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लोकसभा में मॉब लिंचिंग की कड़ी निंदा हो रही थी, भीड़ अकबर को पीटकर मार रही थी

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20 जुलाई 2018. मॉनसून सत्र में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान पीएम मोदी विपक्ष के सवालों का जवाब दे रहे थे. इस दौरान पीएम मोदी ने मॉब लिंचिंग के बारे में कहा-

‘हाल के समय में हिंसा की घटनाएं हुई हैं. ये घटनाएं दुखद हैं और मानवता के मूल सिद्धांत के खिलाफ हैं. राज्य सरकारें कदम उठा रही हैं. मैं राज्य सरकारों से एक बार फिर कहना चाहता हूं कि इस तरह के मामलों में कड़ी कार्रवाई की जाए.’

पीएम मोदी ने लोकसभा में मॉब लिंचिंग की कड़ी निंदा की और इसपर सख्त ऐक्शन लेने को कहा.
पीएम मोदी ने लोकसभा में मॉब लिंचिंग की कड़ी निंदा की और इसपर सख्त ऐक्शन लेने को कहा.

लेकिन पीएम मोदी जिस दौरान मॉब लिंचिंग पर कड़ी कार्रवाई करने की बात कर रहे थे, राजस्थान के अलवर जिले में मॉब एक शख्स की लिंचिंग करने में व्यस्त थी. भीड़ ने अलवर जिले के रामगढ़ इलाके के लल्लावंडी गांव में अकबर नाम के एक शख्स को पीटकर मार डाला. भीड़ को शक था कि अकबर एक गोतस्कर था. शक की वजह ये थी कि हरियाणा के कोलागांव का रहने वाला अकबर अलवर से दो गायों को लेकर अपने गांव जा रहा था. अकबर के साथ गाय देखकर भीड़ ने इंसाफ कर दिया. उसे पीटकर मार दिया और फरार हो गए.

जब पुलिस पहुंची, तो उसके हाथ लगी अकबर की लाश और दो गाएं. अब पुलिस मामले की जांच कर रही है. कह रही है कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देंगे. अलवर के एएसपी अनिल बेनिवाल कह रहे हैं कि इस बात की जांच हो रही है कि अकबर गोतस्कर था या नहीं, लेकिन भीड़ ने तो अपनी जांच कर ली थी. उसने तो मामला कोर्ट भी नहीं पहुंचने दिया और इंसाफ कर दिया.

ये भीड़ है. इंसाफ करती रहती है. इस बात की संसद में कड़ी निंदा होती है और अदालतों में कड़ी कार्रवाई की बात. लेकिन भीड़ नहीं सुनती है. उसे सुनना भी नहीं है, सिर्फ फैसला करना है. अभी एक साल भी तो नहीं हुए. राजस्थान के अलवर की ही भीड़ ने 55 साल के पहलू खान को पीटकर मार डाला था. भीड़ ने उसे भी गोतस्कर करार दिया था. पुलिस ने उस वक्त भी दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही थी. एक साल बाद भी क्या हुआ. पहलू खान मारा गया, किसने मारा, पुलिस को पता नहीं. कर्नाटक में भीड़ ने एक इंजीनियर को पीटकर मार दिया. इस बार भीड़ के पास वजह दूसरी थी. ये वजह बच्चा चोरी की थी, सो पीटकर मार दिया. किसने मारा, पुलिस जांच कर रही है.

1 अप्रैल 2017 को अलवर में ही भीड़ ने पहलू खान की हत्या कर दी थी.
1 अप्रैल 2017 को अलवर में ही भीड़ ने पहलू खान की हत्या कर दी थी.

लेकिन इस भीड़ के पास इतनी हिम्मत आती कहां से है. कौन है, जो भीड़ को इतनी ताकत देता है कि वो किसी को भी मार दे. अगर पहलू खान वाला उदाहरण लें, तो शायद समझ में आ जाएगा कि इस भीड़ को ताकत कौन देता है. पहलू खान की हत्या होती है और पुलिस कहती है कि नहीं पता कि पहलू खान को किसने मारा. लेकिन भीड़ को तो पता है कि किसने मारा. पहलू खान मारा गया, भीड़ बच गई. अब उसे नए शिकार की तलाश थी, तो मिल गया अकबर. भीड़ ने उसे भी मार दिया. आगे हम, आप कोई भी हो सकता है. उस भीड़ का भी कोई आदमी हो सकता है, क्योंकि जब वो कहीं अकेला जा रहा होगा, तो उसके सामने कोई और भीड़ हो सकती है. उसके पास मारने की कोई अलग वजह हो सकती है. और ये सिर्फ अंदेशा नहीं है. ऐसा हो रहा है. असम से लेकर गुजरात तक. राजस्थान से लेकर कर्नाटक तक भीड़ अपने तईं इंसाफ कर रही है. उसे पुलिस और अदालत की ज़रूरत नहीं है. उसे किसी संसद और सुप्रीम कोर्ट की बात नहीं सुननी है. उसे इंसाफ करना है. और सरकार. उसका तो क्या ही कहें.

