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भारतीय सीमा में जहां चीनी सैनिकों के घुसकर तोड़-फोड़ करने की ख़बर आ रही, वहां का इतिहास जान लीजिए

भारत और चीन की सेना लद्दाख वाला झगड़ा खत्म करने के लिए कई दौर की बैठकें कर चुकी हैं. बीच-बीच में खबरें आती भी हैं कि अमुक जगह को लेकर सहमति बन गई है, या सेनाएं पीछे हटने को राजी हो गई हैं. बैठकें हो रही हैं. सुलह की कोशिश हो रही है. लग रहा था कि चीज़ें पटरी पर हैं. लेकिन फिर खबर आती है कि चीन ने झगड़े के लिए सीमा पर नया मोर्चा खोल दिया है. LAC के मिडिल सेक्टर में चीनी सेना की बड़ी घुसपैठ की खबर आई है. मिडिल सेक्टर यानी उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश से लगा चीन का इलाका. हिमाचल से 200 किलोमीटर और उत्तराखंड से 345 किलोमीटर लंबी सीमा चीन के साथ लगती है. तो करीब साढ़े पांच सौ किलोमीटर में फ्रिक्शन पॉइंट्स यानी झगड़े वाली जगह कम ही हैं. करीब 3500 किलोमीटर लंबी सीमा में सबसे शांत माना जाता है मिडिल सेक्टर को. दो चार-साल से घुसपैठ की कोई एक-आध खबर आती है. लेकिन इस बार मामला बड़ा माना जा रहा है.

इकनॉमिक टाइम्स में मनु पब्बी और राहुल त्रिपाठी की रिपोर्ट के मुताबिक 100 से ज्यादा चीनी सैनिकों ने भारत की सीमा में घुसपैठ की. चीनी सैनिक LAC से 5 किलोमीटर भारत के इलाके में घुस आए थे. कई निर्माणों में तोड़फोड़ की. इनमें एक ब्रिज भी शामिल है. चीन के सैनिक 55 घोड़ों के साथ आए थे. और करीब 3 घंटे भारतीय सीमा में रहे. रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय सेना और इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस के पहुंचने से पहले ही चीन के सैनिक जा चुके थे. यानी दोनों देशों की सेनाओं का आमना-सामना नहीं हुआ. स्थानीय लोगों ने ही प्रशासन को इस घुसपैठ की खबर दी. और सूत्रों के ज़रिए लगभग एक महीने बाद ये खबर बाहर आई.

बड़ाहोती का इतिहास, भूगोल

घुसपैठ वाली घटना 30 अगस्त की बताई जा रही है. उत्तराखंड के चमोली जिले के बड़ाहोती में ये घुसपैठ हुई है. बड़ाहोती चमोली ज़िले की मलारी घाटी पर एक ढलान वाला घास का मैदान है. बड़ाहोती को तुन जुन ला पास तिब्बत से जोड़ता है. ये कभी भारत और तिब्बत के बीच आवाजाही का रूट हुआ करता था. 1962 से पहले इस रास्ते से व्यापारियों का आना जाना रहता था. कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भी ये सबसे सुगम रास्ता था. लेकिन चीन से झगड़े के बाद ये रूट बंद कर दिया गया था.

बड़ाहोती को लेकर भारत और चीन का झगड़ा 1950 के दशक से ही है. माना जाता है कि चीनी सेना द्वारा भारतीय ज़मीन पर पहली घुसपैठ बड़ाहोती में हुई थी. 1954 के साल में. चीन ने इस इलाके को वु जे कहा था. और दावा किया था कि तुन जुन ला पास के दक्षिण से यानी बड़ाहोती से होकर उसकी सीमा गुजरती है. हालांकि तब भारत ने विरोध किया था. बड़ाहोती मामले को लेकर नवंबर 1959 का एक प्रसंग मिलता है. तब अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के सांसद हुआ करते थे. उन्होंने संसद में चर्चा के लिए स्थगन प्रस्ताव पेश किया. लेकिन उनका प्रस्ताव टाला जा रहा था. उन्होंने झल्ला कर कहा है कि मेरा प्रस्ताव तो इंतजार कर सकता है लेकिन मुझे डर है चीनी इंतजार नहीं करेंगे. आगे वाजपेयी ने कहा था कि सदन ये जानना चाहता है कि बड़ाहोती से भारतीय सीमा पुलिस को क्यों हटाया गया. भारत की सरकार ने क्यों वहां जवानों के सर्दियों में ठहरने के लिए उचित व्यवस्था नहीं की. जवाब में संसद में जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि बड़ाहोती विवादित है. इसलिए चीन से सहमति होने तक सशस्त्र सैनिक वहां पेट्रोल नहीं कर सकते.

1962 में चीन का हमला

तो बड़ाहोती पर सहमति हो पाती, उससे पहले 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया. और फिर बड़ाहोती का झगड़ा कभी नहीं सुलझ पाया. LAC को लेकर दोनों देशों का परसेप्शन है. चीनी परसेप्शन को भारत नहीं मानता और भारत के परसेप्शन को चीन. इसलिए लद्दाख की जगह ही चीन बड़ाहोती में भी घुसपैठ करता रहता है. 30 अगस्त वाला मामला पहला नहीं है. कई बार चीन ये कर चुका है. जून 2017 में खबर आई थी कि चीनी हेलिकॉप्टर्स ने बड़ाहोती में घुसने की कोशिश की. और पीछे जाएंगे तो भी घुसपैठ के मामले मिलते हैं. इंडिया टुडे की 2012 में छपी रिपोर्ट के मुताबिक 2010 से 2011 के बीच चीनी सेना ने बड़ाहोती में 120 बार घुसपैठ की थी. ये नंबर इंटेलिजेंस ब्यूरो से आया था.

