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केजरीवाल जी काम करो, बकैती के लिए दुनिया पड़ी है

मुख्यमंत्री दिल्ली, अरविंद केजरवाल जी

आपके फैन्स की गिनती ग्राफ में ऊपर चली जाती है. गोवा तक आपने चुनावी रणक्षेत्र फैला दिया है. पंजाब में हर गली चौराहे आपका हल्ला है. उम्मीद जोर है कि जीत ही लेंगे पंजाब. हवा का रुख आपकी तरफ है. सब ठीक ठाक चल रहा होता है तभी आप कुछ कोई चिरकुटई का काम कर देते हैं.

एक लेटर देखा. मीडिया और सोशल मीडिया में दिन भर टहलता रहा. ओपन लेटर था तो जाहिर है दुनिया को दिखेगा ही. वो आपने दिल्ली राज्यपाल नजीब जंग के नाम लिखा था. साथ में लपेटा पीएम मोदी को. नजीब जंग को ताना मारा कि कुछ भी कर लो मोदी जी आपको उप राष्ट्रपति नहीं बनाने वाले. ये लेटर देख लो भाई सब लोग.

Kejriwal letter

तो मुद्दा ये है कि आप किस वादे के साथ पॉलिटिक्स में आए? हम राजनीति बदलने आए हैं. हम राजनीति सिखाने आए हैं. आप एक तरफ पीएम को ललकारते हैं “इनकी भाषा देखिए जी.” खुद उनको साइकोपैथ कहते हैं. कभी दिल्ली पुलिस को ठुल्ला बोल देते हैं. कभी किसी के पिछवाड़े पर लात मारकर निकाल देते हैं.

24 घंटे में 36 घंटे काम करने की अफवाह भले पीएम के बारे में फैली हो. लेकिन आपके बारे में ये सच लगती है. भैया इतना टाइम किसके पास होता है. कि एक स्टेट के सीएम का पद संभाले. अपने विधायकों को बचाए. ‘परेशान करने वालों’ के बीच काम करता रहे. स्टेट की 50 तरह की मुसीबतों से निपटते हुए दो और स्टेट्स में बिसात बिछा दी हो. और इतने बिजी शेड्यूल से भी टाइम निकाल एक ओपन लेटर लिख डाला. वो भी बेइज्जती से भरपूर.

लेकिन साहब, इससे बेइज्जती आपकी होती है. आपका अंधसमर्थक तो खूब वाहवाही करते हुए उसे शेयर करेगा. लेकिन जिसके पास थोड़ी भी अक्ल होगी वो अपने फैसले पर फिर से सोचेगा. कि आपको ये कुकुरझौंझौं करने के लिए कुर्सी दी है या स्टेट संभालने के लिए.

देखो बॉस, अपने को पॉलिटिक्स नहीं आती. अपन जनता हैं. बोर हो गए हैं नेताओं के घिसे पिटे भाषण सुनकर. वही ‘कड़ी निंदा’ और ‘मेरे बयान को तोड़ मरोड़कर पेश किया गया है’ के अलावा कोई डायलॉग नहीं आता. तो हम इससे ऊबे जरूर हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि 24 घंटे लालू यादव छाप मसखरी को अप्रीशिएट करेंगे. या विधानसभा में मां बहन की गालियों का इंतजार करेंगे.

फिर गुरू अगर हम बोरियत महसूस करेंगे तो टीवी खोल लेंगे. सीरियल वाला कोई चैनल लगा लेंगे. उसके लिए हमें विधानसभा की फुटेज देखने की नौबत आए तो बड़ी शर्म की बात है. गाली वाली को असंसदीय भाषा क्यों कहा जाता है. और हम क्यों उसके इस्तेमाल की उम्मीद अपने नेताओं से नहीं करते. क्योंकि उनको जनता चुनती है एक आइकन के रूप में. आदर्श स्थापित करने के लिए. खाली गरियाने के लिए कोई नेता बनना चाहे तो कस्टमर केयर को फोन पर गरियाने वाले चच्चा में कौन सी बुराई है. उनको बना दें दिल्ली का सीएम.

आपके पास अगर वाकई राज्यपाल से कहने के लिए कुछ है तो उसे पब्लिक अटेंशन सीकिंग के लिए न इस्तेमाल करो. प्वाइंट दर प्वाइंट लिखकर आपस में डिस्कस करो. पब्लिक को कुकुरझौंझौं में मजा आता है. जहां सड़क पर दो शराबी भी लड़ रहे हों तो उनको देखने के लिए भीड़ जम जाती है. तो महज भीड़ इकट्ठी करने के लिए ये स्टंट मत करो. अगर अपने अपोजीशन को सबक सिखाना चाहते हो तो वो भी एक प्रॉपर तरीके से. ये सड़कछाप लोगों वाला हथियार इस्तेमाल मत करो प्लीज.

आपका

असली वाला आम आदमी

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