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बॉलीवुड में साइडकिक का रोल करने वाला ये एक्टर, मराठी सिनेमा की बहुत बड़ी शख्सियत है

फिल्म इंडस्ट्री बहुत बड़ा उद्योग है. कई-कई लोगों का ख़ून-पसीना लगा होता है इसे चलाए रखने में. चाहे वो बॉलीवुड हो या फिर क्षेत्रीय भाषा की फ़िल्में बनाने वाली इंडस्ट्री. ज़ाहिर सी बात है सालभर में कई सारी फ़िल्में और उनसे चमकने वालों की भरमार तो होगी ही. ऐसे में किसी फिल्म इंडस्ट्री को कोई दो-चार ही लोग दशक भर तक अपने कंधों पर ढोते रहें तो ये बहुत बड़ी बात कहलाई जानी चाहिए. मराठी सिनेमा आज अपने अभिनव कथ्य, शिल्प और अभिनेताओं की विस्तृत रेंज के कारण स्पॉटलाइट में है. लेकिन 80-90 के दशक में जब इन सब चीज़ों का भयानक अकाल था तो एक आदमी ने बरसों तलक अपने कंधों पर इंडस्ट्री संभाल रखी थी. उसका साथ देने के लिए महज़ एक-दो लोग ही और थे. उस अद्भुत कलाकार का नाम था लक्ष्मीकांत बेर्डे.

मराठी सिनेमा जब तक रहेगा लक्ष्या का ऋणी रहेगा.
मराठी सिनेमा जब तक रहेगा, लक्ष्या का ऋणी रहेगा.

लक्ष्मीकांत बेर्डे ने उनके जितने ही प्रतिभाशाली अशोक सराफ के साथ मिलकर मराठी फिल्म इंडस्ट्री पर तकरीबन 15 साल राज किया. उस दौर में इन दोनों के अलावा मराठी सिनेमा का कोई काबिलेज़िक्र वली-वारिस नहीं नज़र आता था. उस दौर के तमाम अन्य कलाकारों का पूरा सम्मान करते हुए बेहद ज़िम्मेदारी से मैं ये बात कह रहा हूं. थोड़ा बहुत उल्लेखनीय काम सचिन पिलगांवकर और महेश कोठारे का भी रहा है लेकिन जो सुपरस्टार जैसा ग्लैमर था वो इन्हीं दोनों में था. जिनके नाम पर दर्शक सिनेमा घरों तक खिंचे चले आए, ऐसा करिश्मा इन दोनों का ही था. ख़ास तौर से लक्ष्मीकांत बेर्डे उर्फ़ महाराष्ट्र के प्यारे ‘लक्ष्या’ का. हिंदी सिनेमा के दर्शक उन्हें सूरज बड़जात्या की फिल्मों में हीरो की साइड किक के तौर पर देख चुके हैं. यकीन मानिए अपना लक्ष्या उससे कहीं ज़्यादा बड़ी शख्सियत है.

‘धडाकेबाज़’ लक्ष्या

‘धडाकेबाज़’ लक्ष्मीकांत बेर्डे की एक बेहद मशहूर फिल्म है. इसका मतलब है धूम-धड़ाका करने का आदी शख्स. लक्ष्या की पैदाइश तीन नवंबर 1954 को हुई. अभी वो किशोर ही थे कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान गणेश उत्सव के दौरान लक्ष्या को एक पंडाल में नाटक करने का मौक़ा मिला. उस घटना से उनकी एक्टिंग में दिलचस्पी बढ़ गई. फिर तो इंटर-स्कूल और इंटर-कॉलेज ड्रामा कम्पीटीशंस में उन्होंने प्राइजेस का ढेर लगा दिया. जल्दी ही उन्होंने ‘मुंबई मराठी साहित्य संघ’ में नौकरी कर ली. ताकि अपने प्यार अभिनय से नज़दीकी बनी रहे. कुछेक नाटकों में भूमिकाएं करने के बाद उनके हिस्से आया, पुरुषोत्तम बेर्डे का महाकामयाब प्ले ‘टूर टूर’. इस नाटक के बाद लक्ष्या की एक कॉमिक स्टाइल विकसित हुई, जो बेतहाशा पसंद की गई.

लक्ष्या की बम्पर-जम्पर-शम्पर या जैसी भी होती हो वैसी हिट फिल्म.
लक्ष्या की बम्पर-जम्पर-शम्पर या जैसी भी होती हो वैसी हिट फिल्म.

