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अपने देश से आठ लाख भारतीयों को निकालने पर क्यों आमादा है कुवैत सरकार?

सामान्य ज्ञान की सस्ती किताबें पढ़ने का चलन अब घट रहा है. लेकिन एक वक्त वो खूब पढ़ी जाती थीं. और उनमें तब एक सवाल ज़रूर होता था- किस देश की मुद्रा दुनिया में सबसे महंगी होती है? उत्तर लिखा होता था- कुवैत. कुवैत की मुद्रा है कुवैती दिनार. एक कुवैती दिनार भारत के 242 रुपये के बराबर है. यानी कोई कुवैत जाकर वहां एक दिन में 100 कुवैती दिनार भी कमाएगा, तो भारत में वो 24 हज़ार 200 रुपये एक दिन की कमाई होगी. इसी लुभावने गणित के फेर में लाखों भारतीय बरसों से कुवैत जाते रहे हैं. और कुवैत का वीजा मिलना यूरोप-अमेरिका की तरह मुश्किल भी नहीं रहा है.

लेकिन अब कुवैती सरकार ऐसे भारतीयों के भविष्य को पलीता लगाने की तैयारी कर रही है. कुवैत से भारतीयों की एक बड़ी संख्या को निकालने की तैयारी कर रही है. एक ऐसा कानून तैयार किया जा रहा है, जिसके जरिए कुवैत में रहने वाले भारतीयों की अधिकतम संख्या तय की जाएगी. कुवैत क्यों ऐसा कर रहा है और जिन भारतीय मजदूरों ने कुवैत को अमीर बनाने में अपना पसीना बहाया, उसी कुवैत की सरकार को अब भारतीय क्यों चुभने लगे हैं?

कुवैत है कहां पर

पहले दुनिया के नक्शे में कुवैत का भूगोल देख लीजिए. पश्चिम एशिया में छोटा-सा देश. कितना छोटा देश है- पूरा कुवैत देश हमारी दिल्ली से बस थोड़ा ही बड़ा है. इसके उत्तर में इराक और दक्षिण में सऊदी अरब. कुवैत को छोटा और कीमती समझकर 1990 में उस वक्त इराक के शासक रहे सद्दाम हुसैन ने कब्जा करने का मन बना लिया था. कब्जा कर भी लिया था, लेकिन फिर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने इराक को कुवैत से हटाया. इतिहास में ये खाड़ी युद्ध या गल्फ वॉर के नाम से दर्ज है. सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर फरेब इसलिए डाला, क्योंकि कुवैत में बेहिसाब तेल के भंडार हैं. दुनिया के छह फीसदी तेल के भंडार कुवैत में हैं, जो बिल्कुल एक छोटा सा देश है.

कुवैत पश्चिमी एशिया का छोटा सा मुल्क है. इसका आकार दिल्ली जितना ही है.
कुवैत पश्चिमी एशिया का छोटा सा मुल्क है. इसका आकार दिल्ली जितना ही है.

तेल तो जमीन में था, निकालने वाले कहां से आए?

अब कुदरत के दिए तेल भंडार तो कुवैत में थे. लेकिन इस तेल को निकालने के लिए चाहिए ढेर सारे मज़दूर, जो ज़्यादा तनख्वाह भी न लें. इसलिए फिर दूसरे देशों के लोगों को कुवैत ने भर्ती करना शुरू कर दिया. इन्हें अंग्रेजी में कहा जाता है- एक्सपैट्रियट. शॉर्ट में कहते हैं एक्सपैट. शब्दकोश वाली परिभाषा से कहें, तो वो लोग जो नौकरी या अस्थायी तौर पर रहने के लिए किसी दूसरे देश में जाते हैं, लेकिन वहां स्थायी तौर पर बसने के इरादे से नहीं जाते हैं. एक्सपैट को हिंदी में हम प्रवासी कहेंगे.

अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो गए कुवैती

अब कुवैत में ये एक्सपैट या प्रवासी कितने हैं. कुल आबादी का 70 फीसदी. कुवैत की कुल आबादी है 43 लाख. इनमें से 13 लाख कुवैत के हैं और 30 लाख प्रवासी हैं. यानी कुवैत में कुवैती अल्पसंख्यक हो गए हैं. अब जो 30 लाख प्रवासी हैं, उनमें भी सबसे ज्यादा भारतीय हैं. लगभग 10 लाख. दूसरा नंबर है इजिप्ट के लोगों का. कुवैत की गिनती दुनिया के सबसे अमीर देशों में होती है. और इस अमीरी के पीछे वजह सिर्फ तेल है. तेल की रिफाइनरी लगी, तो कुवैत ने दूसरे देशों से इंजीनियर या मजदूर भर्ती करने शुरू कर दिए. इसके अलावा कुवैती लोगों की जेब में पैसा गया, तो वो भी अमीर हुए. उन्होंने अपनी सुख-सुविधाएं. बढ़ाई और इसके लिए उन्हें डोमेस्टिक वर्कर्स की जरूरत पड़ी. जैसे ड्राइवर, माली, रसोइया, क्लीनर. इनकी भर्ती कुवैत ने भारत से भी की.

कितने भारतीय हैं कुवैत में

# कुवैत में मौजूद भारतीय दूतावास के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 28 हजार भारतीय वहां सरकारी नौकरी में हैं- जैसे नर्स, तेल कंपनियों के इंजीनियर्स या वैज्ञानिक.

# 5 लाख 23 हजार भारतीय प्राइवेट कंपनियों में काम करते हैं.

# इनके डिपेंडेंट हैं एक लाख 16 हजार. ये वहां काम करने वालों के परिवार के लोग हैं. इनमें से 60 हजार तो भारतीय बच्चे तो वहां के स्कूलों में ही पढ़ते हैं.

