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एक-एक को क्यों गालियां देते हो, ग्लोब पर ही बुर्का डाल दो न

एक बार फिर से इस्लाम ख़तरे में है. एक बार फिर मज़हब मरने की कगार पर पहुंच गया है. एक बार फिर ज़हनियत का कचरा कूड़ेदान से उबल-उबल कर बाहर गिर रहा है. एक बार फिर दीन की दुकान का बदसूरत इश्तेहार मार्केट में है. हज़ारों हज़ार बार की तरह, एक बार फिर किसी औरत के लिबास ने मुल्लाशाही की चूलें हिला दी हैं.

क्रिकेटर मुहम्मद शमी ने अपनी पत्नी के साथ एक तस्वीर क्या शेयर की, मज़हब के रखवालों का हुजूम टूट पड़ा है उनपर. चुन-चुन के इस्लाम सिखाया जा रहा है. उनकी फेसबुक पोस्ट पर लोगों ने इतने ऊट-पटांग कमेन्ट किए हैं कि शर्म भी मुंह छिपाकर पड़ी होगी कहीं.

कुछ एक कमेंट्स मुलाहिज़ा फरमालें, फिर बात करेंगे.

‘तुम मुस्लिम हो और अच्छी तरह जानते हो कि औरत को कैसे रखा जाता है, ये शोभा नहीं देता’
‘शर्म करो आप एक मुस्लिम हो, बीवी को परदे में रखो. कुछ सीख लो अमला से’
‘शर्म आनी चाहिए शमी, मरना है एक दिन ये मत भूलो. बीवियों को कैसे रखा जाए अपने साथी क्रिकेटर पठान से सीखो’
‘तुम्हारी वजह से सारा इस्लाम बदनाम हो रहा है’
‘क्या आपको अल्लाह और रसूल का डर नहीं है?’
‘शमी भाई, बीवी को परदे में रखो, अभी तो ये खुली चॉकलेट के जैसी है’
‘आर यू ट्रू मुस्लिम? शेम ऑन यू’
‘तुम्हारा तो बस नाम मुस्लिम है, काम तो गैरों वाले है’

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और पता नहीं क्या क्या! सारे तो लिखे भी नहीं जा सकते किसी पब्लिक प्लेटफार्म पर. एक आदमी ने तो ये तक दावा किया कि मॉडल रह चुकी शमी की पत्नी हसीन जहां का आधे कोलकाता से अवैध संबंध रहा है.

 

भाई हो कौन तुम लोग? एलियन हो? मंगल ग्रह से आए हो? देश, समाज, दुनिया से बिल्कुल कटे हुए हो? हदीसों के हवाले से ही हांकोगे दुनिया को? आपको पता भी है आप अपने ही मज़हब का मज़ाक बना रहे हो? किसको क्या पहनना है ये जब उसकी व्यक्तिगत चॉइस है, तो आप क्यों हर औरत के पीछे बुर्का/हिजाब ले कर दौड़ लगाते हो? पूरी दुनिया को ही काला-लबादा ओढ़ा दो भाई! ढंक दो ग्लोब को. अल्लाह अल्लाह खैर सल्ला.

सुन्नती लाइफस्टाइल का शोर मचाने वाले तमाम मज़हबी लड़ाके अपनी सहूलियत के लिए तो हदीसों को बायपास करने से नहीं चूकते. यहूदियों को एक सांस में छत्तीस गालियां देते हुए उन्हीं का बनाया फेसबुक मज़े से चलाते हैं. लेकिन जब ‘मसला-ए-लिबास-ए-औरत’ आ जाता है, इंची टेप कान पर धरे कूद पड़ते हैं. क्या पहनना है, क्या सुनना है, औरत को कैसे रखना है इन सब कामों की ‘आदर्श आचार संहिता’ है इन लोगों के पास. नबियों के, पैगम्बरों के हवालों से साबित कर के दम लेते हैं कि औरत है ही जहन्नुम की मुस्तहक़. सारी बदबख्तियां जनाना कौम की देन है. ये नहीं समझते कि इस क्रम में उनका खुद का मज़हब जी भर के ज़लील हो रहा है.

शमी की फेसबुक पोस्ट को लोगों ने ख़ूब शेयर किया. ये कहते हुए कि कमेंट्स पढ़िए. ना सिर्फ मज़ाक उड़ाया जा रहा है बल्कि जम के मजम्मत भी हो रही है. ‘टायर पंक्चर लगाने वालों की मानसिकता’ जैसे जुमले उछल रहे हैं मुसलमानों के लिए. अव्वल तो वैसे ही इस्लाम की छवि दागदार है, ऊपर से ये मूढ़ता का जाहिर प्रदर्शन मुसलमानों को और ही काट के रख देगा समाज की मुख्यधारा से.

अक्सर सोशल मीडिया में ट्रोल्स की महिमा का बखान हुआ करता है. वो लोग जो संगठित होकर किसी पे हमला करते हैं. कहा जाता है कि शुद्ध राजनितिक फायदों के लिए ट्रोल्स को ऑनलाइन सेना की तरह इस्तेमाल किया जाता है. सत्ता-पक्ष की ऐसी ही सेनाओं का ज़िक्र अक्सर सोशल मीडिया के गलियारों में सुनाई पड़ता है.

उन्हें तो चलो कोई पॉलिटिकल बैकिंग होगी लेकिन इन्हें कौन संचालित करता है? ये तो सोच का इश्तेहार है. व्यक्तिगत सोच का. ये उतना ही या शायद उससे ज़्यादा ख़तरनाक है. वो राजनितिक मकसद से किया हुआ संगठित हमला है. ये आपका वो विश्वास है जो ना सिर्फ आधी आबादी के प्रति क्रूर है बल्कि मज़हब के लिए भी शर्म का बायस बन रहा है. इस रैंडम ट्रोलिंग का मतलब तो यही हुआ कि मुसलमानों में एक बड़ा, नहीं, नहीं…  बहुत बड़ा वर्ग अब भी औरत/पहनावा/खान-पान इसी सब में उलझा हुआ है.

ऐसी हरकतों से तमाम मुस्लिम कौम का चेहरा दागदार होता है. गधे-घोड़े एक ही लाठी से हांक लिए जाते हैं. कुछ लोगों की ट्रोलिंग मज़हब की तमाम बुनियादी शिक्षाओं पर सवालिया निशान बनकर रह जाती है. मेरी क्रिसमस बोलने से, दिवाली की शुभकामनाएं देने से, जिस धर्म की नींव दरकती हो तो उसके अनुयायियों को फिर धर्मनिरपेक्षता का आग्रह करने का क्या हक़ बचा? इस देश का सेक्युलर फैब्रिक वैसे ही नाजुक हुआ जा रहा है. उसे बचाए रखने की ज़िम्मेदारी सबकी, आई रिपीट सबकी है.

उम्मीद है मुहम्मद शमी इस झुंडनुमा हमले से विचलित नहीं होंगे और भारत के लिए अपना शानदार खेल दिखाते रहेंगे.


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