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टीम इंडिया का लीजेंड 'सोनू', जिनके पिता उन्हें बिज़नेस नहीं, गेंद थमाना चाहते थे

जालंधर के सरदार ने 18 साल तक जब भी मैदान पर कदम रखा, तो अपने पिता के सपने को जिया. सरदार सरदेव सिंह ने ‘सोनू’ के लिए एक सपना देखा था. सोनू ने जब बचपन में ही हाथ में बल्ला थामा और अपनी इच्छा ज़ाहिर की, तो पिता ने सोच लिया कि ये एक दिन देश के लिए बड़ा नाम करेगा. आखिरकार लंबी मेहनत के बाद हुआ भी वैसा ही. लेकिन सोनू की उस कामयाबी को देखने के लिए उनके पिता नहीं रहे.

हम बात कर रहे हैं टीम इंडिया के टर्बनेटर हरभजन सिंह और उनके पिता सरदार सरदेव सिंह की. हरभजन सिंह अपने पिता की छह संतानों में इकलौते बेटे थे, जिसकी वजह से घर में उन्हें खूब लाड-प्यार मिलता था. बचपन में घर में चारों तरफ सिर्फ सोनू ही सोनू हुआ करता था.

पिता सरदार सरदेव का पुश्तैनी बिजनेस भज्जी को विरासत में मिला. लेकिन पिता नहीं चाहते थे कि वो उस बिज़नेस का हिस्सा बनें. खुद भज्जी की माता जी अवतार सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था-

”सोनू के पिता हाथ के औजारों के बिजनेस में थे, लेकिन वो कभी नहीं चाहते थे कि सोनू वो काम करे. वो बचपन से ही खेलों में लगा रहता था. उसे कबड्डी, जूडो, कराटे, क्रिकेट सब बहुत पसंद था.”

ऐसे बहुत से क्रिकेटर या क्रिकेट चाहने वाले बच्चे हैं, जो अपने घर में क्रिकेट या किसी भी खेल में भविष्य बनाने के बारे में बात भी नहीं कर सकते. लेकिन भज्जी के लिए ये सब उतना मुश्किल नहीं था. उनके पिता सरदेव सिंह ने भज्जी के टैलेंट को पहचाना और उन्हें क्रिकेट अकेडमी भेजने का फैसला कर लिया.

Harbhajan Bat
फाइल फोटो

भज्जी के रिश्तेदार करतार सिंह बैडमिंटन कोच थे. उन्होंने भज्जी को एक क्रिकेट कोच से मिलवाया और यहां से सोनू का हरभजन बनने का सफर शुरू हुआ.

सोनी शुरुआती करियर में हिन्दुस्तान के हर बच्चे की तरह बैटिंग के शौकीन थे. इस वजह से वो एक बल्लेबाज़ बनना चाहते थे. भज्जी के पहले कोच भुल्लर को लगता था कि सोनू एक साधारण गेंदबाज़ हैं और एक अच्छा बल्लेबाज़ बनने के लिए भी उन्हें बहुत कड़ी मेहनत की ज़रूरत है. लेकिन उसी दौरान भुल्लर का निधन हो गया.

सुबह उठकर ट्रेनिंग शुरू और स्कूटर की हेडलाइट में खत्म

अब भज्जी को एक नए कोच की ज़रूरत थी. तब भज्जी को वो कोच मिले, जिन्होंने सोनू को हरभजन बनाने में बड़ा रोल प्ले किया. यानी देविन्द्र अरोड़ा.

देविन्द्र अरोड़ा ने एक बार बताया था-

”पहले दिन ही भज्जी ने एक स्पॉट पर गेंदबाज़ी करने के लिए बेहतरीन धैर्य दिखाया. वो लगातार तीन घंटे तक गेंदबाज़ी करता था. वो सुबह जल्दी दिन शुरू करके ट्रेनिंग खत्म करने की ओर होता था, तो बाकी खिलाड़ी वहां ज्वॉइन करने के लिए पहुंचते थे. इसके बाद वो तीन बजे के करीब फिर से मैदान पर लौटता और सूरज ढलने तक प्रैक्टिस करता था.”

शुरुआती दिनों में भज्जी की अपने खेल के प्रति ऐसी लगन थी कि कई बार वो दिन ढलने के बाद स्कूटर की हेडलाइट जलाकर प्रैक्टिस किया करते थे.

भज्जी चोट के अलावा कभी भी प्रैक्टिस नहीं छोड़ते थे. वो दिन में तीन-तीन बार साइकिल से जालंधर शहर में अपने घर से दौलतपुरी मैदान का आना-जाना करते थे. हरभजन अपने हाई आर्म एक्शन की वजह से बॉल बाउंस करते और बल्लेबाज़ उसमें फंसकर कैच देने लगते. इस तरह के खेल की वजह से ही स्कूल में उन्हें कमाल का क्रिकेटर मान लिया गया.

