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ईरान न्यूक्लियर डील को रोकने के लिए मोसाद ने जो कारनामा किया उसकी दूसरी मिसाल नहीं

Truth is Stranger than fiction.

इस लाइन को अंग्रेज़ी की एक कहावत के तौर पर देखा जाता है. इसका अर्थ है. सत्य कल्पना से भी ज़्यादा रहस्यमयी होता है, लेकिन असल में ये अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन का कथन है जो अधूरा है. पूरा कथन इस प्रकार है,

“Truth is stranger than fiction, but it is because Fiction is obliged to stick to possibilities; Truth isn’t.”

यानी

‘सत्य कल्पना से भी ज़्यादा रहस्यमयी होता है. ऐसा इसलिए कि कल्पना को संभावनाओं के दायरे में रहना होता है, लेकिन सत्य के लिए ऐसी कोई बंदिश नहीं है.’

दुनियादारी में जिस खबर पर बात होने जा रही है उसकी कहानी कुछ ऐसी है कि ट्रूथ और फ़िक्शन की सीमा को चैलेंज करती है. इस कहानी से तीन देशों के तार जुड़े हैं. अमेरिका, इज़रायल और ईरान. क्या है ट्रूथ और क्या है फ़िक्शन. आज इसी पर बात करेंगे.

अमेरिका, दुनिया का सुपरपावर देश है. फ़िक्शन से तुलना करें तो कुछ-कुछ सुपरमैन जैसा. दूसरे देशों के मामलों में हस्तक्षेप करके आज़ादी और जस्टिस जैसे आदर्शों की बात करने वाला. सुपरमैन की ख़ासियत ये है कि वो सब कुछ दिन के उजाले में करता है. बिना कुछ भी छिपाए, छाती चौड़ी करके.

पिछले साल 3 जनवरी, 2020 को अमेरिका ने ईरान की एक बड़ी शख़्सियत, कुद्स फोर्स के चीफ, मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की एक ड्रोन हमले में हत्या कर दी. और इसकी ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए ट्रम्प ने सुपरमैन की तरह ही खुलेआम कहा,

हमें परवाह नहीं, ईरान इसका क्या बदला लेगा.

ईरान की स्थिति उस समय आगे कुआं, पीछे खाई वाली थी. कारण कि उसी साल यानी 2020 में अमेरिका में चुनाव भी होने वाले थे. जिसमें ट्रंप के हारने की पूरी संभावना थी. बाइडन के जीतने की स्थिति में ईरान को फ़ायदा होता. और वो 2015 में हुई न्यूक्लियर डील में दोबारा एंटर हो जाता. साथ ही उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध भी हट जाते. ऐसे में सुलेमानी की हत्या पर अगर वो कोई बड़ा कदम उठाता, तो डील के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद भी हो सकते थे. इसलिए ईरान ने दावे तो बड़े-बड़े किए. लेकिन कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की.

Box Holyfield Belfort Trump Politics
अमेरिका ने ईरान के कुद्स फोर्स के चीफ, मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की एक ड्रोन हमले में हत्या कर दी थी और इसकी जिम्मेदारी भी ली थी.

खेल में इज़रायल की एंट्री

अब इस खेल में एंट्री होती है इज़रायल यानी बैट्मेन की. जो सुपरमैन के विपरीत छुपकर काम करता है, और नई-नई तकनीकों वाले gadgets का भी उपयोग करता है. इज़रायल भी ऐसा ही देश है जो अपने ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद और उच्च तकनीक वाले नवीनतम हथियारों के लिए जाना जाता है. अमेरिका के मुक़ाबले इज़रायल ईरान के दसियों मिलिटरी पर्सनल को मार चुका है. लेकिन ना कभी उसने इसकी ज़िम्मेदारी ली और ना ही कभी अपने ऑपरेशन्स की भनक लगने दी. चुपचाप, ख़ुफ़िया तरीक़े से काम करने वाला, बिल्कुल बैट्मन के माफ़िक़.

ईरान में 2010 से लेकर अब तक इज़रायल ना जाने कितने ही खुफ़िया ऑपरेशंस को अंजाम दे चुका है. मसलन 2010 में पार्टिकल फ़िजिक्स के ईरानी एक्सपर्ट मसूद अली मुहम्मदी और माजिद शहरियार की हत्या. उसके बाद 2011 में साइंटिस्ट दरियॉश रेज़ाइनेजाद की हत्या कर दी गई. और 2012 में ईरान के नतांज़ यूरेनियम एनरिचमेंट प्रतिष्ठान के डेप्युटी हेड मुस्तफ़ा अहमदी रोशन को भी मार डाला गया. इनके अलावा और भी कई साइंटिस्ट्स मारे गए. कइयों को अगवा भी कर लिया गया.

