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यूरोप कोरोना को लेकर जो बेवकूफी कर रहा है उससे दूसरे देशों को सीख लेनी चाहिए

कोरोना महामारी और इंसानों का रिश्ता ऐसा हो गया है, जैसे दोनों जनम-जनम के साथी हों. एक बार को कोरोना दूर हो जाए तो विरह-वेदना सताने लगती है. हम तमाम जतन करके उसे वापस बुला लाते हैं.

‘आस पास’ फ़िल्म का एक गाना है. आनंद बख़्शी का लिखा. गाने के बोल हैं,

तुम जो चले गए तो होगी बड़ी ख़राबी

तुम्हें दिल में बंद कर लूं, दरिया में फेंक दू चाबी.

यूरोप में इस समय यही हो रहा है. आबादी का एक बड़ा हिस्सा वैक्सीन लगा चुका है. जो बच गए हैं, उनमें से अधिकांश पुरानी ज़िद पर कायम हैं. कोरोना से मर जाएंगे, पर वैक्सीन नहीं लगाएंगे.

ऐसे कई शहर, जहां कम वैक्सीनेशन हुआ है. पिछले दिनों में कोरोना हॉटस्पॉट बनकर सामने आए हैं. यूरोप कोरोना की चौथी लहर की कगार पर खड़ा है. 5 नवंबर को WHO ने अपनी रिपोर्ट जारी की थी. रिपोर्ट के अनुसार, अगर अभी वाली रफ़्तार जारी रही तो यूरोपीय क्षेत्र में फ़रवरी 2022 तक पांच लाख और लोगों की जान जा सकती है.

इन आशंकाओं के बीच सरकारों को सख़्ती पर उतरना पड़ा है. 15 नवंबर को ऑस्ट्रिया ने लॉकडाउन लगाने का ऐलान किया. चुनिंदा लोगों के लिए. चुनिंदा कौन? वैसे लोग जिन्होंने कोरोना का टीका नहीं लगवाया है. उन्हें सिर्फ़ मेडिकल या बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए ही बाहर जाने की अनुमति होगी. अन्यथा उन्हें घर में बंद रहना होगा. ऑस्ट्रिया अनवैक्सीनेटेड लोगों के लिए लॉकडाउन लगाने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है.

बाकी देश वैक्सीन नहीं लगाने वालों से कैसे निपट रहे हैं? कोरोना वैक्सीन की उपयोगिता साबित होने के बावजूद लोगों में झिझक क्यों है? और, इस झिझक से दुनिया पर क्या खतरा मंडरा रहा है? सब विस्तार से बताएंगे.

अक्टूबर 2021 में इटली ने अपने यहां ‘ग्रीन पास’ वाला कानून लागू किया. इसके तहत, प्राइवेट या पब्लिक सेक्टर में काम करने वाले हर एक कर्मचारी के लिए पास लेना अनिवार्य कर दिया था. पास पाने के लिए क्या नियम थे? कोरोना की वैक्सीन लगानी होगी या नेगेटिव कोविड टेस्ट रिपोर्ट दिखानी होगी या फिर हाल में कोविड से रिकवर होने का सबूत देना होगा.

अगर आप नियम पर खरे उतरे तो आपके लिए ग्रीन पास जारी होगा. अगर पास नहीं लिया तो क्या होगा? आपको काम पर आने से रोक दिया जाएगा. इतना ही नहीं, आपके ऊपर डेढ़ लाख रुपये तक का ज़ुर्माना भी लगाया जा सकता है.

सरकार कानून तो ले आई, लेकिन लोग मानने के लिए तैयार नहीं हुए. ट्रिएस्ते शहर में हज़ारों की संख्या में लोग इकट्ठा हुए. माय बॉडी, माय रूल की तख़्तियां लिए हुए. हज़ारों की भीड़ में लोग बिना मास्क के नारे लगा रहे थे. बहुत सारे प्रदर्शनकारी इटली के अलग-अलग शहरों से भी आए थे. पुलिस ने किसी तरह मामला शांत कराया. लेकिन नुकसान तो हो चुका था. प्रोटेस्ट खत्म होने के दो हफ़्ते बाद ही ट्रिएस्ते कोरोना हॉटस्पॉट बन गया. रोज़ाना नए मामलों की संख्या बढ़ने लगी.

