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रूस ने यूक्रेन को डराया, ब्रिटेन और कनाडा ने सेना उतारी

19वीं सदी में ब्रिटेन में एक मशहूर लेखक हुए. हर्बर्ट जॉर्ज वेल्स. उन्होंने युद्ध के बारे में बड़े मार्के की बात कही थी,

If we don’t end war, war will end us.

अगर हमने युद्ध का चलन खत्म नहीं किया तो युद्ध हमें खत्म कर देगा.

वेल्स की बातों को बड़े गौर से पढ़ा-सुना गया. मगर जब उस पर अमल करने की बात आई तो सब मज़ाक उड़ाकर आगे बढ़ गए. नतीजा, वेल्स ने अपने जीवन में दो विश्व युद्ध देखे. पहला 1914 से शुरू होकर 1918 तक चला. वेल्स ने पहले विश्व युद्ध की वीभीषिका देखकर एक किताब लिखी. The War that will end War. यानी, ये पहले युद्ध की सभी संभावनाओं को खत्म करने वाला युद्ध है.

लेकिन इंसान का चरित्र उनकी सोच के उलट था. उन्हीं के जीते-जी दूसरा विश्व युद्ध भी हुआ. 1946 में वेल्स की मौत हो गई. उनके जाने के बाद भी दुनियाभर में युद्ध नहीं रुके. ये सिलसिला आज तक जारी है. तब समझ में आता है कि एक युद्ध बीतते-बीतते दूसरे युद्ध का बीज रोप जाता है.

इसका एक हालिया उदाहरण रूस और यूक्रेन के बीच बढ़ रहा तनाव है. बातचीत की मेज़ों पर उदासी पसरी है. सीमाओं पर चहल-पहल है. रूस ने बेलारूस की सीमा के पास युद्ध अभ्यास शुरू कर दिया है. वो बेलारूस की सेना के साथ भी मिलिटरी ड्रिल करने वाला है. यूक्रेन भी पीछे नहीं है. उसने अपने सहयोगियों को फ़ोन लगाना शुरू कर दिया है. पहला सपोर्ट ब्रिटेन और कनाडा से मिला है. ब्रिटेन ने एंटी-टैंक हथियारों, जबकि कनाडा ने स्पेशल फ़ोर्सेज़ की पहली खेप यूक्रेन में तैनात कर दी है. कभी भी, कुछ भी घटित होने की आशंका बलवती होती जा रही है.

आज जानेंगे, रूस और यूक्रेन का झगड़ा इस स्तर तक कैसे पहुंचा? और, अगर युद्ध हुआ तो कौन किसे सपोर्ट करेगा?

साथ में बताएंगे, यूएई में एयरपोर्ट हुए एक ड्रोन हमले की कहानी. जिसमें दो भारतीयों समेत तीन लोगों की मौत हो गई. ये हमला अप्रत्याशित क्यों है? और, यूएई इसका बदला लेने के लिए क्या कर रहा है?

तारीख़, 13 जनवरी 2022. रूस की सत्ता के केंद्र क्रेमलिन की तरफ़ से यूक्रेन मसले को लेकर एक बयान जारी हुआ. क्रेमलिन के प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव की तरफ़ से. पेस्कोव ने बताया कि हम पिछले कुछ दिनों से अमेरिका और नाटो के साथ बात कर रहे थे. जेनेवा और ब्रुसेल्स में दो राउंड की बातचीत पूरी हो चुकी है. लेकिन इसका कुछ नतीजा नहीं निकला. बुनियादी मसलों पर हमारी असहमति बनी हुई है.

इस बयान के एक दिन बाद ही यूक्रेन में ज़बरदस्त साइबर हमला हुआ. इस हमले में यूक्रेन की लगभग 70 सरकारी वेबसाइट्स को निशाना बनाया गया. हमले में कंप्यूटर्स का डेटा उड़ाकर लिखा गया था,

यूक्रेन वालों, क़यामत के लिए तैयार रहो.

