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आईटी सेल नहीं थी तब, इसलिए बंदर से आदमी बनने का स्क्रीनशॉट नहीं हमारे पास

ashishसत्यपाल सिंह. केंद्र सरकार में शिक्षा राज्यमंत्री हैं. पिछले दिनों इन्होंने बयान दिया कि इंसान हमेशा से ऐसा ही रहा है. वो बंदर से इंसान नहीं बना है. चार्ल्स डार्विन और क्रमिक विकास की उनकी थ्योरी वैज्ञानिक रूप से गलत है. स्कूल-कॉलेज में सही थ्योरी पढ़ाने की ज़रूरत है. सत्यपाल सिंह की बात को सीरियसली लेना अपराध से कम नहीं. लेकिन आशीष का दिल बड़ा है. उन्होंने एक खत लिखकर कोशिश की है सत्यपाल को उनकी ज़बान में समझाने की. पोस्ट नहीं कर पाए तो उनने लल्लनटॉप को दे दिया. हम आपको पढ़ा रहे हैं –


आदरणीय सत्यपाल जी,

प्रणाम,

आपको ये खुला खत लिख रहे हैं, हो सकता है आप इसे खत मानने से भी इनकार कर दें क्योंकि अगर खत है तो फिर पोस्टकार्ड या अंतर्देशीय क्यों नहीं दिख रहा? आपने कहा, ‘हमारे किसी भी पूर्वज ने बंदर को इंसान में बदलते नहीं देखा, इस हिसाब से डार्विन की थ्योरी गलत है.’ आपने इतनी पुरानी बात के लिए इतना भी कहा इसी के लिए शुक्रिया! वर्ना बाकी के भाई लोग तो 2014 के पहले दुनिया थी भी, ये तक नहीं मानते. भले वो बंदर रहे हों या नहीं, लेकिन अभी जो इंसान पाए जा रहे हैं उनमें इंसान के तौर पर एक खूबी होती है, खूबी ये कि वो जिस बारे में बात करते हैं, उसके बारे में थोड़ी जानकारी तो रखते ही हैं. आपने डार्विन की बात की, आपको पता होगा कि डार्विन और अब्राहम लिंकन की जन्मतिथि सेम थी, वैसे ही जैसे आपकी, ललित मोदी की और फवाद खान की जन्मतिथि एक है. अब आप कहेंगे इस बात का क्या सेंस बनता है? एक्जैक्टली माय पॉइंट! आपकी बात का भी क्या सेंस बनता है?

फवाद खान. सांकेतिक फोटो. किस बात का संकेत. हम नहीं जानते.
फवाद खान. इनसे सत्यपाल जी की जन्मतारीख मिलती है. इसलिए हमने फोटो लगा दी. 

लोकतंत्र में हर सवाल का सम्मान होना चाहिए. और आपका सवाल तो तर्कसंगत है. इसके समकक्ष कुछेक सवाल और हैं, जैसे कोई लड़की अपनी शादी के दिन जींस पहनने का ही क्यों सोचेगी? गुलाब जामुन में गुलाब किस-किसने देखा है? पहले मुर्गी आई या अंडा? ब्रेड पकौड़ा रोटी में आता है या पकौड़े में? अच्छे दिन कब आएंगे? हवा को किसी ने नहीं देखा तो क्या हवा होती है? जब पद्मावती फिल्म को किसी ने देखा ही नहीं तो ये कैसे पता कि उसमें कोई ड्रीम सीक्वेंस है? भल्लाल देव का बेटा कैसे हो गया जब उसकी बीवी को किसी ने देखा ही नहीं?

मुझे पता नहीं कि आप भी मेरे जैसे उन स्कूलों में पढ़ें हैं या नहीं जहां जीते-जागते आदमी को कुर्सी, एरोप्लेन या मुर्गा बना दिया जाता था. क्योंकि ऐसे स्कूलों में ही हमें इंसान का दूसरी चीज में तत्क्षण बदलना नज़र आता था. मुझे ऐसा भी लगता है कि आपने एडवर्ड, बेला और जैकब वाली फिल्म भी दबा के देखी है, जहां भेड़िया पल भर में मुंडी झटक के इंसान बन जाता था. लेकिन मुझे ये पता है कि आपका सवाल विकास बनाम क्रमिक विकास का सवाल है. इसलिए इसका जवाब खोजा जाना चाहिए.

