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चीन और जापान जिस द्वीप के लिए भिड़ रहे हैं, उसकी पूरी कहानी

ये बात है दूसरे विश्व युद्ध के दौर की. चीन के हरबिन शहर का एक छोटा सा ज़िला था- पिंगफान. 1938 वाले साल इस शहर में बड़ी अजीबोगरीब चीज हुई. बाहर से कुछ लोग यहां आए और उन्होंने शहर में एक बड़ा सा कंपाउंड बनाया. करीब 150 इमारतें. रेलवे की पटरियां. एयरफील्ड. पावर हाउस. लाश जलाने की भट्ठी. जानवरों के लिए बाड़ा. कंपाउंड क्या, समझिए कि शहर के भीतर एक और शहर बसाया गया था. इस विशाल कंपाउंड के बाहर बोर्ड लगा था- क्वॉनतंग आर्मी की पानी आपूर्ति और महामारी बचाव यूनिट.

पानी आपूर्ति की यूनिट में इतनी सुरक्षा?
क्वॉनतंग आर्मी, यानी साम्राज्यवादी जापान की सेना का सबसे विशाल धड़ा. उन दिनों चीन के मंचूरिया इलाके पर जापान का कब्ज़ा था. ऐसे में जापानी सेना की चीन के शहर में मौजूदगी कोई सप्राइज़ नहीं थी. हैरानी की वजह कुछ और थी. क्या थी? ये कि साफ़ पानी की आपूर्ति करने के लिए बनाए गए कंपाउंड के चारों तरफ किलेनुमा दीवार क्यों बनाई गई? दीवार भी ऐसी-वैसी नहीं. चारों तरफ़ खाई खुदी हुई. जिनके किनारे हाई-वोल्टेज़ वाले बिजली के तार लगे थे. ऐसा क्या हो रहा था उस कंपाउंड में कि जिसकी सुरक्षा के लिए इतना इंतज़ाम किया गया था?

क्या होता था यहां?
इस क्यों का जवाब छुपा था कंपाउंड के भीतर बनी दो इमारतों में. ब्लॉक सात और ब्लॉक आठ. ये दोनों ब्लॉक्स बहुत सीक्रेटली बनाए गए थे. सीक्रेटली इसलिए ताकि इन दोनों इमारतों के भीतर जो होता है, वो बाहर न आने पाए. क्या होता था इन इमारतों में? ये इमारतें जापान की कुख़्यात ‘यूनिट 731’ की प्रयोगशालाएं थीं. यहां वो जैविक हथियार बनाते और फिर इंसानों पर उनका परीक्षण करते.

महामारी बनाने की प्रयोगशाला
यूनिट 731 ऐंथ्रैक्स, हैजा और प्लेग जैसे जीवाणुओं का बड़े स्तर पर उत्पादन करती. फिर उनके असर का अंदाज़ा लगाने के लिए अपनी कैद में बंद लोगों को उन जीवाणुओं से संक्रमित करती. ऐसे ही इंसानी प्रयोगों के सहारे जापान की यूनिट 731 ने तैयार किए क्ले बॉम्ब. जिनके अंदर भरा होता था ऑक्सीजन और प्लेग ग्रसित पिस्सू. हर एक बम में करीब 30 हज़ार प्लेग ग्रसित पिस्सू. कम ऊंचाई पर उड़ने वाले जापानी हवाई जहाज़ इन बमों को चीन के गांवों पर फेंक आते. वहां इन बमों में बंद संक्रमित पिस्सू न केवल महामारी फैलाते. बल्कि पानी और ज़मीन भी संक्रमित करते.

