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वर्ल्ड कप 2011 का वो नाम जो न जाने कहां खो गया

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ढाका. 19 फरवरी 2011. शफीउल इस्लाम की शार्ट ऑफ़ लेंथ, तेज़ गेंद. सहवाग बैक फुट पर पहुंचते हैं और बल्ले का चेहरा गेंद को दिखाते हैं. चार रन! वर्ल्ड कप 2011 की पहली गेंद.

मुंबई. 2 अप्रैल 2011. नुवान कुलासेकरा की फुल लेंथ बॉल. धोनी ने बाजुओं की पूरी ताकत झोंक दी बल्ला घुमाने में. गेंद लॉन्ग ऑन के ऊपर से जाती हुई दिख रही थी. धोनी एकटक गेंद को जाते हुए देख रहे थे. गेंद कहां गिरी, किसी को कोई सुध नहीं थी. धोनी अपने कंधे के ऊपर बल्ला घुमाते हैं. वैसे जैसे कोई तेज़ तर्रार समुराई तलवार घुमाता है. 6 रन! वर्ल्ड कप 2011 की आखिरी गेंद.

Dhoni Winning six

इन दो गेंदों के बीच में जो कुछ भी घटा, इतिहास में दर्ज है. साथ ही उसने अपने भविष्य की दिशा भी बदल दी. सचिन कहते हैं कि कपिल देव को वर्ल्ड कप की ट्रॉफी उठाये देख उन्होंने भी क्रिकेट खेलने का सपना देखा था. ये वर्ल्ड कप भी कुछ अलग नहीं था. इसने हमें दोबारा विश्वास दिलाया था कि हम वो बन रहे हैं जिसका हमने कभी ख़्वाब देखा था.

The world cup win

सचिन को वर्ल्ड कप की ट्रॉफी उठाये देखना सिर्फ सचिन का नहीं, मेरा नहीं, पूरे देश का सपना था. युवराज को मैदान पर फफकता देख आंसू हर किसी के उतर आये थे. हरभजन का रोते हुए तिरंगे में लिपट जाना नहीं भूला जा सकता. जश्न मनाने सड़कों पर उतरे लोग, हर पास में खड़े होने वाले से गले मिलते अजनबी, इस बात का सबूत थे कि एक सपना था जो अब साकार हो चुका था. एक त्यौहार का नाम बताइए जिसने जाति, धर्म अदि से ऊपर उठकर लोगों को घर से बाहर निकाल एक दूसरे से मिलवा दिया हो? ये क्रिकेट ही कर सकता था. और उसने किया. हमें जोड़ा खुद से और आपस में भी.

Crowd after india's World cup win 2011

अब जो भी कहने-बताने जा रहा हूं, वो पूरी तरह से पर्सनल है. हमने साल दर साल हर किसी की बात की है. ज़हीर का एक्सपीरियंस, युवराज की बैटिंग और बॉलिंग, सचिन का सपना, धोनी की आखिरी मैच में बैटिंग, गंभीर की पारी, रैना का साथ. सब कुछ. लेकिन कप में एक बात है जो मुझे उसके बाद से हमेशा सालती रही. एक नाम जो दब गया. हमेशा के लिए. जो क्रिकेट की सबसे ऊंची जगह पहुंच कर कहां गायब हो गया, मालूम नहीं.


मुनाफ़ मूसा पटेल. धोनी के लिए मुन्ना. इकहर, गुजरात का रहने वाला महागरीब घर से आता मीडियम पेसर. कहां है अब? मालूम नहीं. क्या करता है? मालूम नहीं, क्रिकेट ही खेलता होगा.


मूसा पटेल और साईदा पटेल के घर पैदा हुआ मुन्ना. तारीख 12 जुलाई 1983. सबसे पहली दोस्ती हुई ग़रीबी से. नौवीं क्लास में पहुंचते हुए मुन्ना फ़ेमस हो चुका था. दूर-दूर के इलाकों में भी इससे तेज़ गेंद फेंकने वाला कोई नहीं था. लेकिन मुन्ना अब क्रिकेट नहीं खेलना चाहता था. उसे गरीबी ने जकड़ा हुआ था. बाप किसी और के खेत में काम करता था और छुट्टियों में मुनाफ़ पटेल घर के ही पास मार्बल फैक्ट्री में टाइल्स की क्वालिटी चेक करके उन्हें पैक करता था. दिन के 35 रुपये हाथ में लेकर रोज़ शाम घर वापस पहुंचता था. उन दिनों को याद करते हुए मुनाफ़ कहते हैं, “दुख ही दुख था लेकिन झेलने की आदत हो गयी थी. किसी को सुनाऊं तो लगेगा क्या दिन था लेकिन जब आपको उसकी आदत हो जाये और कोई ऑप्शन न हो तो आप सोचते हो क्या यार, ये तो रोज़ का है. फ़ादर अकेला खेत में काम कर रहा है और हम स्कूल में हैं.”