फिल्मों में लक्ष्या

मराठी सिनेमा में दर्शक-खेंचू अभिनेताओं की भयानक कमी ने जल्द ही लक्ष्या के लिए फिल्मों की राह खोल दी. ‘लेक चालली सासरला’ (बिटिया ससुराल चली – 1985) नाम की फिल्म से वो रुपहले परदे पर अवतरित हुए. यहां भी सक्सेस का स्वाद चखने में उन्हें ज़्यादा वक़्त नहीं लगा. जल्द ही वो वक़्त भी आ गया, जब उनकी हर फिल्म हिट होने लगी. ‘कॉमेडी किंग’, ‘कॉमेडी सुपरस्टार’ जैसे लकब उनके नाम के आगे लगने लगे. दर्शक सिर्फ उन्हें देखने के लिए टिकट खरीदने लगे.

1985 के बाद उनकी कितनी ही फ़िल्में एक के बाद एक रिकॉर्ड्स बनाती रहीं. ‘धूम धड़ाका’, ‘धड़ाकेबाज़’ ‘थरथराट’, ‘अशी ही बनवा बनवी’ जैसी कितनी ही फ़िल्में थी जिन्हें दर्शक बार-बार देखते थे.

जब ‘लक्ष्या माने ठहाका’ का समीकरण फिट हो गया था

इस आर्टिकल का लेखक उसी दौर में महाराष्ट्र में रहा है, जब लक्ष्या का सूरज उरूज़ पर था. उस दौर को याद करूं तो कितनी ही यादें अनायास चली आती हैं. हर संडे को दूरदर्शन जो फिल्म दिखाता था, वो अमूमन लक्ष्या की ही होती थी. इसके अलावा वीसीआर पर सारी रात तीन फ़िल्में देखने की भी प्रथा थी. ये मासिक आयोजन हुआ करता था. तब लक्ष्या की कितनी ही फ़िल्में बार-बार देखी.

'झपाटलेला' के सेट पर साथी महेश कोठारे और टीम के साथ लक्ष्या.
‘झपाटलेला’ के सेट पर साथी महेश कोठारे और टीम के साथ लक्ष्या.

कुछेक सीन तो कई फिल्मों में दोहराए गए. किसी मुसीबत में फंसा लक्ष्या अपने दोस्त महेश को पुकार रहा है. तुरंत महेश हाज़िर होकर उसे बचा लेता है. ये महेश अमूमन मराठी अभिनेता महेश कोठारे हुआ करते थे. महेश कोठारे और लक्ष्मीकांत बेर्डे का फिल्मों में नाम अक्सर लक्ष्या और महेश ही होता था. महेश का पुलिस इंस्पेक्टर होना भी लाज़मी था. जब तक दोनों ने साथ काम किया, ये ढर्रा बना रहा. एक से बढ़कर एक साहसी काम करने के बावजूद भी महेश का कभी प्रमोशन नहीं हुआ. बहरहाल वो जुदा मुद्दा है.

जब लक्ष्या ने निभाया था औरत का किरदार

1988 में एक फिल्म आई थी ‘अशी ही बनवा बनवी’. जो हृषिकेश मुखर्जी की ‘बीवी और मकान’ का रीमेक थी. लम्बी चौड़ी स्टार कास्ट थी. कुंवारों को घर देने में आनाकानी करते मकान-मालिक से निपटने के लिए चार दोस्तों में से दो लड़की बनकर रहते हैं. इन दो लड़कियों में से एक अपना लक्ष्या था. उनके साथी अशोक सराफ कहते हैं कि लक्ष्या का ये किरदार उनकें जीवन की सबसे उम्दा परफॉरमेंस है. परदे पर साड़ी पहनकर औरतों का अभिनय बहुत से अभिनेताओं ने किया है. लेकिन उसे वल्गर न होने देना, उसकी गरिमा कायम रखना बहुत कम लोगों को मुमकिन हो पाया है. लक्ष्मीकांत बेर्डे ने ये बेहद सहजता से किया.

देखिए इसी फिल्म से एक शानदार गीत, जो महाराष्ट्र में ज़बरदस्त हिट है.