Unit 731
म्यूजियम में यूनिट 731 में इंसानों के किए जा प्रयोग का एक दृश्य (फोटो: एएफपी)

कैसे-कैसे अत्याचार?
चीनियों को मारने के ऐसे और कई तरीके थे यूनिट 731 के पास. मसलन, पिंगफान स्थित उनका वो कंपाउंड. जहां करीब तीस लाख चूहे पाले गए थे. उन चूहों को प्लेग ग्रस्त करके चीन के गांवों में छोड़ दिया जाता. लोगों को प्रेशर चैंबर में कैद किया जाता. उनपर प्रयोग होता कि कितना प्रेशर देने से इंसान की आंखें ढक्कन की तरह बाहर निकल आती हैं. कोई बीमारी इंसान के अंगों पर कैसा असर करती है, ये देखने के लिए पहले उसे संक्रमित किया जाता. फिर उसके जीते-जी उसके अंग निकाल लिए जाते. कभी किसी अंग को शरीर में कहीं और जोड़ दिया जाता. कभी महिला कैदियों के साथ बलात्कार करके उन्हें जबरन प्रेगनेंट किया जाता. फिर उन महिलाओं को सिफिलिस जैसी बीमारियों से संक्रमित किया जाता. ताकि रिसर्च हो सके कि ऐसी बीमारियां मां से बच्चे में ट्रांसफर होती हैं कि नहीं.

यूनिट 731 के प्रयोगों ने लाखों निर्दोष चीनी नागरिकों को तड़पा-तड़पाकर मारा. उनकी फैलाई महामारियों ने लाखों चीनी नागरिकों की जान ली. विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद भी कई बरसों तक ये बीमारियां चीन में लोगों की जान लेती रहीं.

आप पूछेंगे, आज ये इतिहास क्यों बांच रहे हैं हम?
अब न तो जापान पहले वाला जापान है. न चीन वो पुराना चीन है. फिर क्यों बता रहे हैं हम आपको ये हिस्ट्री? इसलिए बता रहे हैं कि यूनिट 731 और उसकी क्रूरताएं. ये चीन और जापान की लंबी रंज़िश का एक छोटा सा चैप्टर है. ये रंज़िश इतनी गाढ़ी और क्रूर है कि आज भी ये दोनों देश दोस्ती नहीं कर पाते. इनकी आपसी दुश्मनी में हाल-फिलहाल एक बड़ी घटना हुई है. उस घटना के कारण हो सकता है कि आने वाले दिनों में चीन और जापान के बीच भी वैसा ही कुछ हो, जैसा 15 जून को लद्दाख में चीन और भारत के बीच हुआ था.

क्या है ये हालिया घटना?
इसे समझेंगे, मगर उससे पहले जापान का भूगोल समझ लेते हैं. प्रशांत महासागर के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में बसा जापान एक द्वीपीय देश है. करीब 6,852 द्वीप हैं यहां. इनमें से कुछ ही द्वीप हैं, जहां आबादी रहती है. समझिए कि लगभग 430 द्वीप पर ही लोग रहते हैं. इन 430 द्वीपों में सबसे प्रमुख हैं पांच आइलैंड- होक्काइदो, होनशु, शिकोकु, क्यूशु और ओकिनावा.

Japan
जापान (फोटो स्क्रीनशॉट: गूगल मैप्स)

क्या हुआ है 22 जून को?
ये जो ओकिनावा द्वीप है, वहां ‘इशिगाकी’ नाम का एक शहर है. 22 जून को इशिगाकी सिटी काउंसिल ने एक क़ानून पास किया. इस क़ानून का संबंध है राजधानी तोक्यो से करीब 1,931 किलोमीटर दूर बसे एक निर्जन द्वीप से. इस द्वीप को जापान के लोग कहते हैं- सेनकाकुस. 22 जून को पास बिल में जापान ने इस सेनकाकुस द्वीप के प्रशासनिक दर्जे में बदलाव कर दिया है. इस बदलाव के कारण चीन और जापान के बीच का टेंशन ख़ूब बढ़ गया है. ऐसा क्यों? क्योंकि चीन कहता है कि ये सेनकाकुस द्वीप जापान का नहीं, उसका है. चीन के लोग इस द्वीप को कहते हैं- दिआओयू. यूं तो 1972 से ये द्वीप जापान के पास है. लेकिन इसके मालिकाना हक़ की लड़ाई चीन और जापान के इतिहास की ही तरह सैकड़ों बरस पुरानी है.

