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क़िस्सागोई 7: और जब सुनसान रास्ते पर अपनी भयानक हंसी के साथ दीवानी आ गया !

दीवानी ! ये कैसा नाम है ? आदमी का नाम तो दीवाना होना चाहिए. लेकिन उसका नाम दीवानी ही था. एक बार मैने उसे देखकर कहा था कि दीवाना आ रहा है. तो सब लोग बहुत हंसे थे. फिर मामा बोले, कहो- दीवानी आ रहे हैं. मैं बोला- दीवानी आ रही हैं. सब फिर हंसे और हंसते ही रहे. बड़े उस ज़माने में भी बच्चों की सही बातों पर इसी तरह हंसते थे. लेकिन बच्चे उनके हंसने को हंसी में उड़ा देते थे. बच्चों की मंडली में ये ख़ास बात नहीं थी कि दीवानी आ रहे हैं. ये भी नहीं कि दीवानी आ रही हैं. ख़ास बात ये थी कि दीवानी, भूत है. मज़ाक़ नहीं बल्कि सचमुच, दीवानी भूत है. बच्चों में ये बात सब जानते थे. इसे झूठ कोई नहीं कहता था. क्योंकि सच से बच्चों का रिश्ता बिल्कुल सीधा था. झूठ बहुत दूर की कोई चीज़ थी. उतनी ही दूर की चीज़, जितनी दूरी पर बड़ों की दुनिया थी. मैं और मेरे साथ का कोई बच्चा उस दुनिया के बारे में ज़्यादा नहीं जानता था. न जानना चाहता था. लेकिन हम ये जानते थे कि दीवानी भूत है. एक ख़तरनाक भूत. जला हुआ काला रंग, भयानक चेहरा, चेचक के बड़े बड़े दाग, चौड़ी नाक, डबलरोटी जैसे होंट, कोटरों से गिर गिर पड़ती बड़ी बड़ी आंखें और इन सबमें सबसे डरावनी उसकी भूतिया हंसी. जब वो हंसता था तो देखने वाले बच्चों का बदन झरझरा जाता था. उसी तरह जैसे बड़े लड़के अमिया तोड़ने के लिए आम के पेड़ पर चढ़कर उसे झरझराते थे. हंसने पर उसके बड़े बड़े सफ़ेद दांत उसके कालिख जैसे चेहरे पर पूरी तरह क़ब्ज़ा कर लेते थे. वो हंसी देखकर कई बच्चों का कई बार पेशाब छूट चुका था जिनमें से मैं भी एक था. सब बच्चे जब खेल में लगे होते थे, थे तो ये नहीं मनाते थे कि जीत जाएं. ये मनाते थे कि दीवानी न मिल जाए और मिल भी जाए तो हंस न पड़े.

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पूरा गांव खेत में टट्टी जाता था. क्योंकि तब बहुत कम घरों में लेट्रीन बनी थी. उन बहुत कम घरों में एक घर मेरा भी था. मेरे घर में ‘खुड्डी’ वाली लेट्रीन बनी थी. जो उस ज़माने में गांव में बहुत बड़ी चीज़ समझी जाती थी. लेकिन इसके बावजूद मैं बाक़ी सब की तरह खेतों में ही टट्टी जाता था. खेत में टट्टी जाने का भी एक दस्तूर था. बूढ़े बूढ़ों के साथ जाते थे, बड़े बड़ों के साथ, महिलाएं महिलाओं के साथ और बच्चे बच्चों के साथ. खेत में टट्टी जाने की अपनी मुश्किलें थीं मगर वो घर की खुड्डियों से लाख गुना बेहतर था. इस लाख गुना बेहतरी के पीछे वजह सिर्फ़ एक थी. दीवानी! क्योंकि वो भूत था.

