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हर जंग हारे पाकिस्तान के फौजी इतने मेडल काहे टांगे फिरते हैं!

ट्रोल्स पाकिस्तान को ट्रोल करें, दुत्कारें, फटकारें, लानतें भेजें, यहां तक चलो ठीक है. लेकिन कई बार ‘वहां’ के बाशिंदों के प्रति हमारी सोच हमसे कुछ ऐसा करवा देती है जो सुनने और देखने में तो बहुत अच्छा लगता है, फील गुड वाला एहसास भी देता है, लेकिन होता लॉजिक से परे है. तब हमें ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से पढ़ के आए हो’ जैसी टिप्पणियां झेलनी पड़ती हैं. और इसी सबसे बचने के लिए हम लेकर आते हैं एक्सप्लेनर्स. ताकि अब अगर कोई आपका मज़ाक़ उड़ाए तो आप, “पता है, पता है!” कहकर उसे दो ज्ञान की बातें एडिशनल बता सकें और अपनी ट्रोलिंग (गुड फ़ेथ वाली) जारी रख सकते हैं.

# आज पड़ोसी देश की बात क्यों?

दरअसल कुछ पाकिस्तानी ऑफिसर्स की तस्वीरों को आजकल हमारे यहां बहुत फुटेज मिल रहा है. इनमें हमारे मीमर्स ने पाकिस्तानी आर्मी ऑफिसर्स की वर्दी को टार्गेट कर रखा है? मल्लब फुल डेकोरेटेड वाली वर्दी को.

ऑफिसर्स कौन-कौन? पाकिस्तान के वर्तमान और पुराने आर्मी चीफ़्स हैं. परवेज़ मुशर्रफ, अशफ़ाक परवेज़ कियानी और कमर जावेद बाजवा वगैरह.

ऐसे सैकड़ों मीम आपको सोशल साइट्स पर मिल जाएंगे
ऐसे सैकड़ों मीम आपको सोशल साइट्स पर मिल जाएंगे

अब ज़रा कैप्शंस पर गौर करिए. एक में लिखा है-

पाकिस्तानी सेना ने हमसे हुए सारे युद्ध हारे हैं. किसी और देश के साथ कोई युद्ध नहीं लड़ा. फिर ये सारे मेडल क्या लूडो मैच के लिए हैं?

बाकी फ़ोटोज़ में भी लगभग ऐसे ही कैप्शन हैं. ‘क्या मेडल लाहौरी मार्केट से ख़रीदे हैं’ टाइप्स.

हमने तो एक कोलाज बनाकर आपको सिर्फ तीन फ़ोटोज़ दिखाई हैं. लेकिन अगर आप गूगल पर ‘Pakistani army medals memes’ सर्च करें और ‘Images’ वाले टैब पर जाएं तो आपको सैकड़ों ऐसी तस्वीरें दिख जाएंगी. कुछ FB पर, कुछ ट्विटर पर, एकाध रेडिट वग़ैरह पर और एकाध किसी के ब्लॉग वगैरह पर भी.

तो क्या सच में पाकिस्तानी आर्मी ने फर्ज़ी के मेडल और तमगे अपने ऑफिसर्स की छाती पर टांग दिए? माने गेंडा स्वामी वाले फुस्स मिसाइल सरीखे, जिनके फ्यूज कंडक्टर राजकुमार का किरदार पहले ही निकाल चुका!

चलिए, सवाल का उत्तर ढूंढ़ने से पहले ज़रा इंडियन आर्मी के डेकोरेशन की बात कर ली जाए. थोड़ा रेफ़रेंस मिलेगा. डेकोरेशन बोले तो, भारत में आर्मी को कब-कब और क्या-क्या मेडल दिए जाते हैं.

#भारत के आर्मी मेडल्स

इंडियन आर्मी को साल में दो बार मेडल्स दिए जाते हैं. गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर. ये मेडल मुख्यतः दो कैटेगरी में मिलते हैं. एक युद्ध के दौरान वीरता, शौर्य और बहादुरी दिखाने पर. और दूसरा शान्ति के दौरान वीरता, शौर्य, पराक्रम और साहस दिखाने पर. मोटा-माटी कहें तो एक कैटेगरी है ‘वॉर गैलेंट्री मेडल्स’ की और दूसरी है ‘पीस गैलेंट्री मेडल्स’ की.

