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अमेरिका में चीन के लोगों के साथ क्या अत्याचार हुआ कि अब वह उनसे माफ़ी मांग रहा है?

अमेरिका और चीन की दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है. ये दुश्मनी हालिया समय की अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे ज्वलंत मु्द्दों में से एक है. ये सवाल भी उठता है कि क्या अमेरिका और चीन ‘कोल्ड वॉर 2.0’ के मैदान में उतर चुके हैं? इन सबके बीच अमेरिका का एक शहर चीनी समुदाय के लोगों से माफ़ी क्यों मांग रहा है? अमेरिकी नस्लभेद के इस चैप्टर की पूरी कहानी क्या है? और, कोविड-19 के बाद से उन दुखद कहानियों का जिन्न बोतल से बाहर कैसे निकला?

सोने के खदान मिलने से शुरू होती है ये कहानी

इस कहानी की शुरुआत जनवरी 1848 में हुई थी. जेम्स मार्शल नाम के एक बढ़ई ने कैलिफ़ोर्निया में सोने के खदान मिलने की सूचना दी. इसके बाद वहां सोना निकालने की होड़ चली. सोने का सीधा संबंध समृद्धि से था. कैलिफ़ोर्निया फलने-फूलने लगा था. जब इसकी ख़बर बाहर आई तो पूरी दुनिया से लोग वहां पहुंचने लगे. उन्हें अपने सामने बेहतर भविष्य दिख रहा था. ठीक-ठीक कहा जाए तो कैलिफ़ोर्निया उन लोगों के लिए ‘सपनीले जीवन की नगरी’ थी.

कोई अपना डीह, अपनी थाती छोड़कर परदेस क्यों जाता है? पहला मकसद होता है अपना और अपने परिवार का जीवन बेहतर बनाना. कमियों से संपन्नता की ओर ले जाना. उस दौर में चीन के लोग भी इसी मंशा से कैलिफ़ोर्निया पहुंचे थे. चीन में चिंग वंश का शासन पतन की तरफ़ बढ़ रहा था. इसके अलावा, सिविल वॉर के कारण भी वहां मार-काट मची हुई थी. युवाओं के सामने नाउम्मीदी की खाई पसरी हुई थी. तभी उन्होंने कैलिफ़ोर्निया में अचानक आई समृद्धि की ख़बर सुनी. और हज़ारों की संख्या में चीनी लोग अमेरिका पहुंचने लगे.

California Gold Rush
कैलिफ़ोर्निया में अचानक आई समृद्धि की ख़बर हज़ारों की संख्या में चीनी लोगों को अमेरिका ले आई.

जब चीन के लोग अमेरिका के लिए उम्मीद बने

1850 के दशक में अमेरिका में दासप्रथा के ख़िलाफ़ माहौल बनने लगा था. ऐसे में गोरे लोगों को सस्ते मज़दूरों की चिंता सताने लगी. चीनी उनके लिए उम्मीद की किरण बनकर आए थे. पहले उन्होंने अश्वेतों को अपना ग़ुलाम बनाकर रखा था. अब चीनी लोग उनके लिए वही काम करने वाले थे. अंतर बस इतना था कि चीनियों को मामूली मज़दूरी मिल जाया करती थी.

कैलिफ़ोर्निया गोल्ड रश 1855 में खत्म हो गई. इसके बाद भी बहुत सारे चीन के लोग अमेरिका में ही रुक गए. उन्होंने ट्रांस-कॉन्टिनेंटल रेलवे, इंडस्ट्री और दूसरे क्षेत्रों में काम पकड़ लिया. वे कोई भी काम कितने भी कम पैसे पर करने के लिए तैयार रहते थे. उद्योगपतियों के लिए ये फायदे का सौदा था. उन्होंने बड़ी संख्या में चीनी मज़दूरों को काम पर रखा. इसके चलते गोरे लोगों के लिए नौकरियां कम होने लगीं. इससे उनमें नाराज़गी बढ़ी. उन्होंने इस नाराज़गी का बदला चीनी मज़दूरों से लेना शुरू किया. समूचे अमेरिका में चीनियों पर हमले बढ़ने लगे. उनके घरों को तोड़ा जाने लगा. उन्हें बुनियादी सुविधाओं से वंचित किया जाने लगा. इस अब्यूज़ में प्रशासन भी शामिल रहा. एक उदाहरण से समझिए.