यूक्रेन ने इस साइबर हमले के लिए रूस को ज़िम्मेदार बताया. इससे पहले 2017 में भी रूस ने नॉटपेटा वायरस के ज़रिए यूक्रेन को भारी नुकसान पहुंचाया था. उस हमले में दुनिया को लगभग 75 हज़ार करोड़ का नुकसान हुआ था. जानकारों का कहा कि आने वाले दिनों में यूक्रेन में और भी साइबर हमले हो सकते हैं.

साइबर हमलों के अलावा रूस और क्या कर रहा है?

रूस ने सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है. वो अपने सैनिकों को बेलारूस भेज रहा है. वहां फ़रवरी में बेलारूस की सेना के साथ अभ्यास की योजना है. बेलारूस लंबे समय से रूस का दोस्त रहा है. व्लादिमीर पुतिन बेलारूस के तानाशाह राष्ट्रपति अलेक्ज़ेंडर लुकाशेनको को सपोर्ट करते हैं.

2014 में जब रूस ने क्रीमिया पर क़ब्ज़ा किया था, तब लुकाशेनको ने न्यूट्रल ग्राउंड चुना था. उन्होंने रूस के क़ब्ज़े को समर्थन नहीं दिया था. लेकिन जब से पश्चिमी देशों ने बेलारूस पर प्रतिबंध लगाने शुरू किए हैं, लुकाशेनको पुतिन के करीब होते जा रहे हैं. उन्होंने ना सिर्फ़ क्रीमिया पर क़ब्ज़े को सही ठहराया, बल्कि यूक्रेन मसले में भी रूस का साथ देने की बात कही है. बेलारूस की सैकड़ों किलोमीटर की सीमा यूक्रेन से सटी है. युद्ध की स्थिति में रूस बेलारूस की ज़मीन का इस्तेमाल कर सकता है.

रूस ने हाल के दिनों तक ये कहा है कि उसका यूक्रेन पर हमला करने का कोई प्लान नहीं है. 16 जनवरी को दमित्री पेस्कोव ने सीएनएन पर एक शो के दौरान भी यही बात दोहराई. पेस्कोव ने ज़ोर लेकिन बॉर्डर पर लगभग दो लाख सैनिकों का जमावड़ा, अत्याधुनिक हथियारों की तैनाती, बेलारूस के साथ युद्ध अभ्यास, यूक्रेन की सरकारी वेबसाइट्स पर हमला और यूक्रेन की पूर्वी सीमा पर अलगाववादियों को सपोर्ट. ये सारी कड़ियां मिलकर एक ही तरफ़ इशारा करती हैं. रूस की उस कुख़्यात प्लानिंग की तरफ़. जिसके तहत रूस बीते दौर का गौरव लौटाना चाहता है.

यूक्रेन लंबे समय तक रूसी साम्राज्य और बाद में सोवियत संघ का हिस्सा रहा. इस वजह से रूस उसे अंततोगत्वा अपनी सीमा में मिलाने की फ़िराक़ में है. 1950 के दशक में सोवियत संघ ने क्रीमिया को उसे उपहार के तौर पर दिया था. लेकिन 2014 में रूस ने बलपूर्वक वो उपहार छीन लिया.

दूसरा यूक्रेन रूस और यूरोपियन यूनियन के ठीक बीच में है. यूक्रेन पिछले कुछ समय से नाटो में शामिल होने की कोशिश कर रहा है. रूस इसे किसी भी क़ीमत पर रोकना चाहता है. यूक्रेन मसले को लेकर होने वाली बातचीत में वो यही मांग रख रहा है. हालांकि, रूस इसी मांग तक सीमित नहीं है. उसका कहना है कि नाटो और अमेरिका सेंट्रल यूरोप में 1997 से पहले वाली स्थिति में लौट जाए.

हम लौटते हैं मूल विषय की तरफ़.

रूस की तैयारी तो ज़ोरों पर है. इस बीच में यूक्रेन क्या कर रहा है?

