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स्टालिन का डॉक्टर्स प्लॉट क्या था?

तारीख़ 13 जनवरी. साल 1953. USSR के एक अख़बार प्रावदा में बड़ी सनसनीखेज़ और यहूदियों के षड्यंत्र का पर्दाफ़ाश करती एक ख़बर छपी. जिसकी हेडिंग थी- नीच हत्यारे और जासूस, जिन्होंने डाक्टर्स का मुखौटा पहना हुआ था.

इस ख़बर के पीछे का सच क्या था? क्या वाक़ई में ये डाक्टर्स क़त्ल और जासूसी के दोषी थे. या फिर उल्टा ये प्लॉट स्टालिन ने रचा था इन डॉक्टर्स के ख़िलाफ़. षड्यंत्र जिसने स्टालिन की मौत के बाद अचानक ही अपना रूप बदल लिया था. तारीख़ में आज हम बात करेंगे, इसी ‘डॉक्टर्स प्लॉट’ की. जिसे ‘स्टालिन की लास्ट कॉन्सपरेसी’ भी कहा जाता है.

कैसे पनपी स्टालिन के मन में यहूदियों के लिए नफ़रत?

USSR का जन्म लेनिन और मार्क्स के सिद्धांतों पर हुआ था. जिसमें राष्ट्रवाद के लिए कोई जगह नहीं थी. ‘धर्म अफ़ीम है’ वाले सिद्धांत पर चलने वाले इस देश में लोग या तो नास्तिक हो चले थे.

द्वितीय विश्व युद्ध से पहले हुई क्रांतियों और लेफ़्ट-मूवमेंट में यहूदी रहे नास्तिकों ने भी, बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था. द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद USSR और अमेरिका दोनों ही दुनिया के बाक़ी देशों को अपने पाले में करने में लगे हुए थे. जब 14 मई, 1948 को यहूदियों के नए देश, इज़रायल का जन्म हुआ तो स्टालिन मान के चल रहा था कि ये देश हमारे, यानी सोशलिस्ट पाले में चला आएगा. कारण ये कि, कुछ ही देश थे जो इज़रायल के बनने का समर्थन कर रहे थे. इनमें से USSR और USA दो बड़े देश थे. लेकिन इज़रायल अमेरिका के पाले में चला गया. यहूदी एज़ेंसी के हेड बेन गर्लोन ने एक चर्चित स्टेटमेंट में कहा था कि ‘हमें सोवियत यूनियन के गोले-बारूद नहीं चाहिए.’ स्टालिन तिलमिला गया. हालांकि इसके पीछे USSR में चल रहा ‘रूटलेस कॉस्मोपोलिटेन’ का विरोध भी महत्वपूर्ण कारण था. ‘रूटलेस कॉस्मोपोलिटेन’ की बात आगे करेंगे.

Israel
दुनिया के मानचित्र में इज़रायल (स्क्रीनशॉट: गूगल मैप्स)

एंटी फ़ासिस्ट कमिटी

ख़ैर, उधर कुछ साल पहले ही 1942 में, ‘एंटी फ़ासिस्ट कमिटी’ की स्थापना हुई थी. ये उन यहूदियों ने बनाई थी, जो सोवियत संघ का समर्थन करते थे, और द्वितीय विश्व युद्ध में सोवियत संघ के पक्ष में हवा बनाना चाहते थे. द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद इस कमिटी का उद्देश्य थोड़ा बदल गया था. धीरे-धीरे इस कमिटी में कई और यहूदी संगठन जुड़ते चले गए. अब ‘सोवियत यूनियन’ के लिए हवा मुफ़ीद बनाने की कोई ज़रूरत नहीं थी. समिति के सदस्य युद्ध में यहूदियों के ख़िलाफ़ हुए अत्याचारों को डॉक्यूमेंटेशन करने में लग गए. स्टालिन इससे ख़ुश नहीं था. उसे लगा कि पूरे देश ने युद्ध की विभीषिका को झेला है तो फिर ये संगठन, ‘ज्यू ऑरिएंटेड’ कैसे हो सकते हैं? स्टालिन को यहां भी ‘यहूदी राष्ट्रवाद’ वाली बात नज़र आई. साथ ही इस कमिटी की जड़ें अमेरिका और बाकी पश्चिमी देशों से भी जुड़ी हुई थीं. कोल्ड वॉर के चलते सोवियत संघ डरा हुआ था कि कहीं इस कमिटी से जासूसी वग़ैरह तो नहीं हो रही?

Jewish Antifascist Committee Memorandom
एंटी फ़ासिस्ट कमिटी का एक मेमोरेंडम.