जब राहुल गांधी ने मॉब लिंचिंग पर सवाल उठाए तो राजनाथ सिंह ने कड़ी निंदा की और कहा कि सबसे बड़ी मॉब लिंचिंग 1984 में हुई थी.
जब राहुल गांधी ने मॉब लिंचिंग पर सवाल उठाए तो राजनाथ सिंह ने कड़ी निंदा की और कहा कि सबसे बड़ी मॉब लिंचिंग 1984 में हुई थी.

संसद के मॉनसून सत्र में जब विपक्ष की ओर से मॉब लिंचिंग के बारे में पूछा गया तो शाश्वत सवाल उभरकर सामने आ गया कि 84 में कहा थे. जाहिर है सवाल राहुल गांधी ने पूछा और जवाब देने या यूं कहें कि कड़ी निंदा करने के लिए सामने आए गृहमंत्री राजनाथ सिंह. उन्होंने कड़ी निंदा भी की. जितने कड़े शब्दों में हो सकती थी, उतने कड़े शब्दों में. लेकिन ये भी कहा कि मॉब लिंचिंग की सबसे बड़ी घटना 1984 में हुई थी. उनका इशारा सिख दंगों की तरफ था. लेकिन क्या जो 1984 में हुआ, वो बार-बार होता रहेगा. क्या कांग्रेस के जमाने में भीड़ ने दंगा किया तो बीजेपी के शासन में भी यही होगा. फिर क्या फर्क है दोनों सरकारों में. क्या सिर्फ कड़ी निंदा ही होगी. गृहमंत्री भी कड़ी निंदा कर रहे हैं और प्रधानमंत्री भी. देश की सबसे बड़ी अदालत कर रही है कि किसी को कानून अपने हाथ में लेने का हक नहीं है, लेकिन अदालत के कहे को लागू करना पुलिस का काम है. वो नहीं हो रहा है. हो रही है तो सिर्फ कड़ी निंदा और भीड़ इस कड़ी निंदा को दरकिनार कर लगातार इंसाफ करती जा रही है. रही अकबर की हत्या की बात, तो अब कार्रवाई के बजाए सियासत शुरू हो गई है.

मॉब लिंचिंग की घटनाओं के विरोध में कई बार रैलियां निकल चुकी हैं, लेकिन भीड़ को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.
मॉब लिंचिंग की घटनाओं के विरोध में कई बार रैलियां निकल चुकी हैं, लेकिन भीड़ को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमिन के मुखिया और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन औवैसी ने भीड़ की मानसिकता पर नहीं, सरकारों के रवैये पर भी नहीं, गाय और मुस्लिम पर निशाना साधा है. उन्होंने लिखा है-

‘गाय को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने का नैतिक अधिकार है और एक मुस्लिम को मारा जा सकता है क्योंकि उनके ‘जीने’ का नैतिक अधिकार नहीं है. मोदी शासन के चार साल-लिंच राज.’

लिंचिंग राजस्थान में हुई है. और जिस वक्त लिंचिंग हुई है, उससे ठीक पहले संसद में गृहमंत्री ने कहा था कि ये मुद्दा केंद्र नहीं राज्य का है. लिहाजा इस घटना की जिम्मेदारी राज्य की थी. फिर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को ट्वीट करना पड़ा. उन्होंने भी कड़ी निंदा की और कहा कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.

राजस्थान से केंद्रीय मंत्री हैं अर्जुन राम मेघवाल. उन्होंने भी इसकी कड़ी निंदा की है, लेकिन उन्होंने कहा है कि ये कोई पहली घटना नहीं है. इसका इतिहास देखा जाना चाहिए कि ऐसा क्यों होता है और इसे किसे रोकना चाहिए. उन्होंने भी कहा है भीड़ की सबसे बड़ी हिंसा 1984 में हुई थी.

ठीक है. सही बात है. 1984 में मॉब लिंचिंग हुई थी. लेकिन क्या 34 साल बाद भी वही होना चाहिए. 34 साल बाद देश चांद पर पहुंच गया, अर्थव्यवस्था फ्रांस से भी बड़ी हो गई, जीएसटी लागू हो गई, देश डिजिटल हो गया लेकिन नहीं बदली तो मॉब लिंचिंग. वो बढ़ी है. बढ़ती ही जा रही है. कब रुकेगी पता नहीं. आप सिर्फ नाम और जगह बदलते देखते रहिए. किसी दिन इसमें आपका हमारा भी नाम शामिल हो सकता है.


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