सुप्रीम कोर्ट का अजीब फैसला

1854 में कैलिफ़ोर्निया की सुप्रीम कोर्ट में एक चीनी मज़दूर की हत्या का मामला आया. इसका आरोप जॉर्ज़ हॉल नाम के एक गोरे पर था. गवाहों को सुनने और सबूत देखने के बा ज्यूरी ने हॉल को दोषी ठहरा दिया था. लेकिन अंत में अदालत ने उसे बाइज्ज़त बरी कर दिया. और तो और अदालत ने एक नया आदेश भी थोप दिया. क्या? यही कि एशियाई समुदाय के लोग अदालत में गोरे व्यक्ति के ख़िलाफ़ गवाही नहीं दे सकते. ऐसे गवाहों को मान्यता नहीं दी जाएगी. इस केस को ‘पीपुल वर्सेज़ हॉल’ के नाम से जाना जाता है. इस फ़ैसले ने गोरों को एशियाई मूल के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा करने की खुली छूट दे दी थी.

Chinese Worker In Railways
चीन के लोग अमेरिका में ही रुक गए और अलग-अलग सेक्टर में काम करने लगे.

एंटी-कुली ऐक्ट

ये ज्यादती यहीं तक रुकने वाली नहीं थी. 1862 में एंटी-कुली ऐक्ट लागू किया गया. इसके तहत, चीनी मज़दूरों से मंथली टैक्स वसूला जाने लगा. मज़दूरों की पहले से ही आमदनी कम थी. उनके लिए ये सब अहसनीय था. चमड़ी से सफ़ेद लेकिन मन से अत्यंत लीचड़ तत्कालीन अमेरिका की अधिकांश आबादी एशियाई लोगों को किसी भी कीमत पर बाहर निकालना चाहती थी. यहां पर एक बात सोचने वाली है. असल में ये एक विरोधाभास है. जो गोरे अमेरिका को अपनी ज़मीन मानते थे, वे ख़ुद बाहर से आए थे. उन्होंने 90 फीसदी से अधिक मूलनिवासियों को मिटाकर अपना प्रभुत्व साबित किया था. वही लोग चीनियों को हर मुमकिन तरीके से बाहर निकालने पर आमादा थे. अख़बारों में चीनी लोगों के बारे में भ्रामक ख़बरें छापी जातीं. उन्हें गंदा, घृणित और लिजलिजा किस्म का प्राणी बताया जाता. जनता पर इसका असर हुआ. उनकी नफ़रत कई गुणा तक बढ़ चुकी थी. इसके चलते हिंसा की आग और भड़की.

एक घटना अक्टूबर 1871 की है. लॉस एंजिलिस में लगातार हो रहे हमलों के बीच कुछ चीनियों ने अपने गैंग बना लिए थे. वे अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों का जवाब बाहुबल से देने लगे थे. 24 अक्टूबर के दिन एक झगड़ा हुआ. इसमें एक गोरे आदमी की मौत हो गई. इसके बाद पांच सौ से अधिक लोगों ने मिलकर पास के चाइनाटाउन को घेर लिया. उन्होंने उस दिन 19 चीनी समुदाय के 19 लोगों को पीट-पीटकर मार दिया. ये अमेरिका के इतिहास में हुई सबसे बड़ी मॉब लिंचिंग है. इस मामले में आठ लोग दोषी करार दिए गए. बाद में फ़ैसला पलट दिया गया. इस मॉब लिंचिंग के मामले में कभी भी किसी को सज़ा नहीं हुई.

