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क़तर और सऊदी का रार कहां जाकर खत्म होगा?

ये कहानी है चार पड़ोसियों की. इन चार में से तीन एक टीम में हैं. इनकी चिढ़ है अपने चौथे पड़ोसी से, जो अपनी अलग चलाता है. उसको लाइन पर लाने के लिए इन तीन ने मिलकर उसका बायकॉट कर दिया.

इस बायकॉट से उस चौथे पड़ोसी की आफ़त आ गई. चूंकि उसके घर जाने का रास्ता बाकी पड़ोसियों की ज़मीन से होकर गुज़रता था, तो उसका घर आना मुश्किल हो गया. ऐसे में उसने खोजा एक विकल्प. उसने जाकर दुश्मन के दुश्मन से हाथ मिला लिया. उस दुश्मन की ज़मीन के रास्ते उसने अपने घर आने का एक ऑल्टरनेटिव रास्ता भी बना लिया. अब झगड़े के बावजूद उसका काम चलने लगा. और इस तरह माधुरी दीक्षित के स्टाइल में लड़ाई के दिन बने हफ़्ते, हफ़्ते महीने और महीने बन गए साल. कुछ कॉमन फ्रेंड इनका पैचअप करवाने में लगे हैं. मगर पड़ोसियों का ये झगड़ा अब भी जारी है.

ये किस झगड़े की बात कर रहे हैं हम?

हम बात कर रहे हैं, अरब देशों के बीच चल रहे झगड़े की. इस झगड़े में एक तरफ हैं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन. इनकी रार है क़तर से. तीन बरस पहले इस झगड़े का एक बड़ा चैप्टर शुरू हुआ था. क्या हुआ था? ये बात है 5 जून, 2017 की. इस दिन सऊदी, UAE और बहरीन ने मिलकर क़तर के साथ अपने कूटनीतिक रिश्ते ख़त्म कर दिए. इज़िप्ट ने भी इन तीनों का साथ दिया.

5 June 2017
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट

रिश्ता ख़त्म करने के बाद सऊदी ग्रुप ने छोड़ा ब्रह्मास्त्र. क्या था ये ब्रह्मास्त्र? ये समझने से पहले आप देखिए मानचित्र. क़तर के पश्चिम और दक्षिण में है सऊदी. पूरब में है UAE. उत्तर की तरफ है बहरीन. यानी सारी दिशाएं विरोधियों से घिरी हुईं. इसी को सऊदी ग्रुप ने अपना हथियार बनाया. उन्होंने क़तर के साथ अपनी ज़मीनी, आसमानी और समुद्रीय सीमाएं बंद कर दीं. कहा, देखते हैं. सप्लाई कैसे मंगवाते हो. देखते हैं, तुम अपने जहाज़ कहां उड़ाते हो.

Qatar
लाल घेरे में क़तर (गूगल मैप्स)

क़तर करता तो क्या करता?

अपनी लाइफ़लाइन बचाने के लिए अब क़तर के पास दो ही रास्ते थे. पहला रास्ता ये कि वो अपने पड़ोसियों की शर्तें मानकर सुलह कर ले. मगर ये क़तर के लिए मुश्किल था. ऐसे में उसने चुना दूसरा रास्ता. क्या था ये रास्ता? क़तर के पूरब में फ़ारस की खाड़ी है. खाड़ी के उस पार बसा है ईरान. ईरान के साथ क़तर की दोस्ती भी थी. उसने मदद मांगी. ईरान ने उसके लिए अपने रास्ते खोल दिए. क़तर की मदद के लिए उसका दोस्त तुर्की भी आगे आया. तुर्की और ईरान से मिली इस मदद के कारण क़तर को घुटनों पर लाने का सऊदी प्लान पूरा नहीं हो सका.