कहां पड़ता है ये सेनकाकुस द्वीप?
मानचित्र पर इसकी लोकेशन है ताइवान के पास. उसकी उत्तर-पूर्वी दिशा में. सेनकाकुस समंदर के जिस हिस्से में पड़ता है, उसको कहते हैं ईस्ट चाइना सी. ये जो ईस्ट चाइना सी है, वो प्रशांत महासागर का एक हिस्सा है. चीन के पूरब में होने के कारण इसका ये नाम पड़ा है.

क्या ख़ास बात है इस निर्जन द्वीप में?
लोकेशन समझ ली. अब समझते हैं सेनकाकुस द्वीपसमूह की अहमियत. इस द्वीपसमूह में कुल आठ द्वीप हैं. इनका टोटल इलाका है करीब सात स्क्वैयर किलोमीटर. कहने को इसपर कोई आबादी नहीं रहती. मगर सामरिक और व्यापारिक नज़रिये से इसकी बहुत अहमियत है. क्यों? क्योंकि एक तो ये प्रशांत महासागर के व्यस्त शिपिंग रूट में पड़ता है. दूसरा, ये दुनिया के सबसे संपन्न फिशिंग ग्राउंड्स में से एक है. फिशिंग ग्राउंड माने पानी का वो इलाका, जहां ख़ूब सारी मछलियां जमा होती हैं. सेनकाकुस की एक तीसरी अहम ख़ासियत है, यहां मौजूद कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का भंडार. माना जाता है कि पूरे पूर्वी चाइना सी में कच्चे तेल और गैस का जितना भंडार है, उसका अधिकतर हिस्सा ओकिनावा के आसपास के हिस्से में है. चूंकि सेनकाकुस भी इसी हिस्से में है, तो यहां भी कच्चे तेल और गैस का बड़ा भंडार होने का अनुमान है.

Senkaku Island
सेनकाकुस द्वीप (फोटो स्क्रीनशॉट: गूगल मैप्स)

दावेदारी
लोकेशन हो गई. अहमियत हो गई. अब बात करते हैं दावेदारी की. सबसे पहले जापान का दावा समझते हैं. जापानी दावे की टाइमलाइन करीब सवा सौ साल पुरानी है. जापान के मुताबिक, उसने 19वीं सदी में करीब दस साल तक इस द्वीप का सर्वे किया. और फिर 14 जनवरी, 1895 को उसने यहां अपना झंडा गाड़ दिया. उस जमाने में ऐसा ही हुआ करता था. जिसने पहले झंडा गाड़ा, ज़मीन उसकी हो जाती थी. इस तरह जापान ने इसे भी अपना संप्रभु हिस्सा बना लिया.

कैसे लौटा ये जापान के पास?
फिर आया 1945 का साल. इस बरस दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार हुई. हार के बाद 1945 से 1952 तक अमेरिकी सेना ने जापान का प्राशासनिक कामकाज संभाला. 1951 में जापान और विश्व युद्ध के मित्र देशों के बीच सैन फ्रांसिस्को में एक संधि हुई. इस संधि की दो ख़ास बातें थीं. पहली ये कि इसके बाद जापान और पश्चिमी देशों के बीच दोस्ताना ताल्लुक बहाल हुए. दूसरी ख़ास बात ये हुई कि कई जापानी आइलैंड अमेरिका और ब्रिटेन जैसे मित्र देशों के संरक्षण में चले गए. इन्हीं में से एक था ओकिनावा प्रांत, जिसके अंतर्गत आता है सेनकाकुस द्वीपसमूह. जापान का ये हिस्सा 1971 तक अमेरिकी संरक्षण में रहा. फिर हुआ 1971 में ओकिनावा रिवर्ज़न अग्रीमेंट. इसके तहत अमेरिका ने जापान को ओकिनावा लौटाया. तब सेनकाकुस भी वापस जापान के पास आ गया. तब से ही इसपर जापान का अधिकार है.