ट्रिएस्ते में आईसीयू में दाखिल होने वाले कोरोना के मरीज़ों की संख्या अचानक से बढ़ गई है. इटली 12 साल से अधिक उम्र के 80 फीसदी लोगों को वैक्सीन की दोनों खुराक लगा चुका है. इसके बावजूद 17 नवंबर को यहां एक दिन में 10 हज़ार से अधिक नए मामले दर्ज़ किए गए. इसमें सबसे बड़ा योगदान एंटी-वैक्सीन प्रोटेस्टर्स का है.

इटली के उत्तर में बोल्ज़ानो नाम का एक प्रांत है. ये ऑस्ट्रिया और स्विट्ज़रलैंड की सीमा के पास पड़ता है. यहां वैक्सीनेशन की दर देश में सबसे कम है. इलाके के लोग होम्योपैथी और प्राकृतिक दवाओं पर अधिक भरोसा करते हैं. उन्हें सरकार पर भरोसा नहीं होता. पिछले कुछ समय से यहां भी कोरोना के केस बढ़ रहे हैं.

अब बात ऑस्ट्रिया की. 17 नवंबर को ऑस्ट्रिया में 14 हज़ार से अधिक नए मामले सामने आए. ये अपने आप में एक रेकॉर्ड है. सबसे ज़्यादा प्रभावित प्रांत हैं, अपर ऑस्ट्रिया और साल्ज़बर्ग. ऑस्ट्रिया में सिर्फ़ 65 प्रतिशत आबादी को वैक्सीन लगी है. यूरोप के बाकी देशों की तुलना में ये काफ़ी कम है.

जब संक्रमण नियंत्रण से बाहर गया तो सरकार को अनवैक्सीनेटेड लोगों के लिए लॉकडाउन लगाना पड़ा. ऐसे लोगों को पहले ही पब्लिक प्लेस पर जाने से रोका जा रहा था. अब उन्हें घर बैठना होगा. अगर नियम का पालन नहीं किया तो डेढ़ लाख रुपये तक का ज़ुर्माना लग सकता है. 12 साल से कम उम्र के बच्चों और हाल में कोविड से रिकवर हुए लोगों को लॉकडाउन से छूट दी गई है.

जब सरकार नियम लेकर आई तो इसका जमकर विरोध हुआ. संक्रमण के ख़तरे के बावजूद लोग सड़कों पर उतरे. दक्षिणपंथी पार्टियों ने आरोप लगाया कि सरकार लोगों को बांट रही है.

सरकार ने महामारी से निपटने को लेकर अपना मूड तय कर लिया है. गृहमंत्री ने कार्ल नेमर ने साफ़ कर दिया है कि लॉकडाउन कोई सुझाव नहीं है, ये आदेश है. यानी पालन तो करना ही होगा.

हालांकि, जानकारों का कहना है कि सरकार ने सख़्त होने में देर कर दी. हालात हाथ से निकलने की कगार पर हैं. अगर दस दिनों के अंदर केस का बढ़ना नहीं रुका तो लॉकडाउन को आगे बढ़ा दिया जाएगा.

यूरोप के बाकी देशों में क्या चल रहा है?

नीदरलैंड में रोज़ाना 20 हज़ार से अधिक नए केस आ रहे हैं. 12 नवंबर को यहां ‘आंशिक लॉकडाउन’ लगाया गया था. इसके तहत, दुकान रात आठ बजे तक बंद करना होगा. घरों में चार से अधिक मेहमान बुलाने की इजाज़त नहीं होगी. स्पोर्टिंग इवेंट्स बिना दर्शकों के आयोजित होंगे आदि आदि.

ये नियम हर किसी पर लागू है. चाहे उसने वैक्सीन लगाई हो या न लगाई हो.