जब भज्जी ने ठान लिया एक दिन ये कैप हासिल करके ही रहेंगे:

शुरुआती दिनों में भज्जी को भी भारतीय टीम की कैप खरीदकर पहनने का शौक था. जब वो एक बार इंडिया की हैट लेने एक फैक्ट्री में गए, तो उन्हें बिना इंडियन टीम को लोगों वाली कैप दे दी. इसके बाद भज्जी ने अपने दोस्तों से कहा-

‘अगर भगवान का साथ रहा, तो मैं एक दिन इस कैप को कमाऊंगा.’

इसके बाद साल 1998 में वो दिन आ ही गया, जब अनिल कुंबले के साथ ही भज्जी को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सीरीज़ में पहला मौका मिल गया. सरदार सरदेव सिंह ने जो सपना देखा था, वो अब सच हो चला था. भज्जी को उस मैच में दो विकेट मिले. लेकिन बॉलिंग ऐक्शन में शिकायत की वजह से उन्हें टीम से बाहर होना पड़ा.

साथ ही साथ ये वो दौर भी था, जब अनिल कुंबले टीम इंडिया के मैच विनर स्पिनर थे. उनके आगे टीम में जगह बना पाना किसी के लिए भी आसान नहीं था. लगातार अच्छा प्रदर्शन के बावजूद भज्जी को टीम में जगह नहीं मिल पा रही थी.

साल 1999 में उन्होंने फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में कमाल का खेल दिखाया. बल्ले से भी भज्जी ने खूब मेहनत की और एक सीरीज़ में 51 के औसत से भी रन बनाए. लेकिन टीम में वापसी का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था. इधर पिता की तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी. जबकि बहनों के लिए कुछ करने और उनकी शादी की चिंता भी हरभजन को सता रही थी.

साल 2000 में पिता का निधन और मुश्किल वक्त

साल 2000 में एक दिन सरदार सरदेव सिंह जी का देहांत हो गया. इसके बाद हरभजन बुरी तरह से टूट गए. उन्होंने क्रिकेट को छोड़ने तक का मन बना लिया. लेकिन फिर उनकी ज़िंदगी में वो टर्निंग प्वॉइंट आया, जो उन्हें वो सब देने वाला था, जो उन्होंने क्रिकेट के लिए गंवा दिया था.

साल 2001 में ऑस्ट्रेलिया की टीम एक बार फिर से भारत आने वाली थी. बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी से पहले ही अनिल कुंबले को चोट लगी और वो टीम से बाहर हो गए. ये सब भज्जी के लिए एक वरदान जैसा था. सौरव गांगुली, भज्जी के ऑल टाइम फेवरेट कप्तान ने तुरंत भज्जी को खेलने की कॉल भेज दी.

गांगुली ने एक बार भज्जी से कहा था,

”तुम एक लंबी रेस के घोड़े हो.”

2001 में बदल गया भज्जी का क्रिकेटिंग करियर

दादा की ये बात सच साबित हुई और भज्जी फिर टीम इंडिया की स्पिन जोड़ी के अहम किरदार बन गए. साल 2001 में वापसी करते हुए पहली इंटरनेशनल सीरीज़ में उन्होंने हैटट्रिक ली और भारत ने ऑस्ट्रेलिया को हराकर इतिहास रच दिया.

इस सीरीज़ के बाद हरभजन सिंह ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने अपने पिता के सपने को सच किया. हरभजन सिंह साल 2001 से 2011 तक भारतीय टीम का अहम हिस्सा रहे.

वो मोहम्मद अज़हरुद्दीन से लेकर सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, अनिल कुंबले और एमएस धोनी की कप्तानी में भी खेले. उन्होंने 2007 और 2011 में भारतीय टीम की जीत में अहम भूमिका निभाई. लेकिन साल 2012 से 2015 तक वो टीम में इक्के-दुक्के मौकों पर ही रहे. भज्जी आज भी आईपीएल में चेन्नई सुपर किंग्स टीम के साथ बने हुए हैं.

हरभजन सिंह ने टीम इंडिया के लिए कुल 103 टेस्ट में 417 विकेट, जबकि शॉर्टर फॉर्मेट में लगभग 300 विकेट चटकाए हैं.

साल 2015 के आखिर में हरभजन सिंह ने शादी की. वो बॉलीवुड अदाकारा गीता बसरा के साथ शादी के बंधन में बंधे.

हरभजन की मां बताती हैं कि वो अपने जीवन में कभी नहीं बदले. घर आने पर वो अक्सर राजमा चावला ही मांगते हैं, जबकि सुबह नाश्ते में उन्हें आलू और गोभी के पराठे ही चाहिए होते हैं.


2002 का वो किस्सा जब न्यूज़ीलैंड एयरपोर्ट पर हरभजन सिंह की एंट्री रोक दी गई! 

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