1971 Okinawa Reversion Agreement
1971 के ओकिनावा रिवर्ज़न अग्रीमेंट से सेनकाकुस वापस जापान के पास आया.

चीन क्या कहता है?
ये था जापान की दावेदारी का इतिहास. अब बढ़ते हैं चीन के दावे की तरफ. बाकी सारे दावों की तरह चीन का ये दावा भी ‘लॉन्ग लॉन्ग टाइम अगो’ पर जाता है. चीन के मुताबिक, प्राचीन काल में उसका ताइवान प्रांत इस द्वीपसमूह का प्रबंधन देखता था. फिर 1895 में पहले सिनो-जापान युद्ध में हार के बाद ताइवान चला गया जापान के पास. ये ताइवान चीन के पास लौटा सन् 1951 में. उसी ‘ट्रीटी ऑफ सैन फ्रांसिस्को’ के तहत, जिसके कारण जापान के हाथ से सेनकाकुस द्वीपसमूह निकला था. चीन कहता है कि जब ताइवान उसके पास लौटा, तो फिर क़ायदे से सेनकाकुस भी उसके पास लौट आना चाहिए था. यही ‘चाहिए था’ चीन के दावे का आधार है. ये वो आधार है, जिसपर इतिहास में कभी अमल नहीं हुआ. क्यों नहीं हुआ, इसका दोष पेइचिंग देता है चांग काई-शेक को.

पीपल्स रिपब्लिक बनाम रिपब्लिक ऑफ़ चाइना
ये बड़ी कॉम्प्लिकेटेड हिस्ट्री है. आपको पता है न कि साल 1949 में माओ की कम्यूनिस्ट फोर्स सत्ता में आई. उसने चीन का नाम रखा- पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना. माओ के पहले चीन की सत्ता थी क्यूमिनतांग पार्टी के चांग काई-शेक के पास. 1949 में चांग काई-शेक भागकर चले गए ताइवान. और उन्होंने ताइवान का नाम रखा- रिपब्लिक ऑफ चाइना. अब दुनिया में दो-दो चीन थे. दोनों ही ख़ुद को असली चीन बताते थे. पश्चिमी देशों ने चांग काई-शेक के दावे को माना. अमेरिका ने भी 1949 से 1978 तक ताइवान उर्फ़ रिपब्लिक ऑफ चाइना के साथ ही रिश्ते रखे.

Chiang Kai Shek And Mao Zedong
च्यांग काई-शेक और माओ त्से-तुंग (फोटो: एएफपी)

70 के दशक से ही क्यों सूझा चीन को दावा करना?
चीन कहता है कि चांग काई-शेक अमेरिका के पिट्ठू थे. इसीलिए उन्होंने 1971 के ओकिनावा रिवर्ज़न डील के समय सेनकाकुस द्वीपसमूह जापान को दिए जाने का विरोध नहीं किया. चूंकि चीन बीते दौर का इतिहास फिर से लिखना चाहता है, सो वो चांग काई-शेक के बहाने सेनकाकुस को भी हासिल करना चाहता है. ये दावा अपनी फ़ितरत में वैसा ही है, जैसा गलवान घाटी, अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन पर उसका दावा. या फिर साउथ चाइना सी के विवादित द्वीपों पर उसका दावा. जापान कहता है कि चीन ने 70 के दशक में आकर सेनकाकुस पर दावा करना शुरू किया. कब? जब ये पता चला कि इस इलाके में कच्चे तेल और गैस का भंडार है.

विवाद बढ़ा कब?
लोकेशन, अहमियत और दावेदारी के बाद अब समझते हैं कि ये विवाद गर्माया कब से. ये गर्माया करीब आठ साल पहले. हुआ ये कि जापान के कुछ कारोबारियों ने साल 1932 में सेनकाकुस द्वीपसमूह के तीन द्वीप खरीद लिए थे. 2012 में जापान सरकार ने ये तीनों द्वीप वापस खरीद लिए. इसपर चीन में ख़ूब हंगामा हुआ. वहां जापान विरोधी प्रदर्शन हुए. लोगों ने पेइचिंग स्थित जापानी दूतावास को घेर लिया. चीन ने भी सेनकाकुस द्वीपसमूह के पास अपनी नौसैनिक गश्ती बढ़ा दी. चीनी नौसेना को भगाने के लिए जापान अपने फाइटर जेट्स भेजने लगा. फिर 2013 में चीन ने पूर्वी चाइना सी के आकाश में एक विशेष ज़ोन बना दिया. इस ज़ोन में सेनकाकुस भी आता था. चीन ने कहा कि इस हवाई क्षेत्र से गुज़रने वाले हवाई जहाज़ों को पेइचिंग की परमिशन लेनी होगी. ये जापानी संप्रभुता के दावों का उल्लंघन करता था. उसने चीन की हरकतों का विरोध किया.

