Submit your post

Follow Us

लॉकडाउन को सिर्फ़ एक साल हुआ है, पर इन 7 स्यापों की तगड़ी याद आ रही है

इस आर्टिकल को सिगरेट का पैकेट समझें और ये वैधानिक चेतावनी पढ़कर ही आगे बढ़ें. वरना आपका मुकेश (हराने, अंबानी नहीं) बनना तय है. इस स्टोरी को अपने रिस्क में पढ़ें क्यूंकि इससे ज़्यादा बकवास बेकाम की बातें, आपने एक साथ, अंडर वन रूफ़ कहीं नहीं पढ़ी होंगी. KRK और डॉनल्ड ट्रम्प को छोड़कर, ऑफ़ कोर्स. याद रखें कि ‘स्वांत सुखाय’ कभी-कभी, ‘सर्वजन दुखाय’ भी सिद्ध होता है.


लेकिन ये क्या बताएं, अब हाल दूसरा है,
वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है

अल्ताफ़ राजा की ये कालजयी लाइन, मैंने अपनी किसी स्टोरी में पहली बार लिखी हो, ऐसा नहीं है. और यक़ीन कीजिए, इस शे’र, या जो कुछ भी ये है, से शुरू करके मेरे ‘क्रिएटिव सेल्फ़’ को बहुत आनंद आ गया हो, ऐसा भी नहीं है. पर पिछले साल की यादों से जुड़ी स्टोरी करने के वास्ते, इससे अच्छी शुरुआत कुछ नहीं हो सकती थी. ऐसा मेरा मानना है.

हालांकि दूसरा विकल्प हरिवंश राय बच्चन की, ‘अब न रहे वे आठवले, अब न रहा आयुष काढ़ा’ और तीसरा विकल्प, काफ़्का की, ‘वो एक दिन उठा और उसने देखा कि उसे कोरोना हो गया है’ वाली लाइन थी. लेकिन फिर मुझे लगा कि जिस तरह सांख्य दर्शन में प्रकृति-पुरुष के बीच एक अटूट संबंध है, उसी तरह समय के बीत जाने की बात का भी दो चीज़ों से अटूट संबंध है. पहली आइंस्टीन की जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटेविटी और दूसरी अल्ताफ़ राजा का ये शे’र, या जो कुछ भी ये है. और आइंस्टीन की जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटेविटी, अल्ताफ़ के इस शेर के रिलेटिवली कुछ ज़्यादा ही जनरल थी. मतलब उसमें वो एसेंस नहीं था, वो इंटलेक्ट नहीं था, वो सोफ़ेस्टिकेशन नहीं था जो, ‘वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है.’ में है. अस्तु अल्ताफ!

Creativity is contagious, pass it on कहते हुए कहीं आइंसटीन कोरोना को क्रिएटिविटी तो नहीं लिख गए थे?
‘Creativity is contagious, pass it on’, कहते हुए कहीं आइंसटीन कोरोना को क्रिएटिविटी तो नहीं लिख गए थे?

हाँ तो हुक अप लाइन के बारे में पर्याप्त बकवास कर चुकने के बाद, आइए अब बात, आई मीन बकवास आगे बढ़ाते हैं. तो बात दरअसल ये है कि कोरोना को हमारे जीवन में आए हुए एक साल से ज़्यादा बीत चुका लेकिन ‘आँधी’ वाले संजीव कुमार की तरह लगता है कि शायद इस बार अमावस 9 बरस लंबी थी. (चिंता मत कीजिए, इस स्टोरी में अब कहीं पर भी आइंस्टीन का रेफ़रेंस नहीं आएगा. हाँ, अल्ताफ़ इररिज़िस्टेबल है, वो बेशक आ सकते हैं.) तो आइए जानते हैं इन ‘नौ सालों’ में हमारे साथ क्या-क्या बीता, जिसकी अब रह-रहकर याद आती है. ताकि सनद रहे. क्यूंकि जैसा फ्योदर के दोस्त, व्हिस्की (पता है मुझे, पता है, ये सेल्फ़ अवेयर PJ है) पीते हुए कह गए हैं: व्यंग्य, विनम्र और पवित्र लोगों का अंतिम शरणस्थल है. नीचे उन चीज़ों/घटनाओं/बेवकूफियों की लिस्ट है, जो साल भर पहले अचानक चलन में आईं.