दीवानी पता नहीं कहां से आता था. मेरे घर में खुड्डियों की सफ़ाई करने. खुड्डी वाले बाक़ी घरों में भी जाता था. यही वजह थी कि खुड्डी में टट्टी जाने के ख़याल भर से मैं कांप जाता था. क्योंकि खुड्डी का ख़याल दरअस्ल दीवानी का ख़याल था. शरीर के एक तरफ़ झउआ टिकाए वो किसी भी वक़्त खुड्डी में प्रकट हो सकता था और राख डाल कर सफ़ाई शुरू कर सकता था. उस वक्त भी जब मैं टट्टी कर ही रहा होता. वो आता, मुझे देखकर अपनी वही भयानक हंसी हंसता और अपना सफ़ाई वाला उपकरण मेरे नीचे बढ़ा देता. मैं उसी अवस्था में घबराकर, अधहगा खुड्डी से नीचे गिर पड़ता. मुझे दीवानी पर बहुत गुस्सा आता. जी में आता कि मैं उसे मार डालूं. लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता था. क्योंकि जितना मुझे उस पर गुस्सा आता था, उससे कहीं ज़्यादा मुझे डर लगता था.

टीवी के पुराने सीरियल अलिफ़ लैला में भी ऐसा ही एक शैतान आता था (तस्वीर यूट्यूब)
टीवी के पुराने सीरियल अलिफ़ लैला में भी ऐसा ही एक शैतान आता था (तस्वीर यूट्यूब)

दीवानी के बारे में बच्चे कहते थे कि वो बच्चों को ग़ायब कर देता है. जो उसको छू लेता है, भूत बन जाता है, ग़ायब हो जाता है. कई ग़ायब हो चुके बच्चों के नाम और उनकी कहानियां बच्चों को याद थीं. इसीलिए उसको छूना मना था. सब बच्चे उसको छूने से डरते थे. बड़े लोग भी दीवानी को छूने से डरते थे. वो उससे दूर ही रहते थे, और अपने बच्चों को भी दूर रखते थे. मेरे घर वाले भी. दीवानी ख़ुद सबके सामने बच्चों के नज़दीक नहीं आता था, मैने उसे सबसे पास से तभी देखा जब मैं खुड्डी पर बैठा होता था और वो सफ़ाई करने आ जाता था. लेकिन तब भी वो काफ़ी दूर होता था, सिवाए एक दो बार को छोड़कर. सब बच्चे मानते थे कि दीवानी बच्चों को अकेले में ही छूकर ग़ायब करता है. सब मनाते थे कि दीवानी किसी को अकेले में न मिल जाए. वरना इधर छुआ और उधर बच्चा भूत बन कर ग़ायब. हालांकि बड़े लोग बच्चा ग़ायब करने वाली बात पर हंस देते थे. लेकिन बच्चे बड़ों को गंभीरता से नहीं लेते थे. वो आपस में यही बातें करते थे कि दीवानी सफ़ाई के लिए नहीं बच्चों को ग़ायब करने आता था. मगर दीवानी के बारे में सुनी गयी सबसे भीषण बात ये नहीं थी. ये थी कि दीवानी खुड्डी की सफ़ाई के बाद अपनी डलिया में टट्टी भर कर ले जाता है उसको रोटी में चुपड़ कर खाता है. इस बात पर हर बच्चे को भरोसा था. क्योंकि दीवानी भूत था. भूत ऐसा कर सकता है.
गांव के पीछे एक सुनसान रास्ता था. मुश्किल भी. कच्चा, ऊबड़-ख़ाबड़ और घुमावदार. उस रास्ते की सबसे ख़राब चीज़ थी उस पर उगी पतेल की बड़ी बड़ी झाडियां. ये इस बेतरतीबी से उगी थीं कि रास्ते को ही नज़र से ओझल कर देती थीं. ये झाड़ियां उस रास्ते को बेवजह रहस्यमय बना देती थीं. फिर भी वो रास्ता बहुत दिलकश था. मुझे उस पर जाना पसंद था. हालांकि बहुत से बच्चे उस पर जाने से घबराते थे. क्योंकि गर्मियों की दोपहर को वो रास्ता कुछ ज़ियादा ही सुनसान रहता था. उस वक़्त इस रास्ते पर सिर्फ़ उड़ती हुई धूल और लू का कब्ज़ा होता था. बहुत देर, दूर दूर तक एक आदमी भी नहीं दिखता था. मुझे इस पर कभी डर नहीं लगा. मुझे डर सिर्फ़ दीवानी से लगता था. मुझे इस रास्ते पर हमेशा एक सुखद रोमांच महसूस हुआ. क्योंकि उस रास्ते पर नज़र को जितना फैलाव मिलता था, जैसा मंज़र मिलता था, वो गांव में कहीं और नहीं था. धूल भरी लू जो उस वक़्त अच्छी लगती थी, लहलहाते हुए खेत, खंती, पोखर और पुराने पुराने जामुन, बरगद, पीपल, आम और शीशम के पेड़, उसके बाद पड़ने वाला झाड़-झंखाड़ और कई तरह के पेड़-पौधों और झाड़ियों से भरा एक जंगलनुमा बाग़. लेकिन इस राह पर सबसे ज़्यादा पसंद मुझे कोई और चीज़ थी. बड़े बड़े पेड़ों के बीच बेतरतीबी से उगी जंगल-जलेबी. फीके मीठे स्वाद वाली नाजुक जंगल जलेबी मुझे बहुत पसंद थी. वो गांव में सिर्फ इसी रास्ते पर मिलती थी. एक ख़ास जगह पर तो वो बहुत घनी उगी थी. इस जगह को भी सब लोग जंगल-जलेबी ही कहते थे. ये मेरी पसंदीदा जगह थी. कई बार मैं सिर्फ़ जंगल जलेबी खाने लड़कों के साथ इस रास्ते पर आ जाता था. जंगल जलेबी की तलब में मुझे ऐसा लगता था कि मैं अपने घऱ से जंगल-जलेबी तक अकेले भी आ सकता हूं. रास्ता बच्चों के लिए उतना आसान नहीं था मगर मुझे लगता था कि मुझे याद है. मैं बिल्कुल अकेले कभी इधर नहीं आया था. लेकिन मैं अकेले यहां आना ज़रूर चाहता था. क्योंकि गांव में बहुत कम ऐसे बच्चे थे जो अकेले यहां चले आते थे. वो बड़े बच्चे थे, और मैं उनमें शामिल होना चाहता था. मैं बड़ा होना चाहता था.