सालों बाद मुन्ना मुनाफ़ बन चुका था. इंडिया 2007 का वर्ल्ड कप बुरी तरह हार चुकी थी. सचिन और सौरव के रेस्टोरेंट पर पत्थरबाजी हुई थी. धोनी के घर की एक दीवार तोड़ दी गयी थी. ज़हीर के घर पे पत्थर फेंके गए थे. टीम अब भी वेस्टइंडीज़ में ही थी. सचिन तेंदुलकर मुनाफ़ पटेल के रूम में पहुंचते हैं. मुनाफ़ से पूछते हैं कि सभी के घर पे बवाल कट रहा है, उसके घर का क्या सीन है? मुनाफ़ ने कहा, “पाजी, उधर मैं रहता हूं न, वहां आठ हज़ार लोग रहते हैं. और आठ हज़ार मेरी सिक्योरिटी हैं.” सचिन हंस पड़े. उन्होंने कहा, “फिर तो हम सभी को तुम्हारे घर चलना चाहिए.”

वर्ल्ड कप 2011 में पाकिस्तान के खिलाफ़ मुहम्मद हफीज़ का विकेट याद करिए. सोलहवें ओवर की तीसरी गेंद. हफ़ीज़ पैडल स्वीप करने चले जाते Munaf Patelहैं. ये बात उनके पैर देखकर साफ़ पता चल जाती है. मुनाफ़ स्लोवर गेंद फेंक देते हैं. 126 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार. फुल लेंथ, आउटसाइड ऑफ स्टम्प. हफ़ीज़ के पास संभलने का टाइम ही नहीं था. तीर कमान छोड़ चुका था. गेंद बल्ले का किनारा लेते हुए वहां पहुँचती है जहां कोई चूक होने की संभावना ही नहीं. धोनी के ग्लव्स में. पाकिस्तान का दूसरा विकेट गिर चुका है. मुनाफ़ दौड़ते हुए हफीज़ की ओर मुट्टी भींचते हुए जोर से चिल्लाते हैं. पवेलियन में यूनिस खान आने की तैयारी करने लगते हैं.

इसी मैच का सैंतीसवां ओवर. दूसरी गेंद. रन अप पर धीमे से आते हुए मुनाफ़ गुड लेंथ पर गेंद को अंगुलियों में फंसाकर लेग-कटर फेंक देते हैं. इस बार गेंद की स्पीड 116 किलोमीटर प्रति घंटा. अब्दुल रज्ज़ाक गेंद को जहां खेलने जाते हैं गेंद उससे कोसों दूर विकेट में घुस जाती है. ऑफ स्टम्प बाहर. मात्र 150 रन पर छठा पाकिस्तानी विकेट. सुरेश रैना दौड़कर आते हैं और मुन्ना को उठा लेते हैं. सहवाग दूर से ही इन दोनों पर छलांग मार देते हैं. इंडिया लगभग जीत चुका है. वर्ल्ड कप से सिर्फ एक कदम दूर. 2 दिन बाद जिसे हम जीत जाते हैं.

अमूमन तेज़ गेंद फेंकने वाले दौड़ते हुए आते हैं. बहुत तेज़. विकेट से ठीक पहले छलांग मारते हैं और गेंद फेंक देते हैं. मुनाफ़ इसके ठीक उलट थे.


आराम से अपनी मदमस्ती में टहलते हुए रनअप लिया, विकेट पे आते ही हल्का सा एक तरफ़ निकले, बायें हाथ का पंजा खोले हुए उससे दो तिहाई गोला बनाया, और गेंद फेंक दी. विकेट टु विकेट. ज़्यादातर गेंदे खुद ही फ़ील्ड भी कर लेते थे. बैट्समैन मारे भी तो तब न जब उसे मारने को रूम मिले.


वर्ल्ड कप में मुनाफ़ की एंट्री भी इत्तेफ़ाक थी. प्रवीण कुमार इंजर्ड हो गए. ठीक वर्ल्ड कप से पहले. प्रवीण का कॉम्बिनेशन नेहरा के साथ जमता था. वर्ल्ड कप के पहले दोनों ने साथ गेंदें भी फेंकी थीं जिससे आपसी समझ भी बन चुकी थी. इसलिए प्रवीण इंडिया के वर्ल्ड कप प्लान का हिस्सा थे. लेकिन यहां उन्हें चोट लगने के कारण मुनाफ़ पटेल को बुलाया गया.

