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भारत में राजनीतिक जासूसी नई बात नहीं; नेहरू, इंदिरा, मोदी सब पर लगे हैं आरोप

पेगासस जासूसी मामले में विपक्ष सरकार को घेर रहा है. सड़क से लेकर संसद तक बवाल हो रहा है. पेगासस मामले में जो लिस्ट सामने आई थी उसमें भारत के 300 फोन नंबर शामिल थे. दावा किया गया कि ये नंबर भारत के कई बड़े  नेताओं, पत्रकारों, बिजनेसमैन, ब्यूरोक्रेट्स और अन्य महत्वपूर्ण लोगों के हैं. हालांकि इन सभी लोगों की जासूसी हुई या नहीं, ये साबित नहीं हुआ है. भारत की सरकार कह रही है कि पेगासस जासूसी मामला ‘फेक न्यूज’ है. इससे देश की छवि खराब हुई है.

बहरहाल, भारत के राजनीतिक इतिहास में जासूसी का ये मामला नया नहीं है. पहले भी स्कैंडल्स हुए हैं, जिनमें सरकारें तक गिर गईं, मुख्यमंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया. कभी CBI जांच का आदेश हो गया तो कभी मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे. इतिहास ऐसे मामलों से भरा पड़ा है. ऐसे ही कुछ मामलों पर नजर डालते हैं.

नेहरू के जमाने में हो गई थी शुरुआत

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि राजनीतिक जासूसी की शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जमाने में ही हो गई थी. बात 1962 की है. जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट के पावरफुल मंत्री थे टीटी कृष्णामाचारी. उन्होंने फोन टैप होने का आरोप लगाया था. उन्होंने उस समय के इंटेलीजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर बीएन मलिक का नाम भी लिया था. हालांकि इस मामले में थोड़े समय बाद कुछ और नहीं सुना गया.

वहीं, तत्कालीन मंत्री रफी अहमद किदवई ने भी आरोप लगाया था कि सरदार पटेल के कहने पर उनका फोन टैप किया जा रहा था. हालांकि ना तो उन्होंने इसका विरोध किया और ना ही शिकायत की. संचार मंत्री होने के नाते उन्होंने AICC मुख्यालय में सामान्य टेलीफोन को अपने पास ट्रांसफर करा लिया. और अपने परिवार को सलाह दी कि उनके आधिकारिक फोन को डिनर के दौरान पारिवारिक मामलों पर चर्चा के समय बिजी रखें.

Nehru And Patel
पंडित जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल.

1959 में लोकप्रिय थल सेना प्रमुख जनरल केएस थिमय्या ने इस्तीफे की पेशकश कर दी थी. तत्कालीन रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन के सामने. उन्होंने आरोप लगाया था कि उनके ऑफिस और घर दोनों में बग थे. उन्होंने अपने एक इलेक्ट्रॉनिक विशेषज्ञ की मदद से इसे डीबग किया था.

जब इंदिरा गांधी ने अपने ही मंत्री की जासूसी करवाई

पत्रकार और लेखक विजय त्रिवेदी ने लल्लनटॉक से बातचीत में कहा कि इंदिरा गांधी ने अपने ही होम मिनिस्टर ज्ञानी जेल सिंह के खिलाफ फोन टैपिंग करवाई थी. एमके धर IB के डायरेक्टर रहे हैं. उन्होंने भी अपनी किताब में इसका जिक्र किया है. ये ऑन रिकॉर्ड है. इंदिरा गांधी ने अपने ही होम मिनिस्टर के खिलाफ जासूसी के लिए IB को कहा था. ज्ञानी जेल सिंह और ऑपरेशन ब्लू स्टार की वजह बने जरनैल सिंह भिंडरांवाले के बीच जो बातचीत हुई थी, उसे रिकॉर्ड किया गया था.

ज्ञानी जैल सिंह
ज्ञानी जैल सिंह

मेनका गांधी और उनके परिवार के खिलाफ भी फोन टैपिंग के कई मामले सामने आए. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, एमके धर ने ये माना कि उन्होंने मेनका गांधी की मां, अमतेश्वर आनंद के जोर बाग घर में व्यक्तिगत रूप से फोन-टैपिंग डिवाइस इंस्टॉल किया था. विजय त्रिवेदी का कहना है कि मेनका गांधी की मैगजीन सूर्या के ऑफिस पर छापे पड़े, जासूसी हुई. मेनका गांधी के दोस्तों की कॉल रिकॉर्डिंग हुई.

