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उस शख़्स की कहानी, जिसे पाकिस्तान 'राष्ट्रीय धरोहर' कहता है और दुनिया कहती है 'लादेन से भी ख़तरनाक'

ये साल 2004 के फ़रवरी महीने की बात है. पाकिस्तान के नेशनल टेलीविजन पर अचानक से एक चेहरा प्रकट हुआ. ये चेहरा अभी तक दीवारों और पोस्टरों तक ही महदूद था. उसकी हैसियत ‘हीरो’ की थी. पाकिस्तानी जनता के लिए वो किसी फ़रिश्ते से कम नहीं था. मगर उस रोज़ सब कुछ बदला हुआ था. कथित हीरो के कंधे झुके हुए थे. उसकी आवाज़ भीगी हुई थी. टीवी पर उसने एक कबूलनामा पढ़ा –

पिछले दो महीने में कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के चलते पाकिस्तानी अवाम जिस पीड़ा और दर्द से गुज़री है, मैं उस पर थोड़ा मरहम लगा सकूं. इसलिए, मैंने गहरे दुख, वेदना और पछतावे के साथ आपके सामने उपस्थित होने का फ़ैसला किया है. मैं अपने बर्ताव की पूरी ज़िम्मेदारी लेता हूं और आप लोगों से माफ़ी की गुहार लगाता हूं.

अगले रोज़ ये क़बूलनामा पूरी दुनिया के अख़बारों की सुर्खी में शुमार हुआ.

Pakistani scientist sorry for selling Secrets

गोपनीय चीज़ें बेचने के आरोपी पाकिस्तानी वैज्ञानिक ने माफ़ी मांगी 

ये पाकिस्तानी वैज्ञानिक कौन था? पाकिस्तान में उसे हीरो का दर्ज़ा क्यों मिला हुआ था? ऐसा क्या हुआ कि उसे नेशनल टीवी पर आकर माफ़ी मांगनी पड़ी? माफ़ी मांगने के बाद उसके साथ क्या हुआ? और, आज हम ये कहानी आपको क्यों सुना रहे हैं? सब विस्तार से बताएंगे.

साल 2003. सितंबर के महीने में ‘बीबीसी चाइना’ नाम का एक जहाज दुबई से निकला. इसे लीबिया की राजधानी त्रिपोली जाना था. स्वेज़ नहर पार करने के बाद जहाज कुछ समय के लिए इटली के तट पर रुका. इसी दौरान सादी ड्रेस में कुछ लोग जहाज पर चढ़े. ये लोग अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के एजेंट थे. उन्होंने जहाज की तलाशी शुरू की. मालूम चला कि जो चीज़ काग़ज़ में दर्ज़ थी, उससे बिल्कुल अलग सामान जहाज पर मौजूद था. सेंट्रिफ़्यूज़ का इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में होता है. जहाज पर हज़ारों की संख्या में सेंट्रिफ़्यूज़ लदे हुए थे. दो दिनों के बाद ये लीबिया पहुंच जाता. उसके बाद इसे पकड़ना मुश्किल हो जाता.

जब अमेरिका के करीब आया गद्दाफी

उस समय लीबिया में तानाशाह मुअम्मार गद्दाफ़ी का शासन चल रहा था. जहाज वाली घटना गद्दाफ़ी के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी. बढ़ते प्रतिबंध के बीच उसने अमेरिका से रिश्ते सुधारने की शुरुआत की थी. लेकिन इस घटना ने उसके छिपे मंसूबों को जाहिर कर दिया था. जहाज ज़ब्त होने के बाद उसे अपनी भूल सुधारनी थी. दिसंबर 2003 में गद्दाफ़ी ने सभी विनाशकारी हथियारों को खत्म करने का वादा किया. साथ ही साथ, उसने इंटरनैशनल वेपन इंस्पेक्टर्स को लीबिया में आमंत्रित भी किया.

भले ही लीबिया ने परमाणु हथियार बनाने का प्रोग्राम टाल दिया था, लेकिन ख़तरा टला नहीं था. लीबिया में जो सामान अवैध तरीके से पहुंचाया जा रहा था, उसके पीछे एक पूरा ब्लैक मार्केट काम कर रहा था. इस ब्लैक मार्केट के पीछे एक पाकिस्तानी वैज्ञानिक का हाथ था. जिसने 1970 के दशक में यूरोप से परमाणु तकनीक चुराई थी. उसने पहले पाकिस्तान को दुनिया का पहला इस्लामिक परमाणु शक्ति-संपन्न देश बनाया. उसके बाद उसने इस तकनीक को दुनिया के सबसे खूंख़ार लोगों को सप्लाई किया. इस आदमी का नाम था, अब्दुल क़दीर ख़ान. उर्फ़ AQ ख़ान.

