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जैकब ज़ुमा की गिरफ्तारी के बाद दक्षिण अफ्रीका में क्यों हो रहे हैं दंगे?

किसी चीज़ को बिगाड़ना और उसे तबाह करना बेहद आसान है. असली नायक वे हैं जो शांति स्थापित करते हैं और नया निर्माण करते हैं.

ये शब्द कहे थे दक्षिण अफ़्रीका के महान नेता नेल्सन मंडेला ने. 18 जुलाई को उनका जन्मदिन होता है. ताउम्र शांति और अहिंसा के पैरोकार रहे मंडेला का देश पिछले एक हफ़्ते से ख़ून-खराबे और लूटपाट की आग में झुलस रहा है. वजह है एक गिरफ़्तारी. एक ऐसे नेता की गिरफ़्तारी जो एक दशक तक देश का राष्ट्रपति रहा. गद्दी छोड़ने के बाद उसके ऊपर घूसखोरी और गबन के आरोप लगे. उसने समय-समय पर अदालत की अवमानना की. और, जब उसे गिरफ़्तार किया गया तो देशभर में दंगे भड़क उठे.

कौन है ये शख़्स जिसकी गिरफ़्तारी ने पूरे दक्षिण अफ़्रीका का रूटीन बिगाड़ दिया है? उसकी पूरी कहानी क्या है? इस दंगाई अध्याय की और क्या वजहें गिनाई जा रहीं है? और, दक्षिण अफ़्रीका में रह रहे भारतीयों पर इन घटनाओं का क्या असर पड़ा है?

आज से एक हफ़्ते पहले की बात है. तारीख़ 12 जुलाई 2021. दक्षिण अफ़्रीका का डरबन शहर बिखरा हुआ था. आगजनी और तोड़फोड़ के निशान हर सड़क पर चस्पा थे. इस तबाही के आगोश में एक बहुमंजिला इमारत भी आई थी. इस इमारत में भयानक आगजनी हुई थी. वैसे तो आस-पास की हर बिल्डिंग का हाल एक जैसा था. लेकिन कुछ ही समय बाद उस इमारत पर कुछ ऐसा दिखा, जिसने पूरा नज़ारा ही बदल दिया. एक महिला अपनी बच्ची को लेकर दूसरी मंजिल की बालकनी में खड़ी थी. कुछ सेकेंड तक सोचने के बाद उसने बच्ची को सड़क की तरफ उछाल दिया. गनीमत ये रही कि आस-पास खड़े भले लोगों ने बच्ची को पकड़ लिया. उसे बचा लिया गया था. बाद में फ़ायरफ़ाइटर्स ने मां को भी सुरक्षित निकाल लिया.

यहां पर सवाल उठता है कि ऐसी क्या नौबत आई कि एक मां को अपनी दो साल की बच्ची को नीचे फेंकना पड़ा? इसका जवाब कुछ दिनों बाद मिला. जब ब्रिटिश अख़बार द गार्डियन ने मां से बात की. इस बातचीत से क्या पता चला? ये परिवार उस इमारत की सोलहवीं मंजिल पर रहता था. 12 जुलाई को दंगाइयों ने नीचे की दुकानों में आग लगा दी. धीरे-धीरे आग की लपटें ऊपर की तरफ आने लगी. धुएं की वजह से दम घुटने लगा तो मां अपनी बेटी को लेकर नीचे की तरफ भागी. वो किसी तरह दूसरी मंज़िल तक पहुंच गई. लेकिन नीचे जाने का रास्ता बंद हो चुका था. फिर वो किसी तरह बालकनी में पहुंची और बच्ची को अज़नबी लोगों के भरोसे पर नीचे उछाल दिया. मां ने बताया कि उसके पास कोई रास्ता नहीं बचा था. वो किसी तरह बच्ची की जान बचाना चाहती थी.

इस घटना का वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. तब लोगों को अहसास हुआ कि दक्षिण अफ़्रीका की समस्या कितनी गंभीर है. हालांकि, ये घटना तो एक हिस्सा भर थी. अगर पूरे माहौल का मज़मून जानना हो तो कुछ आंकड़ों से समझने की कोशिश करते हैं-

– 8 जुलाई से 18 जुलाई के बीच कम से कम 212 लोगों की जान जा चुकी है.

– हिंसा का पहला वाकया क्वाज़ुलू-नटाल में दर्ज़ किया गया था. यहां अब तक लगभग आठ हज़ार करोड़ रुपये की लूटपाट हो चुकी है.

– जोहानसबर्ग और डरबन सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं. वहां पुलिस की मदद के लिए सेना उतारनी पड़ी है.

