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पहले फर्जी बैंक ब्रांच खोली, फिर ढाई लाख खाते खुलवाकर कर दी हजारों करोड़ की हेराफेरी

12 साल. 2 लाख 60 हजार 315 फर्जी लोन अकाउंट. एक फर्जी बैंक और तकरीबन 12 हजार करोड़ रुपए की कथित हेराफेरी. माना जा रहा है कि ये आंकड़े DHFL घोटाले की बस ‘टिप ऑफ द आइसबर्ग’ है. मतलब ये सिर्फ बानगी है कि किस तरह पूरे बैंकिंग सिस्टम को सिर के बल उल्टा खड़ा कर दिया गया. हाल यह है कि जांच करने वाली एजेसियों को ही समझ नहीं आ रहा कि कौन-सा छोर पकड़ें कि गुत्थी सुलझे. अब DHFL के फॉरेंसिक ऑडिट की रिपोर्ट आई है, जिसमें विहंगम घोटाले की आशंका जताई गई है. आइए जानते हैं ये पूरा मामलाः

बेहद उलझी है हजारों करोड़ की गुत्थी 

DHFL (दीवान हाउसिंग फाइनैंस लिमिटेड) हाउसिंग फाइनेंस करने वाली नॉन बैंकिंग कंपनी है. यह घर लेने वालों को आसान शर्तों पर लोन देने का काम करती है. इस पर तकरीबन 31 हजार करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप है. इसी साल जनवरी में DHFL के प्रवर्तक कपिल वाधवान (Kapil Wadhwan) और धीरज वाधवान (Dheeraj Wadhwan) को गिरफ्तार किया गया था. फिलहाल, दोनों जमानत पर हैं. आपको याद दिला दें कि ये वही वधावन बंधु हैं, जो कोरोना संकट के दौरान लॉकडाउन तोड़ने के आरोप में भी गिरफ्तार किए गए थे.

DHFL के इस घोटाले की असलियत जानने के लिए आरबीआई ने फरवरी 2020 में आर. सुब्रमण्यकुमार को प्रशासक नियुक्त किया था. सुब्रमण्यकुमार ने 98 पेज की एक रिपोर्ट दाखिल की. उसके आधार पर ग्रांट थॉर्नटन नाम की फॉरेंसिक ऑडिट एजेंसी ने जांच शुरू की. ये रिपोर्ट 27 अगस्त को ऑडिट एजेंसी ने आरबीआई की ओर से नियुक्त एडमिनिस्ट्रेटर को सौंप दी थी. अब इसकी डिटेल्स सामने आई है. इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक, पता चला है कि मुंबई के बांद्रा में एक फर्जी कंपनी ने सैकड़ों फर्जी लोन अकाउंट (Fake Loan Accounts) बनाए थे, और इनमें पैसा जमा कराया था.

डीएचएफएल के प्रमोटर कपिल वधावन.
DHFL के प्रमोटर कपिल वधावन लॉकडाउन में छुट्टियां मनाने महाबलेश्वर गए थे, जहां उन्हें हिरासत में ले लिया गया.

लाखों बैंक अकाउंट के साथ एक फर्जी बैंक की ब्रांच ही बना ली

ऑडिट एजेंसी को पता चला है कि कथित घोटाले को अंजाम देने के लिए  साल 2007 से 2019 के बीच में कुल 2,60,315 फर्जी होम लोन अकाउंट्स बनाए गए. जैसा कि कंपनियां करती हैं कि लोन देने से पहले लेने वाले के बारे में जांच-पड़ताल करती हैं कि वह लोन चुका भी पाएगा या नहीं. और अगर नहीं चुका पाया तो वसूली के लिए क्या गिरवी रखवाया जा सकता है. लेकिन इतनी भारी संख्या में लोन जारी करने से पहले किसी भी तरह की सिक्योरिटी या कोलेटरल तक नहीं ली गई. कई उधार लेने वालों ने लोन लेने के ​लिए एक ही पते का इस्तेमाल किया. उनसे बेहद कम दर पर ब्याज लिया गया. इन सभी कारणों से DHFL पर दिवालिया होने का संकट आ गया है.

