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गायत्री प्रजापति: गैंगरेप का दोषी नेता कैसे बना हजारों करोड़ का मालिक?

पूर्व मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति को आजीवन कारावास की सजा मिली है. उन्हें और अन्य को चित्रकूट नाबालिग गैंगरेप मामले में अदालत ने दोषी करार दिया था. शुक्रवार 12 नवंबर को गायत्री प्रसाद प्रजापति और अन्य दोषियों की सजा का ऐलान होना था. आजतक के मुताबिक अदालत ने गायत्री प्रसाद प्रजापित को उम्रकैद की सजा सुनाने के अलावा उन पर दो लाख रुपये का जुर्माना भी ठोका है. उनके अलावा दो और दोषियों अशोक तिवारी और आशीष शुक्ला को भी उम्रकैद हुई है. अदालत ने इन दोनों पर दो-दो लाख का जुर्माना लगाया है. ये तीनों गैंगरेप और पॉक्सो ऐक्ट की धाराओं में दोषी पाए गए थे. मामले के अन्य आरोपियों विकास वर्मा, अमरेंद्र सिंह, चंद्रपाल और रूपेश्वर को अदालत ने बरी कर दिया.

गायत्री प्रसाद प्रजापति की राजनीतिक यात्रा पर लल्लनटॉप ने एक स्पेशल स्टोरी की थी. इसे 10 जनवरी 2019 को प्रकाशित किया गया था. चित्रकूट गैंगरेप मामले में अदालत का फैसला आने के बाद ये स्टोरी एक बार फिर पाठकों के सामने है.


 

एक नेता जो कभी पुताई करता था और फिर विधायक और मंत्री बन गया.
एक नेता जिसकी समाजवादी पार्टी को तुड़वाने में अहम भूमिका बताई जाती है.
एक नेता जिसके बारे में सब जानना चाहता है कि उसके पास इतना पैसा कैसे आया.
एक नेता जो तीन चुनाव हारने के बाद जीता और सीधा मंत्री बन गया.

हम बात कर रहे हैं यूपी के पूर्व खनन मंत्री और अमेठी से विधायक रहे गायत्री प्रसाद प्रजापति की. आपको प्रजापति का पूरा इतिहास और वर्तमान बताते हैं. बचपन से लेकर बुढ़ापे तक का.

गायत्री प्रजापति का राजनीतिक ग्राफ अचानक से बढ़ा.
गायत्री प्रजापति का राजनीतिक ग्राफ अचानक से बढ़ा.

पर कहानी कहां से शुरू करें.

अमेठी से तीन किलोमीटर दूर पड़ने वाले परसावां गांव से. जहां एक मिट्टी के कुल्हड़ और बर्तन बनाने वाले सुकई राम के घर 16 जुलाई 1963 के दिन गायत्री का जन्म हुआ. या फिर 1996 से, जहां से गायत्री को अपना राजनीतिक गॉडफादर मिल गया. धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव.

चलिए आपको ज्यादा कंफ्यूज नहीं करते हैं. इन दोनों पड़ावों के बीच का सफर बताते हैं पहले आपको. ये समझाते हैं कि एक गरीब कुम्हार के घर जन्मे गायत्री राजकुमार कैसे बने. बात 1984 की है. उसी 84 की जिस साल इंदिरा गांधी का कत्ल हुआ. राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने. औऱ अमेठी को एक तोहफा मिला. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड. एचएएल का. वही एचएएल जो इस वक्त लोन लेकर अपने कर्मचारियों को सैलरी दे रही है.

