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कैसे आता है एवलांच जो सियाचिन में अब तक 873 जवानों की जान ले चुका है

सियाचिन के नॉर्थ ग्लेशियर के पास 18 नवंबर को भयंकर हिमस्खलन (एवलांच) हुआ. इसमें 4 जवानों के साथ 2 पोर्टरों (कुली) की मौत हो गई. रिपोर्ट के मुताबिक, दोपहर साढ़े 3 बजे हुए एवलांच ने कुछ चौकियों को तबाह कर दिया. जब ये एवलांच हुआ उस वक्त 19 हजार फीट पर सेना के 8 जवानों का दल गश्त कर रहा था. बताया जा रहा है कि गश्त करने वाला दल दूसरे पोस्ट पर बीमार पड़े जवान को निकालने जा रहा था. तभी एवलांच हुआ और 8 जवान बर्फ में दब गए.

इस मामले की खबर मिलते ही बचाव दल मौके पर पहुंचा, सभी को बर्फ के भीतर से निकाला. उनमें से 7 जवानों की स्थिति गंभीर थी जिन्हें हेलिकॉप्टर से आर्मी हॉस्पिटल पहुंचाया गया. लेकिन आर्मी हॉस्पिटल पहुंचते ही 4 जवानों की मौत हो गई. मौत की वजह हाईपोथर्मिया बताई गई. हाइपोथर्मिया का मतलब है शरीर का तापमान सामान्य यानी 98 डिग्री फॉरेनहाइट से कम हो जाना. इस कंडिशन में बाहर का तापमान कम होने की वजह से शरीर पर्याप्त गर्मी पैदा नहीं कर पाता है.

जवानों की मौत पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी दुख जताया. उन्होंने ट्विटर पर लिखा-

सियाचिन में हिमस्खलन के कारण जवानों के शहीद होने से गहरा दुख हुआ. मैं उनके साहस और राष्ट्र की सेवा को सलाम करता हूं. उनके परिवारों के प्रति मेरी संवेदना.

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सियाचिन में एवलांच की वजह से 4 सैनिक समेत 6 की मौत. (फाइल फोटो)

सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा वॉर ज़ोन

सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा वॉर ज़ोन है, जो काराकोरम रेंज में समुद्र तल से 20 हज़ार फ़ुट की ऊंचाई पर स्थित है. नॉर्थ पोल और साउथ पोल के बाद सियाचीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्लेशियर है. यहां ड्यूटी देने वाले सैनिकों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. क्योंकि यहां नॉर्मल टेंपरेचर माइनस 10 डिग्री होता है जबकि अक्टूबर से मार्च तक यहां का पारा माइनस से 50 डिग्री नीचे चला जाता है. यहां तक कि सर्दियों के मौसम में बर्फीले तूफ़ान और तेज़ हवाएं 200 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से चलती हैं. जिसमें हिमस्खलन का भी खतरा बना रहता है.

रिपोर्ट्स बताते हैं कि सर्दियों में जवानों को सांस लेने की भी समस्या हो जाती है, क्योंकि यहां ऑक्सीजन में भी 30 प्रतिशत तक की कमी हो जाती है.

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कुछ वक्त पहले जवानों के खाने का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें जूस से लेकर अंडे और आलू तक सब जमे हुए थे. (फाइल फोटो)

एवलांच या हिमस्खलन क्या होता है?

अंग्रेजी में कहें तो एवलांच और हिंदी में कहें तो हिमस्खलन. आसान भाषा में कहें तो पहाड़ पर जमे बर्फ का टूटकर गिरना. पहाड़ों पर बर्फ के ज्यादा बढ़ने, तापमान में बढ़ोतरी, हवा में नमी की कमी, भूकंप, नैचुरल, इंसानी विस्फोट. इनमें से किसी भी वजह से एवलांच हो सकता है. अमेरिकी एवलांच स्पेशलिस्ट सिमॉन ट्रॉन्टमैन कहते हैं-

ज्यादातर मौके पर हिमस्खलन प्राकृतिक तौर पर आते हैं, और ये जानलेवा नहीं होते लेकिन इंसानी हस्तक्षेप होने के बाद ये इंसानों से बदला लेना बेहतर जानता है.

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एवलांच कई बार 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ता है. (फाइल फोटो)

कैसे आता है एवलांच?

पहाड़ों पर जब टेंपरेचर कम होता है तो उनकी ऊंची चोटियों पर बारिश नहीं बर्फबारी होती है. ये बर्फ रुई की तरह मुलायम होती है. लगातार बर्फबारी के बाद पहाड़ों के ऊपर अलग से बर्फ की चट्टान तैयार हो जाती है. इस बीच अगर धूप निकल जाए या फिर हवा में नमी की कमी हो जाए तो इस बर्फ के ऊपर एक कड़ी परत जम जाती है. ठीक वैसे ही जैसे की आपके फ्रीज़र में बर्फ जमती है.

अब बर्फ के इसी हार्ड सरफेस पर दोबारा बर्फबारी होती है, तो वो ज्यादा देर तक उस हार्ड सरफेस पर नहीं टिक पाती है. ऐसी बर्फ भारी होती है और नीचे की ओर सरकने लगती है. चूंकि गुरुत्वाकर्षण का नियम हर जगह काम करता है तो वो यहां भी ऐप्लिकेबल है. नीचे की ओर सरकती हुई बर्फ अपने साथ पहाड़ पर जमे और भी बर्फ को घसीटती है. ऐसे में बर्फीले तूफान की स्थिति बन जाती है.

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एवलांच के भीतर फंसे हुए इंसान को अगर कुछ ही देर में नहीं निकाला गया तो जान बचानी मुश्किल हो जाती है. (फाइल फोटो)

हिमस्खलन कितना खतरनाक होता है?

पहाड़ की ढलान जितनी तीखी होगी एवलांच उतना ही शक्तिशाली और तबाही करने वाला होगा. क्योंकि ढलान वाली जगह पर ये काफी तेज रफ्तार से आगे बढ़ती है. और ये तब तक नहीं रुकती जबतक समतल मैदान नहीं मिल जाए. एक एवलांच लाखों टन बर्फ को समेटते हुए आगे बढ़ता है, जिसकी स्पीड 300 से 350 किलोमीटर प्रति घंटे से भी ज्यादा होती है.

बर्फ के टुकड़े रुई की तरह फिर जानलेवा कैसे?

तूफान जब समतल इलाके में पहुंचता है तो वहां बर्फ की ऊंची परत बना देता है. ऐसे में अगर इसमें कोई इंसान बर्फ के भीतर दब जाए और उसे जल्दी नहीं निकाला गया तो उसकी जान जानी तय होती है. क्योंकि जो बर्फ शुरुआत में रुई की तरह होती है, वो समय बीतने और गर्मी के साथ कठोर हो जाती है. ऐसे में उसके भीतर फंसे इंसान को बचा पाना मुश्किल हो जाता है. और अगर किसी तरीके से इंसान को निकाल भी लिया गया तो वो हाईपोथर्मिया का शिकार हो जाता है.

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हवा में नमी की कमी के बाद बर्फ का बाहरी हिस्सा कठोर हो जाता है. (फाइल)

बाकी आखिर में बताते चलें कि सियाचिन को 1984 में मिलिट्री बेस बनाया गया था. तब से लेकर अब तक 873 सैनिक सिर्फ खराब मौसम, बर्फीले तूफान और हिमस्खलन के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं.


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