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बैंकों ने 2 लाख करोड़ रुपए फिर से बट्टे खाते में डाले, जानिए क्या नुकसान होने वाला है आपका?

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मोदी सरकार के दौर में एक शब्द खासा चर्चा में आया है. बट्टा खाता. मोदी की पहली सरकार के वक्त इस शब्द ने सड़क से संसद तक हलचल मचाई. क्यों? क्योंकि अचानक से ये शब्द अकाउंट की किताबों से बाहर आया. और सियासत की गलियों का हिस्सा बना. असल में हुआ ये कि बैंकों ने अपने फंसे हुए कर्जे को अचानक से बट्टे खाते में डालना शुरू कर दिया. और फिर इस पर जमकर सियासत हुई. मोदी सरकार पर आरोप लगा कि वो बड़े धन्नासेठ बकाएदारों के कर्जे माफ कर रही है. दूसरी ओर सरकार ने कहा कि ये सब बैंकों की किताबों (लेजर बुक्स) को साफ-सुथरा करने के लिए किया जा रहा है. और किसी का कोई कर्जा माफ नहीं किया गया है.

अब दूसरी मोदी सरकार के सामने एक बार फिर से बट्टा खाता मुसीबत लेकर आ गया है. नए फाइनेंशियल ईयर के पहले तीन महीनों में अब तक बैंकों ने 2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का फंसा हुआ कर्ज बट्टे खाते में डाल दिया है. ये रकम कितनी ज्यादा है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि साल 2018 के दौरान 1.28 लाख करोड़ रुपए की रकम बट्टे खाते में डाली गई थी. बिजनेस न्यूज पेपर फाइनेंशियल एक्सप्रेस के मुताबिक देश के 27 बैंकों ने 2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम बट्टे खाते में डाली है. बैंकों की इस कवायद का क्या मतलब है? और ऐसा क्यों किया जा रहा है? इसका हमारी आपकी जिंदगी से क्या लेना-देना है? आइए समझते हैं आसान भाषा में.

सवाल-1 क्या किया है बैंकों ने विस्तार से समझिए?

देश में सरकारी और प्राइवेट बैंकों को मिलाकर 40 से ज्यादा बैंक हैं. सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र में एसबीआई और प्राइवेट सेक्टर में एचडीएफसी जैसे बैंक बड़े माने जाते हैं. इन बैंकों ने कारोबारी साल 2019 के तीन महीनों में यानी अप्रैल, मई और जून के दौरान 2.06 लाख करोड़ रुपए का फंसा हुआ कर्ज बट्टे खाते में डाला है. फंसे हुए कर्ज को बैंक की भाषा में नॉन परफॉर्मिंग असेट्स यानी NPA बोला जाता है. इसी तरह बट्टे खाते को राइट ऑफ बोलते हैं. फाइनेंशियल एक्सप्रेस के मुताबिक सिर्फ जिन बैंकों ने कर्जों को बट्टे खाते में डाला है, उनमें 16 सरकारी बैंक शामिल हैं. अकेले इन बैंकों ने 1.77 लाख करोड़ रुपए बट्टे खाते में डाले हैं. बीते साल को देखते हुए ये रकम बहुत ज्यादा है.

सवाल-2 बीते सालों में कितनी रकम डाली गई थी बट्टे खाते में?

साल 2018 के पूरे साल में 1.28 लाख करोड़ रुपए का फंसा हुआ कर्ज बट्टे खाते में डाला गया था. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के साढ़े चार साल के दौरान यानी अप्रैल 2014 से दिसंबर 2018 तक करीब साढ़े 5 लाख करोड़ रुपए का कर्ज बट्टे खाते में डाला गया है.

सवाल-3- ये बट्टा खाता होता क्या है?

तकनीकी तौर पर बट्टा खाता उसे बोलते हैं, जिसमें वसूल न हो पाने वाली रकम लिखी जाती है. देश के तमाम कारोबारी एक किताब में ऐसी रकम दर्ज करते हैं. बैंक भी अपने बही-खातों को साफ-सुथरा दिखाने के लिए ऐसी कवायद करते हैं. वे फंसे हुए कर्ज की रकम को अपनी बैलेंस शीट से हटा देते हैं. इस पूरी प्रक्रिया को कर्ज को राइट ऑफ करना कहते हैं.

अब आप सोच रहे होंगे बैंक ऐसा क्यों करते हैं? तो जान लीजिए बैंकों को भी कई जगह से कर्ज लेना होता है, अब जब उनके खातों में ऐसा एनपीए दिखाई देगा तो उनको कर्ज मिलने में कठिनाई होगी, इसी वजह से वे ऐसे कर्जों को अपनी बैलेंस शीट से हटा देते हैं.