अमेठी के कोरवा इलाके में एचएएल की बिल्डिंग बननी शुरू हुई. गायत्री जवान हो चुके थे. काम ढूंढ रहे थे. पता चला एचएएल की बिल्डिंग में पुताई का काम होना है. नौकरी मिल गई. पुताई करने लगे. कुछ साल ब्रश चलाने के बाद दूसरों से ब्रश चलवाने लगे. पुताई के ठेके उठाने शुरू कर दिए. वो राजीव गांधी का दौर था. अमेठी में काफी बिल्डिंगें बन रही थीं. पैसा आया तो प्रजापति को चसका लगा नेतागिरी का. प्रजापतियों समेत तमाम पिछड़ी जातियों का वो झंडा उठाए घूमने लगे. साल 1993 में विधानसभा चुनाव लड़ गए. चुनाव चिह्न बाल्टी. इलेक्शन कमीशन की साइट पर पार्टी का नाम है बीकेडी माने बहुजन क्रांति दल. क्रांति हो गई. गायत्री के लिए नहीं. बीजेपी के लिए. रामलहर के बाद बीजेपी प्रदेश में तो हारी. मगर कांग्रेस के इस गढ़ में उसके प्रत्याशी जमुना मिश्रा जीत गए. गायत्री को मिले मात्र 1526 वोट.

गायत्री को समझ आ गया. खाली बाइक लेकर घूमने से कुछ नहीं होगा. नेतागिरी करनी है तो जिताने के लिए लोग चाहिए होंगे. तो लोगों के लिए बनाया पिछड़ी जातियों का एक संगठन. बाइक पर ही घूम-घूम कर लोगों को लामबंद करने का काम करने लगे. पैसा भी आता रहे, इसके लिए पुताई की ठेकेदारी के साथ ही प्रॉपर्टी डीलिंग भी करने लगे. इसी दौड़भाग में उनकी मुलाकात हुई इटावा के रहने वाले दयाराम प्रजापति से. सपा से दो बार एमएलसी और मुलायम सिंह के खास दयाराम. दयाराम ने ही गायत्री की मुलाकात मुलायम सिंह से करवाई. मुलाकात रंग भी लाई. मुलायम वैसे भी प्रदेश में ऐसे पिछड़ी जातियों के लड़कों को ढूंढ रहे थे. 1996 में गायत्री को समाजवादी पार्टी से टिकट मिल गया. वो एक बार फिर अमेठी विधानसभा से लड़े. एक बार फिर हार गए. पर पिछली बार की तरह नहीं. 25,112 वोट मिले. तीसरे नंबर पर रहे. चुनाव कांग्रेस के राम हर्ष सिंह जीते. 36,069 वोट पाकर. दूसरे नंबर पर रहे पिछली बार के विधायक बीजेपी के जमुना मिश्रा. उनको 31,870 वोट मिले.

लखनऊ का एक एडीएम फल गया

मगर अगले चुनाव हुए 2002 में. तो 96 से 2002 तक प्रजापति क्या कर रहे थे. लोग बताते हैं कि वो जमीन पर सक्रिय रहते. मुलायम सिंह का जन्मदिन धूमधाम से मनाते. क्षेत्र में खुद को मुलायम का खास बताते. इस तरह उनकी प्रॉपर्टी डीलिंग की दुकान और बढ़ गई. लखनऊ तक पहुंच गई. जानकार बताते हैं अमेठी में उस वक्त एक एसडीएम रहे थे. उनसे गायत्री की बड़ी दोस्ती हो गई थी. फिर ये अधिकारी पहुंच गए लखनऊ. एडीएम लखनऊ बनकर. 2000-2001 के आसपास की बात है. अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे. लखनऊ के सांसद भी. उनका एक ड्रीम प्रॉजेक्ट आया. शहीद पथ. ये वो बाईपास है जिसने लखनऊ के अंदर जाने वाली आधी गाड़ियों को बाहर से निकालकर फैजाबाद हाईवे से जोड़ दिया. तो उन एडीएम साहब को इस बाईपास की पहले से खबर थी. उन्होंने गायत्री पर कृपा बरसाई और उस जगह की काफी जमीन गायत्री और उनके जानने वालों को खरीदवा दीं. कहा जाता है कि इसी जमीन पर बाद में गायत्री ने की प्लॉटिंग और खूब पैसा कमाया.

गायत्री प्रजापति तीन चुनावी हार के बाद चौथी बार में जीते चुनाव.
गायत्री प्रजापति तीन चुनावी हार के बाद चौथी बार में जीते चुनाव.