Chinatown Burn
दो चाइना टाउन रहस्यमयी आगजनी में जलकर खाक़ हो गए.

आज अमेरिका ख़ुद को बार-बार ‘उम्मीदों का देश’ बताए, लेकिन उसका इतिहास बेहद दुखद है. 1882 के साल में अमेरिकी संसद में ‘चाइनीज़ एक्सक्लुजन ऐक्ट’ पास किया. राष्ट्रपति चेस्टर आर्थर ने पहले इस पर वीटो किया. लेकिन बाद में इसको दस साल के लिए लागू कर दिया. इस कानून की समयसीमा बार-बार बढ़ाई जाती रही. 61 साल बाद जाकर 1943 में इसको रद्द किया गया. इस कानून के तहत, चीनी मज़दूरों के अमेरिका आने पर पाबंदी लगा दी गई थी. जो चीनी लोग पहले से अमेरिका में थे, उन्हें नागरिकता लेने से रोक दिया गया थी. नागरिकता नहीं तो अधिकार नहीं. और, अधिकार बिना इंसान की कोई वैल्यू नहीं.

आज इन सारी कहानियों की चर्चा क्यों?

कैलिफ़ोर्निया स्टेट का एक शहर है सैन होज़े. यहां पर एक समय पांच चाइना टाउन हुआ करते थे. दो चाइना टाउन रहस्यमयी आगजनी में जलकर खाक़ हो गए. इसका शक चीनियों के ख़िलाफ़ नस्लभेदी अभियान चला रहे गोरे लोगों पर ही जाता है. KQ-एड की एक रिपोर्ट के अनुसार, कैलिफ़ोर्निया में शुरुआत से ही चीनियों के ख़िलाफ़ नस्लभेदी माहौल था.

कैलिफ़ोर्निया गोल्ड रश के दौरान स्थानीय माइनर्स को पूरी छूट थी. जो वहां के नागरिक नहीं थे, उनके लिए कैलिफ़ोर्निया में फ़ॉरेन माइनर्स लाइसेंस ऐक्ट लाया गया. उन्हें उस दौर में महीने के 1500 रुपये भरने होते थे. 1875 में चीनी महिलाओं अमेरिका में एंट्री पर बैन लगा. 1882 के साल में कोई चीनी नागरिक इस प्रतिबंध से अछूता नहीं रहा.

फिर आया साल 1886 का. सैन होज़े में एक सम्मेलन हुआ. इसका मकसद ये साबित करना था कि चीनियों के आने से सैन होज़े की अर्थव्यवस्था और वहां की संस्कृति का पतन हुआ है. इसमें चीनियों के विरोध में अश्लील नारे भी लगाए गए.

इसके एक साल बाद शहर के मेयर और सैन होज़े सिटी काउंसिल ने बाज़ार के बीच में बने एक चाइना टाउन को हटाने का फ़ैसला लिया. उनका मत था कि ये चाइना टाउन सैन होज़े और वहां के लोगों की सेहत के लिए अच्छा नहीं है. जब तक उस पर सरकारी आदेश आता, तब चाइना टाउन को जलाया जा चुका था. इस आगजनी में कोई हताहत तो नहीं हुआ, लेकिन 14 सौ से अधिक चीनी विस्थापित हो चुके थे. उन लोगों ने बरसों की कमाई जुटाकर अपने सपनों का घर बनाया था. और, उसे नफ़रत के आधार पर मिनटों में तबाह किया जा चुका था.

