का मिला-जुला आधुनिक रीमेक बताया. लेकिन हमेशा की ही तरह ‘सारुक’ के हर क़दम में दिल से उसके साथ चल रहे उसके मोहल्ले वाले यारों ने यहाँ भी वही लिया जो उन्हें सच और पवित्र लगा – दिल से. ‘कल हो ना हो’ के ‘अमन’ के रूप में इस बार ‘सारुक’ ने त्रिकोण प्रेम की ऐसी कथा रची, जो अपनी जेनेसिस से ही दुखान्त होने के लिए अभिशप्त थी. लेकिन जिसे हर वक़्त मुस्कुराहट के छलावे से ढँकते हुए ‘सारुक’ ने अपने क़स्बे के उन्हीं लौंडों को – जो ‘बाज़ीगर’ से उसके साथ चलते-चलते उसकी दोस्ती में उसके साथ ही परिपक्व होते जा रहे थे – बताया कि हर प्रेम कथा की परिणति में दीर्घकालीन सुख ढूँढ लेना ही प्यार में पड़ जाना नहीं है यारों. जितने पल तुम्हें प्रेम में जीने को मिलते हैं, उनमें से हर एक पल को एक जीवन की तरह जी लेना है प्यार में पड़ जाने का असली अर्थ.

'फ़िर भ इडिल है हिंदुस्तानी' में शाहरुख़ खान और जूही चावला.
‘फ़िर  भी दिल है हिंदुस्तानी” में शाहरुख़ खान और जूही चावला.

और इसके फ़ौरन बाद ‘सारुक’ ने अपनी बचपन की माशूका और अब बीवी गौरी के नेतृत्व में ‘रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट’ की नींव रखी. इससे पहले दूरदर्शन के टी.वी. सीरियल ‘सर्कस’ के वक़्त से अपने दोस्त रहे अज़ीज़ मिर्ज़ा और उन्हीं के निर्देशन में की गई अपनी शुरुआती फ़िल्म ‘राजू बन गया जेंटलमैन’ से दोस्त रहीं जूही चावला के साथ मिल कर ‘सारुक’ ने ‘ड्रीम्ज़ अनलिमिटेड’ के नाम से भी प्रोडक्शन हाउस शुरू किया था, लेकिन काफ़ी हद तक वह एक असफल प्रयास ही रहा.

लेकिन ‘रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट’ की क़िस्मत अच्छी रही, और अब बड़े फैसलों से जुड़ी महत्वपूर्ण चीज़ें व्यापार की कहीं बेहतर समझ रखने वाली उसकी पॉलिश्ड, सॉफिस्टिकेटेड बीवी गौरी के सीधे नियंत्रण में थीं.

बस, वक़्त का यही वह लम्हा था जब ‘सारुक’ में से ‘सारुक’ धीरे-धीरे कहीं हवा में ग़ायब होता चला गया, और उसकी जगह बड़ा व्यापारी, रियल एस्टेट इन्वेस्टर, फ़िल्म प्रोड्यूसर और इन सबसे बढ़ कर एक शक्तिशाली अंतर्राष्ट्रीय ब्रैंड ‘पद्मश्री मि. शाहरुख़ ख़ान’ बड़ा होता चला गया. यह ‘पद्मश्री मि. शाहरुख़ ख़ान’ बहुत बड़े बजट से ‘रा.वन’, ‘दिलवाले’, ‘फ़ैन’, ‘जब हैरी मैट सेजल’ और ‘ज़ीरो’ जैसी फ़िल्में बनाते हैं जो 2500-3000 स्क्रीन्स पर रिलीज़ होती हैं और मल्टीप्लेक्स के महँगे टिकट, सैटेलाइट राइट्स, म्यूज़िक राइट्स, वैब स्ट्रीमिंग राइट्स वगैरह की ताक़त से ‘रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट’ को हर बार तगड़ा या कम से कम ठीक-ठाक नफ़ा भी दे ही जाती हैं.

लेकिन ‘सारुक’ के साथ बच्चों से जवान हुए उसके उन क़स्बाई दोस्तों को अपना वह देसी, मध्यमवर्गीय, औसत दर्जे वाला यार अब कहीं देखने को ही नहीं मिलता. उम्मीद से चमकती हुई आँखों से वह हर फ़िल्म की ‘फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो’ टिकट ख़रीद कर जाते हैं और आख़िरकार सूनी आँखें लेकर ही घर लौटते हैं. उनके यार की शक्ल उन्हें कहीं नहीं दिखती, जो उन्हीं की तरह हँसता-हँसाता था. रोता और रुलाता भी था, कुछ सीखता था, कुछ सिखाता भी था. जो ‘कल हो ना हो’ तक तो उनके साथ था और आख़िरी बार जिसने अपनी एक हल्की सी झलक उन्हें ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में दिखाई थी.

अपने घर के बाहर शाहरुख़ खान.
अपने घर के बाहर शाहरुख़ खान.

आज भी उसके क़स्बाई दोस्त अपने लड़कपन के ‘सारुक’ को “हैप्पी बड्डे ‘सारुक’, लगा रह दुनिया हिलाने में यार!” कह कर अपनी दुआ हवा में छोड़ देते हैं. कहते हैं कि अतीत में हुई हर घटना, अतीत में निवासरत हर व्यक्ति के जागृत अंश व्योम में मौजूद हैं और सृष्टि के अंत तक रहेंगे. क्या पता, अपने उन यारों की यह दुआएँ भी पहुँचती हों कहीं ‘सारुक’ तक, और एक तेज़ हुमक उसके मन में भी उठती हो फिर से ‘बाज़ीगर’ का वही अजय शर्मा/विकी मल्होत्रा बन जाने के लिए. जो छोटे से क़स्बे में अपनी सदमे से अर्धविक्षिप्त हुई माँ को छोड़ कर मुंबई सिर्फ़ इसीलिए आया था कि सड़क पर पड़ा सिक्का उछाल कर अपने मोटे फ्रेम और लेंस वाले नज़र के चश्मे की जगह पॉवर कॉन्टेक्ट लेंस पहनने का फ़ैसला करे. और मदन चोपड़ा की ख़ूबसूरत लड़की की गहरी काली आँखों में अपनी काली-भूरी आँखें डाल कर कहे – “हार कर जीतने वाले को ही बाज़ीगर कहते हैं और बड़े-बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं, सिनोरिटा!!❤️❤️❤️”


ये आर्टिकल ‘दी लल्लनटॉप’ के एक मित्र ने लिखा है. लेखक प्राइवेसी पसंद है और अपना नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहता. आप राहुल, सुनील, राज, अमन, वीर, कबीर, मैक्स, रिज़वान में से कोई भी एक चुन लें.


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