तो जैसे LAC के बाकी फ्रिक्शन पॉइंट्स पर चीनी सेना मौका देखकर हमारे एरिया में पेट्रोलिंग के लिए घुसती है, एरिया क्लेम करने की कोशिश करती है, वैसे ही बड़ाहोती में भी होता रहा है. लद्दाख वाले झगड़े के बाद मिडिल सेक्टर से भी खबरें आ रही थीं कि LAC के पास चीनी सेना ने गतिविधियां बढ़ा दी हैं. इंडिया टुडे में मंजीत नेगी की 21 जुलाई की रिपोर्ट मिलती है. इसमें सरकारी सूत्रों के हवाले से लिखा है कि बड़ाहोती में LAC के पास 40 चीनी सैनिकों को पट्रोलिंग करते देखा गया. रिपोर्ट में लिखा था कि चीनी सेना की बढ़ती गतिविधियों की वजह से भारतीय सेना भी हाई अलर्ट पर है. कुछ महीने पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और सेना की सेंट्रल कमांड के जीओसी इन चीफ ले. जनरल वाई धीमरी ने मिडिल सेक्टर में सिक्योरिटी का जायजा लिया था. इन सब के बावजूद भी 100 चीनी सैनिकों की घुसपैठ की खबर आती है.

सरकार चुप

अब बात आती है कि घुसपैठ की खबर पर सरकार क्या कह रही है. कुछ नहीं. ना सरकार की तरफ से, ना सेना की तरफ से और ना ITBP की तरफ से इस मामले में अभी कोई बयान आया है. हालांकि सूत्रों के हवाले से न्यूज़ रिपोर्ट्स में घुसपैठ को गलत बताने की कोशिश ज़रूर हो रही है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर वाकई ऐसी कोई घटना नहीं हुई तो सेना और सरकार ने आधिकारिक रूप से इसका खंडन क्यों नहीं किया.

इंडिया टुडे के सूत्रों के मुताबिक बड़ाहोती में 60 वर्ग किलोमीटर एरिया में ग्रेज़िग ग्राउंड है. यानी घास का मैदान. दोनों देशों के चरवाहे यहां मवेशी लाते हैं. दोनों देश इसे विवादित ग्रेज़िग ग्राउंड मानते हैं, जहां फोर्सेज की तरफ से पेट्रोलिंग नहीं की जाती. सूत्रों के मुताबिक बड़ाहोती इलाके में सिविल एडमिनिस्ट्रेशन की टीमें समय-समय पर मुआयने के लिए जाती हैं.

दावों पर सवाल उठे

सूत्र पुल गिराने की बात को भी गलत बता रहे हैं. कहा जा रहा है कि बाराहोती में ऐसा कोई पुल नहीं है. यानी पुल ही नहीं है तो चीनी गिराएंगे कैसे. ये सारी जानकारी सूत्रों के हवाले से आई हैं. आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है. वैसे ये बात हम जानते भी हैं कि घुसपैठ की बातें आधिकारिक तौर पर नहीं मानी जाती हैं. गलवान घाटी को लेकर भी प्रधानमंत्री ने कहा था कि कोई नहीं घुसा है. तो इस मामले में अभी आधिकारिक तौर पर कोई बयान हमें मिला नहीं. और ये पुष्टि नहीं की जा सकती कि चीनी सैनिक वाकई भारत की सीमा में घुसकर किसी पुल को गिराकर गए हैं या नहीं. लेकिन जानकार ये मान रहे हैं कि चीन लद्दाख वाली हरकत मिडिल सेक्टर में भी कर करता है. अपनी क्लेम लाइन तक सेना भेजकर भारत को झगड़े में उलझा सकता है. इससे बार्गेनिंग टेबल पर चीन बेहतर पोजिशन में होगा. जैसे लद्दाख में देखा गया. लद्दाख में भारत स्टेट्स को यानी पूर्व स्थिति के लिए चीन पर दबाव बना रहा है.

फरवरी में चीनी सेना और भारतीय सेना का पैंगोंग झील पर डिसइंगेजमेंट हुआ था. यानी दोनों सेनाएं पीछे हटने को राजी हुई थी. पिछले महीने गोगरा पोस्ट पर भी सेनाओं के पीछे हटने की खबरें आईं. हालांकि डेप्सांग प्लेन्स में अभी चीन पीछे नहीं गया है. इसके लिए लगातार बातचीत हो रही है. पिछले हफ्ते हमारे विदेश मंत्री चीन के विदेश मंत्री से मिले थे. सेना के स्तर पर भी बातचीत हो रही है. लेकिन ऐसा लगता है कि चीन अपना एडवेंटेज खोना नहीं चाहता. और अब मिडिल सेक्टर में भारत पर दबाव बनाने की कोशिश में दिख रहा है. अफगानिस्तान में तालिबान के आने और अपनी मजबूत पोजिशन का चीन फायदा उठाना चाहता है. चीन के खिलाफ गोलंबदी में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ भारत भी QUAD का हिस्सा है. इनमें से सिर्फ भारत की सीमा चीन से लगती है. इसलिए माना जा रहा है कि चीन सीमा विवाद को लेकर भारत पर दबाव बनाने के लिए अग्रेशन दिखाने की कोशिश करेगा.


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