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तालिबान के किस मसले पर भारत, पाकिस्तान और चीन एक हो गए हैं?

अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े को दो महीने से अधिक समय बीत चुका है. इस बीच अफ़ग़ानिस्तान में काफी कुछ बदलाव हुए हैं. मसलन, अनाथालयों में बच्चों को खिलाने के लिए अनाज नहीं है. देश की आधी से अधिक आबादी भुखमरी के कगार पर खड़ी है. बैंक से पैसा निकालने पर लिमिट लगा दी गई है. बाज़ारों में बिजनेस ठप होने वाला है. इतना समझ लीजिए कि समस्याओं की फेहरिस्त लगातार बढ़ती जा रही है.

इन समस्याओं का समाधान तलाशने की कोशिश लगातार जारी है. इसी के मद्देनज़र 20 अक्टूबर को रूस की राजधानी मॉस्को में एक कॉन्फ़्रेंस बुलाई गई थी. इसमें तालिबान के साथ दस और देशों ने हिस्सा लिया. इनमें रूस, ईरान, चीन के अलावा भारत और पाकिस्तान भी थे. इन देशों ने अफ़ग़ानिस्तान को आर्थिक संकट से निकालने और आम जनता को तत्काल मदद देने के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की.

इस बैठक का क्या नतीजा निकला? सभी पक्षों के बीच किन मुद्दों पर सहमति बनी? और, इस बैठक से तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा? सब विस्तार से बताएंगे.

अक्टूबर 2018 में हुआ क्या था?

18 अक्टूबर 2018. जनरल ऑस्टिन स्कॉट मिलर कंधार के गवर्नर से मिलने पहुंचे. एक महीने पहले ही मिलर को अफ़ग़ानिस्तान में यूएस और नाटो सेना का कमांडर बनाया गया था. वो आने वाले चुनाव के लिए सुरक्षा स्थिति का जायजा लेने आए हुए थे. इस मीटिंग में कंधार के गवर्नर के अलावा प्रांत के पुलिस चीफ़ जनरल अब्दुल राज़िक भी शामिल थे. अब्दुल राज़िक को कंधार का सबसे ताक़तवर शख़्स माना जाता था. उन्होंने तालिबान के भीतर खौफ़ पैदा कर रखा था. उनके कार्यकाल में तालिबान की कंधार में घुसने की हिम्मत नहीं होती थी. बतौर बॉर्डर गार्ड अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले राज़िक 31 की उम्र में एक प्रांत के पुलिस चीफ़ बन चुके थे. अपने लोगों के बीच उनकी छवि हीरो की थी. लेकिन तालिबान के लिए वो दुश्मन थे. तालिबान ने कई बार हत्या की कोशिश भी की. लेकिन उसे सफ़लता नहीं मिली थी.

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अफ़ग़ानिस्तान में यूएस और नाटो सेना का कमांडर रहे जनरल ऑस्टिन स्कॉट मिलर

लेकिन, अक्टूबर 2018 में सब बदल गया. उस दिन मीटिंग हॉल के बाहर भारी-भरकम सिक्योरिटी थी. गवर्नर के निजी गार्ड्स में एक राज़ मोहम्मद नाम का शख़्स भी था. वो कुछ महीने पहले ही कंधार आया था. एक दूसरे गार्ड की पैरवी पर उसे भी गवर्नर की सिक्योरिटी टीम में शामिल किया गया था.

मीटिंग खत्म होने के बाद जनरल स्कॉट मिलर और बाकी लोग हैलीपेड की तरफ़ बढ़े. कंधार के गवर्नर ने उनके लिए अनार की पेटियां मंगा रखी थी. कुछ गार्ड्स उन पेटियों को उठाकर आगे-आगे चल रहे थे. एक पेटी राज़ मोहम्मद के हाथ में भी थी. थोड़ी दूर चलने के बाद उसने अपनी पेटी नीचे रख दी. इसके बाद वो पीछे मुड़ा और अपनी एके-47 की नली का ढक्कन खोल दिया. वहां पर ताबड़तोड़ गोलियां चलने लगी. जब तक हालात सामान्य हुए, तब वहां बिखरी तबाही की असलियत पता चली. राज़ मोहम्मद तो मारा ही गया था. लेकिन मरने से पहले उसने अब्दुल राज़िक की भी जान ले ली थी. अफ़ग़ानिस्तान में सबसे सुरक्षित इलाकों में से एक कंधार प्रांत में नाटो सेनाओं का सबसे बड़ा सहयोगी मारा गया था. इस हमले में जनरल मिलर बाल-बाल बच गए थे.