# ठेले, जो पेले गए

सबसे पहले यही क्लियर कर दें कि यहाँ ‘पेला जाना’ पीटे जाने के संदर्भ में इस्तेमाल हो रहा है. हमारा ANI कांड से कोई संबंध नहीं है. हाँ तो, हमारा देश घटनाओं का देश है, ‘तू जानता नहीं मैं कौन हूँ’ का देश है, ‘भुसंड, चमाट, खोपचे पे ले जाने’ का देश है. तो ऐसा कोई भी देश तीन लोगों के समुच्चय से मिलकर बनता है. एक जो पेलते हैं, दूसरे जो इनसे पिलते हैं. और तीसरे लोग कौन हैं, मेरे देश की संसद मौन है.

तो जब कोई तीसरा आदमी दूसरे आदमी को पहले के हवाले कर देता है ,तो वही होता है जिसकी आशंका मुन्नाभाई MBBS में सुनील दत्त ने की थी. यही लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में हुआ था. जब कुछ समाजसेवी, बिना किसी मासिक सैलरी या तदर्थ भुगतान के, समाज की ‘गंदगी’ साफ़ करने में लग गए. हालाँकि थोड़ी दिक्कत ये हुई कि लॉकडाउन से जुड़े किसी यूज़र मैनुअल और कोविड से जुड़े किसी पूर्व-अनुभव के अभाव में ये समाजसेवी कनफ़्यूज हो गए कि गंदगी कौन है और साफ़ किसे करना है. आई मीन ठीक है, ठेले वालों के गोल-गप्पे खाकर मेरा भी पेट ख़राब हुआ है. मुझे भी सब्ज़ी वाला एक्स्ट्रा धनिया मिर्च नहीं देना. तो इसका मतलब ये थोड़ी न है कि…

सरकार के भ्रष्टाचार से लेकर, इंडियन टीम की हार तक, हर बात का ग़ुस्सा तुझपर निकालेंगे. बोल कर दूं इनके हवाले. (मुन्नाभाई MBBS मूवी का एक सीन)
सरकार के भ्रष्टाचार से लेकर, इंडियन टीम की हार तक, हर बात का ग़ुस्सा तुझपर निकालेंगे. बोल कर दूं इनके हवाले. (मुन्नाभाई MBBS मूवी का एक सीन)

पर क्या कीजे, अपने से नीचे के तबकों को पीटना सभ्यता के प्रारब्ध से ही एक कारगर स्ट्रेस-बस्टर साबित हुआ है. यक़ीन न आए तो ‘मीन कैम्फ’ पढ़ लीजिए. तो यही इन समाजसेवियों के साथ भी हुआ, ये भावनाओं में ऐसे बहे कि फल की चिंता किए बग़ैर अपने कर्म में लग गए. फल की चिंता करते भी तो कैसे, केला और केले का ठेला तो ये उल्टा चुके थे.

तो इन समाजसेवियों को आज भी मिस किया जा सकता है. समाजसेवी, जिनकी पब्जी और टिक-टॉक के अभाव में हिज्र की शाम-ओ-सहर कैसे गुजर रही होगी इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है. इनके लिए अंतिम सांत्वना की बात ये है कि लल्लन-टॉप की सिनेमा टीम शायद इन समाज सेवियों को ‘कहाँ गए वो लोग’ सेक्शन में ले सकती है. इनका सिनेमा से क्या जुड़ाव था ये सोच रहे हैं न आप? तो उत्तर ये कि इन्होंने मनुष्य होने की अच्छी एक्टिंग की थी.

# थाली, गाली और गाल

हमारे देश में लॉकडाउन लगने से पहले ही फ़्रांस इटली वग़ैरह में लग गया था. और वहाँ से आईं अद्भुत तस्वीरें और वीडियो. जिसमें एक घर में गिटार और पड़ोस के दूसरे घर में वोकल्स की आवाज़ें समां बांध दे रही थीं. लेकिन इस ‘वी शैल ओवरकम’ वाले यूरोपियन कार्यक्रम में एक दिक्कत थी. वो ये कि हर किसी को गिटार, वायलन बजाना नहीं आता, हर किसी की आवाज़ लता मंगेशकर सरीखी नहीं होती. इसलिए जिस चीज़ में देश भर का ‘सामूहिक यज्ञ’ बनने की पोटेंशियल रहा, वो एक घर की सत्यनारायण की कथा बनकर रह गया. जो मासेज़ के लिए हो सकता था, वो सिर्फ़ क्लासेज़ तक सिमटकर रह गया. ऐसा अगर हमारे देश में होता तो उसके सामाजिक ताने बाने के लिए बड़ा ग़लत होता. देश, जहां माता की भेटें से लेकर पाँचो वक्त की नमाज़ तक, सभी के लिए मुफ़्त में उपलब्ध है. साभार: ध्वनि वर्धक यंत्र.