AQ ख़ान पर शक गहराया

पश्चिमी देशों की खुफिया एजेंसियों को AQ ख़ान पर बहुत पहले से शक था. वे बस पुख़्ता सबूत का इंतज़ार कर रहे थे. लीबिया प्रकरण ने उनका शक गहरा कर दिया था. 11 दिसंबर 2003 को सीआईए और एमआई-6 के कुछ एजेंट लीबिया में थे. कुछ ही मिनटों में उनका विमान उड़ान भरने वाला था. तभी एक आदमी उनके पास आया. उसने कुछ लिफ़ाफ़े एक कुर्सी पर रखे और चुपचाप वहां से चला गया. लिफ़ाफ़े के भीतर परमाणु बम का पूरा डिजाइन बना था. ये अंतिम सबूत था. इसने AQ ख़ान का कच्चा चिट्ठा खोल कर रख दिया था. लीबिया को परमाणु तकनीक बेचने वाले AQ ख़ान ही थे.

उस समय पाकिस्तान में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ सरकार चला रहे थे. ‘वॉर ऑन टेरर’ में मुशर्रफ़ अमेरिका के साथ थे. AQ ख़ान पर ऐक्शन तय था. मुशर्रफ़ ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया. जैसा कि मुशर्रफ़ दावा ने एक इंटरव्यू में बताया था. उन्होंने AQ ख़ान को कहा,

‘आप इतने महान इंसान थे. इस देश ने आपको अपने इतना सम्मान दिया. आप हीरो हैं, फिर भी आपने पाकिस्तान की छवि हमेशा के लिए खराब कर दी.’

ये सुनकर AQ ख़ान मुशर्रफ़ के सामने ही रोने लगे. इस मुलाक़ात के कुछ दिनों बाद ही उन्होंने नेशनल टीवी पर आकर माफ़ी मांगी. इसमें उन्होंने कहा कि ये सारा काम उन्होंने अकेले किया था. इसमें सरकार या सेना ने उनकी कोई मदद नहीं की थी. इस ड्रामे के एक दिन बाद ही मुशर्रफ़ ने उन्हें माफ़ भी कर दिया. हालांकि, AQ ख़ान को उनके घर में नज़रबंद कर दिया गया. उन्हें घर से निकलने या किसी से मिलने-जुलने की इजाज़त नहीं थी. 2009 में इस्लामाबाद की हाईकोर्ट ने उन्हें हाउस अरेस्ट से मुक्त कर दिया.

AQ ख़ान की माफ़ी में कितना दम था?

क्या सच में वो बिना सरकारी मदद के विदेशी हुकूमतों को परमाणु तकनीक बेच रहे थे?

पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखतीं थी. एक इंटरव्यू में बेनज़ीर ने कहा था कि ये दावा असंभव है. उन्होंने कहा था कि, आपके परमाणु कार्यक्रम का जनक 13 से 14 बार नॉर्थ कोरिया जैसे देश की यात्रा करता है और आपको कोई जानकारी नहीं होती. ये थ्योरी अपने आप में एक मज़ाक है. बेनज़ीर भुट्टो ने पूरे खेल में मुशर्रफ़ का हाथ होने की बात कही थी. 2013 में AQ ख़ान ने आरोप लगाया कि नॉर्थ कोरिया को परमाणु तकनीक बेचने का आदेश बेनज़ीर भुट्टो ने दिया था. तब तक बेनज़ीर इस दुनिया में नहीं थीं. 2007 में एक आतंकी हमले में उनकी मौत हो चुकी थी.

इतनी कहानी हो गई, अब अब्दुल क़दीर ख़ान के बारे में भी जान लेते हैं.