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अब्दुल राज़िक को कंधार का सबसे ताक़तवर शख़्स माना जाता था जिनकी तालिबान ने हत्या कर दी थी.

जांच में पता चला कि राज़ मोहम्मद को पाकिस्तान में ट्रेनिंग मिली थी. हमले के कुछ दिनों बाद तालिबान ने उसकी ट्रेनिंग का वीडियो भी जारी किया. उस समय जनरल मिलर ने कहा था कि तालिबान अजेय है. उसे लड़ाई के मैदान में नहीं हराया जा सकता.

मॉस्को फ़ॉर्मेट क्या है?

इस घटना के कुछ दिनों बाद मॉस्को में एक हाई-लेवल की बैठक हुई. इसमें अफ़ग़ानिस्तान संकट का रास्ता तलाशने पर चर्चा होनी थी. 2017 में पहले चरण की बैठक में छह देश शामिल हुए थे. रूस, भारत, चीन, पाकिस्तान, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान. इस बैठक को नाम दिया गया ‘मॉस्को फ़ॉर्मेट’. दूसरे चरण की बैठक नवंबर 2018 में हुई. उस समय तक ये तय हो चुका था कि लड़ाई के मैदान में तालिबान को हराना नामुमकिन है. अगर अफ़ग़ानिस्तान के संकट को सुलझाना है तो बातचीत करनी होगी.

Russia Afghanistan Conflict Politics
2017 की मॉस्को में हुई मीटिंग.

इसको ध्यान में रखते हुए दूसरे चरण की मीटिंग में तालिबान को भी आमंत्रित किया गया. उस बार अमेरिका ने भी अपना ऑब्ज़र्वर भेजा था. रूस का इरादा अफ़ग़ानिस्तान में अपनी खोई भूमिका को फिर से स्थापित करने का था. सोवियत-अफ़ग़ान युद्ध में मिली करारी हार से उसकी छवि धूमिल हुई थी. रूस उस भूल को ठीक करना चाहता था. अफ़ग़ान संकट को सुलझाकर उसकी कूटनीतिक शक्ति में भी विस्तार होने की संभावना थी.

इस बातचीत का एक और फायदा था. 90 के दशक में जब तालिबान पहली बार सत्ता में आया था, तब उसने लादेन के अल-क़ायदा समेत कई और आतंकी संगठनों को अपने यहां पनाह दी थी. ये आतंकी संगठन रूस और उसके सहयोगी देशों के लिए ख़तरा थे. रूस चाहता था कि दोबारा वैसी दहशत पैदा न हो. इसलिए, वो बैठक के जरिए अफ़ग़ानिस्तान में बढ़त हासिल करना चाहता था

मॉस्को फ़ॉर्मेट का कोई नतीजा नहीं निकला

हालांकि, जब तक मॉस्को फ़ॉर्मेट वाली बैठकों का कोई नतीजा निकलता, तब तक अमेरिका ने तालिबान के साथ दोहा में डील शुरू कर दी थी. अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर निकलने की बात की. 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने राजधानी काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया. इसके पंद्रह दिन बाद अंतिम अमेरिकी सैनिक भी बाहर निकल गया.

अब अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का एकछत्र राज़ है. हालांकि, हालात पहले से बदतर ही हुए हैं. अफ़ग़ानिस्तान बुनियादी चीज़ों की भारी तंगी से जूझ रहा है. तालिबान ने अमेरिका से सेंट्रल बैंक के रिज़र्व पर लगा प्रतिबंध हटाने की मांग की थी. अमेरिका ने इससे साफ़ मना कर दिया था. उसका कहना है कि वो प्रतिबंध तो नहीं हटाएगा, लेकिन अफ़ग़ान जनता के लिए मानवीय मदद भेजने पर विचार ज़रूर करेगा.

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अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद हालात और खराब हुए हैं. लोगों को खाने तक के लिए तरसना पड़ रहा.

‘मॉस्को फ़ॉर्मेट’ का जिन्न फिर बाहर आया

इस संकट के बीच एक बार फिर ‘मॉस्को फ़ॉर्मेट’ का जिन्न बाहर आया है. 20 अक्टूबर को हुई बैठक में तालिबान के अलावा दस देश शामिल हुए. रूस, भारत, चीन, ईरान, पाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताज़िकिस्तान, कज़ाख़िस्तान और किर्गिस्तान. इन सभी देशों की सुरक्षा पर अफ़ग़ानिस्तान संकट का असर पड़ता है. भारत की तरफ़ से इस बैठक में विदेश मंत्रालय के ‘पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान-ईरान’ डिविजन के संयुक्त सचिव जेपी सिंह ने हिस्सा लिया. तालिबान की तरफ़ से उप-प्रधानमंत्री अब्दुल सलाम हनफ़ी ने भाग लिया.