तो, इस धर्मसंकट में, ’थाली’ ऐसा विकल्प बनकर उभरी जिसके लिए कोई छोटा बड़ा नहीं था. अनु मलिक की भाषा में कहें तो ये इंडियन थाली, फ़्रेंच कोर्स आई मीन फ़्रेंच गिटार से इंस्पायर्ड थी. ‘उम्मीदों’ का एक देसी संस्करण. ये अलबैर कामू का कबीर वर्ज़न थी. थाली हर किसी के पास थी, जिसके पास नहीं थी उनके पास दूसरे विकल्प थे. ये सारा थाली बजाने वाला कार्यक्रम उसी तरह था जैसे, किसी स्कूल की यूनिफ़ॉर्म. जिससे गरीब-अमीर का भेद मिट जाए. आप थालियों की आवाज़ सुनकर नहीं बता सकते थे कि ये थाली की आवाज़ बड़े वाले अरबपति भाई की है, या उस छोटे गरीब भाई की, जिसे कोर्ट में जाकर सफ़ाई देनी पड़ी हो कि उसके पास थाली के अलावा कुछ नहीं है. और ये थाली भी दरअसल उसकी मां की दी हुई है.

अब हम क्या कहें क्या करें, जब सब थाल बजने लगे. (तस्वीर:PTI)
अब हम क्या कहें क्या करें, जब सब ओर थाल बजने लगे. (तस्वीर:PTI)

थाली राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनकर उभरी. हालांकि ये एकता इतनी बढ़ गई कि सेल्फ़ क्वारनटाईन से जुड़ी दिक़्क़तें आनी शुरू हो गईं. लोग समूहों में सेल्फ़ क्वारनटाईन होने लगे. पत्नी कहती कि मुझे अकेले रहना है, तो पति कहता कि मुझे भी तुम्हारे साथ अकेले रहना है. ख़ैर ये सब लॉजिस्टिक्स की दिक़्क़तें थीं, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ स्टेटिस्टिक्स में दिखती थीं. स्टेटिस्टिक्स कोविड केसेज़ की, स्टेटिस्टिक्स मौतों की.

टू डार्क? लेट्स मूव टू नेक्स्ट पॉईंट. लेकिन उससे पहले थाली, गाली और गाल से जुड़ा एक ट्वीट आपकी नज़र. लिखने वाला मॉडेस्ट है इसलिए गाली सायलेंट हैं-

# कनिका कपूर, रामदास आठवले, सोनू निगम और अन्य

आइंस्टीन (ओके मैंने शुरू में झूठ बोला था) ने कहा था कि-

दुनिया में दो चीज़ें अनंत हैं, एक मानव की मूर्खताएं, दूसरा ये यूनिवर्स. हालांकि मैं ब्रह्मांड के बारे में ये बात निश्चित तौर पर नहीं कह सकता.

इस बात को सही साबित करने में पूरा भारतवर्ष जी-जान से लग गया था. कनिका कपूर के नाम की स्पेलिंग सारे मुल्क ने गलत पढ़ ली. कोमोलिका समझ लिया उनको. ‘विच’ समझकर तगड़ी ‘हंटिंग’ कर दी. मंगल ग्रह पर भी किसी को कोरोना होता, तो उसका कनिका कनेक्शन निकाल लिया जाता. तमाम दुनिया के लिए कोरोना का ओरिजिन चीन के किसी जंगल का वो मरदूद चमगादड़ था, इंडिया वालों के लिए कोरोना की कोरोनोत्री कनिका थी (इसको व्याकरण में जौन सा भी अलंकार कहते हों). कनिका अकेली के इतने टेस्ट हुए, जितने किसी छोटे-मोटे अफ्रीकन मुल्क की पूरी जनता के भी न हो पाए होंगे.