San Jose Apology
San Jose Apology

उस घटना के 134 साल बाद सैन होज़े अपने नस्लभेदी बर्ताव के लिए माफ़ी मांग रहा है. इस बाबत सिटी काउंसिल ने एक प्रस्ताव पास किया है. प्रस्ताव अंग्रेज़ी में है. हिंदी अनुवाद सुन लीजिए,

उस समय जो अन्याय हुए, वे संगीन थे. कोई भी माफ़ी उस इतिहास को नहीं मिटा सकती. लेकिन इतिहास में हुई ग़लती को मानकर हम आज के समय चल रही नस्लभेद की समस्या का समाधान ज़रूर तलाश सकते हैं

कोविड-19 के बाद से अमेरिका में एशियाई लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है. पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई दफा कोरोना वायरस को ‘चाइना वायरस’ कहकर संबोधित किया था. एशियाई मूल के लोगों को कोरोना के वाहक के तौर पर देखा जाने लगा है. अश्वेत जॉर्ज फ़्लाइड की पुलिस द्वारा की गई हत्या की ख़बर भी ज़्यादा पुरानी नहीं हुई है. अमेरिका के कई बड़े शहरों में स्पा और सैलून में काम करने वाली एशियाई महिलाओं की हत्या भी हुई है. इन्हीं चीज़ों को लेकर ये सवाल आता है कि क्या अमेरिका अपने नस्लभेदी इतिहास को दोहरा रहा है?

मशहूर स्पेनिश दार्शिनक जॉर्ज सेन्त्याना की एक पंक्ति है – Those who cannot remember the past are condemned to repeat it.

जो अपना इतिहास याद नहीं रखते, उन्हें उसे दोहराने के लिए कोसा जाता है.

सैन होज़े ने अपने इतिहास से सबक लेने की शुरुआत कर दी है. सैन होज़े चीनी प्रवासियों के साथ हुए नस्लभेद के लिए माफ़ी मांगने वाला अमेरिका का सबसे बड़ा शहर है. इससे पहले, मई 2021 में एंटियोक ने भी चीनी समुदाय के लोगों से माफ़ी मांगी थी.

नस्लभेद के चैप्टर को यहीं पर विराम देते हैं. अब चलते हैं लैटिन अमेरिकी देश इक्वाडोर. पेरू और कोलोंबिया इसके निकटतम पड़ोसी हैं.

इक्वाडोर अभी सुर्खियों में क्यों है?

इक्वाडोर का एक शहर है, ग्वायाक़ल. इसी शहर में बनी लिटोराल जेल में कुछ सबसे बदनाम गैंग्स के अपराधी रखे गए हैं. लिटोराल, इक्वाडोर की सबसे बड़ी जेलों में से एक है. 28 सितंबर को एक गैंग के कुछ क़ैदी दीवार में सुरंग बनाकर दूसरे विंग में घुस गए. वहां उनके दुश्मन गैंग के लोग बंद थे. उन्होंने वहां जाते ही चाकू, बम और गोलियों से हमला कर दिया. दूसरी तरफ़ से भी जवाबी कार्रवाई हुई. पहले दिन की लड़ाई में 24 लोग मारे गए थे. छह लोगों का सिर काट दिया गया था. बाकी को बम और गोलियां लगी थी.

Ecuador Prison Violence
इक्वाडोर की सबसे बड़ी जेलों में से एक में हुई हिंसा में 100 से ज्यादा लोग मारे गए हैं.

पुलिस ने उस दिन तो माहौल संभाल लिया, लेकिन आधी रात को दोबारा गोलीबारी शुरू हो गई. इसे रोकने में दो पुलिसवाले भी ज़ख्मी हो गए. जब तक और फ़ोर्स आती, तब तक अगला दिन आ चुका था. और, मरनेवालों की संख्या 116 तक पहुंच चुकी थी. ये इक्वाडोर के इतिहास में जेल के भीतर हुई सबसे बड़ी और सबसे बर्बर हिंसा है. इससे पहले फ़रवरी और मई में भी इक्वाडोर की कई जेलों में एक साथ दंगे भड़के थे. इस साल इक्वाडोर में जेल के अंदर हुई हिंसा में दो सौ से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. राष्ट्रपति ने सभी जेलों में आपातकाल लगाने का ऐलान कर दिया है. इसके बाद सेना जेलों को अपने नियंत्रण में ले सकती है. अधिकारियों को भी जांच संबंधी विशेष अधिकार दिए गए हैं. लिटोराल जेल में फिलहाल चार सौ अतिरिक्त पुलिस फ़ोर्स को तैनात किया गया है.