स्माइलिंग बुद्धा से पाकिस्तान के होश उड़े

साल था 1936 का और तारीख़ थी एक अप्रैल. अविभाजित भारत के भोपाल स्टेट में एक स्कूल टीचर के घर अब्दुल क़दीर का जन्म हुआ. 1947 में भारत का बंटवारा हो गया. इस्लाम के नाम पर नया मुल्क़ बना, पाकिस्तान. अब्दुल क़दीर के कई रिश्तेदार विभाजन के समय ही पाकिस्तान चले गए थे. लेकिन लड़के का परिवार अपनी विरासत छोड़ने के लिए तैयार नहीं था. मगर ये डोर भी कुछ दिनों बाद ही टूट गई. धर्म के नाम पर हो रही हिंसा ने उनका मन बदल दिया. 1952 में सिंध मेल पर सवार होकर अब्दुल क़दीर का परिवार पाकिस्तान चला गया.

उन्हें कराची में ठिकाना मिला. पढ़ाई पूरी करने के बाद अब्दुल क़दीर की नौकरी लग गई. कराची नगर निगम में काम करने के दौरान उसे वेस्ट जर्मनी में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिली. वेस्ट जर्मनी, नीदरलैंड्स और बेल्जियम में उसने परमाणु तकनीक की बारीकियां सीखी. फिर बेल्जियम में ही उसने नौकरी पकड़ ली. लेकिन उसका मन अपने देश के लिए कुछ करने का था.

ये मौका आया 1974 में. 18 मई को भारत ने पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया. स्माइलिंग बुद्धा. 1971 की लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह हराया था. परमाणु परीक्षण के बाद वहां हंगामा मच गया. तब तक पाकिस्तान में ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने सत्ता संभाल ली थी. उनकी कही एक लाइन हमेशा याद आती है,

‘अगर भारत परमाणु बम बनाएगा, तो हम भी बनाएंगे, चाहे इसके लिए हमें घास-पत्ती खानी पड़े या भूखा ही क्यों ना रहना पड़े.’

1976 में KRL की स्थापना

इसी समय भुट्टो के पास AQ ख़ान की एक चिट्ठी आई. भुट्टो ने ख़ान को मिलने के लिए बुलाया. भुट्टो को भरोसा हो गया कि ये आदमी पाकिस्तान को परमाणु हथियार दे सकता है. भुट्टो ने रज़ामंदी दे दी. अगले कुछ महीने AQ ख़ान ने अपना समय परमाणु तकनीक का खाका चुराने और सप्लायर्स का नेटवर्क तैयार करने में लगाए. फिर 15 दिसंबर 1975 को ख़ान ने चुपके से पाकिस्तान की फ़्लाइट पकड़ ली.

अप्रैल 1976 में AQ ख़ान ने रावलपिंडी में ख़ान रिसर्च लेबोरेट्रीज़ (KRL) की स्थापना की. ये एक सीक्रेट संस्था थी. इसे पाक आर्मी के इंजीनियर्स ने तैयार किया था. इसी लैब में पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की नींव रखी गई. रिसर्च का पैसा पाकिस्तान सरकार से मिल रहा था.

फिर आया साल 1998 का. मई में भारत ने पोखरण में पांच परमाणु परीक्षण किए. इसके दो हफ़्ते बाद ही पाकिस्तान ने भी न्युक्लियर टेस्ट किया. बलूचिस्तान के चगाई में 28 और 30 मई को दो टेस्ट किए गए. दोनों सफ़ल रहे. अब पाकिस्तान भी परमाणु शक्ति से लैस हो चुका था. पाकिस्तान की इस उपलब्धि के पीछे डॉ अब्दुल क़दीर ख़ान का ही हाथ था. उन्हें पाकिस्तान के सबसे प्रतिष्ठित नागरिकों सम्मानों में से एक निशान-ए-इम्तियाज़ से दो बार नवाजा गया. वे पाकिस्तान के नायक बन चुके थे. उनकी तस्वीरें स्कूल की दीवारों पर उकेरी जाने लगी थीं. उन्हें मोहसिन-ए-पाकिस्तान कहा गया. यानी पाकिस्तान का रक्षक. AQ ख़ान एक समय पाकिस्तान के सबसे ताक़तवर लोगों में शामिल हो चुके थे. कहते हैं कि उन्हें पाकिस्तान के राष्ट्रपति से भी अधिक सिक्योरिटी मिली हुई थी.