एक बात और क्लीयर कर लीजिए ऐसे कर्जों को राइट ऑफ करने का मतलब ये नहीं होता कि कर्ज माफ कर दिया गया है. कई बार लोग ऐसा प्रचार करते हैं कि कंपनी का कर्जा राइट ऑफ या बट्टे खाते में डालने का मतलब है, उसका कर्ज माफ कर दिया गया है. ये सच नहीं है. बैंक कई बार फंसे हुए कर्ज की वसूली भी कर लेते हैं. और जब ये पैसा बैंकों को मिल जाता है, तो ये रकम फिर से बैंकों की बैलेंस शीट में दिखने लगती है.

सवाल 4- बट्टा खाता और कर्ज माफी में क्या फर्क होता है?

बट्टे खाते की रकम की वसूली के लिए बैंक प्रयास करते रहते हैं. दूसरी ओर कर्ज माफी में बैंक अपना कर्ज पूरी तरह से माफ कर देते हैं. बैंक ऐसे कर्ज की वसूली के लिए प्रयास नहीं करते हैं. वे उसी पूरी तरह छोड़ देते हैं. आमतौर पर किसान कर्जमाफी, बाढ़, भूकंप या सूखा वगैरह के हालात में बैंक इस तरह के कदम उठाते हैं. वे कर्ज माफ कर देते हैं. वहीं, बट्टे खाते में आमतौर पर एनपीए की रकम डाली जाती है.

सवाल-5- एनपीए क्या होता है?

बैंक भी कारोबार करते हैं. वे कंपनियों और लोगों को उधार देकर ब्याज से अपनी कमाई करते हैं. कई बार बैंकों के कुछ कर्जें फंस जाते हैं, उनकी समय पर वसूली या वापसी नहीं हो पाती है. ऐसे कर्जों को बैंक एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग असेट्स की कैटेगरी में डाल देते हैं. आमतौर पर जिस लोन की किस्त 90 दिन तक वापस नहीं आती, उसे एनपीए कैटेगरी में डाल दिया जाता है. एनपीए की तीन कैटेगरी होती हैं.

1- सब स्टैंडर्ड असेट्स यानी ऐसा खाता जो एक साल से कम अवधि तक एनपीए में हो.

2- डाउटफुल असेट्स यानी ऐसे खाते जो एक साल से ज्यादा से एनपीए कैटेगरी में हों.

3- लॉस असेट्स यानी ऐसे खाते जिनका लोन वसूल नहीं हो सकता. फंसे कर्ज की वसूली के लिए बैंक इंसॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी कोड IBC के तहत कार्रवाई भी कर सकते हैं. 2,000 करोड़ रुपए या इससे ज्यादा के लोन डिफॉल्ट के मामलों में बैंकों को 180 दिन में समाधान निकालना होता है.

सवाल-6  इन सबका हमारे-आपके ऊपर क्या फर्क पड़ता है?

बैंक इकॉनमी की रीढ़ हैं. वे सभी को कर्ज मुहैया कराते हैं. जब बैंकों का कर्ज फंस जाता है तो उनके सामने कई तरह के संकट आते हैं. और नतीजे हम सभी को भुगतने पड़ते हैं. जैसे-

1-एनपीए ज्यादा होने से बैंकों की लोन देने की क्षमता घट जाती है. मतलब ये कि जब रिज़र्व बैंक बैंक पर सख्ती कर देता है. फिर वे आम ग्राहकों को लोन नहीं दे पाते हैं.

2-बैंकों का मुनाफा कम हो जाता है. इस वजह से सरकार के पास रेवेन्यू कम पहुंचता है. इससे सरकार की निवेश करने की क्षमता कम होती है. आखिर में देश के विकास की रफ्तार कम होती है. साथ ही बेरोजगारी भी बढ़ती है.

3- बैंकों के पास नकदी की कमी हो जाती है. इससे बैंक अपने नुकसान की भरपाई के लिए ब्याज दरें बढ़ाते हैं. नतीजा आम आदमी को कर्ज महंगा मिलता है.

सवाल-7 क्या कहना है सरकार का?

सरकार का कहना है कि नए इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड IBC कानून ने फंसे हुए कर्ज की वसूली में बड़ी मदद की है. वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट भाषण के दौरान कहा कि बीते 4 साल के दौरान 4 लाख करोड़ रुपए के एनपीए की वसूली की गई है.


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