पत्रकार और लेखक विजय त्रिवेदी का कहना है कि राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह से उनके रिश्ते खराब हो गए थे. ये राष्ट्रपति की जासूसी का पहला मामला है जिसमें राजीव गांधी ने IB से राष्ट्रपति की जासूसी करवाई थी. इसका जिक्र एमके धर की किताब ‘ओपन सिक्रेट’ में है.

ज्ञानी जेल सिंह को भी इसका अंदाजा था और इसलिए वे अपने मेहमानों से राष्ट्रपति गार्डन में मिलते थे.

चंद्रशेखर को पीएम पद छोड़ना पड़ा था

साल 1990. चंद्रशेखर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह और उनकी नेशनल फ्रंट की सरकार पर आरोप लगाया कि उनका फोन टैप किया गया. हालांकि ये आरोप आरोप ही रह गए. वीपी सिंह के इस्तीफ़े के बाद जनता दल के नेता चंद्रशेखर ने समर्थकों के साथ पार्टी छोड़ दी. समाजवादी जनता पार्टी का गठन किया. 1990 में चंद्रशेखर ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई. 2 मार्च 1991 को हरियाणा पुलिस के सिपाही प्रेम सिंह और राज सिंह, राजीव गांधी के निवास 10 जनपथ के बाहर जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किए गए. दोनों सादे कपड़ों में थे और गिरफ्तारी के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि वो कुछ सूचना जुटाने वहां भेजे गए थे.

CBI के डायरेक्टर आलोक वर्मा के घर के बाहर चार लोग मिले. बात निकली कि सरकार उनकी जासूसी करवा रही है. ऐसे ही आरोपों की वजह से 1991 में चंद्रशेखर की सरकार गिर गई थी. इल्जाम था कि उन्होंने राजीव गांधी की जासूसी करवाई है (फोटो: इंडिया टुडे)
1991 में चंद्रशेखर की सरकार गिर गई थी. इल्जाम था कि उन्होंने राजीव गांधी की जासूसी करवाई है (फोटो: इंडिया टुडे)

ये मामला खूब गर्माया. तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने एक संयुक्त संसदीय समिति द्वारा जांच की पेशकश की. लेकिन कांग्रेस ने केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी. इसके बाद संसद में फ्लोर टेस्ट की नौबत आई. फ्लोर टेस्ट होना ही था कि इससे पहले चंद्रशेखर ने सबको चौंकाते हुए 7 मार्च 1991 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

कर्नाटक के सीएम को इस्तीफा देना पड़ा था

साल 1988. कर्नाटक. यहां रामकृष्ण हेगड़े की सरकार थी. इसी दौरान फोन टैपिंग का मामला सामने आया. इसके कारण मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े को इस्तीफा देना पड़ा था. तब हेगड़े की सरकार के समय के DGP ने 50 से अधिक नेताओं और मंत्रियों के फोन टेप कराने के आदेश दिए थे. असल में तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे. बोफोर्स मामले में वे घिरे हुए थे. ऐसे में जनता पार्टी के नेतृत्व वाली हेगड़े सरकार के खिलाफ केंद्र को जांच का मौका मिल गया. दबाव में आकर फोन टैपिंग के इस चर्चित मामले में सीएम को इस्तीफा देना पड़ा था.

टाटा और नीरा राडिया टेप कांड

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बड़ी मात्रा में इंटरसेप्ट की गई बातचीत के लीक होने का पहला उदाहरण था टाटा टेप्स का. इस टेप में भारत के 3 बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट नुस्ली वाडिया, रतन टाटा और केशव महिंद्रा की बातचीत थी. इसमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम यानी ULFA कैसे टाटा के स्वामित्व वाले चाय बागानों से धन उगाही कर रहा था, इस पर बातचीत हो रही थी. इस टेप के सामने आने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री आई के गुजराल ने ऑडियो टेप लीक को लेकर CBI जांच के आदेश भी दिए. लेकिन इसके तुरंत बाद ही सबूतों के अभाव में इस जांच को बंद कर दिया गया. हालांकि इसका जवाब कभी नहीं मिला कि इन उद्योगपतियों के टेलीफोन टेप करने का आदेश किस एजेंसी ने और किसके आदेश पर दिया था.