आप कहेंगे, ये मामला तो तीन साल से चल रहा है. फिर हम आज क्यों उठाकर लाए ये ज़िक्र? इस ज़िक्र की वजह है एक बड़ा अपडेट. ये अपडेट आया है नीदलैंड्स के हेग शहर से. यहां बैठती है अंतरराष्ट्रीय अदालत. सऊदी ग्रुप यहां अपनी अपील लेकर गया था. ये अपील थी अंतरराष्ट्रीय सिविल ऐविएशन ऑर्गनाइज़ेशन, यानी ICAO के खिलाफ़.

Icao
ICAO

ICAO भी UN की एक संस्था है. इस संस्था का मकसद है सदस्य देशों के बीच सहयोग बिठाना. ताकि सबको एक सुरक्षित एयर स्पेस मिल सके. अपने एयर ब्लॉकेड के खिलाफ़ क़तर ने इसी ICAO में अपील की. वहां अभी केस की सुनवाई पूरी नहीं हुई, लेकिन कुछ शुरुआती फैसले क़तर के पक्ष में गए. ऐसे में सऊदी ग्रुप पहुंचा इंटरनैशनल कोर्ट. उसने कहा, ICAO का तो अधिकारक्षेत्र ही नहीं बनता. सऊदी ग्रुप का कहना था कि ICAO द्वारा सुनाए गए अब तक के फैसले भी रद्द किए जाएं. इसपर इंटरनैशनल कोर्ट ने क्या कहा? उसने सऊदी ग्रुप की अपील खारिज़ कर दी. ये भी स्पष्ट किया कि एयर स्पेस का झगड़ा देखना ICAO का ही काम है.

हमने आपको केस बताया. केस का अपडेट बताया. अब बताते हैं इस झगड़े की असल वजह. वो वजह, जो क़तर बनाम सऊदी ग्रुप के इस रार की जड़ है.

झगड़े की असल वजह

इस कहानी की शुरुआत करते हैं एक संगठन से. इस संगठन का नाम है, गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल. शॉर्ट में, GCC. ये अरब मुल्कों का संगठन है. छह देश हैं इसमें- सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, ओमान, कुवैत और क़तर. ये राजशाही वाले देश हैं. इनके पास है कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा भंडार.

इन छह में सबसे बड़ा और सबसे ताकतवर है सऊदी. पुराने जमाने में इसी सऊदी के अंदर रहता था एक कबीला. उसका नाम था, तामिम. इस तामिम कबीले का ही एक हिस्सा था, अल-थानी. ये छोटा सा कबीला सऊदी से निकला और आकर बस गया फ़ारस की खाड़ी के पश्चिमी तट पर. ये वही इलाका था, जिसे आज हम क़तर कहते हैं. तब यहां पर शासन था, बहरीन के अल-खलीफ़ा वंश का. अल-खलीफ़ा पहले क़तर वाले इलाके में ही रहते थे. मगर 18वीं सदी की शुरुआत में वो बहरीन शिफ़्ट हो गए. अब क़तर वाले इलाके में ढेर सारे अलग-अलग कबीले बच गए. इनमें से कई छोटे-छोटे शेख बन गए. इन्होंने कहा, हम नहीं मानते अल-खलीफ़ा की सत्ता. इन्होंने सत्ता पाने के लिए बग़ावत शुरू कर दी.

Gcc
गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के देश (फोटो: GCC)

इस संघर्ष में शामिल कई कबीलों में एक कबीला अल-थानी भी था. धीरे-धीरे उसका पलड़ा भारी होने लगा. 1825 के आसपास आकर अल-थानी का कंट्रोल हो गया क़तर पर. अब वो बहरीन से आज़ाद होने की कोशिश करने लगा. बहरीन ने उसे रोकने की कोशिश की. इसके लिए बहरीन ने मदद मांगी अबू धाबी से. दोनों ने मिलकर 1867 में अल-थानी पर हमला कर दिया.

ब्रिटेन क़तर की हिफ़ाजत क्यों करना चाहता था?