जनवरी 1948 में, इस संस्था के पूर्व अध्यक्ष मिखोलस की स्टालिन ने हत्या करवा दी. कमिटी और इसका ऑफ़िस बंद कर दिया गया. इसके सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर अमेरिकी हितों के लिए काम करने के अलावा बुर्जुआ राष्ट्रवाद और ‘रूटलेस कॉस्मोपोलिटेन’ का भी आरोप लगा. ‘रूटलेस कॉस्मोपोलिटेन’, ’खान मार्केट गैंग’ सरीखा था. जो नहीं था, लेकिन जिसके ख़िलाफ़ हौव्वा था. ‘रूटलेस कॉस्मोपोलिटेन’, जैसा नाम से ही ज़ाहिर है, मतलब ऐसा ‘वैश्विक नज़रिया’ जिसकी जड़ें नहीं थी. यूं ‘रूटलेस कॉस्मोपोलिटेन’ का विरोध करने वालों के अनुसार ‘इस गैंग से जुड़े लोग जो अपने को दुनिया भर का ज्ञानी बताते थे, पर वो अपनी जड़ों से, USSR से, नहीं जुड़े थे.’‘रूटलेस कॉस्मोपोलिटेन’ के विरोधी अप्रत्यक्ष रूप से यहूदी विरोधी भी थे. क्यूंकि उन्हें लगता था कि यहूदियों की पश्चिम से कुछ ज़्यादा ही नज़दीकी है. इसी ‘रूटलेस कॉस्मोपोलिटेन’ के विरोध के चलते सितंबर, 1948 और जून, 1949 के दौरान पकड़े गए कम से कम तेरह प्रमुख यहूदी लेखकों को 12 अगस्त, 1952 को मॉस्को के लुब्यांका जेल में फांसी में चढ़ा दिया गया था.

यूं एक तरह से ये ‘रूटलेस कॉस्मोपोलिटेन’ सोवियत संघ में पनप रहा ‘पैसिव राष्ट्रवाद’ कहा जा सकता है. राष्ट्रवाद, जो देश के बुनियादी सिद्धांतों के सख़्त ख़िलाफ़ था. इस अदृश्य ‘रूटलेस कॉस्मोपोलिटेन’ गैंग में ज़्यादातर यहूदी थे. तो इसके विरोध ने एंटी-सिमेंटिज़्म को भी जन्म दिया. एंटी-सिमेंटिज़्म बोले तो यहूदियों के ख़िलाफ़ अत्याचार.

Mikhoels
एंटी फ़ासिस्ट कमिटी के पूर्व अध्यक्ष मिखोलस.

क्या था डॉक्टर्स प्लॉट?

पहली घटना

नवंबर 1950 में ‘एंटी फ़ासिस्ट कमिटी’ के गिरफ़्तार सदस्यों में से एक, डॉक्टर याकोव आईटिंगर की संदिग्ध परिस्थितियों में जेल में मौत हो गई. जुलाई 1951 में, स्टालिन के इशारे पर केंद्रीय समिति द्वारा लिखे गए एक ‘सीक्रेट लेटर’ में, बिना किसी सबूत के आधार पर आरोप लगाया गया कि याकोव आईटिंगर ने 1945 में केंद्रीय कमेटी के सचिव अलेक्सांद्र शार्बाकोव की ‘मेडिकल-मर्डर’ की बात कबूल की थी. और यह हत्या अकेले उसका नहीं, बल्कि डॉक्टरों के एक षड्यंत्रकारी समूह का काम था. याकोव आईटिंगर तो दरअसल, सुरक्षा मंत्री विक्टर अबाकुमोव के चक्कर में फंस गया था.

Viktor Abakumov
विक्टर अबाकुमोव.

दूसरी घटना

आंद्रेई ज़दानोव USSR की राजनीति में बहुत ऊंचा स्थान रखता था. साथ ही वो स्टालिन का करीबी सहयोगी भी था. एक सेनेटोरियम में रखे जाने के बाद, 31 अगस्त 1948 को हृदय गति रुकने के चलते आंद्रेई की मृत्यु हो गई. उनका इलाज प्रोफ़ेसर याकोव आईटिंगर ही कर रहे थे. इस मृत्यु के कई सालों बाद दिसंबर, 1952 में, स्टालिन ने यहूदी डॉक्टरों के एक समूह पर आंद्रेई ज़दानोव की हत्या के पूरे प्लॉट के बारे में पोलित ब्यूरो को बताया. उसने पोलित ब्यूरो को भी खरी-खोटी सुनाई कि कैसे उन्हें अपने नाक के नीचे चल रहे इस पूरे षड्यंत्र की जानकारी नहीं थी? उसने चिल्ला के कहा-

तुम सब अंधे बिल्ली के बच्चे (किंटन्स) की तरह हो. न जाने मेरे बिना क्या हो. देश ख़त्म हो जाए. क्यूंकि तुम लोग दुश्मनों का पता ही नहीं लगा पाओगे.