मॉस्को में हुई बैठक में सभी देशों ने उस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसमें तालिबान ने यूनाइटेड नेशंस में डोनर कॉन्फ़्रेंस बुलाने की मांग की है. ताकि अफ़ग़ानिस्तान को बिखरने से बचाया जा सके.

Russia Afghanistan

बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि ये कॉन्फ़्रेंस जल्द से जल्द बुलाया जाना चाहिए. बयान में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया कि अफ़ग़ानिस्तान को बचाने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उन देशों की है, जिनकी सेनाएं पिछले 20 सालों से इस देश में थी. ये इशारा अमेरिका और उसके नाटो सहयोगियों की तरफ़ था. 9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में वॉर ऑन टेरर शुरू किया था. 20 सालों तक बेहिसाब पैसा और ख़ून बहाने के बाद वे वापस लौट गए थे.

रूस को क्या उम्मीद है?

मॉस्को की बैठक में अमेरिका ने हिस्सा नहीं लिया. उसने अगले राउंड्स में भाग लेने का वादा किया है. रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने उम्मीद जताई कि अमेरिका बैठक में तय हुई बातों पर अमल करेगा.

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रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने उम्मीद जताई कि अमेरिका बैठक में तय हुई बातों पर अमल करेगा.

तालिबान के क़ब्ज़े के बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आशंका जताई थी कि इस्लामिक आतंकी रूस के हितों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इस आशंका की वाजिब वजहें भी हैं. तालिबान के कार्यकाल में ISKP अब तक कई हमले कर चुका है. इन हमलों में सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है. लावरोव ने ये भी कहा कि ‘मॉस्को फ़ॉर्मेट’ अफ़ग़ान संकट को सुलझाने का सबसे सटीक तरीका है. इसके पीछे रूस का उसका मकसद आज भी नहीं बदला है. उसे अपने प्रभाव को बरकरार तो रखना ही है, साथ ही उसे अपनी सुरक्षा की चिंता भी है.

अब यहां पर एक सवाल उठता है, क्या ‘मॉस्को फ़ॉर्मेट’ बैठक के ज़रिए तालिबान को मान्यता देने पर विचार किया जा रहा है?
रूस ने कहा कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है. बैठक का मेन फ़ोकस फिलहाल आर्थिक संकट और सुरक्षा पर है. हम उनके संपर्क में हैं. मान्यता देने का फ़ैसला इस बात पर निर्भर करता है कि तालिबान अपने वादों को पूरा करता है या नहीं.

Russia Germany Politics Diplomacy
क्या ‘मॉस्को फ़ॉर्मेट’ बैठक के ज़रिए तालिबान को मान्यता देने पर विचार किया जा रहा है? रूस ने कहा कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है.

रूस ने तालिबान को ‘आतंकी संगठन’ घोषित कर रखा है. फिलहाल इस स्थिति में बदलाव देखने को नहीं मिलेगा.

रूस ने मांग की है कि तालिबान सभी जातीय और राजनैतिक समूहों को सरकार में शामिल करे. सभी वर्ग के लोगों को समान अधिकार दे. महिलाओं को पढ़ने की आज़ादी दे. तभी आगे विचार किया जाएगा. तालिबान ने सत्ता हासिल करते समय कई सारे वादे किए थे. हालांकि, उसकी करनी और कथनी में भारी अंतर रहा है.

सामूहिक बैठक से इतर भारत ने भी तालिबान सरकार के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात की. इस दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के साथ कूटनीतिक और आर्थिक संबंध सुधारने पर विचार किया. तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने बताया कि भारत, अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय मदद भेजने के लिए तैयार है. द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार अफ़ग़ानिस्तान को गेहूं और दूसरी ज़रूरी चीज़ों की सप्लाई भेजने की तैयारी कर रही है.

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अफ़ग़ानिस्तान में सर्दी का मौसम आ रहा है. इस दौरान कई इलाकों में सप्लाई पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा. पहले से ही किल्लत से जूझ रहे अफ़ग़ानिस्तान को मदद की तत्काल ज़रूरत है. मॉस्को फ़ॉर्मेट का फायदा आम अफ़ग़ानियों तक पहुंच पाता है या नहीं, ये देखने वाली बात होगी.


दुनियादारी: तालिबान के किस प्रस्ताव पर भारत, पाकिस्तान और चीन ने सहमति दी?

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