हमारे यहां तीन सर्वोच्च ‘वॉर गैलेंट्री मेडल्स’ हैं- परमवीर चक्र, महावीर चक्र और वीर चक्र. इनमें से परमवीर चक्र ज्यादातर मरणोपरांत यानी युद्ध में शौर्य का परिचय देते हुए वीरगति प्राप्त होने पर मिलता है. हालांकि कई बार ये जीवित रहे सैनिकों को भी दिया गया है. ये भारत का सबसे बड़ा सैनिक सम्मान है. इसे आप ‘सेना का भारत रत्न’ भी कह सकते हैं. इसके बाद आते हैं महावीर चक्र और वीर चक्र.

परमवीर चक्र, महावीर चक्र और वीर चक्र,बाएं से दाएं(फोटो सोर्स - आज तक)
परमवीर चक्र, महावीर चक्र और वीर चक्र,बाएं से दाएं(फोटो सोर्स – आज तक)

दूसरी केटेगरी है पीस मेडल्स की. इस कैटेगरी में सर्वोच्च तीन मेडल्स हैं- अशोक चक्र, कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र. वरीयता क्रम वही वॉर मेडल्स जैसा. सबसे बड़ा अशोक चक्र, इसे पीस टाइम का परमवीर चक्र भी कह सकते हैं. फिर कीर्ति चक्र और फिर शौर्य चक्र.

अशोक चक्र, कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र,बाएं से दाएं (फोटो सोर्स - आज तक)
अशोक चक्र, कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र,बाएं से दाएं (फोटो सोर्स – आज तक)

औपचारिक तौर पर तो भारत ने अपना आखिरी युद्ध 1999 में लड़ा था. करगिल का युद्ध. छेड़ा पाकिस्तानियों ने था, पहाड़ों पर हमसे कहीं बेहतर पोजीशन पर भी बैठे थे, लेकिन फाइनली पटखनी हमने दी थी. हालांकि हज़ारों सैनिक उनके भी मारे गए और हमारे भी. और युद्ध के दौरान वीरता और अदम्य शौर्य के प्रदर्शन के लिए हमारे सैकड़ों सैनिकों को भी वॉर मेडल्स दिए गए, उनके यहां भी दिए गए. उनके यहां तो लम्बी लिस्ट है. आगे समझेंगे.

लेकिन क्या 1999 के बाद कभी हमारे सैनिकों को बहादुरी, शौर्य, वीरता दिखाने का मौका नहीं मिला?

स्पष्ट है अगर पड़ोसी पाकिस्तान है तो लाठी-डंडा और गोला-बारूद के मौके मिलते ही रहेंगे. सीधी लड़ाई न सही, लेकिन फिर भी बहुत कुछ चलता ही रहेगा.

ऐसा ही भारत और पाकिस्तान के बीच चला. एयर स्ट्राइक, सर्जिकल स्ट्राइक, टेररिस्ट न्यूट्रलाइजेशन, क्रॉस फायरिंग वगैरह. और इनमें बहादुरी दिखाने की कितनी ज़रूरत होती है, ये बताने के लिए किसी कहानी की ज़रूरत नहीं है. करगिल के बाद से आज तक साल-दर-साल हमारे सैनिकों की शहादत और घायल होने की दुर्भाग्यपूर्ण खबरें देख-सुन लीजिए.

आपको ये भी बता दें कि ये तीनों पीस मेडल्स सेना के अलावा पुलिस और अन्य सुरक्षा बालों को भी मिल सकते हैं, और कभी-कभी सिविलियन्स यानी आम नागरिकों को भी कोई बहादुरी का काम करने के लिए ये मेडल्स मिल सकते हैं.

#पाकिस्तान के आर्मी मेडल्स

अब आइए पकिस्तान की तरफ़. यहां भी मेनली दो कैटेगरी में मेडल्स या तमगे दिए जाते हैं. एक वो जिन्हें हम वॉर गैलेंट्री मेडल्स कह सकते हैं और दूसरे वो जिन्हें पीस मेडल्स या ऐसे मेडल्स कह लें जिनका युद्ध से सीधा लेना-देना नहीं है या बिल्कुल नहीं है.

पाकिस्तान में सबसे बड़ा वॉर मेडल है ‘निशान-ए-हैदर.’ ये वहां गाज़ियों को भी मिल सकता है और शहीदों को भी. गाज़ी माने वो जिसने जंग में दुश्मन सेना के किसी सैनिक को मारा हो और ख़ुद बच गया हो. बताया जाता है कि पाकिस्तान में अभी तक किसी भी ज़िंदा फ़ौजी को निशान-ए-हैदर नहीं मिला है. इसके बाद वरीयता के क्रम में दो और प्रमुख तमगे हैं- हिलाल-ए-जुर्रत और सितारा-ए-जुर्रत.