– पूरे इलाके में ज़रूरी सामानों की भारी किल्लत है. लोगों को स्टोर के बाहर घंटों लाइन में लगना पड़ रहा है. पुलिस सप्लाई ट्रकों को एस्कॉर्ट कर रही है.

– कई जगहों पर वैक्सिनेशन सेंटर्स को बर्बाद कर दिया गया. दोनों प्रांत मिलाकर दवा की 131 दुकानों को निशाना बनाया गया है. आशंका जताई जा रही है कि लूटी गई दवाओं को ब्लैक मार्केट में बेचा जा सकता है.

– पुलिस ने अभी तक 25 सौ से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया है. कहा जा रहा है कि आने वाले समय में और सख़्ती देखने को मिलेगी.

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मार्केट में लूटपाट करते लोग. फोटो- PTI

अब तक आपको इन दंगों के ताप का अंदाज़ा मिल गया होगा. अब ये समझते हैं कि ये दंगे शुरू क्यों हुए? इसकी दो मुख्य वजहें बताई जा रहीं है.

– पहली वजह तात्कालिक है. ये एक गिरफ़्तारी से जुड़ी है. किसकी गिरफ़्तारी? दक्षिण अफ़्रीका के पूर्व राष्ट्रपति जैकब ज़ुमा की. जैकब ज़ुमा को दक्षिण अफ़्रीका के सबसे विवादित और रंगीन नेताओं में गिना जाता है. एक कहावत चलती है कि ज़ुमा नौ ज़िंदगियां जी चुके हैं. कई स्कैंडल्स में उनका नाम आ चुका है. उनके ऊपर रेप के आरोप भी लग चुके हैं. उनकी जगह कोई और होता तो उसका राजनैतिक कैरियर कब का चौपट हो चुका होता. लेकिन ज़ुमा का करिश्मा बरकरार है. इसकी दो मुख्य वजहें बताई जाती हैं. पहली उनका बैकग्राउंड. और, दूसरी लोगों तक उनकी पहुंच. ज़ुमा बेहद ग़रीब परिवार में पैदा हुए थे. उन्होंने नस्लभेद के ख़िलाफ़ लंबी लड़ाई लड़ी है. आम लोगों से उनका जुड़ाव रहा है. राष्ट्रपति बनने के बाद भी वो सबकी पहुंच में थे. लेकिन इस आवरण के पीछे का चेहरा भद्दा था. जब वो भेद खुला तो लोगों का मोह छूटने लगा.

ज़ुमा मई 2009 से फ़रवरी 2018 तक राष्ट्रपति पद पर रहे. इस दौरान उनके ऊपर पद के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के आरोप लगे. ज़ुमा से फायदा पाने वालों की लिस्ट में भारतीय मूल के गुप्ता बंधुओं का नाम भी आया. जब ज़ुमा कुर्सी से उतरे, उनके ख़िलाफ़ जांच बिठा दी गई. ज़ुमा ने कहा कि आरोप राजनीति से प्रेरित हैं. मैंने कोई भ्रष्टाचार नहीं किया है. अदालत ने कहा कि आपकी सब बात ठीक है, लेकिन आप जांच कमीशन के सामने पेश होइए. ज़ुमा ने ऐसा करने से साफ़ मना कर दिया. हर बार वो अदालत के आदेश को मानने से इनकार करते रहे.

आख़िरकार, 29 जून 2021 को उन्हें अदालत की अवमानना का दोषी करार दिया गया. जैकब ज़ुमा को 15 महीने जेल की सज़ा सुनाई गई. भ्रष्टाचार वाला मुक़दमा अलग से चलता रहेगा. उस मामले में अभी फ़ैसला नहीं आया है. अदालत ने सज़ा तो सुना दी. अब अमल करने की बारी आई. ज़ुमा के करीबियों ने प्रचार किया कि उनके नेता को जान-बूझकर फंसाया गया है. वे इस सज़ा को नहीं मानेंगे. इसके बाद हज़ारों की संख्या में ज़ुमा के घर के बाहर इकट्ठा हो गए. उन्होंने साफ़ कर दिया कि ज़ुमा को अरेस्ट करने से पहले पुलिस को उनकी लाश पर से गुज़रना पड़ेगा. ये पूरा हंगामा 07 जुलाई तक चला. अचानक से ज़ुमा का हृदय-परिवर्तन हुआ. उन्होंने आधी रात को पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. उम्मीद बंधी कि पूरा गतिरोध समाप्त हो जाएगा. अब तनाव वाली स्थिति नहीं रहेगी.