जिस स्पीड से नीदरलैंड में केस बढ़ रहे हैं. कहा जा रहा है कि यहां जल्दी ही पूर्ण लॉकडाउन लगाया जा सकता है.

17 नवंबर को जर्मनी ने एक बार फिर रेकॉर्ड तोड़ दिया. जर्मनी में एक दिन में 65 हज़ार से अधिक मामले सामने आए. वैज्ञानिकों का कहना है कि असली संख्या तीन गुना से ज़्यादा तक हो सकती है. जर्मनी अभी तक 67 फीसदी आबादी को ही कोरोना का टीका लगा पाया है. रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बार की लहर में हॉस्पिटलाइज़ेशन और आईसीयू में भर्ती होने वालों की संख्या कम है.

जिन्हें ज़रूरत पड़ रही है, उनमें से अधिकतर को वैक्सीन नहीं लगी है. जर्मनी अनवैक्सीनेटेड लोगों के लिए लॉकडाउन लगाने पर विचार कर रहा है. ऑस्ट्रिया की तर्ज़ पर.

फ़्रांस में कोरोना की पांचवीं लहर की आशंका जताई जा रही है. वहां एक दिन में 20 हज़ार से अधिक मामले आ रहे हैं. फ़्रांस अभी लॉकडाउन जैसा कोई कदम उठाने के मूड में नहीं है.

यूक्रेन में कोरोना नए रेकॉर्ड बना रहा है. यहां रोज़ाना 20 हज़ार से अधिक मामले आ रहे हैं. जबकि आठ सौ से से अधिक लोगों की मौत भी रही है. यहां फ़ुली वैक्सीनेटेड लोगों की संख्या 21 फीसदी के आस-पास है. सरकार ने दोनों डोज़ लगाने वालों को लगभग तीन हज़ार रुपये देने का ऐलान किया है. इससे वैक्सीन के प्रति झिझक टूटेगी या नहीं, ये देखने वाली बात होगी. डर इसी बात का है कि देखते-देखते देर ना हो जाए.

इस लिस्ट में और देश भी हैं. स्लोवाकिया, स्वीडन, सर्बिया, चेक रिपब्लिक, ब्रिटेन, ग्रीस, लातविया समेत कई देशों में संक्रमण दर उच्चतम स्तर पर पहुंच चुका है. हालांकि, इस बार की लहर में ये देखने को मिल रहा है कि आईसीयू में भर्ती होने वाले अधिकतर मरीज़ अनवैक्सीनेटेड हैं.

वजह, उपयोगिता साबित होने के बावजूद वैक्सीन को दरकिनार करने की मानसिकता खत्म नहीं हुई है. ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है. लेकिन कोरोना को पनपने के लिए एक मौका ही काफी है. जो यूरोप दो महीने पहले तक महामारी से पहले वाली स्थिति में लौट रहा था. वहां अचानक से महामारी अपने सबसे विकराल स्वरूप में पहुंच चुकी है.

आज की दुनिया वैश्विक है. हर व्यक्ति के हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. कोरोना ने हमें ये बार-बार साबित करके दिखाया है. चीन के वुहान में शुरू हुई महामारी 50 लाख से अधिक लोगों की जान ले चुकी है. 25 करोड़ से अधिक लोग वायरस की चपेट में आ चुके हैं. ये संख्या रोज़ बढ़ ही रही है.

वैक्सीन इस संकट को रोकने का इकलौता उपलब्ध उपाय है. इस सच्चाई से मुंह फेरने वाली जनता के लिए नौशाद अशहर का शेर है –

हर क़दम खाएगा ठोकर न दिखाई देगा

आंख हो बंद तो पत्थर न दिखाई देगा.

यूरोप की नादानी पूरी दुनिया के लिए सबक है. सरकारों के लिए भी और आम लोगों के लिए भी. ये मौका है, सरकारों के लिए अपनी कमियां दूर करने का. और, आम लोगों के लिए अपनी झिझक से पार पाने का.


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