आप ऐसे स्कूल में पढ़ें हैं सत्यपाल जी? (फोटोः Bloemfontein Courant)
आप ऐसे स्कूल में पढ़ें हैं सत्यपाल जी? (फोटोः Bloemfontein Courant)

अब मुद्दे पर आते हैं. बंदर को इंसान बनते किसी ने क्यों नहीं देखा? और अगर देखा तो किसी ने लिखा या बताया क्यों नहीं? अब देखिए ये जो दुनिया है ये 16 मई 2014 के पहले भी हुआ करती थी. 3.8 अरब साल पहले ही यहां जीवन के निशान नज़र आने लगे थे. लेकिन वो बैक्टीरिया टाइप्स हुआ करते थे, माने बहुत किन्नी-बुदी से तो उनकी बात ही छोड़ दीजिए और एक अरब साल को स्किप कर दीजिए. काहे के बहुकोशिकीय जीव आने में लगभग इतना ही समय लगेगा. अब स्किप करते हुए दो चीजें ध्यान में रखिएगा, तब इंसान नहीं हुआ करते थे और दूसरी ये कि एक अरब में कितने पंद्रह लाख होते हैं.

अब आइए आप अब से लगभग 50 करोड़ साल पहले के समय में, तब तक अविभाजित बंगाल तो नहीं था लेकिन मछलियां आ चुकी थीं. अगले दस से बीस करोड़ साल के अंदर मार्केट में पौधे और पौधों के बाद पेड़ भी आ चुके थे. फिर बाजार में आए छिपकली के नाना मतलब डायनासोर, बताते हैं कि डायनासोर रीटेल सेक्टर में डील करते थे और एफडीआई से आए थे, कालांतर में सरकार बदलने पर एक बार जोर की नोटबंदी हुई लगे हाथ एफडीआई पर रोक लगी और तब से ही डायनासोर गायब हो गए.

डायनोसॉर, जिन्हें सबसे पहले स्टीवन स्पीलबर्ग ने देखा.
डायनोसॉर, जिन्हें सबसे पहले स्टीवन स्पीलबर्ग ने देखा.

अब से मोटा-मोटी 20-22 करोड़ साल पहले स्तनपायी जीव आए. आ गए क्योंकि तब क्लीवेज में कैमरा घुसाने वाले रिपोर्टर्स नहीं हुआ करते थे. और अब से लगभग 1-2 लाख साल पहले आए वो जानवर जिन्हें कहा जाता है होमो सेपियंस (होमोफोबिक नहीं! ) माने के इंसान. अब देखिये सत्यपाल जी सीन ये है ना कि आज कल का आदमी इस दुनिया के मार्किट में बहुत नया प्रोडक्ट है, लेकिन फिर भी एक से दो लाख साल पुराना है. और आपको तो पता है पहली भाषा कब आई, किसने लिखी, कब कौन मुंह से बोला. ये तो वैज्ञानिक भी नहीं खोज पाए क्योंकि ये बहुत पुराने समय की बात है. आईटी सेल तब होता नहीं था जो हर बात का स्क्रीनशॉट रख ले, तो तब की पढ़ाई अब आदमी फ़ॉसिल्स से और आर्कियोलॉजी में जो लक्कड़-झक्कड़ मिल जाए उससे करता है. माने भाषा नहीं थी, तो कौनो लिखने बताने वाला नहीं था. इसीलिए हर बात पर लगभग लिखना पड़ता है.

अब देखिए सीन ये था कि स्तनपायी जीव तो शुरू-शुरू में हुआ करते थे. लेकिन एक बार उनके रहते हुए नोटबंदी भी तो हुई थी, उसे मास एक्सटिंशन कहा जाता है, अरे वही जिसके बाद डायनासोर ‘कई थे डायनासोर’ में बदल गए थे. बाद में मुकुल शर्मा ने उसी के बाद की घटनाओं पर एक छोटी सी कहानी लिखी ‘मोबियस ट्रिप्स’ और इसके बाद विशाल भारद्वाज ने उसी को और फैला दिया और ‘एक थी डायन’ वाली पिच्चर बना ली थी, उसमें एक औरत, औरत से छिपकली (डायनासोर की नातिन!) बन जाया करती थी. वो घटना कैमरे में कैद है और लिखी भी गई है, लेकिन प्लीज सत्यपाल जी आप वो देखकर ये न कह दीजिएगा कि इंसान की पूर्वज छिपकलियां थीं.