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कहीं इमारतों में आग है तो कहीं लूट की घटनाएं. फोटो- PTI

लेकिन ये सब दिवास्वप्न साबित हुआ. ज़ुमा के सरेंडर के दो दिन के बाद ही हिंसा की छिटपुट घटनाएं सामने आने लगीं. धीरे-धीरे हमले बढ़ने लगे. ज़ुमा के समर्थकों ने शॉपिंग मॉल्स और फ़ैक्ट्रियों को निशाना बनाना शुरू किया. इसके बाद सप्लाई वाले ट्रकों पर हमले हुए. इन हमलावरों का इरादा गुस्सा जताने भर तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने सामानों की लूटपाट शुरू कर दी. जिसको जहां से जो मिला, वो लूटने लगा. कई लोग तो सामान लूटने के दौरान मची भगदड़ में कुचल कर मर गए. मुख्य राजमार्गों को बंद कर दिया गया. दक्षिण अफ़्रीका अराजक स्टेट का जीता-जागता सबूत बन चुका था.

इस तांडव के पीछे कौन लोग थे? जाहिर बात है कि ये आग ज़ुमा समर्थकों ने सुलगाई थी. फिर इसमें अराजक तत्व शामिल होते गए और स्थिति बेकाबू हो गई. इस वक़्त दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति हैं सिरिल रामाफ़ोसा. उनका बयान है कि ये पूरी हिंसा प्लानिंग के तहत की गई है. उन्होंने किसी का नाम तो नहीं लिया. लेकिन उनका इशारा जैकब ज़ुमा की तरफ ही था. रामाफ़ोसा ने कहा है कि ये लोकतंत्र को हाईजैक करने की साज़िश थी. उनकी सरकार ऐसे लोगों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेगी.

– पहली वजह तो आपने समझ ली. दूसरी वजह है बढ़ती ग़रीबी, महंगाई और बेरोज़गारी. दक्षिण अफ़्रीका की आधी से अधिक आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रही है. एक बड़ी आबादी को भरपेट भोजन तक नहीं मिल रहा है. ग़रीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ती जा रही है. इसके अलावा, युवाओं में बेरोज़गारी दर 32 फीसदी तक पहुंच गई है.

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दक्षिण अफ्रीका में हालात काफी तनावपूर्ण हो चले हैं. फोटो- PTI

इन सारी समस्याओं को कोरोना महामारी ने कई गुणा बढ़ा दिया था. लोग अपना गुस्सा निकालने के लिए एक मौके का इंतज़ार कर रहे थे. जानकारों का कहना है कि अगर सरकार ने इसपर ध्यान नहीं दिया तो आनेवाले समय में स्थिति और बिगड़ सकती है.

ये तो हुई दक्षिण अफ़्रीका में चल रही हिंसा और लूटपाट की कहानी. अब इसका भारतीय पक्ष जान लेते हैं. दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय मूल के लाखों लोग रहते हैं. इनमें से कई उद्योग-धंधे चलाते हैं. हिंसा के बाद से उनके व्यवसाय को गहरा धक्का पहुंचा है. इस हिंसा में भारतीय मूल के कई लोगों की जान भी गई है. हालांकि, अभी तक उनकी वास्तविक संख्या का पता नहीं चल सका है.

14 जुलाई को भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने दक्षिण अफ़्रीकी समकक्ष से बात की. इस दौरान उन्होंने भारतीयों की सुरक्षा का मसला उठाया था. बातचीत के बाद ट्वीट आया कि वहां की सरकार ने भारतीयों की सुरक्षा करने का वादा किया है.

इसके बावजूद लोगों को अपनी सुरक्षा की तैयारी ख़ुद करनी पड़ रही है. उन्होंने अपनी सोसाइटी में विजिलेंट समूह बनाए हैं, जो चौबीसों घंटे निगरानी करते हैं. वे हिंसा का जवाब हिंसा से देने के लिए भी तैयार हैं. वजह साफ़ है. प्रशासन से उनका भरोसा उठ चुका है. पुराना भरोसा लौटाने में कितना समय लगेगा, ये देखने वाली बात होगी.

खबर का अंत नेल्सन मंडेला की कही एक बात से करते हैं-

‘हम कभी न गिरें, ये गर्व का विषय नहीं है. ठोकर खाकर फिर से लड़ने के लिए तैयार हो जाना हमारा असली हासिल है.’

हम उम्मीद करते हैं कि मंडेला का देश अपने प्रेरक पुरखों के कहे का मान रखने में ज़रूर कामयाब होगा.


 

वीडियो- दुनियादारी: साउथ अफ्रीका के दंगों में भारतीय मूल के लोगों पर क्या आफत आई?

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