 इज़रायल की ईरान से इस ख़ास मुहब्बत की वजह

वैसे तो इज़रायल चारों तरफ़ दुश्मनों से घिरा हुआ है. लेकिन सवाल ये है कि इज़रायल की ईरान से इस ख़ास मुहब्बत की वजह क्या है?

यहां हम फिर से बैट्मन का ज़िक्र करेंगें. 2007 में ‘द डार्क नाइट’ फ़िल्म बनाकर तहलका मचा देने वाले मास्टर डायरेक्टर क्रिस्टफ़र नोलन एक नई फ़िल्म पर काम कर रहे हैं. जिसका सब्जेक्ट है ‘परमाणु बम का अविष्कार’. परमाणु बम के जनक थे वैज्ञानिक रॉबर्ट ऑपनहाइमर. परमाणु विस्फोट के बाद गीता का श्लोक कहने वाले ऑपनहाइमर तभी समझ गए थे, कि उनका ये आविष्कार भविष्य में बहुत सारे कॉन्फ़्लिक्ट्स की वजह बनेगा.

ऐसा हुआ भी. द्वितीय विश्व युद्ध के बात जितने भी कॉन्फ़्लिक्ट हुए हैं. उनमें से अधिकतर की वजह न्यूक्लियर पावर ही है. चाहे फिर वो भारत-पाकिस्तान हों, उत्तर और दक्षिण कोरिया हों या रूस और अमेरिका. ईरान और इज़रायल के बीच कॉन्फ़्लिक्ट की बड़ी वजह भी परमाणु शक्ति ही है. ईरान इस फ़िराक में है कि अगर वो परमाणु शक्ति हासिल कर ले, तो मिडिल ईस्ट में सबसे बड़ा खिलाड़ी बन जाएगा. इसके बाद उसे अमेरिका से बार-बार मिलने वाली धमकियों से भी छुटकारा मिल जाएगा.

Israel Iran Attack Nuclear Conflict
Israel Iran Attack Nuclear Conflict

उधर इज़रायल की हालत ‘दूध का जला’ वाली है. उसका अस्तित्व ही यहूदी पहचान पर टिका है. और WW2 के दौरान यहूदी नरसंहार के बाद उनका एक ही उद्देश्य है,

Never Forget, Never Again.

इज़रायल की यहूदी पहचान उसे अरब देशों का दुश्मन बनाती है और ऐसे में वो आसपास होने वाली किसी भी गतिविधि पर पैनी नज़र बनाए रखता है. उसे लगता है कि ईरान के पास अगर परमाणु हथियार आ गए तो उसके अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो जाएगा. मिडल ईस्ट और इज़रायल के बीच संघर्ष के लम्बे इतिहास और धर्म के ऐंगल के कारण उसका डर वाजिब भी है.

इस विषयांतर के बाद वापस क़िस्से पर चलते हैं.

सुलेमानी की मौत में इज़रायल को अपने लिए मौक़ा दिखा

जनरल क़ासिम सुलेमानी की मौत में इज़रायल को अपने लिए मौक़ा दिखा. दरअसल वो 2015 में हुई ईरान-अमेरिका न्यूक्लियर डील के सख़्त ख़िलाफ़ था. 2016 में राष्ट्रपति चुने जाने के बाद ट्रम्प ने इस डील से हाथ वापस खींच लिए. इज़रायल को डर था कि अगर बाइडन राष्ट्रपति चुन लिए गए तो न्यूक्लियर डील दोबारा लागू ना हो जाए. इसलिए अमेरिका में प्रशासन के बदलने से पहले ही वो कुछ सख़्त कदम उठा लेना चाहता था, ताकि ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम पटरी से उतर जाए.

सुलेमानी की हत्या पर ईरान की ढीली प्रतिक्रिया ने इज़रायल के इरादों को और मज़बूती दी. अक्टूबर 2020 में उसने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर सर्जिकल स्ट्राइक करने की ठानी. उसका निशाना था- डॉक्टर मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह. जो तेहरान की ‘इमाम हुसैन यूनिवर्सिटी’ में प्रोफ़ेसर थे. ईरान की पब्लिक के लिए उनकी इतनी ही पहचान थी. यहां तक कि उनके परिवार वालों को भी इसकी खबर नहीं थी कि वो ईरान के न्यूक्लियर प्रॉजेक्ट ‘अमाद’ के चीफ़ scientist थे. इसी कारण लम्बे समय से वो इज़रायल की ख़ुफ़िया एज़ंसी मोसाद के निशाने पर थे.

Qasem Sulemani 1
सुलेमानी की हत्या पर ईरान की ढीली प्रतिक्रिया ने इज़रायल के इरादों को और मज़बूती दी.