निशान-ए-हैदर, हिलाल-ए-ज़ुर्रत, सितारा-ए-ज़ुर्रत , बाएं से दाएं (फोटो सोर्स-Lawofpakistan, Wikimedia,Twitter)
निशान-ए-हैदर, हिलाल-ए-ज़ुर्रत, सितारा-ए-ज़ुर्रत , बाएं से दाएं (फोटो सोर्स-Lawofpakistan.com, Wikimedia,Twitter)

इनकी डिटेल से हमें ख़ास लेना-देना नहीं, सो आगे बढ़ते हैं.

दूसरी कैटेगरी है पीस मेडल्स की. यहां पाकिस्तान के पास एक बड़ी लम्बी लिस्ट है, फटाफट बताए देते हैं-

# तमगा-ए-जुर्रत- ये नॉन कमीशंड गैलेंट्री अवार्ड है.

# तमगा-ए-दिफ़ा- जनरल सर्विस मेडल.

# तमगा-ए-हर्ब (वॉर स्टार 1965)

# तमगा-ए-जंग (वॉर स्टार 1971)

# सितारा-ए-हर्ब (वॉर स्टार 1965)

# सितारा-ए-जंग (वॉर स्टार 1971)

यानी युद्ध भले हारे हैं, लेकिन अगर लड़ाई में शामिल रहे तो मेडल मिलेगा.

अब नॉन ऑपरेशनल बाकी तमगे भी जान लीजिए-

# सितारा-ए-बसालत और तमगा-ए-बसालत. दोनों गुड कंडक्ट यानी अच्छे व्यवहार के लिए दिए जाते हैं.

# निशान-ए-इम्तियाज़ और हिलाल-ए-इम्तियाज़. ये मिलिट्री आर्डर एक्सीलेंस के लिए दिए जाते हैं.

# हिलाल-ए-इम्तियाज़, तमगा-ए-इम्तियाज़ वगैरह भी हैं. जो मिलिट्री एक्सीलेंस के लिए दिए जाते हैं.

# सर्विस मेडल्स भी चार हैं, जो 10, 20, 35 और 40 साल की सर्विस पूरी करने पर दिए जाते हैं. ये व्यवस्था वैसे हमारे यहां भी है.

इसके अलावा कुछ और मेडल्स भी हैं, जिन्हें कममेमोरेटिव यानी यादगार वाले मेडल कहते हैं. ये किसी विशेष व्यक्ति या घटना के सम्मान में दिए जाते हैं. जैसे – ‘तमगा-ए पाकिस्तान’, और ‘तमगा-ए-सद-साला-जश्ने-विलादत-ए-कायदे-आज़म’ यानी जिन्ना की सौवीं जयन्ती पर मिला मेडल.

# कमर जावेद बाजवा की जेब पर तमगे क्यों हैं?

ये सवाल इसलिए क्योंकि बाजवा कोई युद्ध लड़ना और जीतना तो छोड़िए, भारत-पाकिस्तान के बीच हुए आखिरी औपचारिक युद्ध यानी करगिल वॉर के वक्त तक पाकिस्तानी आर्मी में कमीशंड ही नहीं थे. तो इतने मेडल-बिल्ले कहां से आए?

हमने मीम वाली वायरल फोटो पर गौर किया और जो दस मेडल बाजवा की वर्दी पर चमक रहे थे, उनकी डिटेल निकाली. डिटेल कुछ यूं है-

# 1- तमगा-ए-इस्तकलाल – 2002 में कई पाकिस्तानी फौजियों को दिया गया. क्यों? भारत बॉर्डर पर तैयारी में था, क्योंकि पाकिस्तान की तरफ़ से उकसाने की छिटपुट कोशिशें की जा रही थीं. तो ये लोग भी जंग की तैयारी करने लगे और मेडल मिल गया.

# 2- तमगा-ए-बका – 1998 में पाकिस्तान ने न्यूक्लियर टेस्ट किया था. उस वक़्त बाजवा लेफ्टिनेंट कर्नल हुआ करते थे. तो मिल गया था.

# 3 तमगा-ए-जम्हूरियत – यानी लोकतंत्र का पदक. ये थोड़ी हास्यास्पद लग सकता है. जिस देश में ज़्यादातर समय में ऑफ़िशियली और बाकी समय में अनऑफ़िशियली कमान सेना के पास ही रहती है, उस सेना के ऑफिसर्स लोकतंत्र के सर्टिफिकेट लिए घूमते हैं, वो भी वर्दी पर मेडल्स की शक्ल में.

1999 में पूर्व पाक आर्मी चीफ़ परवेज़ मुशर्रफ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की सरकार गिराई थी, उस वक़्त भी मुशर्रफ के पास तमगा-ए-जम्हूरियत था. उसके बाद नए पाक सेना प्रमुख अशफाक परवेज़ कयानी भी ये तमगा वर्दी पर टांगा करते थे.