इस आरोप का आधार बनी थी क्रेमलिन अस्पताल के कार्डियोग्राफिक यूनिट के प्रमुख लिदिया तिमशुक द्वारा लिखी गई एक चिट्ठी. चिट्ठी जो 29 अगस्त, 1948 को क्रेमलिन गार्ड्स के प्रमुख निकोलाई व्लासिक को दी गई थी. इस चिट्ठी में तिमशुक ने चेतावनी दी थी कि डॉक्टर्स आंद्रेई ज़दानोव की गंभीर स्थिति को कम करके आंक रहे हैं और इसके घातक परिणाम हो सकते हैं. चिट्ठी में कहा गया था कि आंद्रेई का इलाज करने वाले डाक्टर्स न केवल आंद्रेई का ग़लत इलाज करने के दोषी हैं, बल्कि उन्होंने इसे छुपाने का भी षड्यंत्र रचा है. स्टालिन ने दावा किया कि यह पत्र सुरक्षा मंत्री विक्टर अबाकुमोव ने उनके पास आने नहीं दिया. इसलिए यहूदी डॉक्टर्स के अलावा इस पूरे प्लॉट को लेकर विक्टर अबाकुमोव और निकोलाई व्लासिक को भी दोषी ठहराया गया.

Andrei Zhdano
आंद्रेई ज़दानोव.

हालांकि बहुत बाद में पता चला कि ये चिट्ठी स्टालिन ने अगस्त, 1948 में ही पढ़ ली थी और इसपर कोई कार्यवाई न करते हुए इसमें रिमार्क भी लिखा था कि इसे आर्काइव कर दिया जाए.

1951-52 में राज्य सुरक्षा मंत्रालय (MGB) ने आंद्रेई ज़दानोव की मौत को इटिंगर के कथित बयानों से जोड़कर साजिश को ‘यहूदियों’ के साथ जोड़ने की कोशिश की. अबाकुमोव को भी इस षड्यंत्र से जोड़ने का प्रयास किया गया. यह साबित करने का भी प्रयास किया गया कि यह साजिश अमेरिकी सरकार द्वारा निर्देशित थी. अबाकुमोव को 1951 में गिरफ्तार कर लिया गया. 37 डॉक्टरों और उनकी पत्नियों को 1951 से 1953 के दौरान गिरफ्तार किया गया. जिसमें केवल 17 यहूदी शामिल थे. इसके बाद 13 जनवरी, 1953 में सोवियत संघ के दो अख़बारों (प्रावदा और इज़्वेस्टिया) ने एक लंबा चौड़ा लेख छापा, जिसमें कथित तौर पर इस ‘डॉक्टर्स प्लॉट’ को एक्सपोज़ किया गया था और इसे यहूदियों के साथ सीधे-सीधे जोड़ा गया था. प्रावदा और इज़्वेस्टिया दोनों ही सोशलिस्ट पार्टी के प्रोपोगेंडा अख़बार थे.

प्रावदा में ये भी मेंशन था कि इन डाक्टर्स का अमेरिका और यहूदी बुर्जुआ के साथ सीधा संबंध था. आर्टिकल में 9 प्रमुख षड्यंत्रकारियों के नाम थे, जिन्हें इस आर्टिकल से छपने से पहले ही गिरफ़्तार कर लिया गया था. इसमें से अधिकतर यहूदी थे. जनवरी, 1953 से मार्च 1953 के दौरान 20 और प्रोफ़ेसर और डॉक्टर गिरफ़्तार किए गए, जिनमें से 12 यहूदी थे. गिरफ़्तार डॉक्टर्स को यातनाएं दी गईं और पूछताछ के बाद यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि ये एक बहुत बड़ी साज़िश थी, जिसके निशाने पर स्टालिन भी थे. इस साज़िश में यहूदी राष्ट्रवादी, अमेरिकी सरकार, केंद्रीय समिति सचिव और आंद्रेई ज़दानोव के शागिर्द अलेक्सी कुज़नेत्सोव सहित कई लोग शामिल थे.

फ़ाइनल ट्विस्ट

5 मार्च, 1953 को स्टालिन की मौत हो गई. दिल का दौरा पड़ने की वजह से. इसके बाद लेवरेंटी बेरिया ने गृह (आंतरिक मामलों के) मंत्री बनते ही डाक्टर्स के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्यवाही पर लगभग तुरंत रोक लगा दी. अभी स्टालिन की मौत को एक महीना भी नहीं बीता था कि 03 अप्रैल, 1953 तक सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया था. अगले दिन, यानी 04 अप्रैल को सरकार ने ये घोषणा की कि डॉक्टर्स से लिए गए इक़बालियन बयान का कोई महत्व नहीं है, क्यूंकि इसे डाक्टर्स को टॉर्चर करके लिया गया था.

Lavrentiy Beria
लेवरेंटी बेरिया.

अंततः

हालांकि कोई डॉक्यूमेंट्स कहीं नहीं मिलता लेकिन कई जगह इस बात को बड़ी जोर देकर मेंशन किया गया है कि अगर स्टालिन जीवित रहता तो, उसका प्लान ये था कि इन आरोपियों को बीच चौराहे में सजा देकर यहूदियों के ख़िलाफ़ दंगे भड़काए जाएं. और फिर यहूदियों को उनकी सुरक्षा का हवाला देकर दूर साइबेरिया खदेड़ दिया जाए. तो क्या स्टालिन की मौत ने उसे एंटी-सिमेटक होने से रोक दिया था?


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