अब लौटते हैं 2002 के विधानसभा चुनाव में. गायत्री को एक बार फिर से मुलायम सिंह का आशीर्वाद मिल गया. राजनीति में आशीर्वाद का मतलब टिकट होता है. अमेठी के पत्रकार बताते हैं कि इस बार टिकट मिलने का विरोध भी हुआ. इस पर मुलायम सिंह अमेठी पहुंचे और कार्यकर्ताओं से साफ कह दिया कि गायत्री हमारे लड़के जैसा है. उसको जिताओ. अब नेताजी की कार्यकर्ताओं ने भले सुन ली हो. जनता ने नहीं सुनी. गायत्री लगातार तीसरी बार चुनाव हार गए. 21764 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे. चुनाव जीता रानी अमिता सिंह ने. बीजेपी से. उनको 55949 वोट मिले. दूसरे नंबर पर रहे कांग्रेस के आशीष. 37184 वोटों के साथ.

अगले चुनाव हुए 2007 में. पर इस बार गायत्री का टिकट कट गया. लोकल स्तर पर विरोध के कारण गायत्री का टिकट कट गया. टिकट मिला राजेश कुमार को. पर वो भी बुरी तरह हारे. एक बार फिर विधायक बनीं अमिता सिंह. तो अब तक गायत्री ठीकठाक पैसा कमा चुके थे. ज्यादातर वक्त भी लखनऊ में बीतता था. मगर अमेठी में अपने चेले-चपाटों और जनता के बीच ये मैसेज वो देते रहते थे कि वो धरतीपुत्र के पुत्र हैं. तो क्या हुआ उन्हें 2007 में टिकट नहीं मिला. अब 2012 के चुनाव आने वाले थे तो उनको ये बात साबित भी करनी थी. पर टिकट मिले कैसे. तो इसके लिए एक साल पहले चलना पड़ेगा. 2011 में. आगरा में समाजवादी पार्टी का अधिवेशन चल रहा था. रामगोपाल यादव घोषणा करते हैं कि अमेठी के गायत्री प्रसाद प्रजापति ने पार्टी को 25 लाख रुपये डोनेट किए हैं. गायत्री लपक के मंच पर जाते हैं और मुलायम सिंह के पैर छू लेते हैं. मंच के दूसरी तरफ बैठी जनता तीन बार के हारे हुए गायत्री को राजनीति का चुका हुआ खिलाड़ी समझ रही थी. पर मई में गायत्री का टिकट फाइनल हो गया. और गायत्री ने 2012 में इतिहास रच दिया. दो बार की विधायक अमिता सिंह को चुनाव में हरा दिया. चार विधानसभा चुनाव बाद उनका वक्त आ ही गया. ये रहा रिजल्ट –

गायत्री प्रसाद – 58,390 वोट
अमिता सिंह, कांग्रेस – 49638 वोट
आशीष शुक्ला, बसपा – 35,318 वोट

इस जीत के साथ एक भविष्यवाणी भी सच हो गई. जो एक वक्त गायत्री के गुरु रहे प्रतापगढ़ के ओम प्रकाश द्विवेदी ने की थी. द्विवेदी ने गायत्री से कहा था – पूजा-पाठ करते रहो. सफलता मिलेगी. मंत्री भी बनोगे. (इन द्विवेदी जी का नाम याद रखिएगा, आगे जिक्र आएगा). तो एक भविष्यवाणी तो सही हो गई थी. सफलता मिल गई थी. गायत्री विधायक बन गए थे. दूसरी भविष्यवाणी थी मंत्री बनने की. तो आगे ये भी सही हो गई.

गायत्री प्रजापति ने मुलायम सिंह का चोला हमेशा पकड़े रखा.
गायत्री प्रजापति ने मुलायम सिंह का चोला हमेशा पकड़े रखा.