जांच के दौरान इस पूरे मामले में बांद्रा ब्रांच का नाम बार-बार आ रहा है. इसी ब्रांच में 2 लाख से ज्यादा अकाउंट खोले गए थे. बांद्रा ब्रांच से ही सीधे लोन की रिक्वेस्ट DHFL के सीएमडी या चीफ मैनेजिंग डायरेक्टर को जाती थी. वह ईमेल पर ही लोन अप्रूव कर देते थे. आमतौर पर लोन अप्रूव करने के लिए तय सिस्टम होता है. लोन की रिक्वेस्ट पहले कंपनी के लोन डेटाबेस में जाती है. उसके बाद अंडर राइटिंग डिपार्टमेंट से होते हुए अप्रूवल कमेटी के पास पहुंचती है. अप्रूव करने के बाद ही वह सीएमडी की मंजूरी के लिए जाती है. लेकिन बांद्रा ब्रांच से आई रिक्वेस्ट में ऐसी किसी भी बात का ख्याल नहीं रखा गया. एजेंसी की जांच से पता चला है कि सिस्टम फॉलो करना तो छोड़िए, इस नाम की कोई बांद्रा ब्रांच असल में है ही नहीं.

जिन अकाउंट्स का जिक्र हो रहा है, वो असल में पहले ही अपनी ली हुई रकम भर चुके हैं. सब कुछ एक दिखावा था. DHFL ने इन खातों को लोन देने के बाद रिकवरी के लिए 14,046 रुपये की मांग की. जब बैंक भी फर्जी, खाते भी फर्जी तो आखिर पैसे गए कहां? इन पैसों को कुछ शेल (नकली) कंपनियों में ट्रांस्फर कर लिया गया. फाइनल रिपोर्ट में करीब 91 ऐसी फर्जी इकाइयों के बारे में जानकारी सामने आई है. इनमें 50 को कुल रकम का 70 फीसदी हिस्सा मिला था. इन्होंने ही DHFL प्रमोटर्स और उधार लेने वालों के साथ सांठगांठ की थी.

अब जब हर तरफ से घिर रहा है DHFL तब इन्हें याद आ रहा है कि पैसा लौटाना भी पड़ता है. अगर कंपनी डूब जाती तो मालिक लोग पल्ला झाड़ कर अलग हो लेते
जांच में दो खुलासे हुए हैं, वे बहुत ही गंभीर हैं. DHFL पर फर्जी ब्रांच खोलने तक के आरोप लगे हैं.

जानिए कि यह DHFL का मामला है क्या

DHFL ने बतौर नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी इस घोटाले को अंजाम दिया, ऐसे आरोप हैं. अब ये नॉन बैंकिंग कंपनी होती क्या है? इसे समझाने में एक नेता का ये डायलॉग काफी काम आएगा- पैसा भगवान तो नहीं है लेकिन भगवान से कम भी नहीं है. कुछ इसी फंडे पर नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां (NBFC) बैंक तो नहीं हैं लेकिन बैंक से कम भी नहीं हैं. मतलब ऐसी कंपनी, जो बैंकों की तरह काम करती हैं लेकिन बैंकों की तरह भरोसे और गारंटी की बात नहीं करतीं. बैंक में आपके फिक्स डिपॉजिट का बीमा होता है NBFC में नहीं. इसके बदले आपको ज्यादा ब्याज दर मिलती है. NBFC से कम पूछताछ पर ही आपको लोन मिल सकता है जबकि बैंक की गाइडलाइंस बड़ी सख्त होती हैं.

तो इसी तरह की NBFC कंपनी DHFL बैंकों से लोन लेती है, और आगे जरूरतमंदों को कुछ ज्यादा ब्याज पर लोन देती है. यह काम वह हाउसिंग सेक्टर में करती. इस पूरे काम में बीच की खुरचन से खुद का पेट भरती. आपको सुनने में ये पूरा सिस्टम काफी साफ-सुथरा लग रहा होगा.

फिर जून 2019 में वह खबर आती है, जिसने बैंकों की नींद उड़ा दी. DHFL ने बैंको से लिए लोन का 960 करोड़ रुपए से ज्यादा ब्याज चुकता करने में हाथ खड़े कर दिए. NBFC को रेटिंग देने वाली कंपनियां लगातार DHFL की रेटिंग गिराती जा रही हैं. यह रेटिंग ही तय करती है कि मार्केट में कोई NBFC कितनी भरोसेमंद है. DHFL लगातार अपने असेट्स बेचकर पूरा बकाया चुकाने का दावा करती है. कुछ ही दिनों के भीतर एफडी अकाउंट्स में जमा भी बंद कर देती है. अब DHFL न तो बैंकों को पैसा लौटा पा रही और न ही जमाकर्ताओं को रकम वापस करने की हालात में दिख रही. लगातार बढ़ती देनदारी के चलते रेटिंग एजेंसियां ICRA, CRISIL, CARE और Brickwork डीएचएफएल की रेटिंग को गिराकर D यानी डिफॉल्ट कर देती हैं. बस खेल खत्म, पैसा हजम.