नीरा राडिया
नीरा राडिया

टाटा टेप्स के सामने आने के दशकों बाद 2008 में कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया की बातचीत का टेप सामने आया. नीरा राडिया टेप कांड सबसे चर्चित कांड रहा. आयकर विभाग ने 2008 से 2009 के बीच नीरा राडिया और कुछ राजनेताओं व कॉरपोरेट घरानों के बीच वार्ता को टेप किया था. इसमें कुछ पत्रकार भी शामिल थे. नीरा राडिया पर पॉलिटिकल लॉबिंग का भी आरोप लगा था. टेप कांड के बाद खुलासा हुआ कि राडिया किस नेता को कौनसा मंत्री पद दिया जाएगा, ऐसी लॉबिंग करती थीं. इसमें तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा का भी नाम सामने आया था. उन्हें 2जी स्पेक्ट्रम मामले में इस्तीफा देना पड़ा था. कोर्ट की निगरानी में सीबीआई ने इस टेप में आपराधिक एंगल खोजने की कोशिश की. लेकिन कुछ पता नहीं चला.

वित्त मंत्रालय की जासूसी!

साल 2011 में इंडियन एक्सप्रेस ने एक खबर छापी. उस वक्त के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने शक जाहिर किया था कि उनके दफ्तर की सुरक्षा में सेंध लगी है. वित्त मंत्री ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इसकी जांच कराने की गुजारिश करते हुए चिट्ठी लिखी थी. इसमें उन्होंने लिखा था कि उनके दफ्तर में 16 अहम जगहों पर चिपकने वाले पदार्थ दिखे थे. उन्होंने शक जाहिर किया था कि हो सकता है मंत्रालय के कामकाज पर नजर रखने की कोशिश की जा रही है. हालांकि IB ने उन चिपकने वाले पदार्थ को महज च्विंगम करार दिया था. बाद में प्रणव मुखर्जी ने भी कहा था कि IB की जांच में कुछ नहीं मिला था. बाद में इस पर तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह का बयान आया था. उन्होंने भी कहा था कि आईबी ने मुझे रिपोर्ट करते हुए कहा कि वहां इस तरह की कोई बात नहीं है.

अरुण जेटली ने भी लगाया था आरोप

साल 2013 में अरुण जेटली राज्यसभा में बीजेपी के नेता थे. उन्होंने फोन टेप कराने का आरोप लगाया था. इस मामले में दिल्ली पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया था. 32 पेज की चार्जशीट फाइल की गई थी. इस मामले में जिन चार लोगों को आरोपी बनाया गया था उनमें दिल्ली पुलिस के कॉन्स्टेबल अरविंद डबास और तीन प्राइवेट डिटेक्टिव्स शामिल थे.

पिछले साल 2020 में जब राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और डिप्टी सीएम सचिन पायलट के बीच अनबन चल रही थी तो पायलट ग्रुप ने भी कई विधायकों के फोन टैप होने के आरोप लगाए थे. गहलोत ने कहा था कि पायलट खेमा सरकार गिराने की साजिश रच रहा था.

पेगासस जासूसी मामले के सामने आने से पहले इस तरह के अनेकों उदाहरण मिलेंगे जब सरकार पर जासूसी के आरोप लगे. कई मीडिया संस्थानों के लिए कॉलम लिखने वाले और कई अखबारों के साथ काम कर चुके विकास पाठक का कहना है कि इस बार की जासूसी में कोई पैर्टन नहीं है. विकास पाठक ने कहा,

“जनरली जब किसी की जासूसी की जाती है, या फोन टैप किया जाता है तो उसका एक मकसद होता है. पेगासस वाले जो नाम हैं वो हिन्दुस्तानी थाली जैसी है, जिसमें 10 तरह की चीजें होती हैं. लेफ्ट, जिन्हें लेफ्ट ऑफ सेंटर माना गया है उनका भी नाम मिल जाएगा. उसी तरह ऐसे लोगों के भी नाम मिल जाएंगे, जिनके बारे में माना जाता है कि वो सरकार के करीब हैं. कांग्रेस के जमाने में कांग्रेस के खिलाफ खोजी पत्रकारिकता करने वाले भी शामिल हैं. राहुल का नाम है तो प्रवीण तोगड़िया का भी नाम है.”

बहरहाल, पेगासस मामले को लेकर रोज नए हंगामे हो रहे हैं. विपक्ष इसे मुद्दा बनाकर मोदी सरकार को घेरने की खूब कोशिश कर रहा है. हालांकि देखना होगा कि इससे उसे फायदा क्या होता है.


पेगासस मामले में विदेशी मीडिया क्या छाप और दिखा रही है?

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