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'आजा आजा गिव मी अ किस' मजरूह ने किस कलम से लिखा होगा

मेरा माइक्रोमैक्स वाला दोस्त कहता है, पैसा हाथ का मैल है. आईफोन वाला दोस्त कभी ये नहीं कहता. इसीलिए वो आईफोन वाला है. पैसे की बड़ी अहमियत है साहब इस दुनिया में. इसे जानने के लिए दुनिया के बड़े लेखकों का साहित्य न पढ़ो. बस उनका लाइफ स्टाइल देख लो.

आदमी को इसके लिए क्या क्या करना पड़ता है. ये तब समझ में आया जब दारा सिंह को घाघरा चोली पहन नाचते देखा. पहलवान फिलिम लाइन में आया तो फिल्मकार उसका मनमाना यूज करने लगे. उसी तरह एक बड़े मारके के कवि और शायर हुए हैं. मजरूह सुल्तानपुरी. फिल्मी म्यूजिक और शायरी को ऐसे अनमोल नगीने दिए हैं मजरूह ने कि कलेजा फड़फड़ाने लगे. लेकिन एक गाना देखा कुछ दिन पहले. फिल्म ‘लव’ का. गाना था “आजा आजा गिव मी अ किस.”

एडिटर की जॉब आदमी में ऐसे घुस जाती है भाईसाब कि वो राह चलते सड़क किनारे साइन बोर्ड्स पर नजर रखता है. सबमें मात्रा, अनुस्वार, सरौता वाला स और पेटचिरवा ष को ध्यान से देखता है. एक भी गलती पकड़ में आए तो मन ही मन खुद को शाबाशी देता है. माइक्रो साइज का राइटर होने के नाते मेरा ध्यान भी पहले इस गाने के लिरिसिस्ट की तरफ गया. नाम देखा तो सांस अटक गई. सांप सूंघ गया. काटो तो खून नहीं. ये गाना मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था. मैंने खुद को चिकोटी काटी. लेकिन ये सपना नहीं था जो टूट जाता. ये हकीकत था और मेरे सामने चल रहा दो कौड़ी का टुच्चा गाना भी हकीकत थी.

घंटों चिंतन मनन करने के बाद यही समझ में आया कि किसी मजबूरी ने उनसे ये लिखवाया होगा. उनकी कलम ने बीच में स्याही पोंक दी होगी ये लिखने से पहले. उनके टूटे कूलर ने वो पन्ने हवा में उड़ा दिए होंगे जिसमें ये लिख रहे थे. फिर भी मजबूरी के मारे मजरूह फिर उठाकर लिखने लगे होंगे. ‘हाय मजबूरियां मेरे हालात की.’ जरूरत किसी से कब क्या करा ले, कोई नहीं जानता.

कुछ ऐसी ही मजबूरी रही होगी जब जावेद अख्तर ने ‘मैं हूं ना’ फिल्म का ‘गोरी गोरी गोरी गोरी गोरी गोरी, कभी कभी कहीं कहीं चोरी चोरी’ लिखा होगा. और गुलजार ने ‘झूम बराबर झूम’ का ‘किस ऑफ लव’ लिखा होगा. लेकिन खुशी की बात है कि मजरूह हों, जावेद या गुलजार. सबने ऐसे नाम डुबाऊ पीस एक दो ही लिखे हैं. बाकी हर जगह गानों से इनकी ममता टपकती रही है.

एक किस्सा किसी ने सुनाया था सत्यजीत राय का. सत्यजीत से किसी ने पूछा कि आप इतनी अच्छी फिल्म बनाते हैं. पर कभी कभी ऐसी घटिया फिल्म बना देते हैं कि यकीन नहीं होता कि आपने बनाई है. ऐसा लगता है कि आप जान बूझ कर ये करते हैं. क्यों?
सत्यजीत ने उनको बताया था कि यही घटिया फिल्में कमाई कराती हैं. अच्छी वाली सिर्फ तारीफ कराती हैं. तो मैं कमाऊ फिल्मों से पैसा कमाकर तारीफ कमाने वाली फिल्में बनाता हूं.

इन लोगों का जवाब भी यही होगा अगर कोई पूछे तो. है कि नहीं?

क्या मजबूरी रही होगी कि दारा सिंह घाघरा पहन के नाचे थे?

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