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DHFL एक डूबता कंपनी है और लोगों को डर है कि उनका भी पैसा डूब जाएगा.

बैंकों से लेकर सरकारों तक में खलबली

जैसे ही DHFL के डिफॉल्ट करने की खबरें आने लगीं, बैंकों से लेकर सरकार तक में खलबली मचनी शुरू हो गई. DHFL की कुल उधारी थी 83,900 करोड़ रुपये. इसमें से आम निवेशकों का हिस्सा करीब 7 फीसदी है. डिबेंचर धारकों का हिस्सा 37 फीसदी और बैंक टर्म धारकों का 31 फीसदी है. बैंक अपना मामला समझ पाते कि इसी बीच यूपी से बड़ी खबर आ गई.

पता चला कि मार्च 2017 में पावर सेक्टर एंप्लाई ट्रस्ट ने करीब 4,121 करोड़ रुपये का निवेश DHFL में किया था. ये पैसे दो अलग-अलग एफडी के तौर पर लगाए गए थे. इसमें से 1,854 करोड़ रुपये की एफडी एक साल के लिए थी. 2268 करोड़ रुपये की दूसरी एफडी तीन साल के लिए कराई गई थी. एक साल वाली एफडी दिसंबर 2018 में पूरी हो गई, जिसका पैसा ट्रस्ट के पास वापस आ गया. तीन साल वाली एफडी मार्च 2020 में पूरी होनी थी. अब इसके पैसे फंस गए हैं क्योंकि मुंबई हाई कोर्ट ने कंपनी के सारे लेन-देन पर रोक लगा दी है. यूपी सरकार ने आनन-फानन में 2 नवंबर को हजरतगंज थाने में एफआईआर दर्ज कराई. इसके बाद तत्कालीन वित्त निदेशक सुधांशु द्विवेदी और तत्कालीन सचिव (ट्रस्ट) पीके गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया गया. DHFL में निवेश शुरू होते वक्त पावर कॉरपोरेशन के एमडी रहे एपी मिश्रा को पुलिस ने हिरासत में लिया गया. उंगलियां इस रकम को निवेश करते वक्त सीएम रहे अखिलेश यादव पर भी उठी थीं.

अखिलेश यादव ने उल्टे बीजेपी पर ही DHFL से 20 करोड़ रुपए का चंदा लेने का आरोप मढ़ दिया. कांग्रेस की प्रियंका गांधी ने भी ट्वीट करके सवाल उठा दिए थे. फिलहाल मामले में जांच चल रही है.

कई तरह के सवाल अब भी बाकी

इस पूरे घोटाले का खुलासा सबसे पहले खोजी पत्रकारिता करने वाली वेबसाइय कोबरा पोस्ट ने किया था. यहां रिपोर्ट पढ़ें. उसने इस घोटाले को भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा घोटाला करार दिया था. कोबरा पोस्ट ने आरोप लगाया कि कंपनी ने 31 हजार करोड़ की हेराफेरी की. हालांकि कंपनी लगातार इस रिपोर्ट को गलत बताती रही. इस बीच जानकारों ने कई सवाल उठाए हैं-

# बरसों तक कंपनी फर्जी बैंक की ब्रांच बनाकर लोन देती रही, लेकिन किसी की नजर क्यों नहीं पड़ी?

# जिन बैंकों ने DHFL को लोन दिए, उन्होंने भी जांच करने की जहमत क्यों नहीं उठाई?

# रेटिंग देने वाली एजेंसियों ने शुरुआत से ही DHFL को बेहतरीन रेटिंग्स दीं, जिससे निवेशकों में भरोसा बना और उन्होंने जमकर निवेश किया.

# जांच के दायरे में आईं वित्तीय एजेंसियों से लेकर राजनैतिक दलों पर सवाल उठ रहे हैं, ऐसे में निष्पक्ष जांच कैसे हो पाएगी? और यह कौन सुनिश्चित करेगा कि निवेशकों का पैसा वापस हो?


वीडियो – लॉकडाउन तोड़कर महाबलेश्वर जा रहे DHFL के प्रमोटर वधावन ब्रदर्स को पुलिस ने किया गिरफ्तार

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