बगीचे की ओर जाता रास्ता बच्चों को ख़ूब लुभाता है (तस्वीर यूट्यूब )
बगीचे की ओर जाता रास्ता बच्चों को ख़ूब लुभाता है (तस्वीर यूट्यूब )

एक दिन बड़ा होने का मौका आ गया. मैं साथ के सब बच्चों के साथ जंगल जलेबी खाने गया था. मज़े उड़ाने में मगन था. सब लोग जब खा चुके तो वापस लौटने लगे, मगर मेरी नीयत नहीं भरी थी. मैं अब भई जंगल-जलेबी तोड़कर अपने छोटे से झोले में भर रहा था. दोपहर का वक़्त था. मैने अपने साथियों से कहा कि वो चले जाएं. मैं कुछ देर में आ जाऊंगा. सबने मुझसे कहा कि अकेले मत लौटना. मैने जवाब दिया अकेले नहीं आऊंगा. जब खेत या बाग़ से लौटते हुए कोई इधर से गुज़रेगा तो उसके हो जाऊंगा. वो लोग भरोसा करके चले गए. जब मैं अकेला हुआ तो कुछ देर तो ये अकेलापन मुझे अच्छा लगा लेकिन फिर मैं वहां उकताने लगा. मेरा झोला भी भर गया था. कुछ देर मैने किसी के आने का इंतज़ार किया लेकिन जब कोई नहीं आया तो मैने सोचा कि मैं अकेला भी तो लौट सकता हूं. कोई आएगा तो देखा जाएगा. मै वापस लौटने लगा.

जंगल-जलेबी से अकेले गांव लौटना मुझे बहुत सुखद और रोमांचक लग रहा था. लेकिन ये सुख और रोमांच थोड़ी ही देर में ग़ायब हो गया. जब चलते चलते मुझे अचानक वो रास्ता अजनबी लगने लगा. मेरी बेचैनी बढ़ने लगी. दूर दूर तक कोई नहीं था. मैं रास्ता भूल चुका था. दिल में एक हौसला यही था कि इधर से कोई न कोई गुज़रेगा तो मैं उसके साथ लग लूंगा, इसलिए मैं जहां था वहीं किनारे एक पेड़ के नीचे बैठ गया. लेकिन जब काफ़ी देर तक कोई नहीं गुज़रा तो जी बहुत घबराने लगा. मन में डरावने ख़याल आने लगे. ऐसा लगने लगा कि अब मैं कभी घर नहीं पहुंच पाऊंगा. पता नहीं आज मेरा क्या होगा. मेरे पेट में अजीब सी खलबलाहट होने लगी. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. घबराहट इस क़दर बढ़ी कि मैं रोने लगा. पहले सुबक सुबक कर रोया और फिर फूट फूट कर.

