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'मुग़लों के बारे में वो झूठ, जिसे बार-बार दोहराकर आपको रटाया जा रहा है'

अंग्रेज़ों के साथ लंबे स्वतंत्रता संघर्ष के बाद साल 1947 में इंडिया को आज़ादी मिली. इतने लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा शायद इसीलिए हम में ऐतिहासिक ज्ञान की कमी है. और हम पर जितने लोगों ने शासन किया सब को हम कॉलोनिस्ट समझते हैं. ‘कॉलोनिस्ट’, यानी वो जो दूसरी जगह जाकर अपनी ‘कॉलोनी’ बसाते हैं. ये जगह उनके देश से बहुत दूर होती है.

प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया भारतीय इतिहासकार हैं. वो ‘कॉलोनाइज़ेशन’ को कुछ यूं बताते हैं- ‘किसी जगह और उस जगह पर रहने वाले लोगों पर शासन करना. शासन ऐसे लोगों का जो उस जगह से बहुत दूर रहते हैं और उनका ऐसी जगह आकर कालॉनियां बसाने का मूल मकसद आर्थिक फ़ायदा पाना होता है.’

मुखिया कहते हैं कि यह आम ग़लतफ़हमी है कि अयोध्या की बाबरी मस्जिद बाबर ने बनवाई थी. उनके मुताबिक़, बाबरी मस्जिद का ज़िक्र उसके ज़िंदा रहने तक या उसके मरने के कई सौ साल तक नहीं मिलता.
हरबंस मुखिया कहते हैं कि यह आम ग़लतफ़हमी है कि अयोध्या की बाबरी मस्जिद बाबर ने बनवाई थी. उनके मुताबिक़, बाबरी मस्जिद का ज़िक्र उसके ज़िंदा रहने तक या उसके मरने के कई सौ साल तक नहीं मिलता.

ब्रिटिशर्स इंडिया में कॉलोनिस्ट बनकर रहे. उनका मूल मकसद हमेशा यही रहा कि उनका खुद का आर्थिक फ़ायदा होता रहे. इसके उलट, मुग़ल आए तो इंडिया में शासकों की तरह थे लेकिन यहां वो कॉलोनिस्ट की बजाए खुद इंडियन बनकर रहे. प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया बताते हैं, ‘मुग़लों ने इंडिया के साथ अपनी पहचान कुछ इस तरह मिला दी कि वो इंडिया का एक अभिन्न हिस्सा बन गए.’

मुखिया तो ये भी कहते हैं कि मुग़लों का विदेशी होने का मुद्दा हाल ही में उठना शुरू हुआ है. मुग़ल तो बहुत अच्छी तरह से इंडिया में घुले-मिले हुए थे. वो इंडिया को अपना देश ही मानते थे.

उन्हें विदेशी मानने का कोई कारण भी नहीं था, आखिर अकबर के बाद से सारे इंडिया में ही पैदा हुए थे. यहां तक कि उनमें से बहुतों की माएं राजपूत थीं. और ये उनकी ‘भारतीयता’ को पूरा करता है.

लोदी वंश के अंतिम शासक थे इब्राहिम लोदी. इनके शासनकाल के दौरान दौलत खान लोदी लाहौर के गवर्नर थे. दौलत खान इब्राहिम के काम से नाख़ुश थे, जिसके चलते उन्होंने बाबर से कहकर राज्य पर आक्रमण करवाया. साल 1526 में पानीपत के युद्ध में बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली सल्तनत जीती थी. इस तरह मुग़ल शासन की नींव रखी गई.

taj mahal
ताजमहल के औसतन हर साल 21 करोड़ रुपए के टिकट बिकते हैं.

ज़्यादातर मुग़लों ने भारतीय शासकों, खासकर राजपूतों  से शादी करके समझौते किए. इनकी सेना में राजपूत ऊंची पोस्ट पर रहते थे. अक्सर कच्छवाहा राजपूतों को मुग़ल सेना में सबसे ऊंची पदवी दी जाती थी.

साल 1857 में पहली बार भारतीय सैनिक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ खड़े हुए थे, वो भारतीय स्वतंत्रता की पहली लड़ाई थी. ये लड़ाई सैनिकों ने अपने बूढ़े और कमज़ोर मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फ़र को हिंदुस्तान का राजा मानकर उनके बैनर तले लड़ी थी.

16वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक, मुग़ल साम्राज्य दुनिया का सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था. 17वीं शताब्दी में भारत आए फ्रांसीसी यात्री फ्रेंकोइस बर्नियर ने लिखा है, ‘हिंदुस्तान में दुनिया के हर चौथाई हिस्से से सोना-चांदी आता है.’

Francois Bernier
फ्रांसीसी यात्री फ्रेंकोइस बर्नियर, मुग़ल शासन के समय इंडिया घूमने आए थे.

शेरशाह और मुग़लों ने कई सड़कों, नदी परिवहन, समुद्री मार्गों और बंदरगाहों का विकास किया था. साथ ही देश के अंदर के कई टोल-टैक्स खत्म कर व्यापार को बढ़ावा दिया था. इनके राज में इंडियन हैंडीक्राफ्ट्स को काफ़ी तवज्जो दी गई. सूती कपड़े, मसाले, नील, ऊनी और रेशम के कपड़े और नमक जैसी चीज़ों का काफ़ी सफल निर्यात होता था.