उस जमाने में यहां ब्रिटेन का ख़ूब असर था. अपने जहाज़ों को समुद्री लुटेरों से बचाने के लिए उसकी यहां मौजूदगी भी थी. उसने बीच-बचाव किया. लड़ाई रुक गई. मगर ब्रिटेन ने बीच-बचाव क्यों किया? क्योंकि उसकी अल-थानी से अंडरस्टैंडिंग हो गई थी. अल-थानी चाहता था, ब्रिटेन उसे मान्यता दे. इसके बदले ब्रिटेन को मिलता, गल्फ़ में अपना प्रभाव फैलाने का मौका. इसी अंडरस्टैंडिंग के तहत 1868 में हुई ब्रिटेन और अल-थानी के बीच एक समझौता हुआ. ब्रिटेन ने अल-थानी को क़तर का शासक मान लिया.

फिर आई 20वीं सदी. ऑटोमन साम्राज्य से बचने के लिए क़तर ने फिर ब्रिटेन का मुंह देखा. 1916 में उसके और ब्रिटेन के बीच फिर एक समझौता हुआ. इसमें तय हुआ कि अगर समंदर के रास्ते क़तर पर हमला हुआ, तो ब्रिटेन उसकी हिफ़ाजत करेगा. इस प्रॉटेक्शन के बदले ब्रिटेन को मिला क़तर की विदेश नीति तय करने का अधिकार.

मगर केवल समंदर की सुरक्षा ही क़तर के लिए पर्याप्त नहीं थी. उसे सबसे ज़्यादा ख़तरा था, अपने पड़ोस में नए बने किंगडम ऑफ सऊदी अरेबिया से. क़तर और सऊदी की ज़मीनी सीमाएं मिलती हैं. ब्रिटेन वाले अग्रीमेंट में बस समंदर वाला करार था. ऐसे में मई 1935 में क़तर ने दोबारा समझौता किया ब्रिटेन से. इसके तहत ब्रिटेन उसे ज़मीन और समुद्र, दोनों रास्तों से होने वाले आक्रमण से सुरक्षा देने को राज़ी हो गया.

Britain Qatar 1916 1935 Treaty
1916 और 1935 में क़तर और ब्रिटेन के बीच हुए समझौते

बेटे ने बाप का तख़्तापलट कर दिया

बाद के बरसों में सऊदी इस इलाके का सुपरबॉस बन गया. वो क़तर पर धौंस जमाता. उसकी पॉलिसीज़ को प्रभावित करता. मगर चीजें हमेशा ऐसी नहीं रहने वाली थीं. स्थितियां बदलीं 1995 के साल. क्या हुआ इस साल? इस बरस क़तर में हुआ एक तख़्तापलट. तब क़तर के शासक थे शेख खलीफ़ा बिन हमाद अल-थानी. जून 1995 में वो गए स्विट्ज़रलैंड की यात्रा पर. पीछे से उनके बेटे शेख हमाद बिन खलीफ़ा अल-थानी ने गद्दी हथिया ली. बेटे ने बाप की कुर्सी हड़प ली. मगर बाप आसानी से हार मानने को तैयार नहीं था. उसने मांगी सऊदी और UAE की मदद. इनकी मदद से बाप ने बनाई जवाबी तख़्तापलट की प्लानिंग. मगर ये कोशिश कामयाब नहीं हुई.

शेख हमाद को सत्ता से हटाने की ये कोशिशें भले नाकाम रही हों, मगर इसने क़तर और सऊदी ग्रुप के रिश्तों की दिशा तय कर दी. अब क़तर ने सऊदी की दिखाई लाइन पर चलने से इनकार कर दिया. उसकी सऊदी ग्रुप के साथ कड़वाहट बढ़ती चली गई.

Hamad Bin Khalifa Al Thani
शेख हमाद बिन खलीफ़ा अल-थानी (फोटो: एएफपी)

सऊदी से दूर-दूर, अमेरिका के पास-पास

क़तर की पॉलिसी उसके पड़ोसियों से बिल्कुल अलग थी. वो ख़ुद को शांतिदूत की तरह पेश करने लगा. क़तर की राजधानी दोहा के दरवाज़े सबके लिए खोल दिए गए. अब यहां चरमपंथी, कट्टरपंथी, युद्ध लड़ाका सब पहुंचते. वो फाइव-स्टार होटलों में बैठकर सुलह और बातचीत करते. सऊदी आलोचक, हिज़बुल्लाह, शिया मिलिशिया, हमास, तालिबान सब आने लगे क़तर.