मैं लगातार अपने आपको ढांढस बंधा रहा था, अपने आंसू पोछ रहा था लेकिन वो और रवानी से बहने लगते थे. मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया था. निराशा का गहन अंधकार. मुझे अपनी याद्दाश्त खोती हुई महसूस हो रही थी. मैं हार मान रहा था. आंसू लगातार बह रहे थे. इसी आलम में मैने आंसू पोछते हुए अचानक सामने देखा तो डर से कांप गया. चीख़ पड़ा… दीवानी… मेरे सामने बिल्कुल क़रीब खड़ा हंस रहा था.अपनी वही भयानक हंसी.

गांवों के कितने ही किरदार हैं जिन्हें बच्चे देखकर सच में डर जाते हैं (तस्वीर यूट्यूब)
गांवों के कितने ही किरदार हैं जिन्हें बच्चे देखकर सच में डर जाते हैं (तस्वीर यूट्यूब)

एक पल को डर से मेरी जान निकल गयी. मैने उसके डरावने चेहरे को इतना करीब से कभी नहीं देखा था. मुझे ऐसा लगा लगा कि उसके वो चेचक के दाग मेरे चेहरे पर छप जाएंगे. उसने अपना एक हाथ मेरी तरफ़ बढ़ा रखा था. वो हंस रहा था. मैं उसके सामने मूर्ति बना हुआ था. अचानक उसने भर्राई हुई आवाज़ में मुझसे कहा कि लो ! जंगल जलेबी खा लो. तब मेरी जड़ता टूटी और मैने देखा कि उसके बढ़े हुए हाथ में जंगल जलेबी का एक गुच्छा था. मैं ज़ोर से रोया और उठकर भागने लगा. उसने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा अरे डरो मत. मेरे पास आओ. मैंने दूर भागने की कोशिश की मगर दीवानी ने तेज़ी से लपककर मुझे पकड़ लिया. उसका हाथ अपने बदन पर छूते ही मैं ज़ोर से चिल्लाया. मुझे उस पल ऐसा लगा जैसे उसका हाथ लगते ही मैं मर गया हूं और भूत बन गया हूं. अब अपने घर कभी नहीं लौट पाऊंगा. दीवानी अपनी भयानक हंसी के साथ मेरे चेहरे पर हाथ फेर कर मेरे आंसू पोछने लगा. उसके हाथ रेगमाल की तरह खुरदरे और बदसूरत थे. मुझे लगा कि आज ये भूत मुझे खा जाएगा. मैं और रोया. दीवानी बोला कि परेशान मत हो मैं तुम्हे घर पहुंचा दूंगा. घर ये शब्द सुनकर मुझे पहली बार हलका सा लगा कि शायद मैं बच जाऊं लेकिन मै दीवानी की गिरफ्त में था.

बच्चे की मासूमियत अचानक 'मालगुडी डेज़' के स्वामी की याद दिलाती है.
बच्चे की मासूमियत अचानक ‘मालगुडी डेज़’ के स्वामी की याद दिलाती है.