भारतीय व्यापारी अपनी शर्तों पर व्यापार किया करते थे. साथ ही पेमेंट में सिर्फ़ सोने-चांदी की ईंटें लेते थे. थॉमस रो एक अंग्रेज़ी राजनीतिज्ञ थे. मुग़लों के राज में ये अंग्रज़ों को रिप्रज़ेंट करते थे. साल 1615 से लेकर साल 1618 तक मुग़ल शासक जहांगीर के आगरा के दरबार में एंबेसेडर थे. उनका कहना था कि यूरोप ने एशिया को समृद्ध बनाने के लिए अपना खून बहाया है (Europe bleedeth to enrich Asia).

इंडिया में परंपरागत रूप से व्यापार हिंदू व्यापारी वर्ग के हाथों में था. यहां तक कि फ्रांसीसी यात्री फ्रेंकोइस बर्नियर ने लिखा है, ‘इंडिया में व्यापार ज़हां हिंदू संभालते थे, वहीं देश की सेना में ऊंचे पोस्ट पर मुसलमान बैठे थे.’

अकबर ने एक बहुत कुशल प्रशासन बनाया हुआ था, जो व्यापार को बढ़ाने में उसकी खूब मदद करता था. ये व्यापार ही तो था जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी को इतना इंटरेस्ट था. पहले इन्होंने व्यापारिक रियायतें देने के नाम पर हस्तक्षेप किया और फिर मुग़ल शासन पर कब्ज़ा कर उसे नष्ट कर दिया.

The East Offering Her Riches to Britannia
इस पेंटिंग का नाम है The East Offering Her Riches to Britannia. Photo credit: British Library

ब्रिटिश लाइब्रेरी में पेंटर स्पीरिडियोन रोमा की एक बहुत इंटरेस्टिंग पेंटिंग रखी है. इसका नाम है The East Offering Her Riches to Britannia. ये साल 1778 के पेंटिंग है. ब्रिटानिया शब्द को यूनाइटेड किंगडम की फ़ीमेल अवतार के लिए इस्तेमाल किया जाता है. जैसे हम ‘भारत माता’ करते हैं.

इस पेंटिंग में इंडिया को भी फ़ीमेल अवतार में दिखाया है. इंडिया घुटनों पर बैठकर अपना ताज और उसके साथ कुछ हीरे-जवाहरात ब्रिटानिया को ऑफ़र कर रही है. असल में इंडिया की दौलत दिल्ली सल्तनत या मुग़लों ने नहीं लूटी थी बल्कि इसे लूटना तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने शुरू किया था.

एडमंड बर्क आयरलैंड में जन्मे एक आयरिश राजनेता थे, साथ ही एक लेखक, वक्ता और फ़िलॉसफ़र भी. बाद में वो लंदन चले गए थे और वहां कई सालों तक हाउस ऑफ कॉमन्स में संसद के सदस्य के रूप में सेवा की. वो 1780 के दशक में ऐसा कहने वाले पहले शख्स थे, ‘इंडिया जड़ से पूरी तरह बर्बाद हो चुका है. ऐसा ईस्ट इंडिया कंपनी के कारण हुआ जो इस देश की दौलत बहाए जा रही है.’

Edmund Burke
एडमंड बर्क

चलिए देखते हैं ब्रिटिश कॉलोनी बनने से पहले इंडिया की आर्थिक स्थिती कैसी थी.

कैम्ब्रिज के इतिहासकार एंगस मैडिसन ने अपनी किताब Contours of the World Economy 1–2030 AD: Essays in Macro-economic History में लिखा है कि साल 1000 से 1500 के बीच इंडिया की आर्थिक स्थिती सबसे मज़बूत थी. तब इंडिया पर मुग़ल शासन कर रहे थे. 18वीं शताब्दी तक इंडिया चीन को पछाड़ते हुए दुनिया में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका था.

2016 में इंडिया की GDP 7.2% थी. वहीं 1952 में इंडिया की GDP 3.8% की.

जब ये बात समझ में आ चुकी है कि मुग़लों ने हमारी दौलत नहीं लूटी थी, तो अब बात करते हैं उन बड़े-बड़े स्मारकों की जो इन्होंने बनाए. इन स्मारकों की वजह से हमें हर साल करोड़ों रुपए मिलते हैं.

लोकसभा में कल्चरल मिनिस्ट्री ने जो आंकड़े दिखाए थे, उसके मुताबिक ताजमहल के औसतन हर साल 21 करोड़ रुपए के टिकट बिकते हैं. (साल 2016 में ताजमहल के दर्शकों में गिरावट आई और आंकड़े 17.8 करोड़ रुपये पहुंच गए थे.) ऐसे ही कुतुब मिनार से 10 करोड़ रुपए और लाल किला और हुमायूं के मकबरे से लगभग 6 करोड़ रुपये मिलते हैं.

बेहतर है कि हम इतिहास को किताबों में पढ़ें, जहां हमेशा सही फैक्ट्स मिलते हैं. न की वॉट्सएप के मैसेजस में जहां अक्सर गलत जानकारियां घूम रही होती हैं.


rana safviये आर्टिकल राना सफवी ने डेली ओ के लिए लिखा था. इसे रुचिका ने दी लल्लनटॉप के लिए ट्रांसलेट किया है. सफवी एक इतिहासकार हैं. साथ ही एक ब्लॉगर और लेखिका भी. आर्टिकल में लिखे हुए विचार लेखिका के निजी विचार हैं और दी लल्लनटॉप का इससे सहमत या असहमत हो सकता है. 

 


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