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क्या पार्टी छोड़ने वाले सांसद और विधायक अपनी खुद की नई पार्टी बना सकते हैं?

लोक जनशक्ति पार्टी यानी LJP में बगावत हो गई है. पार्टी के 6 में से 5 सांसदों ने राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है. सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिख कर कहा है कि उन्हें LJP से अलग एक अन्य पार्टी के रूप में मान्यता दे दी जाए. लेकिन सवाल है कि क्या ऐसा सम्भव है? क्या सांसदों का एक समूह अपनी अलग पार्टी बना सकता है? तरीका क्या है? सबसे पहले लोजपा में पड़ी फूट का मामला समझ लीजिए.

क्या है मामला?

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में लोजपा ने 6 सीटें जीती थीं. चिराग पासवान (जमुई), पशुपति पारस पासवान (हाजीपुर), रामचंद्र पासवान (समस्तीपुर), चंदन सिंह (नवादा), वीणा देवी (वैशाली) और महबूब अली केसर (खगड़िया) लोजपा के सांसद हैं. रामचंद्र पासवान की मौत हो गयी. उपचुनाव हुए. उनके बेटे प्रिंस राज ने समस्तीपुर लोकसभा सीट जीत ली. पशुपति और रामचंद्र पासवान क्रमशः चिराग के चाचा और ताऊ हैं. प्रिंस ठहरे चिराग़ के चचेरे भाई.

साल 2020 में पार्टी सुप्रीमो राम विलास पासवान की मृत्यु के बाद चिराग पासवान लोजपा के अध्यक्ष बन गए थे. अब बस ख़ुद चिराग़ को छोड़कर बाक़ी सांसद अलग हो गए, और कहा कि उनके नेता चिराग़ नहीं बल्कि पशुपति पारस हैं. अलग पार्टी की मांग कर दी. पार्टी का विभाजन कैसे होगा, यह अभी साफ नहीं है. पार्टी का सिम्बल किसके पास जागी,ये भी साफ़ नहीं है. जब लोकसभा स्पीकर अलग पार्टी को इजाजत देते हैं, तभी विभाजन को आधिकारिक माना जाएगा. फिर आयोग की नियमावली के अनुसार निर्णय लिए जा सकते हैं.

अलग पार्टी बनाने का तरीका क्या है?

लोगों का समूह मिलकर नया राजनीतिक दल बना सकते हैं. इस दल को चुनाव आयोग में रजिस्टर कराया जा सकता है, चुनाव लड़ा जा सकता है, आदि. लेकिन वर्तमान स्थिति में यह स्थिति नहीं है. सांसदों और विधायकों के दल बदलने की स्थिति में दल-बदल कानून लागू हो जाता है. यह कानून एक मार्च 1985 में लागू किया गया था. संविधान में 52वें संशोधन के तहत 10वीं अनुसूची जोड़ी गई.

इस कानून के तहत विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर रोक लगा दी गई. इसमें प्रावधान है कि दल-बदल के कारण सांसदों, विधायकों की सदस्यता भी खत्म हो सकती है. हालांकि कानून के मुताबिक चुने गए सदस्यों को अयोग्य करार देने का फैसला सदन के अध्यक्ष ही करते हैं.

लेकिन कैच भी है. नियम है कि अगर किसी पार्टी के दो तिहाई सांसद या विधायक दूसरी पार्टी के साथ जाते हैं तो उनकी सदस्यता खत्म नहीं होगी. अगर पार्टी का बंटवारा होता है और एक तिहाई विधायक नया ग्रुप बनाते हैं तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी.

बाद में साल 2003 में इस कानून को संशोधित किया गया. संविधान के 91वें संशोधन के तहत सामूहिक दल-बदल को भी असंवैधानिक करार दे दिया गया. इसके तहत अगर किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य मूल पार्टी को छोड़कर दूसरी किसी पार्टी में शामिल हो जाते हैं तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. अगर कोई पूरी पार्टी किसी दूसरी पार्टी में विलय कर लेती है तो किसी की सदस्यता नहीं जाएगी. पाठक और दर्शक ‘नई पार्टी’ और ‘दूसरी पार्टी’ के अंतर को समझें. वहीं पर सारा खेल है.

इसके अलावा अगर किसी पार्टी के सांसद, विधायक अलग होकर नई पार्टी बना लेते हैं तो भी किसी की सदस्यता नहीं जाएगी. यही नहीं अगर पार्टी के दो तिहाई सदस्य किसी नई पार्टी में शामिल हो जाते हैं तो भी सदस्यता बच जाती है. तमाम स्थितियों में स्पीकर का फैसला आखिरी माना जाता है. और स्पीकर के फ़ैसले की समीक्षा भी हो सकती है, लेकिन केवल कानूनी तौर पर ही.

क़ानूनी मामलों की वेबसाइट लाइवलॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1957 से 1967 तक 542 बार सांसदों और विधायकों ने अपने दल बदले. 1967 में 430 बार सांसदों-विधायकों ने पार्टी बदली. 1967 के बाद एक वक्त ऐसा आया कि दल बदलने के कारण 16 महीनों में 16 राज्यों की सरकारें गिर गईं. इसी दौरान हरियाणा के विधायक गयालाल ने 15 दिनों में तीन बार पार्टी बदली थी. ख़बरें बताती हैं कि गयाराम के दलबदल को देखते हुए नारा चला था ‘आया राम, गया राम’. फिर 1985 में राजीव गांधी सरकार विधेयक लेकर आयी और बदलावों की फ़ेहरिस्त लगी. क़ानूनों को देखें तो लोजपा के मामले में गेंद अब स्पीकर के हाथ में है. बाक़ी जो होगा, पता चल ही जाएगा.


 

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