# 3 लाख 27 हजार डॉमेस्टिक वर्कर्स हैं. जैसे ड्राइवर, माली, क्लीनर, रसाइये. इन्हें अपना परिवार कुवैत में लाने की इजाजत नहीं है.

कोरोना ने बिगाड़ा मामला

ये भारतीय और बाकी देशों के प्रवासी इस साल के मार्च तक तो कुवैत की जरूरत थे. यानी इनके बिना काम ही नहीं चलेगा वाली हालत थी. लेकिन जैसे ही कोरोना शुरू हुआ, वहां प्रवासी के खिलाफ बयानबाजी शुरू होने लगी. वहां के नेता और सरकारी अधिकारी प्रवासियों को कम करने की मांग करने लगे. असल में कुवैत की अर्थव्यवस्था में 90 फीसदी योगदान तेल का है. तेल महंगा बिकेगा, तो कुवैत अमीर, तेल नहीं बिकेगा, तो कुवैत बर्बाद. ये वाला हाल है. इस साल के शुरू से ही तेल की कीमतें गिरती रहीं और कोरोना शुरू होने के बाद तो तेल की खपत में भी भारी गिरावट आनी शुरू हो गई.

कुवैत में 10 लाख से ज्यादा भारतीय लोग रहते हैं.
कुवैत में 10 लाख से ज्यादा भारतीय लोग रहते हैं.

तेल का है असली खेल

दिसंबर में तेल की कीमत 65 डॉलर प्रति बैरल थी, तो अब 20 से 30 डॉलर प्रति बैरल वाला भाव आ गया. एक तो दाम गिर गए और दूसरा तेल बिक नहीं रहा. यहां कुवैत की बर्बादी शुरू. कुवैत की अर्थव्यवस्था कोरोना की वजह से 40 फीसदी नीचे गिरी. हालत ये है कि कुवैत ने अपने भविष्य की योजना के लिए जो फंड जुटाया था, उसमें से देश चलाने के लिए खर्च करना पड़ रहा है. और ऐसे हालात में जब सरकारों पर सवाल उठते हैं, तो वो सॉफ्ट टारगेट ढूंढती हैं. कुवैत में ये सॉफ्ट टारगेट है- प्रवासी कामगार.

70 से 30 फीसदी की जाएगी बाहरी लोगों की आबादी

कुछ दिन पहले कुवैत के पीएम शेख सबाह अल खालिद अल सबाह का बयान आया था, जिसमें उन्होंने एक्सपैट्स को कुल आबादी के 70 फीसदी से घटाकर 30 फीसदी करने की बात कही थी. बस इसी के लिए कुवैत की सरकार एक बिल लाने की तैयारी में है. ‘गल्फ न्यूज’ के मुताबिक, इस बिल के ड्राफ्ट को कुवैत की संसद की लीगत और लेजिस्लेटिव कमेटी की सहमति मिल गई है. बिल में ये प्रवाधान है कुवैती आबादी के 15 फीसदी से ज्यादा भारतीय वहां नहीं रह सकते. यानी कुवैत में रहने वाले करीब आठ लाख भारतीयों को वहां से निकाला जा सकता है. हालांकि इसमें निशाने पर सिर्फ भारतीय हों, ऐसा भी नहीं है. कुवैत में दूसरे नंबर इजिप्ट के प्रवासी हैं.

धीरे-धीरे, साल दर साल होगी कटौती

बिल के प्रावधान के मुताबिक, कुवैती आबादी के 10 फीसदी तक ही इजिप्ट के लोगों को रखा जाएगा. और प्रवासियों को एक साथ भी नहीं निकाला जाएगा. ‘कुवैत टाइम्स’ में छपे संसद के स्पीकर मरजौक अल घानेम के बयान के मुताबिक, धीरे-धीरे प्रवासियों को कम किया जाएगा. मसलन अगर इस साल 70 फीसदी हैं, तो अगले साल 65 फीसदी कर दिया जाएगा. हालांकि संसद के स्पीकर ने ये भी कहा कि देशों के हिसाब से प्रवासियों की संख्या तक करने का कोई विचार नहीं है. तो फिर किस आधार पर प्रवासियों को निकाला जाएगा. इसका एक हिंट संसद स्पीकर ने दिया कि कुवैत में 13 लाख प्रवासी या तो कम पढ़े लिखे हैं या फिर अनपढ़ हैं, ऐसे लोगों की कुवैत को जरूरत नहीं है.

कुवैत से भारत आए थे 300 अरब रुपये

यानी दो तीन महीने तक कुवैत की सरकार को इन अनपढ़ों में सस्ता लेबर दिखता था. ये बरसों से वहां काम कर रहे थे, कुवैती लोगों को कोई दिक्कत नहीं हुई और अब वहां अर्थव्यवस्था गिरी, तो प्रवासियों की साक्षरता का खयाल आया. जाहिर है, कुवैत जिस नए कानून को लाने की तैयारी कर रहा है, उसमें सबसे ज्यादा नुकसान भारत और भारतीयों का ही होगा. भारत में विदेशों से आने वाली सबसे ज्यादा कमाई में कुवैत का चौथा स्थान है. साल 2018 में कुवैत से भारत में करीब 300 अरब रुपये आए थे. कुवैती सरकार के नए नियम से इस कमाई पर असर पड़ेगा, साथ ही लोगों का जमा-जमाया रोज़गार जाएगा. इस बाबत के विदेश मंत्रालय का या कुवैत में भारत के दूतावास का कोई बयान नहीं आया है.


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