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आदर्श पॉलिटिकल पार्टी का कुछ ऐसा हो आदर्श मेनिफेस्टो

हमारा सरकार से अनुरोध है कि वो तुरंत एक ऐसा क़ानून बनाएं जिसके तहत सभी राजनीतिक दलों को अपने घोषणापत्र को तीन हिस्सों में बांट देना ज़रूरी हो.
जुमले, वादे और इरादे.

अपनी तमाम ‘टू डू लिस्ट’ वो इन्हीं तीन सेक्शन में लिख के जनता के आगे रखे. टंटा ही खत्तम. इतनी ईमानदार अप्रोच रखने के बाद जनता का शिकायत का मुंह नहीं रहेगा.

जुमले

इस कैटेगरी में वो घोषणाएं हो जिनका सच्चाई से दूर दूर तक नाता न हो. महज़ कहने के लिए कही जाने वाली बातें इस कैटेगरी में शामिल की जाएं. हमारा मुल्क हमेशा से जुमला-पसंद मुल्क रहा है. ‘बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना’ या ‘बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी छोटी धांधलियां चलती रहती है’ मार्का जुमलों पर तालियां पीटने वाला मेरा भारत महान राजनीतिक दलों के जुमलों में एंटरटेनमेंट ढूंढ ही लेगा. हिट रहेगा ये सेक्शन. जितनी लंबी लंबी फेंकने का तमाम राजनेताओं को अभ्यास है, उसे देखते हुए ये कहा जा सकता है कि घोषणापत्र के इस हिस्से में बहुत कुछ लिखा जा सकेगा. आखिर उन्हें करना ही क्या है! बस मुंह से कुछ बोल ही तो उचरने हैं.

इसका एक फायदा ये भी है कि बदले में जनता एकाध जुमला खुद भी चिपका सकती है. जैसे हाल ही में आई एक फिल्म से श्री श्री रामाधीर सिंह का जुमला उधार लेकर पब्लिक बोल सकती है कि, ‘बेटा, तुमसे ना हो पायेगा’. दिलचस्प रहा करेगा घोषणापत्रों का ये वाला हिस्सा.

वादे

इस हिस्से में तमाम दल ये बताएं कि यहां लिखी तमाम बातें प्रेमी जनों द्वारा दोहराई जाने वाली उन हजारों-हजार घोषणाओं के समान है, जिनमे से कोई एकाध ही पूरी हो पाती है. वो भी बाई चांस. इरादतन कभी नहीं. जैसे चांद को ज़मीन पर उतारने का दावा करने वाला प्रेमी वक़्त आने पर ब्यूटीपार्लर का बिल भरने से ना-नुकुर करने लगता है, उसी तरह राजनीति में भी ‘बिफोर’ एंड ‘आफ्टर’ जैसी स्थिति होती ही होती है. भारत की समझदार जनता ये बात अच्छी तरह जानती है कि, ‘वादा तो टूट जाता है’. ग़ालिब ऐसी ही सिचुएशन से दो चार होने के लिए कह गए हैं,

“तेरे वादे पे जिए हम तो ये जान झूठ जानां,
कि खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता.”

और ग़ालिब से कोई भी हिन्दुस्तानी कभी नाइत्तेफ़ाक़ी नहीं दिखाता. इसलिए बाई डिफ़ॉल्ट जनता ये जान जाया करेगी कि घोषणापत्र के इस हिस्से को सीरियसली नहीं लेना का. क्यों कि उन्हें अच्छी तरह पता है अंत में रफ़ी साहब की आवाज़ में ही शरण हासिल होनी है.

‘क्या हुआ तेरा वादा’

या फिर किशोर को दोहराना है,

‘वादे पे तेरे मारा गया,
बंदा मैं सीधा सादा, वादा तेरा वादा’

इरादे

ये वाला सेगमेंट थोडा ट्रिकी है. इसकी जिम्मेदारी भी लेनी पड़ सकती है. इसलिए उम्मीद है कि घोषणापत्र के इस हिस्से में कुछ ज़्यादा नहीं लिखा जाने वाला. फिर भी अगर कोई राजनितिक दल चाहे तो अपने उन वादों के बारे में  यहां लिख सकता है जिन्हें पूरा करने का उनका सचमुच का इरादा हो. जाहिर है विपक्षी दलों द्वारा सदन ना चलने देना, गठबंधन में शामिल अन्य दलों से सहमती ना मिलना, किसी ख़ास वोट बैंक से वंचित होने का खतरा पैदा होना जैसे तमाम व्यवधान इन इरादों में बाधक बन सकते हैं. लेकिन वो बाद की कथा है. कम से कम यहां इमानदारी से ये मेंशन तो किया ही जा सकता है कि भई हम इन इन मामलों में गंभीर हैं. बाकी फिर वादा-खिलाफ़ी की तर्ज़ पर इरादा-खिलाफ़ी भी कौन बड़ी बात है?

इनके अलावा एक और ब्रह्मास्त्र मार्का चीज़ भी ऐड हो सकती है इसमें. अटूट कसम. हैरी पॉटर सीरीज में प्रोफ़ेसर सिविरियस स्नेप खाता है न ड्रेको मेल्फॉय के साथ, उसी तरह की. ऐसी कसम जिसे तोड़ने वाला सीधे भस्म. वैसे इस महान भूमि में ऐसे नेता या राजनितिक दल का अवतरण अभी तक नहीं हुआ है, जो लोगों के लिए अपनी जान खतरे में डाले. सो इस फ्रंट पर कुछ होने का सपना ना ही देखा जाए तो बेहतर.

बाकी जो है सो हईये है.


 

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