28 नवंबर 2020 को खबर आई कि फ़ख़रीज़ादेह की हत्या कर दी गई है. जिसके लिए ईरान ने इज़रायल को ज़िम्मेदार ठहराया.ऑफिशियल रिपोर्ट्स के अनुसार जब फ़ख़रीज़ादेह अपनी पत्नी के साथ तेहरान से अबसार्ड शहर की ओर जा रहे थे, तो रास्ते में मोटरसाइकल सवार कुछ लोगों ने उनके क़ाफ़िले पर हमला किया. जिसमें उनकी मौत हो गई.

Iran Nuclear Scientist Attack Furenal
फ़ख़रीज़ादेह की हत्या मोटरसाइकल सवार हत्यारों ने नहीं की थी.

कुछ न्यूज़ एजेंसियों के अनुसार इस हमले में एक रोबोट का इस्तेमाल भी किया गया था. जिसे रिमोट कंट्रोल से ऑपरेट किया जा रहा था. उस वक्त ईरान ने इस बात को नकार दिया. एक कारण ये भी था कि उसकी इलीट सिक्योरिटी फ़ोर्स फ़ख़रीज़ादेह की सुरक्षा में तैनात थी. और रोबोट की बात उनकी साख पर धब्बा लगा सकती थी. लेकिन अब इस हमले की पूरी जानकारी सामने आई है. 18 सितंबर को न्यू यॉर्क टाइम्ज़ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार फ़ख़रीज़ादेह की हत्या मोटरसाइकल सवार हत्यारों ने नहीं की थी.

असल में क्या हुआ था उस दिन?

जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि घटना के दिन फ़ख़रीज़ादेह अपनी पत्नी के साथ अबसार्ड शहर की ओर जा रहे थे. सुलेमानी की हत्या के बाद उनकी सुरक्षा और कड़ी कर दी गई थी. उनके लिए एक बुलेटप्रूफ़ गाड़ी का इंतज़ाम भी किया गया था. 2007 से ही वो मोसाद के निशाने पर थे. जिसकी चेतावनी उन्हें सुरक्षा एजंसियों से मिलती रहती थी. ख़तरे के बावजूद फ़ख़रीज़ादेह ने बुलेटप्रूफ़ गाड़ी के बजाय खुद की गाड़ी से यात्रा करने का फ़ैसला किया.

गाड़ी खुद फ़ख़रीज़ादेह चला रहे थे और उनकी पत्नी गाड़ी की पिछली सीट पर बैठी हुई थी. उनकी कार के आगे और पीछे सिक्यॉरिटी का काफ़िला था. अबसार्ड शहर की ओर जाने के लिए मेन हाइवे से एक अलग रोड कटती थी. मोसाद ने इसी जगह पर हमले का इंतज़ाम कर रखा था. यहां पर रोड में एक स्पीड ब्रेकर लगा था जिसकी वजह से आने-जाने वाली गाड़ियों को स्पीड कम करनी पड़ती थी. रोड की साइड में कंस्ट्रक्शन का सामान रख एक पिक अप ट्रक छुपा दिया गया था. ट्रक में 7.62 mm की स्नाइपर मशीन गन लगी हुई थी जो 600 राउंड प्रति मिनट फ़ायर कर सकती थी.

Iran Nuclear Politics
जैसे ही फ़ख़रीज़ादेह की गाड़ी स्पीड ब्रेकर पर पहुंची पिक-अप ट्रक से एक के बाद एक 6 राउंड फ़ायर हुए. इसमें से 3 गोलियां फ़ख़रीज़ादेह को लगीं और उनकी वहीं पर मौत हो गई.

क़रीब एक बजे मोसाद की टीम को सिग्नल मिला कि फ़ख़रीज़ादेह अपनी पत्नी के साथ निकल चुके हैं. सिग्नल मिलते ही स्नाइपर ने गन को सेट किया और अपनी उंगलियां ट्रिगर पर जमा दी. गाड़ी में फ़ख़रीज़ादेह ही बैठे हैं, ये तय करने के लिए पिक-अप ट्रक जहां खड़ा था, उससे कुछ दूर पहले एक और गाड़ी खड़ी की गई थी. जिसमें हाई रेज़लूशन कैमरे लगे थे. यू टर्न पर गाड़ी रुकी तो कैमरों की मदद से ये पक्का हो गया कि गाड़ी में फ़ख़रीज़ादेह ही हैं.

जैसे ही फ़ख़रीज़ादेह की गाड़ी स्पीड ब्रेकर पर पहुंची पिक-अप ट्रक से एक के बाद एक 6 राउंड फ़ायर हुए. इसमें से 3 गोलियां फ़ख़रीज़ादेह को लगीं और उनकी वहीं पर मौत हो गई. इस पूरे ऑपरेशन में सिर्फ़ एक मिनट का समय लगा. जिसके बाद पिक अप ट्रक को एक्सपलोसिव्स की मदद से उड़ा दिया गया.