अमेरिकी एजेंसियों ने चेतावनी जारी की थी कि रूस यूक्रेन के पूर्वी बॉर्डर पर माहौल ख़राब करने की कोशिश कर रहा है. ताकि उसे हमले का बहाना मिल जाए. यूक्रेन के पूर्वी बॉर्डर पर 2014 से सिविल वॉर चल रहा है. इस झगड़े में अभी तक 14 हज़ार से अधिक लोगों की जान जा चुकी है.

चेतावनी जारी होने के तुरंत बाद यूरोप के दो देश यूक्रेन के सपोर्ट में आए हैं. ब्रिटेन के रक्षा मंत्री बेन वॉलेस ने संसद में कहा कि उनका देश यूक्रेन को लाइट एंटी-आर्मर डिफ़ेंसिव हथियार सप्लाई करेगा. ब्रिटेन का कहना है कि ये हथियार सुरक्षा के लिए हैं. रूस के हमले की स्थिति में ये काम आएंगे. ब्रिटेन सैनिकों की एक टुकड़ी भी भेज रहा है. वे यूक्रेनी सैनिकों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देंगे. हथियारों और सैनिकों की कितनी संख्या यूक्रेन भेजी जाएगी, इस बारे में अभी स्पष्ट जानकारी नहीं है.

17 जनवरी को कनाडा के विदेश मंत्री यूक्रेन के दौरे पर थे. राजधानी किएव में उन्होंने यूक्रेनी प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की. इस मुलाक़ात के बाद ग्लोबल न्यूज़ ने ख़बर चलाई कि कनाडा स्पेशल फ़ोर्सेज़ की एक टीम यूक्रेन भेज रहा है. ये टीम रूस के हमले की स्थिति में कनाडा के लोगों को निकालने और यूक्रेन सरकार को सलाह देने का काम करेगी. ये टीम सीधे तौर पर किसी लड़ाई में शामिल नहीं होगी.

यूक्रेन ना तो अभी यूरोपियन यूनियन और ना ही नाटो का मेंबर बना है. इसलिए, रूसी हमले की स्थिति में कोई पश्चिमी देश सीधे तौर पर उसकी मदद शायद ही करे. लेकिन हथियार और सलाह के स्तर पर उसे सपोर्ट मिलता रहेगा. अमेरिका, रूस के अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम पर प्रतिबंध लगा सकता है. इसके अलावा जर्मनी ने रूस की नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइन को नामंजूर करने की धमकी भी दी है.

क्या आर्थिक नुकसान की आशंकाएं पुतिन को अपने ड्रीम प्लान से पीछे हटा सकती है, ये कहना बहुत मुश्किल है. इतना ज़रूर है कि आने वाले कुछ दिनों में निर्णायक ख़बरें सुनने को मिल सकतीं है.

इस मोर्चे पर हमारी नज़र बनी रहेगी.

रूस और यूक्रेन के चैप्टर को यहीं पर विराम देते हैं. अब चलते हैं अगले झगड़े की तरफ़. ये झगड़ा मिडिल ईस्ट के देश यमन में 2015 से चल रहा है. इस झगड़े में 17 जनवरी 2022 को बड़ा मोड़ आया. इस दिन यूएई के आबूधाबी एयरपोर्ट पर ड्रोन हमला हुआ. इस हमले में दो भारतीय समेत तीन लोग मारे गए, जबकि छह लोग घायल हो गए. इस हमले की ज़िम्मेदारी यमन के हूती विद्रोहियों ने ली. हमले के बाद यूएई ने बदले की धमकी दी. 18 जनवरी को यूएई और उसके सहयोगी देशों ने हूती ठिकानों पर कई हवाई हमले किए हैं.

अब आपके मन में सवाल होगा कि हूती विद्रोही कौन हैं?

ये समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. यमन पर एक हज़ार साल तक ज़ायदी मुसलमान राजाओं का शासन रहा. 1962 में अंतिम ज़ायदी सुल्तान इमाम अहमद की हत्या हो गई. इसके बाद लंबे समय तक सिविल वॉर चला.

यमन दो हिस्सों में बंटा. साउथ और नॉर्थ यमन. साउथ यमन में कुछ समय तक कम्युनिस्ट विचारधारा की हवा भी चली.