He Came, He Saw, He Conquered

आप सोच रहे होंगे कि किसी मराठी एक्टर की तारीफ़ में ये इंग्लिश कहावत क्यों इस्तेमाल हो रही है. दरअसल ये भी एक याद है. इस जगतप्रसिद्ध कथन से – जो कि जूलियस सीज़र का बताया जाता है – मेरा साबका लक्ष्या के माध्यम से ही हुआ था. लक्ष्या की एक और सुपरहिट फिल्म ‘हमाल दे धमाल’ का एक गाना बचपन में मेरा फेवरेट हुआ करता था. लाल कोट में घोषणा करता लक्ष्या.. ‘मी आलो, मी पाहिलं, मी लढलो, मी जिंकुन घेतलं सारं’. यानी ‘मैं आया, मैंने देखा, मैं लड़ा और फिर मैंने सब जीत लिया’. न जाने कितनी बार गुनगुनाया ये गाना. ये तो बड़ा होने पर ज़ालिम दुनिया ने बताया कि इसका ओरिजिन कहां है.

आप भी देख लीजिए एक बार:

बॉलीवुड में लक्ष्या

हिंदी सिनेमा में लक्ष्या की एंट्री सलमान ख़ान के साथ ‘मैंने प्यार किया’ से हुई. ‘हम आपके है कौन’ में भी दोनों ने साथ काम किया. इसके अलावा भी उन्होंने काफी हिंदी फ़िल्में की, जिसमें उनका रोल मुख्यतः एक कॉमिक रिलीफ का ही रहा. एक भोंदू सा आदमी जिसके बोले साधारण शब्दों पर भी हंसी आ जाती थी. उनकी प्रमुख हिंदी फिल्मों में ‘साजन’, ‘100 डेज़’ और ‘बेटा’ जैसी फ़िल्में रहीं. कभी-कभी लगता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने इस कलाकार के साथ अन्याय ही किया.

फिल्मों के अलावा नाट्य जगत में भी उनका सिक्का भरपूर जमा हुआ था. विजय तेंडुलकर के महान नाटक ‘शांतता कोर्ट चालू आहे’ के टाइटल की तर्ज पर बना कॉमेडी नाटक ‘शांतेचं कार्ट चालू आहे’ (शांति की औलाद चालू है) बेतहाशा हिट हुआ. ऐसी ही सफलता ‘बिघडले स्वर्गाचे दार’ (स्वर्ग का दरवाज़ा ख़राब हो गया) के हिस्से भी आई. ‘टूर टूर’ तो बंपर हिट था ही.

ज़बरदस्त हिट रहा ये नाटक.
ज़बरदस्त हिट रहा ये नाटक.

पर्सनल लाइफ

लक्ष्या ने दो शादियां की थी. उनकी पहली पत्नी रूही बेर्डे थी. उनके साथ 1995 में उनका तलाक हो गया. बाद में उन्होंने अपनी सह-कलाकार प्रिया अरुण से शादी कर ली. दोनों के दो बच्चे हैं. एक्टिंग से अपने लगाव की रसीद लक्ष्या ने कुछ यूं छोड़ी है कि अपने बेटे का नाम ही अभिनय रखा है. उनकी एक बेटी भी है जिसका नाम स्वानंदी है. दोनों ही अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने को उत्सुक हैं.

ऑन और ऑफ स्क्रीन दोनों जगह हिट रही ये जोड़ी.
लक्ष्या-प्रिया, ऑन और ऑफ स्क्रीन दोनों जगह हिट रही ये जोड़ी.

ऐसा कलाकार कभी-कभार ही मयस्सर होता है

अगर किसी ने मराठी सिनेमा में हास्य को एक गरिमा बख्शी है, तो वो है लक्ष्मीकांत बेर्डे. एक ऐसा कलाकार जो परिस्थिति से हास्य पैदा करने में माहिर था. जिसे लोगों को हंसाने के लिए किसी और पात्र को तमाचा मारने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. ना ही अजीब ढंग से उछलकूद करनी पड़ती थी. जो अपने चेहरे की कुछ रेखाओं को इधर-उधर कर देने भर से आपसे ठहाका लगवा सकता था. कभी कभी लगता है लक्ष्या किसी विदूषक की भूमिका में बिल्कुल फिट होता. या शायद वो था भी. लोगों को हंसाते-हंसाते रंगमंच छोड़ गया.

16 दिसंबर 2004 को किडनी की बीमारी ने इस असाधारण कलाकार की फिल्म पर ‘दी एंड’ की तख्ती टांग दी.

दुनियावी सर्कस का जोकर लक्ष्या.
दुनियावी सर्कस का जोकर लक्ष्या.

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