पड़ोसियों से इतना झगड़ा मोल लेने के बाद क़तर को ज़रूरत थी सिक्यॉरिटी की. इसमें उसके काम आया अमेरिका. क़तर ने अमेरिका को अपने यहां मिलिटरी बेस बनाने की जगह दी. ये मिलिटरी बेस पूरे मिडिल-ईस्ट में सबसे बड़ा अमेरिकी सैन्य बेस है. अब क़तर के पास अकूत पैसा भी था. ग्लोबल प्रभाव भी था. और अमेरिकी बेस होने के कारण उसकी सुरक्षा भी तय थी. उसे अपने पड़ोसियों की नाराज़गी की कोई परवाह नहीं रह गई थी.

Al Udeid Air Base
अल उदीद एयरबेस मिलिटरी बेस पूरे मिडिल-ईस्ट में सबसे बड़ा अमेरिकी सैन्य बेस है. (फोटो: एएफपी)

क़तर ने अरब स्प्रिंग को बढ़ावा क्यों दिया?

क़तर के इसी कॉन्फिडेंस के बीच आया 2011 का साल. इस बरस ट्यूनीशिया से शुरुआत हुई अरब स्प्रिंग की. ये प्रो-डेमोक्रेसी लहर तानाशाहों के लिए तो ख़तरा थी ही. इससे सऊदी और UAE जैसी इस्लामिक राजशाहियों को भी बड़ा ख़तरा था. वो इसे कुचलने की कोशिश कर रहे थे. मगर क़तर यहां भी अलग लाइन पर था. वो इन आंदोलनों को बढ़ावा देने लगा. उसकी कोशिश थी कि अरब स्प्रिंग की हवा उसके पड़ोसियों का भी तख़्तापलट कर दे. यही सोचकर क़तर ने बाग़ियों को फंडिंग देनी शुरू की. उसने मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे कट्टरपंथियों को भी ख़ूब सपोर्ट किया.

ये अरब स्प्रिंग का घटनाक्रम क़तर और सऊदी ग्रुप के झगड़े का सबसे हाई पॉइंट साबित हुआ. इन्हीं बढ़ी हुई तल्ख़ियों के बीच सऊदी में आए प्रिंस सलमान. कहते हैं, क़तर ब्लॉकेड की प्लानिंग प्रिंस सलमान की ही थी. वो तब सऊदी के डेप्युटी क्राउन प्रिंस थे. विदेश से जुड़े सारे मामलों में उन्हीं की चलती थी. 2015 में उन्होंने ही यमन युद्ध में सऊदी की एंट्री कराई थी. यमन में हूती विद्रोहियों से लड़ रहा था सऊदी. इन हूती विद्रोहियों को ईरान के अलावा क़तर से भी सपोर्ट मिल रहा था. क़तर के इस सपोर्ट ने झगड़े का ट्रिगर दबा दिया और सऊदी ग्रुप ने कर दिया क़तर ब्लॉकेड का ऐलान.

Houthi Rebel
हूती विद्रोही. (फोटो: एएफपी)

इस ब्लॉकेड से क्या हासिल करना चाहता था सऊदी ग्रुप? इस सवाल के जवाब में हम आपको बताते हैं कुछ पॉइंट्स. ये उन 13 शर्तों का हिस्सा हैं, जिन्हें सऊदी ग्रुप ने क़तर के सामने रखा-

1. ईरान के साथ रिश्ते ख़त्म करो. वहां अपने दूतावास भी बंद करो.
2. आतंकी संगठनों के साथ सारे रिश्ते तोड़ो.
3. सऊदी अरब, UAE, मिस्र, बहरीन, अमेरिका और बाकी देशों द्वारा आतंकी माने जाने वालों की फंडिंग रोको.
4. न्यूज़ नेटवर्क अल-जज़ीरा को बंद करो.
5. तुर्की के साथ संबंध तोड़ो. उसका मिलिटरी बेस बंद करवाओ.
6. दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखलंदाज़ी बंद करो.
7. राजनैतिक, आर्थिक और सैन्य सहयोग के मामले में बाकी अरब देशों का साथ दो.