1978 में नॉर्थ यमन में अली अब्दुल्लाह सालेह राष्ट्रपति बनाए गए. उनके समय में नॉर्थ और साउथ में फिर से लड़ाई छिड़ गई. ये लड़ाई तब खत्म हुई, जब सोवियत संघ का पहिया पटरी से उतरने लगा था. इसका असर यमन पर भी हुआ. नॉर्थ और साउथ यमन मिल गए. इस मिलन को रिपब्लिक ऑफ़ यमन का नाम मिला.

हूती विद्रोहियों की कहानी 1990 के दशक में शुरू हुई थी. नामकरण नया था, मगर सूत्रधार वही. अली अब्दुल्लाह सालेह की सत्ता पर कोई आंच नहीं आई. वो एकीकृत यमन के पहले राष्ट्रपति बने. उन्हें साथ मिला सऊदी अरब और अमेरिका का. सऊदी अरब सुन्नी इस्लामिक देश है. उन्होंने यमन में सलाफ़ी मूवमेंट को बढ़ावा दिया.

इन सबके बीच ज़ायदी शिया मुस्लिम किनारे पर चले गए. एक समय के सुल्तान, मुफ़लिसी का जीवन जीने को मजबूर थे. अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए ही बेदरदीन अल-हूती ने ‘बिलिविंग यूथ’ नामक संगठन बनाया था. शुरुआती सालों में इसने बहुत सारे क्लब बनाए. समर कैंप्स लगाए. युवाओं को अपनी तरफ खींचा. इन कैंप्स में शिया स्कॉलर्स की किताबें पढ़ाई जातीं. लेबनान और ईरान के शिया धर्मगुरुओं की कहानियां बाचीं जाती थीं.

एक तरफ़ यमन सरकार सुन्नी सऊदी, अमेरिका और इजरायल के साथ झूला झूल रही थी. वहीं ज़ायदी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे. वे अपने लिए ज़रूरी संसाधनों और अधिकारों की मांग कर रहे थे. सरकार ने उनकी मांगों को अनसुना कर दिया. इससे नाराज़ बेदरदीन अल-हूती ने सरकार के ख़िलाफ़ रैलियां निकालीं. इन रैलियों से सालेह सरकार परेशान हो गई.

सरकार ने अल-हूती के ख़िलाफ़ अरेस्ट वारंट निकाल दिया. लेकिन इससे मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया. सेना और अल-हूती के समर्थकों के बीच हिंसक जंग शुरू हो गई. दोनों तरफ से लोग मरने लगे.

10 सितंबर 2004 को सेना ने एक मुठभेड़ में बेदरदीन अल-हूती को मार दिया. ये चिनगारी के भड़कने का पहला संकेत था. अल-हूती के समर्थकों ने यमन सरकार के खिलाफ सीधी जंग का ऐलान कर दिया. अल-हूती के नाम पर इस आंदोलन को नाम मिला, हूती विद्रोह. उनके समर्थक कहलाए हूती विद्रोही.

इस लड़ाई में यमन सरकार ने अपना पूरा दमखम झोंक दिया. आर्मी और एयरफ़ोर्स ने हूती विद्रोहियों के ठिकानों पर खूब बम बरसाए. बरसे तो पैसे भी. सऊदी अरब की ज़ेब से. सऊदी यमन सरकार की तरफ था. पलड़ा भारी था. सरकार का पलड़ा भारी था. मगर किस्मत नहीं. इस लड़ाई में हूती विद्रोहियों ने बाजी मार ली. उन्होंने नए ठिकानों पर कब्ज़ा कर लिया. ये सऊदी अरब के मुंह पर करारा तमाचा था.

साल 2010 में हूती विद्रोहियों ने यमन सरकार के साथ समझौता कर लिया. दोनों पक्ष युद्धविराम पर राज़ी हो गए. हलचल थम गई. मगर पूरी तरह नहीं. पड़ोस में एक और बड़ी हलचल पकने के लिए तैयार थी. ट्यूनीशिया में. दिसंबर के महीने में. एक फल विक्रेता के चेहरे पर लगे एक थप्पड़ ने अरब स्प्रिंग का बटन दबा दिया था.

