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फांसी से पहले सिर को काले कपड़े से क्यों ढंकते हैं? ये नाना पाटेकर बहुत पहले बता चुके हैं

निर्भया के दोषियों को फांसी हो गई. अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा, मुकेश सिंह और पवन गुप्ता की फांसी. 20 मार्च की सुबह 5.30 बजे इन्हें फांसी पर लटका दिया गया. इन चारों ने फांसी रुकवाने के लिए काफी कोशिश की. इस वजह से पहले भी तीन बार डेथ वारंट जारी किए गए, जिन पर अमल नहीं हो सका था. पहला वारंट जनवरी में जारी हुआ था. लेकिन दोषियों ने अलग-अलग कानूनी पैंतरे इस्तेमाल किए. इस तरह फांसी की तारीख आगे बढ़ती गई. तिहाड़ जेल में पहली बार एक साथ चार दोषियों को फांसी दी गई है.

# क्या होता है फांसी में?

जेल सुप्रिटेंडेंट, लोकल मजिस्ट्रेट, कुछ पुलिस अधिकारियों समेत एक डॉक्टर फांसी के दौरान मौजूद रहते हैं. तय टाइम पर मुजरिम को फांसी के तख्ते की ओर ले जाया जाता है. इसी दौरान उसे उसके गुनाह के बारे में बताया जाता है.जिसके लिए उसे फांसी दी जा रही है. तख्ते पर जल्लाद मुजरिम के हाथ पीछे से बांध देता है और दोनों पैरों को भी बांध दिया जाता है.

जल्लाद कैदी के मुंह पर कपड़ा डालकर, उसके गले में फंदा लगाता है. और इसके बाद लीवर खींच देता है. दुनियाभर में फांसी के चार तरीके होते हैं. भारत में लॉन्ग ड्रॉप तरीके से फांसी दी जाती है. लॉन्ग ड्रॉप में कैदी के वज़न के हिसाब से रस्सी की लंबाई फिक्स की जाती है. ये इसलिए किया जाता है ताकि झटके से गर्दन और रीड की हड्डी टूट जाए. ऐसा माना जाता है कि फांसी में लॉन्ग ड्रॉप वाला तरीका सबसे कम क्रूर होता है.

ब्रिटिश दौर में इस तरह का मास्क इस्तेमाल किया जाता था और हाथ पीछे बांधने के लिए इस तरह की रस्सी होती थी (नैशनल म्यूज़ियम से साभार तस्वीर)
ब्रिटिश दौर में इस तरह का मास्क इस्तेमाल किया जाता था और हाथ पीछे बांधने के लिए इस तरह की रस्सी होती थी (नैशनल म्यूज़ियम से साभार तस्वीर)

# लेकिन चेहरे पर काला मास्क क्यों?

बीसवीं शताब्दी के आस-पास फांसी के वक़्त कैदी के सिर को काले कपड़े से ढंका जाने लगा था. लेकिन कुछ देशों में फांसी से ठीक पहले सफ़ेद मास्क पहनाया जाता था. ब्रिटेन और इसके उपनिवेशों में कैदी को सफ़ेद मास्क पहना दिया जाता था. मास्क के ब्रिटिश वर्जन में एक ख़ासियत ये होती थी कि उसमें देखने के लिए आंखों के सामने दो छेद होते थे. आमतौर पर ये मास्क ठीक तभी पहनाया जाता था जब कैदी को फांसी लगने ही वाली हो. इससे पहले तक जिसे फांसी लगने वाली होती है वो फांसी का फंदा, जल्लाद वगैरह सबको देखता रहता है. कुछ देशों ने बाद में इस परंपरा को बदलने की कोशिश की गई. कैदी को फांसी के लिए ले जाने से पहले ही उसका चेहरा मास्क से ढंक देते थे. लेकिन ऐसे में आमतौर पर कैदी ज़्यादा परेशान और विचलित होने लगे. उन्हें पता नहीं होता था कि कहां क्या हो रहा है. इसलिए बाद में यही परंपरा रही कि मास्क तभी पहनाएं जब फांसी का फंदा गले में पहना दिया जाए.

तिहाड़ जेल में इससे पहले कभी एक साथ चार लोगों को फांसी नहीं दी गई (तस्वीर PTI)
तिहाड़ जेल में इससे पहले कभी एक साथ चार लोगों को फांसी नहीं दी गई (तस्वीर PTI)

फांसी से ठीक पहले काला मास्क पहनाने की दुनिया भर में तीन वजहें मानी जाती हैं.

पहली वजह, लॉन्ग ड्रॉप के तरीके से फांसी देने में एक बात का विशेष ध्यान रखना होता है. अगर फांसी का लिवर खींचने से ठीक पहले कैदी हिलने लगा तो उसकी गर्दन पर उतना ज़ोर नहीं पड़ेगा कि गर्दन की हड्डी टूट सके. और यही मौत की सबसे बड़ी वजह होती है फांसी में. फांसी के फंदे को नाप कर गर्दन पर रखा जाता है. अगर गांठ अपनी जगह से हिल गई तो ये भी हो सकता है कि कैदी तुरंत ना मरे.

