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कोविड काल में नौकरियों की हालत कितनी खस्ता, ये रिपोर्ट डराने वाली है

बेरोज़गारी. हमारे देश के लिए एक बहुत बड़ी समस्या है. 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में रोज़गार के अवसर बढ़ाने के लिए 100 लाख करोड़ की योजना का ऐलान किया. रोज़गार और बेरोज़गारी का स्तर देखने के लिए सरकार की ओर से समय-समय पर पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे (PLFS) कराया जाता है. हाल में जारी PFLS की सालाना रिपोर्ट में कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान नौकरियों पर पड़े असर का लेखा-जोखा दिया गया है. PLFS के अलावा एक अन्य निजी संस्था सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) ने भी ऐसे ही आंकड़े जारी करके देश में बेरोजगारी की हालत बयां की है. आइए बताते हैं, इन रिपोर्ट्स में है क्या-

शहरों में बेरोजगारी की मार ज्यादा

अगर कोविड की पहली लहर की बात करें तो सर्विस और निर्माण दोनों क्षेत्रों की नौकरियों में सबसे ज़्यादा महिलाएं बेरोज़गार हुईं. ग्रामीण और शहरी दोनों जगहों पर महिलाओं को ख़ामियाज़ा उठाना पड़ा. वहीं PFLS की रिपोर्ट के मुताबिक, दूसरी लहर में सबसे ज्यादा शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ी. इसमें संगठित क्षेत्र, आम भाषा में कहें तो सैलरीड क्लास पर सबसे ज़्यादा असर पड़ा है.

PLFS का डेटा देश में आर्थिक संकट और अवसरों की कमी को भी साफ़ दर्शाता है. रिपोर्ट बताती है कि श्रमिक कम उत्पादकता वाले काम करने को मजबूर हैं. इसके एवज में उनको वेतन भी कम मिलता है जिससे बेरोज़गारी की समस्या और बढ़ रही है. कोरोना की पहली लहर के बाद कृषि और गैर-कृषि दोनों क्षेत्रों में ग्रामीण इलाक़ों में रोज़गार बढ़े थे. लेकिन दूसरी लहर के बाद ग्रामीण इलाक़ों में कृषि क्षेत्र से जुड़े कामकाज में बढ़ोतरी हुई है. जहां तक बात गैर-कृषि क्षेत्र की है, तो यहां परिणाम नकारात्मक हैं. नौकरियों में गिरावट आई है.

CMIE के आँकड़ों ने भी ऐसे ही संकेत दिए हैं. CMIE के मुताबिक़, फ़िलहाल भारत में बेरोज़गारी दर 7.4 प्रतिशत पर है. लेकिन यही शहरी इलाक़ों में ये दर 9.1 प्रतिशत तक है. ग्रामीण इलाक़ों में इसका स्तर 6.7 प्रतिशत है. अगर जुलाई 2021 तक CMIE के आंकड़ों पर नज़र डालें तो खेतिहर मजदूरों और कंस्ट्रक्शन के काम में लगे मज़दूरों के रोजगार में बढ़ोतरी दिखती है. अगर बात तनख्वाई नौकरियों की करें तो आंकड़े दिखाते हैं कि जून 2021 में जहां 7.97 करोड़ लोगों के पास नौकरियां थीं, वहीं जुलाई 2021 में ये 30 लाख घटकर 7.65 करोड़ हो गईं. मतलब एक महीने में 30 लाख आपके और मेरे जैसे महीने के अंत में तन्ख्वाह पाने वाले लोग बेरोज़गार हो गए. जुलाई के ये आँकड़े कोरोना वायरस की दूसरी लहर से पहले जनवरी-मार्च 2021 में 8 करोड़ नौकरियों के आँकड़े से काफ़ी कम हैं.

2019-20 के स्तर की तुलना में जुलाई 2021 में रोजगार में 2.3 प्रतिशत की गिरावट आई थी. जिसमें वेतनभोगी नौकरियों में गिरावट 11.7 प्रतिशत थी जबकि कारोबारियों को 7.5 फीसदी का नुकसान हुआ है.

नौकरी छूटी तो किसानी करने लगे

अगर तुलना निचले लेवल की नौकरियों से करें तो यहां असर कम होता दिखता है. छोटे व्यापारियों और दिहाड़ी मजदूरों को 3.2 प्रतिशत का नुकसान हुआ था. CMIE की रिपोर्ट ये भी दावा करती है कि नौकरी गंवाने वालों में से कुछ किसानी करने लगे, इसलिए किसानों की संख्या में 9.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. लेकिन जुलाई 2021 में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की बढ़ोतरी ज्यादातर खेतिहर मजदूरों और निर्माण श्रमिकों के बीच हुई थी.