ट्यूनीशिया से शुरू हुई आग धीरे-धीरे पूरे मिडिल-ईस्ट में फैल गई. वहां दशकों से तानाशाही सरकारें कायम थीं. यमन में अली अब्दुल्लाह सालेह 32 सालों से सरकार चला रहे थे. उनके ख़िलाफ़ विद्रोह हुआ. सालेह ने अपने सहयोगी मंसूर हादी को सत्ता सौंप दी. लेकिन ये पावर ट्रांसफ़र ठीक से हो नहीं पाया.

जनवरी 2015 में हूती विद्रोहियों ने प्रेसिडेंशियल पैलेस पर क़ब्ज़ा कर लिया. राष्ट्रपति मंसूर हादी देश छोड़कर भाग गए. सत्ता हूती विद्रोहियों के हाथों में आ गई.

उधर मंसूर हादी भागकर सऊदी अरब गए. सऊदी को अपना आधार खिसकने का डर था. उसे ये शक भी था कि हूती विद्रोहियों की मदद ईरान कर रहा है. इसी बुनियाद पर उसने हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया. सऊदी अरब के नेतृत्व में गठबंधन सेना ने यमन में युद्ध शुरू किया. इस गठबंधन में एक किरदार यूएई का भी है. बाकी सहयोगियों में अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस का नाम आता है.

यूएई पर हुआ ड्रोन हमला अप्रत्याशित क्यों है?

इसकी कई वजहें है. यूएई की कोई सीमा यमन से नहीं लगती. सऊदी अरब की एक सीमा यमन से सटी है. हूती विद्रोही लंबे समय से सऊदी अरब के तेल खदानों पर हमला करते रहे हैं. लेकिन यूएई इससे बचा रहा. उसकी ज़मीन पर हूती विद्रोहियों का आख़िरी हमला 2018 में हुआ था.

यूएई शुरुआती दौर में हूती विद्रोहियों से सीधे नहीं उलझा. 2019 के बाद उसने यमन में अपनी मौज़ूदगी कम कर दी थी. लेकिन पिछले कुछ हफ़्तों से यूएई ने अपने हथियारों का मुंह हूती विद्रोहियों की तरफ़ खोल दिया है. यूएई के समर्थन वाली जायंट ब्रिगेड्स ने हूती विद्रोहियों के क़ब्ज़े वाले कई इलाकों को अपने नियंत्रण में लिया है.

अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 का साल हूती विद्रोहियों के लिए काफी अच्छा रहा. उन्होंने सरकार के नियंत्रण वाले आख़िरी शहर मरीब में भी कोहराम मचाया. लेकिन जायंट ब्रिगेड के आगमन के बाद स्थिति पलट गई है. इस वजह से हूती विद्रोहियों का गुस्सा बढ़ा हुआ है. आबूधाबी एयरपोर्ट पर ड्रोन हमला इसी गुस्से की वजह से हुआ है.

जानकारों की मानें तो हूती विद्रोही यूएई पर और भी भीषण हमला करने में सक्षम हैं. उन्होंने सऊदी अरब के मामले में ऐसा करके दिखाया भी है. सऊदी तेल कंपनी अरामको को कई बार तेल उत्पादन रोकना पड़ा था.

एयरपोर्ट पर हमले के बाद यूएई ने बदला लेने का वादा किया. गठबंधन सेना ने सना में हूती विद्रोहियों के ठिकानों पर बमबारी शुरू कर दी है. इस हमले में 14 लोगों के मारे जाने की ख़बर है. अल-अरबिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस हमले में एक हूती कमांडर भी मारा गया है.

यूएई ने कहा है कि आतंकी घटनाओं का जवाब देना उसका अधिकार है और वो ऐसा करता रहेगा. कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में दोनों पक्षों के बीच हिंसा बढ़ेगी.


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