हमाम में सब नंगे हैं

इन शर्तों में आतंकवादी संगठनों की फंडिंग का ज़िक्र आया. ये मामला क्या है? ये मामला जुड़ा है क़तर की विरोधाभासी नीतियों से. उसकी ईरान और अमेरिका, दोनों से दोस्ती है. एक तरफ वो यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की मदद करता है. दूसरी तरफ सीरिया में ईरान समर्थित बशर अल-असद से लड़ने वालों की हेल्प करता है. वो आतंकवाद का विरोध भी करता है. दूसरी तरफ वो अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट से जुड़े संगठनों को सीरिया में फंड भी देता है. उसने कट्टरपंथी संगठनों के गिरफ़्तार लोगों को छुड़वाने के लिए करोड़ों रुपये की फ़िरौतियां भी दी हैं.

लेकिन सवाल ये है कि क्या सऊदी और UAE हाई मोरल ग्राउंड लेने की स्थिति में हैं? क्या वो पाक साफ़ हैं? जवाब है, नहीं. सऊदी और UAE ख़ुद भी इस्लामिक कट्टरपंथियों की मदद करते हैं. उनकी फंडिंग करते हैं. यमन और लीबिया जैसे देशों में अपनी पसंद की सरकार बनवाने के लिए युद्ध प्रायोजित करते हैं. सऊदी पर दुनियाभर में कट्टरपंथी वहाबिज़म को एक्सपोर्ट करने का आरोप है. ओसामा बिन लादेन सऊदी का ही प्रॉडक्ट था. 9/11 हमले में शामिल 19 हाइजैकर्स में से 12 सऊदी के और दो UAE के नागरिक थे. कट्टरपंथियों को सपोर्ट करने में सऊदी का इतना लंबा-चौड़ा रेकॉर्ड है कि इसपर कई क़िताबें लिखी जा चुकी हैं. ये वो टेरेटरी है, जहां इन सबके हाथ गंदे हैं.

Bashar Assad
सीरिया के राष्ट्रपति राष्ट्रपति बशर अल-असद (फोटो: एएफपी)

कबीलाई झगड़ों का आधुनिक रूप

इस लड़ाई की असल वजह वही है, जो सौ साल पहले थी. समझिए कि ये उसी पुराने अरब के कबीलाई झगड़ों का आधुनिक रूप है. क़तर पाक साफ नहीं है. मगर सऊदी और UAE भी किसी ग्रेटर गुड की भावना से काम नहीं कर रहे. उनकी चिढ़ बस इतनी है कि बहरीन जैसे पिछलग्गू देशों की तरह क़तर भी कदमताल मिलाकर क्यों नहीं चलता उनके पीछे.

Fifa World Cup 2022
2022 का फीफा फुटबॉल वर्ल्ड कप क़तर में होने वाला है. (फोटो: एएफपी)

जहां तक ब्लॉकेड का सवाल है, तो क़तर ने इसका विकल्प खोज लिया है. ब्लॉकेड से पहले सारा दूध बाहर से मंगवाता था. ब्लॉकेड के बाद उसने रूसी कार्गो विमान की मदद से हज़ारों यूरोपियन गायें एयरलिफ़्ट करवा लीं. इतनी गायें हैं अब वहां कि हर दिन 30 से 50 गायें बच्चे देती हैं. ब्लॉकेड के समय उसका GDP ग्रोथ था 1.7 पर्सेंट. 2019 में ये बढ़कर हो गया 2.2 पर्सेंट. प्रति व्यक्ति आय में दुनिया का नंबर एक देश है क़तर. 2022 का फीफा फुटबॉल वर्ल्ड कप होने वाला है यहां. क़तर पर जिस तरह के प्रतिबंध लगे, उनके आगे कई देश बिखर गए होते.


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