CMIE की रिपोर्ट कहती है कि रोजगार में ये बढ़ोतरी ज्यादातर इन्फ़ॉर्मल एम्प्लॉयमेंट यानी अस्थायी सेक्टर में है. कम से कम कृषि के मामले में तो इस बात की काफ़ी आशंका है कि खरीफ फसल के बाद अस्थायी नौकरियां जा सकती हैं यानी कि रोज़गार दर में और गिरावट.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में इकनॉमिक्स पढ़ाने वाले डॉ. नरेंद्र ठाकुर ने दी लल्लनटॉप को बताया कि ग्रामीण इलाक़ों में रोज़गार दर में बढ़ोतरी एक बड़ी “बुनियादी समस्या” को दिखाता है. उनके मुताबिक़,

कोरोना के प्रकोप के कारण जो लोग शहर से ग्रामीण इलाक़ों में गए हैं, अब वो वहीं कृषि क्षेत्र में नौकरियां तलाश रहे हैं, क्योंकि शहरों में नौकरियों की भारी कमी है. इस समस्या का समाधान सरकार को जल्द निकालना पड़ेगा. इसके लिए नरेगा जैसी स्कीम शहरों में भी लागू करने पर विचार करना चाहिए. 

स्वरोजगार पर जोर, लेकिन इसमें भी पेच है

जून-जुलाई, 2019-20 का डेटा जारी करते हुए PLFS की रिपोर्ट में बताया गया है कि कुल रोजगार में सेल्फ़-एम्प्लॉयमेंट यानी स्वरोजगार की हिस्सेदारी सबसे ज़्यादा है. इसे पिछले साल की समान अवधि में स्वरोजगार 52.1 प्रतिशत था, जबकि इस बार बढ़कर 53.5 प्रतिशत हो गया है. लेकिन इसमें चिंता का विषय ये है कि स्वरोजगार श्रेणी के भीतर भी ज़्यादा बढ़ोतरी उन लोगों की है, जो घरेलू उद्यमों में सहायक के तौर पर काम करते हैं. जिनको वेतन भी नहीं मिलता. उदाहरण के लिए, एक रेहड़ी पर गोलगप्पे बेचने वाले को अपने घर पर काफ़ी तैयारी करनी पड़ती है और इस काम में घर के लोग मदद करते हैं. इसके लिए उन्हें अलग से कोई वेतन नहीं मिलता. ऐसे रोज़गार की तादाद काफ़ी बढ़ी है. ये 2018-19 में कुल स्वरोज़गार का ये 13.3 प्रतिशत था जो 2019-20 में बढ़कर 15.9 प्रतिशत पहुंच गया.

डॉ. नरेंद्र ठाकुर के मुताबिक़, सेल्फ़-एम्प्लॉयमेंट शहर से ग्रामीण पलायन की वजह से भी बढ़ा है. इससे उबरने के लिए सरकार को नीतिगत बदलाव करने की ज़रूरत है. वह कहते हैं,

“इस तरह के रोज़गार को अर्थशास्त्र की भाषा में डिसगाइस्ड अनएम्प्लॉयमेंट कहते हैं. ये काफ़ी चिंता का विषय है क्योंकि लोग मजबूर होकर इसे कर रहे हैं, विकल्प के अभाव में. इसी से जुड़ा है भुखमरी का सवाल. सरकार को पॉलिसी लेवल बदलाव करने होंगे. कम्पनियों, किसानों को अब लोन देने से काम नहीं चलने वाला, क्योंकि वो पहले से क़र्ज़ में डूबे हैं. PDS यानी राशन व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा. सरकार को तीनों किसान क़ानूनों पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है.”

पटरी पर लौटने में अभी वक्त

PLFS की सालाना रिपोर्ट हालांकि कुछ सकारात्मक पहलू भी दिखाती है. अपवाद ही सही लेकिन निर्माण क्षेत्र में रोजगार में काफ़ी सुधार हुआ है. औद्योगिक उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन अभी भी ये कोरोना के प्रकोप के पहले के स्तर से नीचे है. जून, 2020 में कारखानों में उत्पादन 13.6 प्रतिशत बढ़ा था.

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणब सेन कहते हैं कि  बेरोज़गारी अभी भी बहुत ज़्यादा है. लेकिन ये जो आंकड़े हैं वो डिसगाइस्ड अनएम्प्लॉमेंट के हैं. लोग काम कर रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है. असल में इसका मतलब यह है कि 20 साल से ज़्यादा समय से लोगों की आय बढ़ रही थी, जो अब नीचे आ गिरी है. मिडिल क्लास बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. ऐसा लगता है कि इसे वापस ठीक होने में थोड़ा समय लगेगा.


वीडियो-खर्चा-पानी: बेरोज़गारी पर मोदी सरकार को संसदीय पैनल ने कैसे घेर लिया?

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