और अगर उसे मास्क पहनाकर उसकी आंखें ना ढंकी जाएं तो ये हो सकता है कि फांसी का लिवर खिंचता देखकर कैदी डर की वजह से हिलने लगे. इससे फंदे की गांठ सही जगह से हिल जाएगी.

दूसरी वजह ये होती है कि कैदी के गले की त्वचा पर फांसी के फंदे का गहरा निशान ना रह जाए. फांसी के फंदे का लिवर तेज़ी से खींचने के बाद जब कैदी का शरीर नीचे को जाता है तो ये इतनी स्पीड से जाता है कि फंदे की वजह से घर्षण होकर त्वचा जल जाती है. और अगर मास्क को फंदे से न बांधा जाए तो गले पर गोलाई में जलने के निशान रह जाएंगे.

फंदे से मास्क इसलिए भी कसकर बांध दिया जाता है कि नीचे जाते हुए मास्क चेहरे पर से उतर ना जाए.

तीसरी और सबसे ज़रूरी वजह. फांसी के बाद का चेहरा. जिसे फांसी चढ़ाया जाता है उसकी आंखें और जीभ इतने दबाव से बाहर आ जाती हैं. वहां मौजूद लोगों या किसी के लिए भी इस चेहरे को देख पाना लगभग असंभव होता है. एक बार इंसान को इस हालत में देखने के बाद इसका असर दिमाग़ पर लम्बे समय तक रह सकता है. इसलिए कैदी का चेहरा ढंक दिया जाता है.

आपको फ़िल्म क्रांतिवीर याद होगी. पहले दूरदर्शन पर गाहे-बगाहे आती थी. उसमें फांसी के फंदे पर चढ़ने के लिए तैयार नाना पाटेकर का किरदार क्या कहता है? यही कि ‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने? अभी मुझे लटका देंगे. ज़बान बाहर आ जाएगी, आंखें बाहर निकल आएंगी…’

अपने तिहाड़ जेल के अनुभवों को पत्रकार सुनेत्रा के साथ मिलकर लिखा है सुनील गुप्ता ने. (तस्वीर सुनील गुप्ता साभार)
अपने तिहाड़ जेल के अनुभवों को पत्रकार सुनेत्रा के साथ मिलकर लिखा है सुनील गुप्ता ने. (तस्वीर सुनील गुप्ता साभार)

लेकिन मास्क काला होने की वजह? काला कृत्य. black doing. माना जाता है कि कानूनी होने के बाद भी ये आख़िरकार मानव हत्या ही है. इस बारे में The Lallantop ने बात की तिहाड़ के पूर्व जेलर और ब्लैक वॉरेंट-कन्फेशंस ऑफ अ तिहाड़ जेलर किताब के लेखक सुनील गुप्ता से. उन्होंने बताया कि फांसी के समय कैदी को काला कपड़ा पहनाया जाता है. सिर को काले मास्क से ढंका जाता है. काला रंग इसलिए क्योंकि फांसी की ये पूरी प्रक्रिया Black Act मानी जाती है. क़ानून और अपराध ने ये हत्या करने के लिए सिस्टम को मजबूर किया. इसलिए कपड़ों और मास्क का रंग काला ही रखा जाता है.

# वारंट भी काला होता है

कोर्ट फांसी के लिए डेथ वारंट जारी करता है. इसे ‘ब्लैक वारंट’ भी कहा जाता है. फांसी की तारीख से 14 दिन पहले यह जारी किया जाता है. इसके ऊपर लिखा होता है, ‘वारंट ऑफ एक्जीक्यूशन ऑफ अ सेंटेंस ऑफ डेथ’. वारंट में ये भी लिखा होता है कि कैदी को फांसी पर तब तक लटकाया जाए, जब तक उसकी मौत न हो जाए. कोर्ट से जारी डेथ वारंट सीधा जेल प्रशासन पहुंचता है. फांसी होने के बाद कैदी की मौत से जुड़े सर्टिफिकेट वापस कोर्ट में दिए जाते हैं. इसके अलावा डेथ वारंट भी वापस किया जाता है.

फांसी का लीवर खींचने के लगभग आधे घंटे बाद लाश को फंदे से उतारा जाता है. लेकिन उसे तभी उतारा जाता है जब मेडिकल ऑफिसर मौत की पुष्टि कर दे. मौत की पुष्टि के बाद मजिस्ट्रेट, मेडिकल ऑफिसर और सुप्रिटेंडेंट तीनों डेथ वॉरंट पर साइन करते हैं. फांसी के बाद लाश परिवार को सौंप दी जाती है, जिन कैदियों का परिवार नहीं होता उनकी मौत से पहले उनसे पूछा जाता है कि अंतिम संस्कार कैसे करना है.


ये वीडियो भी देखें:

तिहाड़ में कैदी मालिश से लेकर फांसी तक के खौफनाक सच सामने आए

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