Anti Japan Protests 2012
2012 में जापान सरकार के खिलाफ़ चीन में ख़ूब हंगामा हुआ. (फोटो: एएफपी)

अमेरिका कहां से आया पिक्चर में?

जापान और चीन की ये लड़ाई अमेरिका की एंट्री से और सीरियस हो गई. एशिया में अमेरिका का सबसे बड़ा पार्टनर है- जापान. न केवल व्यापारिक, बल्कि सामरिक पार्टनर भी. इस पार्टनरशिप का एक अहम चैप्टर है, 1960 में जापान और अमेरिका के बीच हुआ सुरक्षा करार. इस करार के तहत अमेरिका ने योकोसुवा, कनागाव और ओकिनावा जैसे जापानी ठिकानों पर अपने सैन्य बेस बनाए. और बदले में जापान को गारंटी मिली कि अगर उसके ऊपर हमला हुआ, तो अमेरिका उसकी सुरक्षा करेगा. इसी करार के कारण जब सेनकाकुस पर चीन की धमकियां बढ़ीं, तो अमेरिका बीच में कूदा. उसने कहा कि सेनकाकुस की सुरक्षा करना उसके द्विपक्षीय करार का हिस्सा है. अमेरिका ने कहा कि अगर ज़रूरत पड़ी, तो जापान की तरफ से वो इस द्वीप की हिफ़ाजत करेगा. यानी अगर चीन और जापान के बीच जंग छिड़ी, तो अमेरिका को भी इस लड़ाई में शामिल होना पड़ेगा.

बस एक द्वीप का झगड़ा नहीं है…
इस कथा-कहानी के बाद अब फिर लौटते हैं 22 जून को इशिगाकी सिटी काउंसिल द्वारा पारित कानून पर. चीन ने सेनकाकुस के अडमिनिस्ट्रेटिव बदलाव पर जापान को धमकाया है. पिछले करीब दो महीने से चीन के जहाज़ हर रोज़ ही सेनकाकुस के अगल-बगल चक्कर लगाते मिलते हैं. जापान इन्हें अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है. उसने कहा है कि वो चीन की आक्रामकता का जवाब देने के लिए तैयार है. जिस तरह हर झगड़े के बाद हमारे यहां चाइनीज़ प्रॉडक्ट्स के बहिष्कार की अपील उठती है. उसी तरह सेनकाकुस द्वीप के कारण जापान और चीन में एक-दूसरे के सामानों का बायकॉट करने की होड़ लगती है. इन दिनों अगर आप चीन में जापानी टयोटा गाड़ी लेकर घूमते दिख गए, तो मुमकिन है आप पीट-पीटकर अधमरे कर दिए जाएं. इस नफ़रत का कारण एक द्वीप या द्वीप से जुड़ा विवाद भर नहीं है. इसके पीछे का मनोविज्ञान दशकों पुरानी उसी रंज़िश से जुड़ा है, जिसके एक अध्याय का क़िस्सा हमने आपको इस एपिसोड की शुरुआत में सुनाया था.

ऐसा नहीं कि बुरे अतीत वाले सारे देश आज भी इतिहास तले दबे हों. जर्मनी और फ्रांस को देखिए. नाज़ी जर्मनी ने फ्रांस को तबाह कर दिया. मगर अब वो पक्के दोस्त हैं. यही हाल जापान और अमेरिका का है. दुनिया में आज तक दो ही बार न्यूक्लियर हथियार इस्तेमाल हुए. दोनों ही का निशाना बना जापान. और बम गिराने वाला कौन था? अमेरिका. आज जापान और अमेरिका पार्टनर हैं. सवाल यही है कि आप इतिहास में कितना पीछे जाएंगे? मध्यकालीन और साम्राज्यवादी दौर की दुश्मनी को कब तक ढोएंगे? सैकड़ों साल पहले का भूगोल उठाकर कब तक और कितनों से युद्ध लड़ेंगे?


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