उधर लॉकडाउन का सुहाना सफ़र दो सोनुओं के सारथ्य में सुसह्य हो गया (अगेन दैट अलंकार थिंग). एक ने मदद की परिभाषा को भयानक विस्तार देकर लोगों की आँखों में ख़ुशी के आँसूं भरे, दूसरे ने सिंगिंग छोड़ मास्टरस्ट्रोक की इन्वेंट्री लेनी शुरू कर दी. साइंस को चैलेंज देकर लोगों को मनोरंजन की नई, अनोखी विधा सिखाई. 12 घंटे में कोरोना मारने की निंज़ा तकनीक को कैमरे पर सराहकर मीम्स की दुनिया के तख्तेताउस पर जा बैठें. अपने शानदार सिंगिंग करियर से हासिल शोहरत को इंटरनेट ट्रोल्स के हवाले कर दिया. ये तो वही हाल हुआ कि ‘आ बैट, मुझे काट’ (सोनू निगम की रीज़निंग से ज़्यादा बुरा नहीं है ये कसम से).

बेतुकी तुकबंदियों का ज़िक्र चल ही पड़ा है, तो उस कालजयी कविता को भी याद कर ही लिया जाए! इस आपदा के लिए कोई चूहा, चील, चमगादड़ नहीं, हम भारतवासी खुद ज़िम्मेदार थे. हमने ही इस महान हस्ती की, एंटरमार कविताओं से भी ज़्यादा ज़हरीली, तुकबंदियों को व्यूज़ दिए थे. संसद में किए गए उनके ‘कविता के साथ दुष्प्रयोग’ को तमाम दूसरी गैलेक्सियों तक वायरल किया था. और जैसा कि हरिसिंह के इकलौते बेटे ने अपने तीन गुर्गों से कहा था, ‘इसकी सज़ा मिली, बराबर मिली’.

एक हाहाकारी फिकरे का जन्म हुआ. ‘गो कोरोना, कोरोना गो’.

बाक़ी नीचे की तस्वीर सेल्फ एक्सप्लेनेट्री है.

Gorona!
Gorona!

आई रेस्ट माई केस! आई मिस दी यूनिवर्स!

# तबलिगी जमात

हाई कोर्ट के एक फ़ैसले से बाद पता चला कि कोरोना को फैलाने में तबलिगी जमात का उतना ही हाथ था, जितनी बी प्राग के गानों के हिट होने में लिरिक्स का हाथ होता है. मतलब ज़ीरो. (ये वाला व्यंग्य सिर्फ़ शाहरुख़ के लिए था.)

लेकिन जैसा कि अकीरा कुरोसावा की लेजेंडरी मूवी ‘राशोमोन’ में कहा गया है कहानी इंट्रेस्टिंग होनी चाहिए, सच्ची हो या झूठी, क्या ही फ़र्क़ पड़ता है. वही पूरे तबलिगी जमात वाले मसले पर हुआ. लोग एंटरटेन हो रहे थे, दूसरी ओर नैतिकता की ‘यूटेलीटेरियन थ्योरी’ भी एंटरटेन होने वालों के पक्ष में थी. यूटेलीटेरियन थ्योरी, जो कहती थी कि करोड़ों लोगों का मनोरंजन एक दो लोगों की पीड़ाओं से कहीं ज़्यादा क़ीमती है.

एंटरटेनमेंट कोशेंट = 100. इमोशन कोशेंट = 0.
एंटरटेनमेंट कोशेंट = 100. इमोशन कोशेंट = 0.

न जाने अब वो ऑलरेडी पेड मनोरंजन कहां प्राप्त हो, जिसकी टिकटों के प्रायोजक कुछ अनजान मासूम लोग थे.

# आयुष काढ़ा

आब ए ज़मज़म, समुद्र मंथन से निकले अमृत और आयुष काढ़ा में क्या समानता है? कुछ नहीं. लेकिन फिर भी एक दौर ऐसा आया था कि लोगों को आयुष काढ़ा में ही अमृत और हाइड्रोऑक्सीक्लोरोक्वीन में ही आब ए ज़मज़म नज़र आने लगा था. सेनेटाइज़र में नैवेद्यम और साबुन में तावीज़. जल तू जलाल तू, आए कोरोना को टाल तू.

इसके अलावा भी कुछ चीज़ें थीं, जो अब नहीं हैं. आशंका है कि कल फिर न हो जाएं. (स्पॉइलर अहेड: भारत में कोविड के केसों की संख्या रोज़ रिकॉर्ड तोड़ रही है.)