होमो इरेक्टस. बंदर से होमो सेपियंस के बीच का इंसान. (फोटोः http://humanorigins.si.edu)
होमो इरेक्टस. बंदर से होमो सेपियंस के बीच का इंसान. (फोटोः http://humanorigins.si.edu)

तो मुद्दे पर लौटिये जो स्तनपायी थे वो बहुत नुन्नू-मुन्नू टाइप थे. रोडेंट्स कहते थे उनको. ये स्तनपायी मास एक्सटिंशन में वैसे ही बच गए, जैसे नोटबंदी में सौ का नोट बच गया था. अब क्योंकि हाल ही में नोटबंदी हुई थी और नोटबंदी के बाद का तो आपका पता है, हजार का नोट दो हजार हो जाता है. सौ और पांच सौ के नोट के बीच से रंग बदल के दो सौ आ जाता है. पचास का पुराना नोट तो रहता ही है एक नया वाला भी आ जाता है. जीवों में भी ऐसा ही कुछ हुआ, उसे अंग्रेज़ी वाले एडैप्टिव रेडिएशन और हिंदीभाषी अनुकूली विकिरण कहते हैं. तो अगले बीस से पच्चीस मिलियन साल में काफी कुछ बदला. जैसे ये जो रोडेंट्स थे, उनका विजन क्लियर नहीं था. वैसे ही जैसे आपकी सरकार का क्लियर नहीं है लेकिन रोडेंट्स का सीन कुछ अलग था, उनके शरीर में आंखें सिर के साइड में थीं, पर आने वाले समय में जो बंदर टाइप जीव आए उनमें वो आंखें सिर के आगे तरफ आ गईं.

इसी टाइम एक चीज और बदली, एक चीज होती है मेरुदंड. वो अंदर-अंदर जाके दिमाग से जुड़ी होती है और जहां पे जुड़ती है वहां एक छेद बना होता है. उसे फोरमन मैग्नम कहते हैं, तो पहले वो बंदरों की खोपड़ी में पीछे तरफ हुआ करता था. अब वो शिफ्ट होकर खोपड़ी के उस हिस्से में आ गया जिससे अरविंद केजरीवाल सबसे ज्यादा तपे रहते हैं, माने सेंटर में. इससे हुआ क्या कि सीधे खड़े होने में सुभीता हो गई. जब एक तरफ ये सब हो ही रहा था, तभी ग्लोबल वार्मिंग की सौतेली बहन ग्लोबल कूलिंग आ गई. फिर जंगल घटे, घास के मैदान बढ़े और ऐसे जानवर ज्यादा फैशन में आ गए जो खुले मैदान में आराम से रह सकें. अब जानवर के सामने जानवर आए तो आप तो अच्छे से जानते हैं, लिंचिंग की घटनाएं बढ़ीं. माने एक-दूसरे को मारकर खाने वाले जानवर भी बढ़ गए. ऐसे में हो सकता है जो बंदर इस सब का रिकॉर्ड रख रहा था कि पिछले कुछ लाख सालों में बंदरों में क्या बदलाव आए, उसको भी कोई खा गया हो.

कैप्शन - इस बारे में मैं कहना चाहूंगा नो कमेंट्स.
कैप्शन – इस बारे में मैं कहना चाहूंगा नो कमेंट्स.

अब से सात साल पहले ऐसा समय आया जब इंसान को ‘Apps’ का चस्का चढ़ना शुरू हुआ था लेकिन अब से सात मिलियन साल पहले ऐसा समय आया था जब इंसान ‘Ape’ से अलग हो लिया था. माने वही टाइम जिसकी सारी भसड़ है. जिसके बारे में हमारे पुरखे लिख या बता नहीं गए. क्योंकि ये एक दिन में नहीं हुआ था, इस पूरे प्रोसीजर में लगभग छ: मिलियन साल लग गए थे. माने फ़ाइल बहुत आराम से सरक रही थी. कायदे से ये उस टाइम का राम मंदिर था, जिसको पूरा होने में समय तो लगना था. कहते हैं कि 13 मिलियन साल पहले बंदर से इंसान बनना शुरू हो गया था, और जो पुराने टाइम के सबूत मिलते हैं ये लगभग 7 मिलियन साल पहले का इशारा करते हैं. अब आप ही बताइए, अगर कोई इंसान ऐसे में एकाध दो मिलियन साल ज़िंदा रह भी गया होगा, जिसने देखा होगा कि नथुआ की पछीती में एक बंदर रातोंरात इंसान बन गया तो वो कैसे हमको ये बता पाएगा? हो सकता है उसने अपने बच्चों को बताया हो लेकिन उसके बच्चे इतने नाकारा निकल गए कि हमें बताना भूल गए. सीधी सी बात है सर आप कभी पुलिस के कमिश्नर थे एक दिन में तो आप भी बीजेपी के नेता नहीं बन गए थे.

शेष कुशल,

अब जाते हैं.

वैसे सर एक सवाल था, मान लीजिए कि आदमी कभी बंदर था तो जब बंदर आदमी बन गया तो बाकी के बंदर, बंदर ही क्यों रह गए? सोच के बताइएगा.


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