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कोरोना काल में क्या हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं? इस रिपोर्ट ने सच बता दिया है

स्कूली शिक्षा (School Education) कोरोना के दौर में काफ़ी प्रभावित हुई है. ये बात कई विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों ने भी मानी है. इंटरनेट की पहुंच सभी तक न होने के कारण भी शिक्षा पर ज़्यादा प्रभाव पड़ा है. सोमवार 6 सितंबर को इस मुद्दे पर एक रिपोर्ट भी सामने आई. “तालीम पर ताला” के नाम से. इसमें दावा किया गया है कि ग्रामीण इलाक़ों में सिर्फ़ 8 प्रतिशत बच्चे लगातार ऑनलाइन पढ़ाई करते हैं, जबकि 37 प्रतिशत बिल्कुल भी पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं. शहरी क्षेत्रों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक, यहां मात्र 24 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो लगातार पढ़ाई कर रहे हैं.

और क्या कहती है रिपोर्ट?

रोड स्कालर्ज़ नाम के एक एक्सपर्ट ग्रुप द्वारा जारी की गई ये रिपोर्ट और भी कई दावे करती है. इस ग्रुप में अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और भारत ज्ञान विज्ञान समिति के सदस्य, जाने-माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज समेत कई लोग शामिल हैं.

रिपोर्ट जिस सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है, उसमें 1400 परिवारों को शामिल किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2021 में देश के 15 राज्यों में सर्वे किया गया. इनमें असम, बिहार, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्य शामिल हैं. ग्रामीण और शहरी दोनों इलाक़ों में सर्वे किया गया है. वंचित तबकों को विशेष रूप से कवर किया गया है. इससे कई चौंकाने वाले आंकड़े मिले हैं.

सर्वे रिपोर्ट से जुड़ा एक टेबल नीचे दिया गया है. इसमें बताया गया है कि शहरों में सिर्फ़ 47 प्रतिशत बच्चे नियमित तौर पर पढ़ाई कर रहे हैं. वहीं ग्रामीण इलाक़ों में ऐसे बच्चों की संख्या 28 प्रतिशत ही है. टेबल के मुताबिक, शहरों में 34 प्रतिशत बच्चे कभी-कभी पढ़ाई करते हैं और ग्रामीण इलाक़ों में ऐसे बच्चों की तादाद 35 प्रतिशत है.

रिपोर्ट की मानें तो ग्रामीण इलाक़ों में 19 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जो बिल्कुल भी पढ़ाई नहीं करते हैं. शहरों की हालत और बदतर है. यहां 37 प्रतिशत बच्चे बिल्कुल भी पढ़ाई नहीं कर रहे हैं.

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ग्रामीण इलाक़ों में 51 प्रतिशत परिवारों के पास स्मार्टफ़ोन नहीं

रिपोर्ट दावा करती है कि ऑनलाइन पढ़ाई में बच्चों और उनके परिवारों को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. जैसे ख़राब नेट्वर्क, इंटरनेट का न होना, स्मार्टफ़ोन का न होना, ऑनलाइन पढ़ाई समझ नहीं आना आदि.

रिपोर्ट में परिवारों का पक्ष जानने के लिए कई बातें सिर्फ़ बच्चों के मां-बाप से की गईं. इससे पता चला कि शहरों में 77 प्रतिशत ऐसे परिवार हैं जिनके पास स्मार्टफ़ोन है. लेकिन ग्रामीण इलाक़ों में ऐसे परिवार महज़ 51 प्रतिशत हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण और शहरी दोनों इलाक़ों में 90 प्रतिशत पैरेंट्स मानते हैं कि स्कूलों को अब खोल देना चाहिए.

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ऑनलाइन क्लास करती एक स्टूडेंट. प्रतीकात्मक तस्वीर (फ़ोटो- आजतक)

इसके अलावा रिपोर्ट कहती है कि शहरों में केवल 11 प्रतिशत बच्चों के पास अपना स्मार्टफ़ोन है. हालांकि ग्रामीण इलाक़ों में ये संख्या 12 प्रतिशत है. एक और बात बताई गई है. बच्चों का ज़्यादा इंट्रेस्ट पढ़ाई के बजाय दूसरे वीडियो देखने या गेम खेलने में होता है. इस वजह से शहरों में केवल 27 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जो लाइव क्लास करते हैं. ग्रामीण इलाक़ों में तो केवल 12 प्रतिशत बच्चे ऑनलाइन क्लास अटेंड करते हैं.

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प्राइवेट स्कूलों से पलायन

रिपोर्ट में प्राइवेट स्कूलों का भी जिक्र है. कहा गया है कि कोरोना वायरस की वजह से लगाए गए पहले लॉकडाउन से अब तक 20 प्रतिशत बच्चों ने प्राइवेट स्कूल छोड़ दिया है. पैरेंट्स ऐसा करने को इसलिए मजबूर हुए हैं, क्योंकि प्राइवेट स्कूलों ने फ़ीस कम नहीं की. रिपोर्ट कहती है कि दिहाड़ी बंद होने की वजह से गरीब अभिभावकों ने मजबूरन ऐसा कदम उठाया.

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स्कूल में मिड-डे मील खाते स्टूडेंट्स. प्रतीकात्मक तस्वीर

मिड-डे मील हुआ बंद

स्कूल बंद थे तो मिड-डे मील भी बंद था. कोरोना काल के दौरान कई राज्य सरकारों ने मिड-डे मील के अलावा अनाज और रुपए देने की बात कही थी. लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक़, सिर्फ़ 11 प्रतिशत शहरी बच्चों को खाना और पैसे दोनों मिले. ग्रामीण इलाक़ों में ऐसे बच्चों की संख्या 15 प्रतिशत रही. कुछ बच्चों को खाना, तो कुछ को पैसों की मदद मिली. शहरों में 20 प्रतिशत ऐसे बच्चे भी थे जिनको कुछ भी नहीं मिला. ग्रामीण इलाक़ों में ऐसे बच्चों की तादाद 14 प्रतिशत बताई गई है.


वीडियो- प्राइमरी स्कूलों में OBC और SC/ST के कितने छात्र हैं?

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