जैसे ही गोलियां चलना शुरू हुई, फ़ख़रीज़ादेह के सुरक्षा गार्डों ने पोजिशन ले ली. बाद में उन्होंने पिक-अप ट्रक के पुर्ज़ों को चेक किया तो पता चला ट्रिगर खींचने वाला व्यक्ति वहां नहीं बल्कि 1000 मील दूर से इस ऑपरेशन को अंजाम दे रहा था.

Iran Nuclear Politics
इस ऑपरेशन को पूरी तरह से रिमोटली ऑपरेट किया गया था.

इसका मुख्य कारण था कि फ़ख़रीज़ादेह की सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि ज़मीन पर किसी एजेंट की मदद से इस मिशन को अंजाम देना मुश्किल था. क्योंकि मोसाद का शुरुआत से एक नियम रहा है, अगर किसी ऑपरेशन को अंजाम देने वालों को रेस्क्यू नहीं किया जा सकता तो ऑपरेशन होगा ही नहीं. आपरेटिव को बाहर निकालने का फूल-प्रूफ़ प्लान होना अनिवार्य है.

इस ऑपरेशन को पूरी तरह से रिमोटली ऑपरेट किया गया था. पिक अप ट्रक में एक Belgian-made मशीन गन लगी थी. जिसे रिमोट कंट्रोल से ऑपरेट किया जा रहा था. इससे पहले कभी ऐसे मिशन को अंजाम नहीं दिया गया था. ये सेट-अप इतना उन्नत था कि सभी पुर्ज़ों का वजन मिलकर 1 टन हो गया था. इस कारण अलग-अलग पुर्ज़ों को पहले ईरान में स्मगल किया गया और फिर इन्हें आपस में जोड़ा गया.

इतना ही नहीं इस काम के लिए आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस और फेसियल रिकग्निशन का भी सहारा लिया गया. कारण कि हर शॉट के बाद रिकॉइल की वजह से बंदूक़ हिल जाती थी और अगली गोली का निशाना बदल जाता था. डेटा ट्रांसफर में कुछ सेकेंड का डिले और कैमरा इमेज के स्नाइपर तक पहुंचने में 1.6 सेकेंड का डिले पैदा हो रहा था.

एक हिलते-डुलते टार्गेट पर ऐसे में किसी धाकड़ निशानेबाज़ का निशाना भी चूक सकता था. सेटअप की सटीकता का अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि फ़ख़रीज़ादेह की पत्नी को एक भी गोली नहीं लगी जबकि वो कुछ इंच दूर बैठी हुई थी.

फिर भी ईरान ने कुछ नहीं किया

इस घटना के बाद लगा था कि ईरान के सब्र का बांध टूट जाएगा. लेकिन उसने इसके बावजूद कोई बड़ा कदम नहीं उठाया. इसका बड़ा कारण ये था कि तब तक अमेरिकी चुनाव के नतीजे आ चुके थे. ट्रम्प रुख़सत हो चुके थे और बाइडन ‘प्रेसिडेंट इलेक्ट’ बन गए थे. जैसा कि एक्सपेक्टेड था, बाइडन ने आते ही न्यूक्लियर डील पर दोबारा काम शुरू कर दिया. विएना में यूरोपीयन युनियन की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर डील को लेकर वार्ता शुरू हुई.

साल 2021 में ईरान में भी सत्ता में परिवर्तन आया. वहां के नए राष्ट्रपति ने न्यूक्लियर डील के एवज़ में मांग रखी कि अमेरिका सभी आर्थिक प्रतिबंधों को वापस ले. लेकिन बाइडन इस बात पर अड़े हैं कि ट्रम्प ने जो एक्स्ट्रा प्रतिबंध लगाए थे, केवल उन्हें ही वापस लिया जाएगा. चाइना भी अब इस मामले में एंटर कर चुका है. उसने तेहरान के साथ एक बड़ा व्यापारिक समझौता करते हुए मदद का भरोसा दिलाया है.

इस मामले में लेटेस्ट अपडेट ये है कि ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने रविवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए NY टाइम्ज़ की इस रिपोर्ट को ख़ारिज किया है.

इसके अलावा इसी हफ़्ते UN की वार्षिक मीटिंग में न्यूक्लियर डील को लेकर चर्चा हो सकती है. न्यूक्लियर एनर्जी से जुड़ी एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है- IAEA. पूरा नाम- इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी. इसका काम है, न्यूक्लियर एनर्जी के मिलिटरी इस्तेमाल पर रोक लगाना. उसका कहना है कि डील दोबारा लागू नहीं हुई तो ईरान परमाणु हथियार बनाने में एक कदम और आगे बढ़ जाएगा.


दुनियादारी: इजराइल की खूफिया एजेंसी मोसाद का वो कारनामा जिसे देख दुनिया दंग रह गई!

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