मुझे उस पर भरोसा नहीं था. वो मुझे छू चुका था. मैं भूत बन चुका था. मुझे अभी भी भयंकर डर लग रहा था. कहीं दीवानी मुझे अपने घर तो नहीं ले जाएगा. भूत का घर. किसी पेड़ या पहाड़ पर. मेरे मुंह से रुलाई के अलावा कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी. दीवानी फिर बोला. मैं तुम्हे गांव पहुंचा दूंगा तुम्हारी नानी के पास. लो जंगल जलेबी खाओ. नानी का नाम सुना तो मुझे थोड़ी तसल्ली हुई. मेरे आंसूं धीमे पड़ गए लेकिन दीवानी की जंगल जलेबी मैने तब भी नहीं खाई. दीवानी मुस्कुराया. मुझसे बोला कि तुम अकेले क्यों आए. अकेले मत आया करो यहां. और हमसे क्यों डरते हो ? हम क्या भूत हैं. इतना सुनना था कि फिर डर के मारे फिर मेरी रुलाई तेज़ हो गयी. दीवानी घबरा गया. मेरे सर पे प्यार से हाथ फेरते हुए, मेरा गाल सहलाते हुए, अपने चेचक वाले गाल को मेरे गाल में हलके से सपर्श कराते हुए बोला- भूत वूत कुछ नहीं होता है, रोओ मत. लो जंगल जलेबी खाओ और गांव चलो. मैं उसकी गिरफ़्त में था, बेचैन था मगर उस घड़ी मुझे कुछ भरोसा महसूस हुआ. मैने दीवानी से जंगल जलेबी ले ली. मगर खाई नहीं. दीवानी आगे बढ़ गया. मैं भी लपक कर उसके पीछे चल पड़ा. गांव की तरफ़ बढ़ने लगा. मगर मैं उससे कुछ बोला नहीं. वो भी मुझसे कुछ नहीं बोला, चलता रहा…वो वैसे भी कम ही बोलता था. मैंने उसकी आवाज़ आज पहली बार ही सुनी थी. वो आवाज़ भी उतनी ही डरावनी थी जितना उसका चेहरा. जैसे ख़ासतौर पर इसी चेहरे के लिए बनाई गयी हो. दीवानी आगे आगे चलता रहा, और मैं उसके पीछे पीछे. जैसे ही वो रास्ता मुझे जाना पहचाना लगने लगा मैने दीवानी की दी हुई जंगल जलेबी खा ली. मुझे जंगल-जलेबी खाता देखकर दीवानी हंसा. अपनी वही हंसी. लेकिन आज पहली बार मुझे वो हंसी भयानक नहीं लग रही थी अच्छी लग रही थी. दीवानी ने मुझसे कहा कि घर में मत बताना कि तुमको हम मिले थे और हमने तुम्हे जंगल-जलेबी खिलाई वरना तुम्हारी डांट पड़ेगी. मेरी समझ में नहीं आया कि घर में क्यों न बताऊं और इसपे डांट क्यों पड़ेगी लेकिन मुझे घर पहुंचने की ख़ुशी इतनी थी कि मैंने इस पर ज़ियादा सोचा नहीं.

ये होती है जंगल जलेबी
ये होती है जंगल जलेबी

जब गांव बिल्कुल क़रीब सामने दिखाई देने लगा मैं ख़ुश हो गया. दीवानी ने मुझसे कहा कि अब यहां से तुम घर चले जाओ. मुझे वापस अपने घर जाना है. मैं वहीं जा रहा था तुमको रोता देखकर रुक गया. मैंने ठीक कहकर गर्दन हिलाई और आगे बढ़ गया. फिर तुरंत मेरा मन हुआ कि मैं पलटकर दीवानी से पूछूं कि उसका घर कहां है. मैं पीछे मुड़ा तो वो वहीं खड़ा हंस रहा था. अपनी वही हंसी. इस बार पहली बार उस हंसी के जवाब में मैं भी हंस दिया. मुझे ये पल बहुत अच्छा लगा और मैं दीवानी से बिना कुछ पूछे मुड़कर अपने घर वापस आ गया.

मैने वो वाकया तब से आज तक किसी को नहीं बताया. तकरीबन बीस साल हो गए. मैं ये सब भूल चुका था. आज अचानक याद आ गया.जब अख़बार में पढ़ा कि बच्चा चुराने के शक में दीवानी नाम के एक शख़्स को भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला. लोगों के मुताबिक वो रास्ता भटक गए किसी बच्चे को जंगल जलेबी का लालच देकर किडनैप करना चाहता था.

हिमांशु बाजपेयी
हिमांशु बाजपेयी

हिमांशु बाजपेयी. क़िस्सागोई का अगर कहीं जिस्म हो, तो हिमांशु उसकी शक्ल होंगे. बेसबब भटकन की सुतवां नाक, कहन का चौड़ा माथा, चौक यूनिवर्सिटी के पके-पक्के कान और कहानियों से इश्क़ की दो डोरदार आंखें.‘क़िस्सा क़िस्सा लखनउवा’ नाम की मशहूर क़िताब के लेखक हैं. और अब The Lallantop के लिए एक ख़ास सीरीज़ लेकर आ रहे हैं. नाम है ‘क़िस्सागोई With Himanshu Bajpai’. इसमें दुनिया जहान के वो क़िस्से होंगे जो सबके हिस्से नहीं आए. हिमांशु की इस ख़ास सीरीज़ की ये थी सातवीं खेप.


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