# 4- हिजरी तमगा- ये एक तरह से वही यादगार वाला मेडल है.

# 5, 6- हिलाल-ए-इम्तियाज़, निशान-ए-इम्तियाज़– ये दोनों एक्सीलेंस यानी मेरिट वाले अवार्ड हैं और आम नागरिकों को भी दिए जा सकते हैं.

# 7- इंडिपेंडेंस डे गोल्डन जुबली मेडल- नाम से ही समझ गए होंगें, बताना क्या.

# 8- आर्मी सर्विस मेडल- ये अलग-अलग मियाद के हिसाब से अलग-अलग मिलते हैं. फ़िलहाल बाजवा ऐसे तीन मेडल धारण किए हुए हैं.

तमगा-ए-इस्तकलाल,तमगा-ए-बका,तमगा-ए-जम्हूरियत,हिजरी तमगा,हिलाल-ए-इम्तियाज़,निशान-ए-इम्तियाज़ (फोटो सोर्स- gmic.co.uk, picclick.co.uk, wikimedia)
तमगा-ए-इस्तकलाल,तमगा-ए-बका,तमगा-ए-जम्हूरियत,हिजरी तमगा,हिलाल-ए-इम्तियाज़,निशान-ए-इम्तियाज़ (फोटो सोर्स- gmic.co.uk, picclick.co.uk, wikimedia)

यानी इतना साफ़ है कि बाजवा की वर्दी पर गैलेंट्री वाला कोई मेडल नहीं है. जब युद्ध ही नहीं लड़ा तो मेडल्स किस बात के और बहादुरी किस बात की. सो हमारे डियर मीमर्स को ये तो समझ आ गया होगा कि पाकिस्तानी आर्मी ऑफिसर्स बिना जंग लड़े और जीते मेडल्स कहां से ले आते हैं.

साथ ही पाकिस्तानी आर्मी में मेडल्स, अव्वल तो आसानी से मिल जाते हैं, दूसरा कि उनके यहां कैटेगोरिकल स्ट्रिक्टनेस भी नहीं है. माने हर बात की ख़ुशी मनाओ, मेडल निकालो और जिसे चाहो दो. कोई कैटेगरी नहीं. चाहे आर्मी वाला मेडल लटकाए या आम आदमी वाला.

# एक और मीम

अब बात कर लें दूसरी मीम वाली तस्वीर की. इसमें इजरायली आर्मी चीफ़ अवीव कोचावी और लेफ्टिनेट जनरल गादी एसेनकोट की तस्वीरों से पाकिस्तानी आर्मी चीफ़ बाजवा और राहील शरीफ़ की ड्रेसेज़ की तुलना की गई है. बताने की कोशिश की गई है कि-

एक तरफ़ जहां सारी जंगें जीतने वाले इजरायली फौजियों की वर्दी पर मेडल्स नहीं हैं, वहीं पाकिस्तान जिसने एक भी लड़ाई नहीं जीती उसके सैन्याधिकारी मेडल्स से लदे खड़े हैं.

ये तुलना सेरेमोनियल ड्रेसेज में होनी चाहिए थी
ये तुलना सेरेमोनियल ड्रेसेज में होनी चाहिए थी

इस मीम में जो तुलना की गई है वो दरअसल ऐसी ही है, गोया आपकी एक तस्वीर नाइट ड्रेस में ले ली जाए और एक पार्टी टाइम की. अगर मेटाफ़र में उत्तर दिया जाए तो दरअसल मीम बनाने वाले ने संतरे और सेब की तुलना कर डाली है. आर्मी में एकाधिक ड्रेसेज़ होती हैं. जो 10-12 तक भी एक्सीड कर सकती हैं. हां दोनों तस्वीरों का कोलाज बनाने से पहले अगर मीमर्स ने सेरेमोनियल फोटो ढूंढी होती तो हम बाकी अंतर बताने की भी कोशिश करते.

दूसरा ये भी है कि इनमें विंग और कैटेगरी का भी फर्क है.

बाकी मीम बनाने वालों, ट्रोल करने वालों का क्या है… वो तो ‘आती रहेंगी बहारें’ वाली कैटेगरी में आते हैं. आप भी मीम बनाइए, ट्रोल करिए, ट्रेंड होइए, लेकिन पॉज़िटिव माइंडफ़्रेम के साथ. और पूरी जानकारी के साथ.


ये स्टोरी शिवेंद्र ने लिखी है.


पिछ्ला वीडियो देखें: पाकिस्तान में इमरान खान ने सेना और TLP से पंगा लिया, आगे क्या खतरे हैं?

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