परमाणु हथियारों की ब्लैक मार्केटिंग

ये सारा सम्मान, सारी उपलब्धियां पर्दे पर थीं. पर्दे के पीछे का खेल कुछ और ही था. ये सब पर्दे के सामने चल रहा था. पर्दे के पीछे का खेल कुछ और ही था. अब्दुल क़दीर ख़ान ने पाकिस्तान से बाहर अपनी कंपनियां बना रखी थीं. इसके जरिए उन्होंने परमाणु हथियारों को ‘ब्लैक मार्केट’ में बेचना शुरू किया. डिजाइन, तकनीक, विशेषज्ञता आदि सरेआम खरीद के लिए उपलब्ध थे. इन्हें खरीदा भी गया. ईरान, उत्तर कोरिया और लीबिया ने इसे हाथों-हाथ लिया. इन देशों में तानाशाह सरकारें चल रहीं थी. उनके हाथ परमाणु हथियार लगने का मतलब था, अनियंत्रित दुनिया. ऐसा ही हुआ भी. ईरान और नॉर्थ कोरिया, जो परमाणु हमले की धमकियां देते फिरते हैं, उसकी बुनियाद अब्दुल क़दीर ख़ान की रखी हुई है.

एक बात पता है! AQ ख़ान की कंपनी ने इराक़ी तानाशाह सद्दाम हुसैन को भी परमाणु तकनीक खरीदने का ऑफ़र दिया था. लेकिन सद्दाम को लगा कि ये कोई साज़िश है. उसने इसी डर से इस डील में हिस्सा लेने से मना कर दिया. अगर सद्दाम के हाथ परमाणु हथियार लगे होते तो परिणाम की बस कल्पना ही की जा सकती है.

दुनिया में विलेन, पाकिस्तान में हीरो

डॉ. अब्दुल क़दीर ख़ान बाकी दुनिया में एक बदनाम और अनैतिक वैज्ञानिक के तौर पर जाने जाते हैं. लेकिन पाकिस्तान में उन्हें आज भी हीरो का दर्ज़ा मिला हुआ है. इसकी वजह एक ही है. भारत के जवाब में परमाणु हथियार तैयार करने में मिली सफ़लता. AQ ख़ान ने परमाणु तकनीक की तस्करी क्यों की? इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं. एक कारण बताया जाता है कि उन्हें पैसों से बहुत प्यार था. दूसरा कारण ये बताया जाता है कि वो पाकिस्तानी नेतृत्व के साथ मिलकर पश्चिमी देशों का एकाधिकार तोड़ना चाहते थे.

सीआईए के एक पूर्व डायरेक्टर ने AQ ख़ान को ओसामा बिन लादेन से भी ख़तरनाक इंसान बताया था. ख़ान इन आरोपों पर कहते थे,

‘मैं कोई पागल या सिरफिरा नहीं हूं. वे मुझे इसलिए नापंसद करते हैं और तमाम तरह के बेबुनियाद आरोप लगाते हैं, क्योंकि मैंने उनके कई प्लान्स चौपट कर दिए.’

जहां तक छोटे-छोटे देशों को परमाणु शक्ति से लैस करने की बात है, इसके कई और भी तरीके हो सकते थे. AQ ख़ान ने जो रास्ता अपनाया, वो मानवता के ख़िलाफ़ अपराध की श्रेणी में आता है. उन्होंने दुनिया के सबसे ख़तरनाक हथियारों में से एक की तकनीक खुले बाज़ार में बेची. इसका दायरा आज तक पता नहीं चल सका है. अगर ये तकनीक आतंकी संगठनों के हाथ लगी तो कौन-सी माफ़ी उससे होने वाली आपदा को रोक पाएगी?

आज हम अब्दुल क़दीर ख़ान की चर्चा क्यों कर रहे हैं? दरअसल, 10 अक्टूबर 2021 को अब्दुल क़दीर ख़ान की मौत हो गई. कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद उन्हें इस्लामाबाद के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने AQ ख़ान को ‘राष्ट्रीय धरोहर’ बताया. ये वही इमरान ख़ान हैं, जिनकी कुछ हफ़्ते पहले ही AQ ख़ान ने आलोचना की थी. उनका आरोप था कि अस्पताल में भर्ती होने के बाद प्रधानमंत्री या उनकी कैबिनेट ने एक बार भी हाल-चाल नहीं पूछा. खैर, अब इमरान ख़ान ने औपचारिकता पूरी कर दी है. हालांकि, इसे देखने के लिए AQ ख़ान अब ज़िंदा नहीं हैं.


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