गायत्री ने शिवपाल सिंह से मुलाकातें बढ़ाईं. मुलायम सिंह का आशीर्वाद तो पहले से ही था. सो 2013 में मंत्रीमंडल विस्तार करते हुए सीएम अखिलेश यादव ने गायत्री को सिंचाई विभाग में राज्य मंत्री बना दिया. सिंचाई विभाग के कैबिनेट मिनिस्टर थे खुद शिवपाल यादव. हालांकि अखिलेश गायत्री को लेकर इतने खुश नहीं थे. गायत्री को समझ आ गया कुछ और करना पड़ेगा. जानकार कहते हैं कि गायत्री ने इसके बाद मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता और उनके पुत्र प्रतीक की परिक्रमा करनी शुरू की. इसका फायदा मिला 2013 के जुलाई महीने में. जब गायत्री को खनन विभाग मिल गया. फिर वो इसी डिपार्टमेंट के पहले स्वतंत्र प्रभार और फिर 2014 में कैबिनेट मिनिस्टर बन गए. गायत्री शायद इकलौते मंत्री होंगे जिनका एक ही मंत्रालय में तीन बार प्रमोशन हुआ. इसके बाद तो बस दिन दोगुनी रात चौगुनी तरक्की होने लगी. वो सपा में फाइनैंसर और बड़े-बड़े इवेंट्स के लिए पैसा जुटाने का काम भी करने लगे.

इसी बीच गायत्री को मुलायम ने एक सम्मेलन करवाने का काम सौंपा. 17 अति पिछड़ी जातियों का सम्मेलन. इसमें प्रजापति जाति भी थी जिसका झंडा गायत्री 1993 से उठाए थे. गायत्री ने इस सम्मेलन को मेगा इवेंट बना दिया. वो बड़ी-बड़ी एलईडी स्क्रीन लगवाई गईं. पार्टी कार्यालय से लेकर सड़कों तक. जिस दिन सम्मेलन था. उस दिन बारिश हुई, मगर गायत्री ने ऑफिस के मैदान को भरने भर की भीड़ जुटा ली. और यहीं निकला गायत्री का सबसे फेमस राजनीतिक उद्घोष. वो एक सांस में बोले –

ऐ मेरे पिछड़े, गरीबों, कमजोरों, मजदूरों, उठो जागो, वक्त आ गया है.

इस सफल कार्यक्रम ने गायत्री का जलजला करवा दिया. इतना करवा दिया कि 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने गायत्री को स्टार प्रचारक बना दिया. प्रजापति को अति पिछड़ी जातियों का समाजवादी चेहरा बना दिया गया. उनकी एक यात्रा भी निकलवाई गई ताकि इन 17 अति पिछड़ी जातियों को लामबंद किया जा सके.

मुलायम सिंह के साथ गायत्री प्रजापति.
मुलायम सिंह के साथ गायत्री प्रजापति.

2014 के चुनाव में रिजल्ट जरूर सपा के फेवर में नहीं रहा. मगर गायत्री सपा के स्टार प्रचारक बने रहे. मुलायम की आंख के तारे बने रहे. गायत्री का कद इतना बढ़ा कि बड़ी-बड़ी मीटिंगों में सपा नेता खुद को गायत्री का करीबी दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते. तरीका होता गायत्री के बगल में कुर्सी लगाना. उनके कानों में फुसफुसाना.

पर तरक्की के साथ आती हैं शिकायतें. तो गायत्री के खिलाफ सबसे पहली शिकायत की उन्हीं गुरुजी ने, जिनका नाम कुछ देर पहले हमने याद रखने को कहा था. ओम प्रकाश द्विवेदी. द्विवेदी जी पहुंचे लोकायुक्त के पास. उन्होंने गायत्री पर कई सौ करोड़ रुपये की संपत्ति गलत तरीके से जुटाने के आरोप लगाए. हालांकि ओम प्रकाश द्विवेदी ने बाद में ये शिकायत वापस ले ली. पर असली शिकायत की यूपी में आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की पत्नी और सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने. लोकायुक्त से लेकर कोर्ट तक नूतन ने शिकायत की कि खनन के धंधे से गायत्री ने एक हजार करोड़ से भी ज्यादा की संपत्ति इकट्ठा कर ली है. नूतन और द्विवेदी के अलावा तीन और शिकायतें आईं. माने कुल पांच. मगर इनमें से तीन शिकायत वापस ले चुके हैं. लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने इसमें से तमाम लोगों को तलब भी किया. उनको भी जिनके बारे में कहा गया कि उनके नाम पर गायत्री ने काफी संपत्ति ली है. हालांकि इनमें से ज्यादातर लोगों ने ये बात कही कि प्रॉपर्टी उन्होंने खुद से खरीदी है.