# गंगा-जमुना

दिल्ली और कानपुर वालों के लिए ये भी कौतूहल का विषय था कि उमा भारती के फेल हो जाने के बाद क्या लॉकडाउन पॉल्यूशन मिटाने का एक मास्टर स्ट्रोक तो नहीं था? रोज़ अख़बारों में साफ़ होती गंगा की जमुना की तस्वीरें जो आतीं. जो पंछी पलायन कर गए थे, उनके घर लौट के वापस आने की तस्वीर आतीं. (अब आप पंछियों और पलायन से जुड़ी इस प्यारी बात में भी सटायर ढूँढ निकालें, तो फिर इसमें तो सारा का सारा ‘आई फ़ॉर डिटेल’ आपका ठहरा न.)

लोग नहीं सभ्यता वापस जा रही थी.
लोग नहीं सभ्यता वापस जा रही थी.

# आरोग्य सेतु ऐप

ऐसा नहीं है कि आरोग्य सेतु ऐप ‘फ़्लॉपी ड्राइव’, ‘ऑडियो कैसेट’ या ‘मारियो ब्रदर्स’ हो गया हो. बस ऐसा है कि अब लोगों को इसकी ज़रूरत महसूस नहीं होती. लेकिन ज़रूरत के ख़त्म होने से यादें कहां ख़त्म होती हैं. आज भी याद है कि झूठी-सच्ची खबरों के बाद कैसे मुझे आरोग्य सेतु ऐप इंस्टॉल ऐप करने से पहले ‘ब्रेक इवन पॉईंट’ वाले ग्राफ़ का रिवीज़न करना पड़ गया था: ठीक-ठीक जानने के लिए कि प्राइवेसी महत्वपूर्ण है या फिर इम्यूनिटी.

# अंततः

हालांकि चीज़ें तो इतनी थीं कि अगर उन्हें याद करने बैठो तो 2-3 दिन का सेल्फ़ क्वारनटाईन लगेगा. जैसे मुफ़्त में अमिताभ वाली कॉलर ट्यून, शेयर मार्केट का गिरने की नित नई ऊँचाइयाँ छूना, थूक कर कोरोना फैलाने की अफवाहें, ट्रेन में क्वारनटाईन आदि… आदि…

पर फिर इन यादों की बातों को कहीं तो ख़त्म करना होगा न. तो ये लीजिए- (सुर में पढ़ पाएं, तभी आप म्युज़िक वॉरियर्स माने जाएंगे)

कोविड लॉकडाउन, सूने बाज़ार, मुहल्ले की वो गत, और बीमार
वो जाके बाल्कनी में, थाली बजाना, वो गाने गाना, ‘गो कोरोना यार!’
वो काढ़ा पीना ख़ुद ही बनाके, वो करना हाथों को, घड़ी-घड़ी साफ़,
बस यादें, यादें, यादें रह जाती हैं. कुछ छोटी, छोटी, छोटी बातें रह जाती हैं.


लल्लनटॉप वीडियो : कोरोना वैक्सीन का बूस्टर डोज़ क्या बला है और इससे क्या होगा?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

कौन सा था वो पहला मीम जो इत्तेफाक से दुनिया में आया?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

चुनावी माहौल में क्विज़ खेलिए और बताइए कितना स्कोर हुआ.

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

राहुल के साथ यहां भी गड़बड़ हो गई.

रोहित शेट्टी के ऊपर ऐसी कड़क Quiz और कहां पाओगे?

14 मार्च को बड्डे होता है. ये तो सब जानते हैं, और क्या जानते हो आके बताओ. अरे आओ तो.

आमिर पर अगर ये क्विज़ नहीं खेला तो दोगुना लगान देना पड़ेगा

म्हारा आमिर, सारुक-सलमान से कम है के?

परफेक्शनिस्ट आमिर पर क्विज़ खेलो और साबित करो कितने जाबड़ फैन हो

आज आमिर खान का हैप्पी बड्डे है. कित्ता मालूम है उनके बारे में?

अनुपम खेर को ट्विटर और वॉट्सऐप वीडियो के अलावा भी ध्यान से देखा है तो ये क्विज खेलो

चेक करो अनुपम खेर पर अपना ज्ञान.

कहानी राहुल वैद्य की, जो हमेशा जीत से एक बिलांग पीछे रह जाते हैं

'इंडियन आइडल' से लेकर 'बिग बॉस' तक सोलह साल हो गए लेकिन किस्मत नहीं बदली.

गायों के बारे में कितना जानते हैं आप? ज़रा देखें तो...

कितने नंबर आए बताते जाइएगा.

संविधान के कितने बड़े जानकार हैं आप?

ये क्विज़ जीत लिया तो आप जीनियस हुए.