इक्वाडोर की जेलों में इतनी हिंसा होती क्यों है?

अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, इक्वाडोर में कुल 65 जेलें है. इनमें तीस हज़ार क़ैदियों के रहने की व्यवस्था है. इसकी बजाय जेलों में फिलहाल 39 हज़ार क़ैदी बंद हैं. तय संख्या से तीस प्रतिशत ज़्यादा. उपलब्ध संसाधन उन क़ैदियों पर नज़र रखने के लिए पर्याप्त नहीं है. राष्ट्रपति ने वादा किया है कि आने वाले दिनों में कुछ क़ैदियों को रिहा किया जाएगा. इसके अलावा, सिक्योरिटी कैमरों के लिए भी नए सिरे से फ़ंड जारी किए जाएंगे. ये पहले सोचने वाली बात थी. हालांकि, देर से ही सही, सरकार की नींद तो खुली है.

Ecuador Prison Riot
इक्वाडोर में कुल 65 जेलें है. इनमें तीस हज़ार क़ैदियों के रहने की व्यवस्था है. इसकी बजाय जेलों में फिलहाल 39 हज़ार क़ैदी बंद हैं.

दूसरी वजह है इक्वाडोर की लोकेशन. पेरू और कोलोंबिया से होने वाली ड्रग्स की सप्लाई का ट्रांज़िट रूट इक्वाडोर से होकर जाता है. मेक्सिको के ड्रग माफ़िया इक्वाडोर के लोकल गैंग्स की मदद से अपनी पकड़ मज़बूत बनाए रखना चाहते हैं. जो गैंग जितना ख़तरनाक होगा, उसके लिए बेहतर डील्स का रास्ता ख़ुद-ब-ख़ुद खुल जाएगा. बादशाहत बनाए रखने के लिए भी जेलों में गैंगवार करवाए जाते हैं. अभी वाली लड़ाई में जो दो गैंग भिड़े, उनमें से एक कुख़्यात सिनालोआ कार्टेल जबकि दूसरा जलिसो न्यू जेनरेशन कार्टेल से संबंधित है.

तीसरी वजह है भ्रष्टाचार. इक्वाडोर के प्रिजन सिस्टम में करप्शन हद तक फैला हुआ है. बड़े-बड़े अधिकारियों से लेकर नेता तक इन गैंग्स से हिस्सेदारी खाते हैं. जेलों में वैसे भी गार्ड्स की कमी है. नीचे के लेवल के गार्ड्स के पास न तो संसाधन हैं और न ही उन्हें ढंग का वेतन मिलता है. इसलिए वे जेल की ड्यूटी करने की बजाय गैंग्स का काम करते हैं. उनकी नाक के नीचे से ड्रग्स और हथियारों की सप्लाई जेल के अंदर होती रहती है. और, हिंसा कायम रहती है.

Ecuador Prison Violence
पुलिसवालों की नाक के नीचे से ड्रग्स और हथियारों की सप्लाई जेल के अंदर होती रहती है. और, हिंसा कायम रहती है.

जानकारों का कहना है कि कुछ दिखावटी ऐलानों से सबकुछ ठीक होने की उम्मीद करना बेमानी है. अगर सच में सरकार सजग है तो उन्हें सबसे पहले सिस्टम के भीतर सफ़ाई अभियान चलाना होगा.


दुनियादारी: अमेरिका का एक शहर चीनियों से किस गुनाह के लिए माफ़ी मांग रहा है?

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