मुनाफ़ ने आते ही इंडियन बॉलिंग को एक मजबूती दी. वो खुद को समझते थे. उन्हें अपनी कमजोरियां और ताकत मालूम थीं. स्पीड नहीं होने के बावजूद अगले को कैसे छकाना है, ये अच्छी तरह से जानते थे. बल का सप्लीमेंट दिमाग होता है, ऐसा उन्हें मालूम ही था. वर्ल्ड कप में युवराज और ज़हीर खान के बाद उनके ही सबसे ज़्यादा विकेट थे. 11.

पिच पे स्टम्प पर गेंद फेंकनी हो या इंडियन स्लो ट्रैक पे उछाल पानी हो, मुनाफ़ समझते थे कि कैसे क्या करना है. बिना रूम दिए बाउंस करती हुए गेंद फेंकने में तो अच्छे-अच्छे चक्कर खा जाते थे.


पूरे वर्ल्ड कप में मुनाफ़ की इकॉनमी थी 4.96. यानी हर ओवर में वो 5 रन से भी कम दे रहे थे.


मुनाफ़ पटेल उर्फ़ मुन्ना ही वो वजह हैं जिसके कारण ज़हीर खान को फ्री होकर गेंद फेंकने को मिल रही थी. उन्हें रन लुटवाने की परवाह किये बिना विकेट लेने पर फोकस करने को मिल रहा था. अक्सर गेंदबाज पर विकेट लेने के साथ ही रन रोकने का प्रेशर होता है लेकिन एक और से जब मुन्ना गेंद फेंक रहा हो और रन रुके हुए हों, तो आप थोड़ी लिबर्टी ले सकते हैं. वर्ल्ड कप 2011 में अगर इंडिया ऐसा कर पा रही थी तो वजह थे मुनाफ़ पटेल.

युवराज सिंह ने भले ही इंडिया के लिए सबसे ज़्यादा विकेट लिए हों लेकिन वो तब भी पार्ट टाइम बॉलर ही थे. और ऐसे में पार्ट टाइमर्स को उनकी फ्रीडम देने वाले भी मुनाफ़ पटेल थे. उनके खाली जाते ओवर अगली टीम के लिए परेशानी का सबब बने होते थे. ऐसे में किसी नए बॉलर को देख उसके ओवर में ज़्यादा से ज़्यादा रन बनाने के चक्कर में बैट्समेन से गलती होना लाज़मी था. इन्हीं गलतियों का फ़ायदा युवराज, ज़हीर ने बखूबी उठाया.

साल 2014 में आईपीएल दुबई में हुआ. वानखेड़े स्टेडियम में खड़ा मुनाफ़ पटेल अपने बड़ौदा के प्लेयर्स को चिल्लाते हुए इंस्ट्रक्शन दे रहा था. उसके सभी साथी खिलाड़ी दुबई आईपीएल खेलने जा चुके थे. इस साल मुन्ना को आईपीएल की किसी भी टीम ने नहीं खरीदा था. पिछले साल उसकी टीम ने ट्रॉफी जीती थी. मुनाफ़ निराश था, आईपीएल में न खेलने से. लेकिन खुश था कि अपने स्टेट की टीम को सैयद मुश्ताक़ अली ट्रॉफी में उत्तर प्रदेश से फाइनल में जिताने जा रहा था.

मुनाफ़ ने एक बंगला बनवाया था अपने लिए. किसी से कहा भी था कि ये घर मेरे बाप का सपना था और मैंने सिर्फ उसे पूरा किया है. मुनाफ़ ने कई प्लेयर्स के उलट इस बात को समझ लिया है कि वो शायद अब कभी भी इंडिया की उस नीली जर्सी पहनकर मैदान में नहीं उतर पायेगा लेकिन उसे उसका क्रिकेट खेलने से आज भी कोई रोक नहीं सकता. बड़ौदा टीम में मुनाफ़ का नाम शामिल है.


एक बार उससे किसी रिपोर्टर ने पूछा था कि क्यूं वो रणजी खेलने से ज़्यादा आईपीएल खेलने को तैयार रहते हैं तो उसने जवाब दिया था, “जिन लोगों को टीवी पर बोलने के पैसे मिलते हैं, उन्हें बोलने से पहले सब कुछ समझ बूझ लेना चाहिए. ऐसे एक-दो लोग होते हैं लेकिन हर कोई ऐसा नहीं होता. मेरे जैसे लोग क्रिकेट खेलने के सिवा और क्या जानते हैं? मैं अगर क्रिकेट नहीं खेलूंगा तो और क्या करूंगा? मैं जब तक फिट रहूंगा, क्रिकेट खेलता रहूंगा.”


वीडियो देखें: वर्ल्ड कप 2019: स्विंग से निपटेगी तभी फाइनल में पहुंचेगी टीम इंडिया

 

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munaf patel the unsung hero of indian world cup victory in 2011

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