हालांकि अखिलेश सरकार को उस समय तगड़ा झटका लगा, जब हाई कोर्ट ने खनन विभाग में अनिमियताओं को लेकर सीबीआई जांच के आदेश दे दिए. इसके अलावा गायत्री पर जमीनों के अवैध कब्जे, सरकारी जमीन बेच देने, पद का दुरुपयोग करने जैसे भी कई आरोप लगे. अखिलेश ने इस पर कार्रवाई करते हुए गायत्री को कैबिनेट मिनिस्टर के पद से हटा दिया. उसी वक्त सबके सामने आया यादव परिवार का झगड़ा. माना जाता है कि अखिलेश का पिता मुलायम और चाचा शिवपाल के साथ जो विवाद शुरू हुआ, उसमें प्रजापति को मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया जाना भी एक बड़ा मुद्दा था. प्रजापति की बर्खास्तगी पर मुलायम नाराज हो गए थे. इसी दबाव के कारण ही अखिलेश ने बाद में प्रजापति को दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया था. गायत्री ने भी इस बीच समझ लिया कि सपा अब अखिलेश यादव के हाथ में जा रही है. तभी फिर से मंत्री बनने पर वो अखिलेश यादव के चरण छू बैठे. मगर यही चरण वंदना अब और गायत्री का अवैध खनन का मामला अखिलेश यादव के गले की फांस बन रहा है.

किस मामले में जेल में हैं

गायत्री प्रजापति को असली झटका लगा 18 फरवरी 2017 को. जब विधानसभा चुनाव सिर पर था. नेता प्रचार करने में जुटे थे. तभी गायत्री प्रजापति व उसके छह साथियों के खिलाफ लखनऊ के गौतमपल्ली थाने में रिपोर्ट लिखाई गई. यह रिपोर्ट चित्रकूट की एक पीड़िता की तहरीर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर लिखी गई थी. पीड़िता ने आरोप लगाया था कि गायत्री के सरकारी आवास पर नशीला पदार्थ चाय में मिलाकर बेहोश करके उसके साथ रेप किया गया था.

गायत्री फिलहाल जेल में हैं.
गायत्री फिलहाल जेल में हैं.

पीड़िता का आरोप था कि गायत्री और उसके साथियों ने तीन साल तक उसके साथ गैंगरेप किया, उसकी अश्लील तस्वीरें लीं और उसे तीन साल तक लगातार धमकी देते रहे. महिला ने आवाज तब उठाई जब आरोपियों ने उसकी बेटी पर नजर डालने की कोशिश की. इस मामले का ये असर हुआ कि 27 फरवरी को अमेठी में अपना वोट डालने के बाद से गायत्री फरार हो गए. अब गायत्री को इसी मामले में उम्रकैद की सजा हुई है.

एक चीज छूट गई थी. 2017 विधानसभा चुनाव का रिजल्ट. गायत्री रेप और अवैध खनन में तो फंसे, मगर 2017 का चुनाव हारे या जीते? तो जवाब है हारे. चुनाव जीतीं बीजेपी की गरिमा सिंह. गायत्री दूसरे नंबर पर रहे. गरिमा को मिले 63912 वोट. गायत्री को मिले 58941 वोट.

पर ये तो सिर्फ चुनावी हार थी. असली हार तो गायत्री की ये थी कि पिछले 6-7 साल में जो राजनीतिक और सामाजिक प्रतिष्ठा उन्होंने पाई थी. वो अब जेल की काल कोठरी में कैद होकर रह गई थी.


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